शेखर सिंह की कविताएँ


शेखर सिंह 


मनुष्य की यह सामान्य फितरत है कि वह दूसरे के बारे में जानने समझने की जिज्ञासा से हमेशा भरा होता है। जब भी किसी परिचित से हम मिलते हैं तो सामान्य तौर पर हमारा यह  पहला सवाल होता है कि 'कैसे हो?' सामने का व्यक्ति चाहें वह जिस परिस्थिति में हो, जवाब देता है कि 'ठीक हूँ'। यह सवाल और जवाब इतना रूटीन टाइप्ड हो चुका है कि अक्सर अभिनय सरीखा लगता है, बावजूद इसके यथावत चलता रहता है। यथावत इस तरह कि दो चार क्षण थम कर आपस में इत्मीनान से कुछ बात तो कर ली जाए। लेकिन एक कवि इसे अस्वीकार करता है उसके लिए यह परिस्थिति भी कुछ अलग तरह की होती है। युवा कवि शेखर सिंह अपनी कविता में लिखते हैं "पूछूँगा नहीं/ कि कैसे हो/ अगर तहज़ीब और सरलता के/ आपसी शीत युद्ध में/ शहादत हमेशा आपसी क़रार की होनी हो/ ...अगर समय की कमी/ और बेमतलब की भागदौड़ में/ हमेशा ख़ुदकुशी करना पड़ता हो/ ज़रा से ठहराव को/ तो बिलकुल नहीं पूछूँगा"। एक लम्बे अरसे बाद पहली बार पर शेखर की कविताएँ साया हो रही हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर सिंह की कुछ बिल्कुल नई कविताएँ।



शेखर सिंह की कविताएँ 


जिरहबख़्तर 


तुम्हें जब कभी पुकारा गया 

तुम उपलब्ध रहे,

पुकारना जैसे इन्सानी सभ्यता की 

सबसे मनोरम आदत हो,

इस विचार में बहुत गहरे 

तुम डूबते चले गए 

और उपलब्ध रहे 


तुम उपलब्ध रहे जंग में 

एक वफ़ादार योद्धा की तरह 

उपलब्ध तब भी रहे जब आसमान 

बिलकुल साफ़ था 

खड़े रह गए संरक्षण में 

ज़ँग लगता हुआ जिरहबख़्तर पहने 


तुम प्यार में उपलब्ध रहे 

बेआवाज़ होती शहादत को 

पुरानी यादों की हँसी में उड़ाते हुए 

और आख़री क्षणों से ठीक पहले 

एक मौजूदगी के भरम को 

पुरस्कार क़रार देते चले गए 


इन सब कुछ के बाद 

अपनी आदत से बाज़ नहीं आये तो 

जीने के सलीके में 

हमेशा उपलब्ध नहीं होने की 

हिदायत बन कर 

किंवदंती हो गए 


किंवदंतियों में उपलब्ध रहे।


(अप्रैल, 2026)



तुम कैसा महसूस करते हो 

(1)


पूछूँगा नहीं 

कि कैसे हो 

अगर पूछ सकता नहीं 

कैसा महसूस करते हो 

उन सब कुछ के बारे में 

जिनके ज़िक्र से ठीक पहले 

कह देते हो कि अच्छा हूँ 

और खो जाते हो 

अच्छा होना दिखाई पड़ने के 

अभिनय के पेच ओ ख़म में 


पूछूँगा नहीं 

कि कैसे हो 

अगर तहज़ीब और सरलता के 

आपसी शीत युद्ध में 

शहादत हमेशा आपसी क़रार की होनी हो 


अगर समय की कमी 

और बेमतलब की भागदौड़ में 

हमेशा ख़ुदकुशी करना पड़ता हो

ज़रा से ठहराव को

तो बिलकुल नहीं पूछूँगा


जब तक कि गढ़ नहीं लिए जाते 

नये तौर तरीके 

नये रिवाज, नयी रस्में 

और वो सब कुछ नया 

जिनके होने में 

मैं जान सकूँ 

कम से कम 

कि तुम,

दरअसल कैसे हो?


(नवम्बर, 2025)




तुम कैसा महसूस करते हो 

(2)


तुम कैसा महसूस करते हो

ठहाका लगा लेते हो हर रोज़ किसी बात पर

या रात को गहरी नींद सो लेते हो?


आख़री बार ज़रा ठहर कर 

कब गुनगुनाई थी कोई धुन 

किसी उदास शाम की अनकही फ़रमाइश पर 

जब मन किसी छूटती जा रही रेल की 

नाकाम हड़बड़ी में नहीं था?


छोड़ो अच्छा ये बताओ 

किसी पुरानी मगर 

बेरंग नहीं पड़ गई याद से

बेवजह प्यार कर लेते हो?

या दम तोड़ चुकी आत्मा की 

ठंडी पड़ गई लाश ढोते हो? 


(फ़रवरी, 2026)



सुराग 


एक शहर है जो नक़्शों में मौजूद है 

एक शहर मेरे अंदर है बेनाम 

कोई नक़्शा नहीं है 

केवल रंग हैं 

कहीं ज़्यादा खिले हुए 


जहाँ नदियाँ सिर्फ़ नदियाँ हैं 

आसमान सिर्फ़ आसमान 

इंसान सिर्फ़ इंसान 

पहाड़ किसी देवता का क़िला नहीं है

लावारिस पड़े पत्थर जहाँ कुछ रंग रखते हैं 

जहाँ मुस्कुराने और ख़ुश रहने की 

ये कुछ अजीब वजहें काफ़ी हैं


इन शहरों के दरमियान 

कुछ मील दूर 

उजाड़ सा कोई इलाक़ा पड़ता है 

चश्मदीदों की राय में मुझे आख़री बार 

इसी इलाक़े में देखा गया है।


(मार्च, 2026)



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)



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