सुरेश कुमार का आलेख 'उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियां'
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| सुरेश कुमार |
'उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियां'
सुरेश कुमार
हिंदी नवजागरणकालीन इतिहास की यह बड़ी दिलचस्प घटना थी कि उन्नीसवीं सदी की विदुषी लेखिका बीबी रत्नकुँवर की किताब उनके गुजर जाने के बाद उनके प्रपौत्र की इजाज़त से छपी थी। इससे औपनिवेशिक भारत में पितृसत्ता की चमक-दमक और उसके रसूख़ का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। उन्नीसवीं सदी में पितृसत्ता के रसूख के चलते स्त्रियों को अपने साहित्य-सृजन को सामने लाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। वह स्त्री भले ही विदुषी क्यों न हो? इस महान लेखिका के प्रपौत्र हिंदी के प्रसिद्ध शिक्षाविद् और लेखक राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ थे। उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों को मर्दवादियों द्वारा ‘गृहिणी’ और ‘जाहिल’ होने का ख़िताब दिया जा रहा था। ऐसे महौल में बीबी रत्नकुँवर द्वारा ‘प्रेतरत्न’ संग्रह का रचा जाना, हिंदी नवजागरण काल के इतिहास में स्त्री की बौद्धिकता की निर्मितियों और दख़ल की तरफ इशारा करता है। बीबी रत्नकुँवर उन्नीसवीं शताब्दी की महान कवयित्री और विदुषी लेखिका थी। इस विदुषी लेखिका के ज्ञान का दायरा संस्कृत-पारसी साहित्य से ले कर यूनानी चिकित्सा तक फैला था। इस लेखिका की बौद्धिकता का अंदाज़ा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ के इस कथन से लगाया जा सकता है :
बहुतेरे मनुष्य ऐसा कहते हैं कि अब इस काल में स्त्रियों का पढ़ना लिखना भारतवर्ष से लोप हो गया और बहुतेरे ऐसा भी कहते हैं कि यह जाति अर्थात् स्त्री पढ़ने लिखने के योग्य ही नहीं। उनके पढ़ाने लिखाने में चाहे जितना परिश्रम करो कदापि कुछ न आएगा। कितने ही ऐसा सोचते हैं कि स्त्री जो पढ़ना लिखना सीखेंगी अवश्य बिगड़ जाएंगी और कुमार्गगामी होंगी और कितने अगले समय की स्त्रियों का वृतान्त मन से भुला कर ऐसा समझते हैं कि नारी का चित्त ही विद्या उपार्जन में न लगेगा। इन्हे विधाता ने केवल गृहस्थी का काम करने को रचा है इस कारण हमने अपनी दादी बीबी रत्न कुवर का बनाया हुआ यह प्रेमरत्न ग्रंथ छपवाने का उयोग किया है वह संस्कृत में बड़ी पंडिता थीं। छह शास्त्र की वेत्ता पारसी भाषा भी इतनी जानती थी कि मौलाना रूमी की मसनवी और दीवान शम्स तबरेज जब कभी हमारे पिता पढ़ कर सुनाते तो वह उसका सम्पूर्ण आशय समझ लेती। गाने बजाने में अत्यन्त निपुण थी और यूनानी और हिन्दस्तानी चिकित्सा जानती थीं। योगाभ्यास में परिपक्व और यम नियम और वृत्ति ऋषि मुनियों की सी सत्तर बरस की अवस्था में भी बाल काले और आँखों की ज्योति बालकों की सी वह हमारी दादी थीं। इससे हमको अब उनकी अधिक प्रशंसा लिखने में लाज आती है परन्तु जो साधु-संत और पण्डित लोग उस समय के उनके जानने वाले काशी में वर्तमान हैं वह उन के गुणों को अद्यावधि स्मरण करते हैं।
शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ बीबी रत्नकुँवर के जीवन और साहित्यिक रुचियों के संबंध बहुत ज़्यादा रोशनी नहीं डालते हैं। वह शायद पितृसत्ता वाले समाज में एक स्त्री की विद्वता बताने के जोख़िम से परिचित होंगे। फिर भी उन्होंने बीबी रत्नकुँवर का कविता संकलन प्रकाशित करवा कर स्त्री बौद्धिकता को सामने लाने का काम किया था। इस लेखिका के जन्म के संबंध में नवजागरणकाल के प्रसिद्ध लेखक और संपादक ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ ने रोशनी डालते हुए लिखा है
बीवी रत्नकुँवरि का जन्म मुर्शिदाबाद के प्रसिद्ध जगत सेठ के घराने में हुआ था। इनका जीवन बड़ा आनन्दमय था। इन्होंने वृद्धावस्था तक पुत्र-पौत्रों के साथ अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत किया। ये बड़ी पंडिता और विदुषी थीं। राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ इनके पौत्र थे। इनका स्वभाव सरल और आचरण प्रशंनीय था।’ ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ बताते है कि ‘प्रेमरत्न’ कविता संग्रह राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ ने सन 1888 में प्रकाशित कराया था।
पहली बात ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ ने ‘प्रेमरत्न’ का जो प्रकाशन वर्ष बताया है, उससे हम सहमत नहीं हैं। दरअसल, ‘प्रेमरत्न’ कविता संग्रह सन् 1888 में नहीं बल्कि यह कविता संग्रह पहली बार सन् 1863 में राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ की आज्ञा से ‘बनारस यंत्रालय सुल्तान हिंद’ प्रेस से छपा था। इस संग्रह का पहला संस्करण इस शोध लेखक की दृष्टि से गुजरा है। दूसरी बात ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ ने बीबी रत्नकुँवर के जीवन पर जो रोशनी डाली है, उसमें बहुत कुछ जोड़ने की जरुरत है। दरअसल, आधी-अधूरी जानकारी के चलते स्त्रियाँ साहित्य के इतिहास से ओझल की जाती रही हैं।
बीबी रत्नकुँवर के पूर्वजों की चौदहीं पीढ़ी में पदमसी हुआ, जो अहमदाबाद से खम्भात में आ कर रहने लगे था। इन्होंने शाहजहां बादशाह को एक ऐसा हीरा भेंट किया जिस से बादशाह खुश हो कर उन्हें ‘राय’ की पदवी दी और अपने साथ दिल्ली में ला कर बसाया। पदमसी के एक पुत्र हुआ जिसका नाम राय उदयचंद था। राय उदयचन्द के फ़तहचन्द और सभाचन्द नाम के दो पुत्र हुए। जब अकाल पड़ा तो राय फ़तेहचन्द ने जनता को सस्ते दामों पर अनाज उपलब्ध कराया था। इससे खुश हो कर दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह ने उन्हें ‘जगत सेठ’ की पदवी प्रदान की थी। इसके बाद राय फ़तहचन्द अपने परिवार सहित मुर्शिदाबाद में अपने मामा सेठ मानिकचन्द के यहां आ कर रहने लगे। और इनके दूसरे भाई राय सभाचन्द के पुत्र अमरचन्द हुए। इन्ही अमरचंद के दो पुत्र राय मोहकम सिंह और राय डालचंद हुए। इन्हीं राय डालचन्द की पुत्री बीबी रत्नकुँवर थीं। बीबी रत्नकुँवर के पिता अपने समय के बड़े विद्वान थे। उन्होंने ‘कल्पभाष्य अर्थात भाषा कल्पसूत्र’ ग्रंथ का निर्माण कवि रायचन्द से करवाया था। इस ग्रंथ को बाद में राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ ने मुंशी नवलकिशोर प्रेस छपवा कर प्रकाशित करवाया था। इनकी राजवाड़ों से लेकर अंग्रेजो तक में अच्छी पैठ थी। कहते हैं कि राजा चेतसिंह का ईस्ट इडिंया कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स का आपस में बखेड़ा हुआ तो राजा चेतसिंह ने राजा डालचंद से मदद की गुहार लगाई। बीबी रत्नकुँवर के पिता डालचंद ने अपनी कूटनीति से जनाना डोली भेज कर राजा चेतसिंह की मदद की। बीबी रत्नकुँवर के भाई उत्तमचन्द थे। इनके भाई का विवाह वजीर अली के खजांची राजा बछराज की कन्या से हुआ था। उत्तमचन्द के कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने अपनी बहन बीबी रत्नकुँवर के बेटे बाबू गोपीचंद को गोद लिया था। इन्ही गोपीचन्द की संतान थे-हिंदी के शिक्षाविद् शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’।
ठाकुर शिव सिंह ने अपने इतिहास ग्रंथ ‘शिवसिंह सरोज’ में बीबी रत्नकुँवर की जन्म तिथि संवत 1808 अर्थात सन् 1751 बतायी है। मेरा अनुमान है कि बीबी रत्नकुँवर का जन्म 1750 के आस-पास हुआ होगा। बीबी रत्नकुँवर को लंबी आयु मिली थी। राजा शिवप्रसाद ‘सिंतारे-हिन्द’ के अनुसार सत्तर बरस की अवस्था में दादी के बाल काले और नज़र बहुत तेज थी। बीबी रत्नकुँवर लगभग नब्बे साल तक जीवित रही थीं। इस महान लेखिका की मृत्यु संवत 1899 अर्थात सन् 1842 में हुई थी। ‘बाला बोधिनी’ के प्रथम अंक में बीबी रत्नकुँवर का उल्लेख एक विदुषी और पंडिता के तौर मिलता है। नवजागरणकालीन ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका ने बीबी रत्नकुँवर के संबंध में लिखा था कि :
राजा डालचंद की बहू बीबी रत्नकुँवर काशी नगर में कैसी पंडिता थीं जिनका नाम इस देश के प्राचीन पंडितों में अब तक प्रसिद्ध है।
भारतेन्दु की ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका से बीबी रत्नकुँवर के संबंध में एक तथ्यपरक चूक यह हो गयी कि बीबी रत्नकुँवर को राजा डालचंद की बहू बता दिया है। जबकि शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ ने अपने खानदान का परिचय देते हुए लिखा था कि राजा डालचंद के पुत्र उत्तमचंद का विवाह राजा बछराज की पुत्री से हुआ था। उत्तमचंद के कोई संतान न होने के कारण उन्होंने अपनी बहन बीबी रत्नकुँवर के बेटे गोपीचंद को गोद लिया था। राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ के अनुसार बीबी रत्नकुँवर डालचंद की पुत्री थी। खैर।
इस महान लेखिका के जीवन संबंध में जान लेने के बाद अब उनके कविता संग्रह ‘प्रेमरत्न’ की चर्चा करना उपयोगी रहेगा। बीबी रत्नकुँवर ने यह कविता संग्रह काव्यानुशासन की कसौटी के मुताबिक लिखा था। बीबी रत्नकुँवर काव्यशास्त्र और छंद शास्त्र में पारंगत थी। उन्होंने ‘प्रेमरत्न’ कविता संग्रह दोहा, सोरठा और चौपाई छंदों में रचा था। इससे बीबी रत्नकुँवर की काव्य संबंधी बौद्धिकता का भी पता लगता है कि वे काव्यशास्त्र की भी ज्ञाता थीं। बीबी रत्नकुँवर बताती हैं कि प्रेमरत्न काव्य संग्रह को उन्होंने उस समय रचा, जब वे साहित्य और काव्यानुशासन में पूरी तरह निपुण हो गई थीं। बीबी रत्नकुँवर ने ‘प्रेमरत्न’ की रचना कब की थी? इसकी सूचना उन्होंने काव्य संग्रह के अंतिम पृष्ठों में दर्ज की है। बीबी रत्नकुँवर लिखती हैं :
ठारह सै चालीस। चतुर बरष जब वितित भय।।
विक्रम नृप अवनीस। भये भयो यह ग्रंथ तब।।
माह माह के माह। अति सुभ दिन सित पंचमी।।
गायो परम उछाहा। मंगल मंगल बार बर।।
कहौं ग्रंथ अनुमान। त्रय सत अरसठ चौपाई।।
तिहि अर्धर अठ जान। दोहा सोरह सोरठा।।
काशी नाम सुधाम। धाम सदा शिवको सुषद।।
तीरथ परम ललाम। सुभग मुक्ति वरदान छम।।
ता पावन पुर महिं। भयो जनम यह ग्रंथ को ।।
महिमा वरनि न जाहिं। सगुन रूप जस रस भरयौ।।
बीबी रत्नकुँवर की इन पंक्तियों से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने ‘प्रेमरत्न’ काव्य संग्रह अपने गुरु की कृपा से काशी में रह कर विक्रम संवत 1840 अर्थात सन् 1784 में रचा था। इसमें तीन सौ अरसठ चौपाई हैं, और इतने ही दोहे और सोरठे हैं। इस कविता संग्रह में बीबी रत्नकुँवर ने श्रीकृष्ण के जीवन की घटनाओं को चित्रित किया था। इसमे कोई दो राय नहीं हैं कि हिंदी साहित्य में कृष्ण को आधार बना कर अपनी बात कहने का चलन रहा है। हिंदी साहित्य के मध्यकाल में मीराबाई यह तरीका अपनाती है। और, बाद में उसी पद्धति का निर्वहन बीबी रत्नकुँवर करती दिखाई देती हैं। इसमे कोई संदेह नहीं है कि ‘मातृत्व’, ‘प्रेम’ और ‘बौद्धिकता’ स्त्री की खूबी है। इसलिए, उसकी रचनाशीलता में सबसे अधिक ज़ोर प्रेम और सद्भाव की कमाना पर रहा है। बीबी रत्नकुँवर जानती थी कि मर्दवादी तंत्र प्रेम और सद्भाव के मामले में कठोर और शुष्क रहा है। इसलिए उन्होंने मर्दवादी तंत्र से प्रेम की ओर लौटने का आग्रह किया। इस विदुषी का मत था कि प्रेम से रिक्त मनुष्य की कोई गरिमा नहीं होती है। उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्री लोकवृत में प्रेम कैसे व्यक्त हो रहा था। इसकी झलक बीबी रत्नकुँवर की इन पंक्तियों में देखिए :
प्रेमरतन जब ही नर पावै। नेम काँच करतें छिटकावै।।
प्रेमरहित नर सोहहिं कैसे। सोम विहीन सबरी जैसे।।
प्रेम रहित नर सोहहिं कैसै। बिना सरलता साधू जैसे।।
प्रेम रहित नर सोहहिं कैसे। बाग बिचि बृछ बिनु जैसे ।।
प्रेम बिना नर पसू समाना। प्रेम लह्यो तिन्ह सबकछु जाना।।
प्रेम कथा कछु जात न गायो। सेवरी को चाष्यो फल षायो।।
प्रेम बिबस श्री रघुकुल चन्दा। दनुज बृन्द कर कियो निकन्दा।।
सक्ति प्रहार हदै निज लीन्हा। पाले राषि बिभीषन दीन्हा।।
भक्तहि देषि सकहिं नहिँ मीरा। प्रेमबिवस आपुन सह पीरा।।
ऐसे प्रेम बिवस गोबिन्दा। बंधे जाय धीवर के फन्दा।।
प्रेम बिबस रुकमिनिहिँ विवाही। अजहुँ सिरोमनि नारिन माहीं।।
स्त्री बौद्धिकता की चौहद्दी को पितृसत्तावादी तंत्र ने रसोईखाने के इर्द गिर्द सीमित कर दिया था। इस चौहद्दी को बीबी रत्नकुँवर चुनौती देती हैं। वे अपनी बौद्धिकता के बल पर साहित्य और कला की दुनिया में क़दम रखती हैं। उनकी यह कवायद उन्नीसवीं सदी में मर्दों द्वारा निर्मित स्त्री की छवि ‘कम-अक़ल’ और आश्वस्त ‘घरेलू महिला’ वाले प्रयास को धक्का देती है। स्त्री बौद्धिकता पर मर्दवाद के पहरे में भी बीबी रत्नकुँवर स्त्री बौद्धिकता की निर्मितियों की नुमाइंदगी करती नज़र आती हैं। उनकी यह नुमाइंदगी साहित्य के परिसर में उस दौर में होती है; जब पराक्रमी मर्दों द्वारा स्त्री को शिक्षा और साहित्य की दुनिया से दूर रखने की दलीलें पेश की जा रही थी। उन्नीसवीं सदी के मर्दवादी वर्चस्व के भीतर किसी उच्च श्रेणी समाज की स्त्री का साहित्य सृजन करने का हौसला ही उसकी स्त्री चेतना का घोतक है।
उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक तक आते-आते पश्चिमोत्तर प्रांत में स्त्री का सवाल व्यापक तौर पर उभर चुका था। भारतेन्दु मंडल के लेखकों ने नागरी-आंदोलन और गौरक्षा-आंदोलन के साथ स्त्री मुक्ति का एजेण्डा अपने चिंतन और साहित्य में जोड़ लिया था। इसका कारण यह था कि जोतिबा फूले, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी दयानंद सरस्वती के आंदोलनों ने स्त्री प्रश्नों पर बात करने की ज़मीन तैयार कर दी थी। देखा जाए तो भारतेन्दु युग के समर्थ लेखक श्रीराधाकृष्ण दास ने ‘दुःखिनीबाला’ नामक एक छोटा सा रुपक लिख कर स्त्री प्रश्न को बड़ी बेबाकी से उठाते हुए उन्होंने पुरोहितवादी व्यवस्था को स्त्री की दुगर्ति का जिम्मेदार माना था। इसी कड़ी में भारतेन्दु मंडल के ही विद्रोही और स्त्री हितैषी लेखक राधाचरण गोस्वामी ने 'विधवा विवाह विवरण' नामक बड़ी मारक किताब लिख कर स्त्री विरोधियों को आइना दिखाने का काम किया था। पश्चिमोत्तर प्रांत में ‘दुःखिनीबाला’ और ‘विधवा विवाह विवरण’ के पहले स्त्री मुद्दे को बड़ी धारदार तरीके से उठाने वाली किताब ‘किस्सा औरत मर्द’ प्रकाशित हुई। इस मारक किताब की लेखिका एक अग्रवाल श्रेष्ठ कुल की कुलीन जैनमती स्त्री थी। कुलीन जैनमती की इस किताब को हम स्त्री विमर्श की पूर्व पीठिका के तौर पर देख सकते हैं। यह किताब पहली बार 1882 में भारत के प्रसिद्ध प्रेस ‘मुंशी नवलकिशोर छापेखाने’ से प्रकाशित हुई थी। उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में प्रकाशित यह किताब साहित्यिक और स्त्री विमर्श के लिहाज़ से बड़ी अद्भुत और मारक है। इस किताब में एक औरत पुरुषतंत्र की तोहमतों और अफवाहों का जवाब अपनी बौद्धिकता से देकर मर्दवादी तहो का पर्दाफाश बड़ी बेबाकी से करती है। कुलीन जैनमती का दावा था कि मर्दों ने पुरुषार्थ के दंभ में औरत के चरित्र पर मनमाने लांछन लांक्षन और आरोप मढ़ डाले हैं। यहाँ तक मर्दों ने औरतों को कमतर सिद्ध करने की कवायद और कयास में अपने आप को औरतों से हर मामले में देवतुल्य सिद्ध कर डाला है। कुलीन जैनमती इस सवाल के साथ अपनी किताब में स्त्री मुद्दों को विस्तार देती हैं कि मर्दों में जितने ऐब होते हैं, उसका दसवां हिस्सा भी औरतों में नहीं होता है। मर्दवादी तंत्र ने स्त्रियों को लांक्षित करने और उनके अधिकारों पर छुरी चलाने में जरा सी भी नरमी नहीं दिखाई। कुलीन जैनमती बताती हैं कि उन्हें यह किताब मर्दों की फ़ितरत को सामने लाने के लिए लिखनी पड़ी है। कुलीन जैनमती का मानना था कि :
ऐसे ही मर्द जबरदस्त औरत कमज़ोर हैं, मर्दों ने औरतों में जो जी चाहा ऐब लगाया और अपने को सब बात में अच्छा जाहिर किया। हालांकि जितने ऐब मर्दो में भरे हुए हैं औरतों में उसका दसवां हिस्सा भी नहीं है। हजारों ऐसी दास्तान हैं जिन से औरतों की भलाई और मर्दों की बेवफ़ाई जाहिर होती है मगर मर्दों ने जब कोई किताब लिखी है उसमें औरतों ही को बुरा कहा है। इस वास्ते मैं एक दास्तान मर्द औरत की लिखती हूं। उस के देखने से मर्द अपने दिल में इन्साफ़ करें कि कौन बुरा और कौन अच्छा है।
कुलीन जैनमती का स्त्री विषयक विमर्श एक किस्सा के हवाले से शुरू होता है। इस किस्से में रामरछपाल और उसकी पत्नी सरुपी अपनी कोठी की छत पर चाँदनी रात में आपस में बातें कर रहे हैं। इन दोनों की वार्ता जैसे आगे बढ़ती है, वैसे ही सरूपी का पति रामरछपाल मर्दवाद के दंभ में आ कर कहता है कि औरते बड़ी बदचलन होती हैं। यह मर्दों के द्वारा स्त्रियों के चरित्र पर लगाया गया एक ऐसा सनातनी आक्षेप है, जो स्त्रियों की पीठ पर किसी बैताल की तरह उनके जन्म से ले कर मरण तक सवार रहता है। स्त्रियाँ कहीं भी जाएं लेकिन मर्दवादी बैतालों से उनका पीछा नहीं छूटता है। कुलीन जैनमती औरत के चरित्र पर आक्षेप लगाने वाले मर्दों से कहती हैं कि औरतों के चरित्र पर सवाल उठाने से पहले मर्दों को अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि वो कितने चरित्रवान और नैतिक हैं। रामरक्षपाल की औरत ज़वाब में कहती हैं :
यह सब बात झूठ है। मर्दों ने एकतरफ़ी कहानी बनाई हैं। औरत क्या सब ही बदचलन होती हैं। जो कोई होती होगी तो वह भी मर्द के क़सूर से होती होगी। जो मर्द नेकचलन हो तो कोई औरत बदचलन नहीं हो सकती। कोई औरत मर्द से यह नहीं कहती कि आ बैल मुझे मार और जैसे ऐब मर्द औरतों में बताते हैं वैसे ऐब औरतें मर्दो में भी बता सकती हैं। औरतों में तो मर्द यही ऐब बताते है कि औरतें बेवफ़ा होती हैं मगर मर्द अपने गिरेबान में मुँह डाल कर नहीं देखते कि वह औरतों के साथ कितनी बेवफ़ाई करते हैं। अपनी औरत को बाज़ारू औरत की खातिर छोड़ देते हैं या एक दूसरी औरत उसके ऊपर ला कर बिठा देते हैं।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कुलीन जैनमती का यह ऐसा मारक सवाल था जिसका जवाब शायद ही मर्दवाद के झंडाबरदारों के पास होगा। इस शताब्दी में मर्दवादियों की ओर से स्त्रियों के वास्ते आदर्श रमणी, कुशल सुगृहिणी, आदर्श पत्नी और आदर्श बेटी का माडल तैयार किया जा रहा था। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि उन्नीसवीं सदी में मर्दवादी तंत्र ने आदर्श पुरुष, आदर्श बेटा, आदर्श पति और आदर्श देवर का कोई माडल तैयार नहीं किया था। जबकि सबसे ज़्यादा आदर्श और नैतिकता के पाठ की जरुरत पुरुषों को ही थी। कुलीन जैनमती मर्दवाद की उस मानसिकता का विरोध करती हैं जिसमें स्त्री को अच्छी-बुरी की श्रेणी में बांट कर उसके चरित्र का निर्धारण किया जाता था। यह दिलचस्प संवाद देखिए :
औरत - अच्छा बताओं सौ में कितने मर्द ऐसे हैं जो अपनी औरत के साथ वफ़ादारी करते हैं।
मर्द - जो औरत अच्छी होती सभी मर्द वफ़ादारी करें। ऐसा कौन सा मर्द है जो अपनी अच्छी औरत से वफ़ादारी मर्द न करे।
औरत - मालूम नहीं तुम अच्छी किस को कहते हो, अच्छी औरत कैसी होती है, तुम अच्छी खूबसरत को कहते हो या नेक चलन को?
मर्द - अच्छी उसको कहते जो नेक चलन भी हो और खूबसूरत भी हो और मर्द की मर्जी के मुवाफ़िक भी हो।
औरत - क्या ऐसी औरत से मर्द की अनबन नहीं होती ?
मर्द - हरगिज नहीं।
औरत - अजी बस रहने भी दो मैंने तो ऐसी औरतें देखी हैं जो बड़ी खूबसूरत हैं और जिन्होंने कभी दूसरे मर्द को आंख भर के नहीं देखा और अपने मर्द की किसी बात में उज्र नहीं किया। वह छूटी पड़ी हैं और उनका मर्द एक भद्दी बदशक्ल बाजारी औरत पर घायल है और वह औरत उसके मुंह भी नहीं लगती। बात-बात पर झिड़कती और बुरा भला कहती है। क्या तुम इस बात को नहीं जानते।
मर्द - पराया हाल दूसरे को अच्छी तरह मालूम नहीं हुआ करता। तुम क्या जानों ऐसी औरतों में क्या ऐब होता है जिससे मर्द का मन खट्टा हो जाता है।
औरत - यह तो ऐसी बात हुई जैसे किसी बनिये ने एक पैसे का सौदा किसी आदमी को दिया था। इत्तफाक से पैसा भी सौदे में चला गया, जब उस आदमी ने देखा कि पैसा भी उलटा चला आया तो उस आदमी ने अपने दिल में कहा कि अब भी बनिये ने कुछ कमाया ही होगा।12
कुलीन जैनमती अपने चिंतन में इस विमर्श को दिशा देती हैं कि स्त्री की व्यक्तिगत और सार्वजनिक चौहद्दी को मर्दवादी तंत्र कैसे निर्धारित कर सकता है। उन्नीसवीं सदी की यह लेखिका मर्दवादी तंत्र से सवाल करती है कि पुरुषों की दुष्टता के चलते स्त्रियां घरों के भीतर कैद रहने के लिए विवश हैं। इस लेखिका ने अपने विमर्श में लैगिंक भेदभाव का सवाल बड़ी गंभीरता से उठाया था। लेखिका का कहना था कि क्या औरत अपने मां-बाप की खानदानी बेटी नहीं जैसे एक बेटा होता है? जब बेटा और बेटी के जन्म लेने की प्रक्रिया एक जैसी है, फिर यह उच्च श्रेणी का समाज बेटे को मान-सम्मान और बेटियों को भार क्यों समझा जाता है? कुलीन जैनमती लिखती हैं:
यह तो जबरदस्ती की बात है बेशक मर्द का दर्जा ऊँचा मगर औरतें भी तो सब लौंडी बांदी नहीं है। भला मैं तुम से यह पूछती हूं कि औरत क्या वैसे ही माँ बाप और खानदान की बेटी नहीं होती। जैसे माँ बाप और खानदान का बेटा मर्द होता है ब्याह या निकाह दोनों का क्या एक ही शास्त्र के मुताबिक नहीं होता। मर्द कमाई कर के औरतों की परवरिश करता है औरत घर का काम धन्धा और बाल-बच्चों की परवरिश करती है। मर्द को भगवान ने औरत का अफ़सर बनाया है। औरत को दुनिया में सिवाय अपने मर्द के और कोई आसरा नहीं। फिर अगर मर्द औरतों के साथ बेवफ़ाई और बेरहमी और जुल्म का बरताव करें तो इससे जियादा और क्या बुराई होगी और फिर इस पर औरतों को बुरा और अपने का भला कहते हैं। भला तुम ही बतातो यह हठधर्मी है या नहीं?
उन्नीसवीं सदी में मर्दवादी तंत्र की ओर से यह जुमला बड़े व्यापक तौर पर उछाला गया था कि स्त्रियाँ ज़ाहिल और कम अक़ल वाली होती हैं। स्त्रियों को अनपढ़ बताने के पीछे मर्दवादियों की छुपी मंशा यह थी कि अनपढ़ होने का सारा ठीकरा स्त्रियों के सिर पर फोड़ दिया जाए। जबकि स्त्री शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा मर्दवादी मानसिकता थी। यह समाज खुद तो स्त्रियों को पढ़ने नहीं देता था, इसके बावजूद स्त्रियों को जाहिल कहने से भी नहीं चूकता था। कुलीन जैनमती कहती हैं कि यदि मर्द अपने आप को बुद्धिमान और ज्ञानवान कहते है तो वे स्त्रियों को धोखा दे कर लौंडो के पीछे मशूक़ बन कर क्यों घूमते हैं? कुलीन जैनमती की किताब का यह संवाद देखिए :
मर्द - औरत जाहिल होती है इस वास्ते मर्द औरतों में अनबन हो जाती है।
औरत - जब कहते हो मर्दों की तरफदारी की कहते हो। जो मर्द ही लड़कियों को न पढ़ावें तो औरतें कहां से पढ़ लिख जावें और मर्द ही क्या सब पढ़े लिखे होते हैं। क्या मर्द दूसरा ब्याह इसी वास्ते करवाते हैं, क्या इसी वास्ते बाजारी औरतों को घर में डालते हैं। क्या इसी वास्ते लौडों को माशूक़ बनाते हैं। क्या वह औरतें जाहिल नहीं होती यह सब बात मर्दों की बनावट है। मर्द को किसी औरत के सुख दुख की कुछ परवाह नहीं होती। वह अपनी थोडी सी दिल्लगी के वास्ते दूसरे की सारी उम्र की तकलीफ़ का भी ज़रा ख़याल नहीं करते और उस पर औरतों का बुरा और बेवफा बतलाते हैं। देखो, अंगरेज भी तो हैं अपनी औरतों की कैसी कदर करते हैं। उनको कैसा सुख देते हैं।
कुलीन जैनमती मर्दवादी और पितृसत्तावादी ख्यालों से टकरती है। इस महान लेखिका का विचार था कि मर्द हर मामले में स्त्रियों पर अंकुश लगा कर उन्हें पराधीन रखने में अपनी मर्दानगी समझते है। मर्दवाद की चौहद्दी के भीतर उच्च श्रेणी स्त्रियों को जानवरों की तरह जीवन गुजारना पड़ता था। यहाँ तक इस पुरुष तंत्र वाली सत्ता में स्त्रियों को अपना दुख-दर्द और अपनी इच्छा प्रकट करने का भी अधिकार नहीं था। मर्दवादी तंत्र चाहता था कि स्त्रियाँ अपने मुंह पर मोहर लगा कर हमेश मर्दों के सामने मूक बनी रहें। कुलीन जैनमती सवाल करती हैं कि मर्द अपने ऐश में सैकड़ों रुपया लुटाते हैं लेकिन स्त्रियों की जरुरतों का तनिक भी ख़याल नहीं करते है। जब स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए लड़ती है तो उन्हें मर्दों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। कुलीन जैनमती लिखती हैं :
औरत अपने मुंह पर मुहर लगा लेवे। मर्द जैसा चाहै काम करे किसी बात पर औरत हू न करे। इसी बात में मर्द खुश रह सकता है। मर्द तो अपने ऐश में सैकड़ों रुपया उड़ावे। औरत खाने को भी न मांगे। जो मर्द तमाशबीनी करे दूसरी औरत अपने पास रख ले तो भी जबान न हिलावे। बस इसी वास्ते मर्द औरतों का बुरा कहते हैं।
कुलीन जैनमती इस किताब में दिखाती हैं कि औरतों को ले कर मर्द कितने तंग ख़याल रखते है। कुलीन जैनमती यह बात कई बार कहती हैं कि स्त्रियों को ले कर जो किताबें पुरुषों ने लिखी हैं, सब झूठ का पुलिंदा है। कुलीन जैनमती का विचार था कि मर्द झूठे किस्से गढ़ने में बड़े माहिर होते हैं। जबकि स्त्रियाँ झूठ के पुतले पर सच का मुल्लमा लगा कर पेश नहीं करती हैं। यह लेखिका मर्दवादी लेखकों की उन किताबों के नाम गिनवाती है, जिसमें स्त्रियों के चरित्र को लेकर खूब भ्रम फैलाया गया है। मर्द और औरत का यह संवाद देखिए :
मर्द - ख़ैर अब इन बातों को जाने दो किस्सा शुरु करो।।
औरत - किस्से कहने मुझसे नहीं आते। किस्से तो मर्द ही कहना जानते हैं। झूठे तूमार बांधते है। कहों, बकावली, ताजुलमलक, कहीं बेनजीर बदरे मुनीर, कहीं जानआलम, अञ्जमेनारा, कहीं आजाद, और हुस्नवारा, बेगम और किस किस का नाम बताऊं फिर भी मर्द सच्चे बनते हैं। किसी ने भी तो अपनी किताब में यह नहीं लिखा कि यह किस्सा हमने कैसा अच्छा गढ़ा है। औरतें बेचारी तो ऐसा झूठ का पुतला बना कर उस पर सच का मुलम्मा करना नहीं जानतीं। भला तुमही इन्साफ़ करो कि मर्दों की बनाई हुई किस किताब को सच समझिये औरतों के चरित्र की कहानी का सच समझ ले जो बहारदानिश का सारा किस्सा सच ही और विरहमन का हाल भी कोई सच समझ ले तो मुज़ायका नहीं यह क्या कि औरतों सब झूठी तूफ़ान बन्दी है एक औरतों का चरित्र ही सच है।
मर्दों ने स्त्री के चरित्र को लांछित करने के लिए जो किस्से गढ़े हैं, उसे यह लेखिका मर्दों की साजिश करार देती है। जाहिर सी बात है कि कुलीन जैनमती के इन सवालों से मर्दवादी तंत्र का आसन डोल गया होगा। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिमोत्तर प्रांत में इतनी तीखीं और मारक बाते लिखने वाली हमें कोई दूसरी स्त्री लेखिका दिखाई नहीं देती है। इस सदी के आठवें दशक में जब मर्दवादी तंत्र अपनी छवि ज्ञानी, पण्डित, महात्मा और सदाचारी और सुधारक की गढ़ रहा था। ऐसे समय में कुलीन जैनमती मर्दवादियों की महात्मा वाली छवि और उनकी फ़ितरत को उघाड़ कर रख देती हैं। कुलीन जैनमती ने नारीवाद की ज़मीन पर खड़ी होकर कहा कि पुरुष बड़े निर्दयी और ज़ालिम जीव होते हैं लेकिन उन्होंने दरवेश होने का मुखौटा ओढ़ रखा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मर्दवादियों ने औरतों के वास्ते ऐसे क़ानून और फ़रमान जारी कर डाले थे, जिनसे स्त्रियाँ अधिकारविहीन हो गई थीं। बड़ी दिलचस्प बात है कि स्त्रियों पर सामाजिक अत्याचार और ज़ुल्म करने के बाद भी मर्द अपने आप को दयावान और मुंसिफ कहते है। स्त्रियों की नज़र में इससे ज़्यादा प्रहसन और क्या हो सकता है। कुलीन जैनमती बताती हैं कि असल में मर्द अपने चरित्र में जालिम, अन्यायी, चरसी और तमाशबीन होते हैं :
रामरछपाल - हम इस बात के काइल नहीं। कोई मर्द ऐसे भी होते हैं क्या सब मर्द ऐसे होते हैं। मर्दों में बड़े बड़े सच्चे, वली, पण्डित, जती, ज्ञानी, महात्मा, नेकचलन, धर्मात्मा, मौलवी, हकीम, हज़ारों हैं अगर कोई एक आध ऐसा निकल आया जैसा तुमने बयान किया; तो भी मर्दों से औरत अच्छी नहीं हो सकती।
औरत - भला तुमने यह सब तो कहा यह नहीं बयान किया कि मर्दों में चोर, बदमाश, डाकू, खूनीजार, जालसाज़, दगाबाज़, अदालतों में झूंठी हलफ़े उठाने वाले खुदगरज़, कृतघ्नी, जालिम, अन्यायी, अफीमी, चरसी ज्वारी, तमाशबीनी, लौडों को माशूक़ बनाने वाले, बटमार कितने हैं। जरा जेहलखानों की रपोट तो पढ़ो। मर्द जियाद हैं या औरतें। मेरा मतलब यह नहीं है कि सब मर्द बुरे हैं। औरतें ऐसी हठधर्म नहीं जो सब मदों को एक तरफ से बुरा कहने लगे। ऐसे हठधर्म तो मर्दों में हुए हैं कि उन्होंने किसी एक औरत की बुराई देख कर औरत की जिन्स ही को बुरा ठहरा दिया और उनके वास्ते आम हुक्म दे दिया कि वह हमेशा जब तक जिन्दा रहें जमीन से ऊपर बनी हुई कब्र में रहे जिसका नाम महलसरा रखा गया है और मरने पर ज़मीन से नीचे की कब्र में रखी जाए। मर्दों ने औरतों को सब निआमतों से जो भगवान ने इन्सान के वास्ते पैदा की है नाहक महरूम कर दिया है फिर भी मर्द अपने आप को मुन्सिफ दयावान् और न्यायवान समझते हैं बड़ा अफसोस है।
रामरछपाल - औरतें घर में रहती हैं। मर्दों के ख़ौफ से बाहर नहीं निकलती इसलिये उनको कोई मौका बुरा काम करने का नहीं मिलता। अगर औरतें भी मर्दों की तरह आजाद रहती जब मालूम होता कि औरतें कैसी बुरी और मर्द कैसे भले होते हैं।
औरत - यह बात भी कुछ ठीक नहीं है। हज़ारों लाखों औरतें बाहर फिरती हैं। कोई भी ऐसे काम नहीं करती है जैसे मर्द करते हैं। देखो, अंगरेजों की औरते जो पर्दें की कैद में नहीं रहती कैसी नेकनाम हैं और उनकी जो कदर है और मैंने माना कि औरतें मर्दों के खौफ़ से कोई बुरा काम नहीं कर सकती तब भी औरतें बनिस्वता मर्दों से अच्छी है। मर्द तो हाकिम परमेश्वर से भी बुरा काम करने में नहीं डरते। फिर मर्द मर्दो को भला औरतों को बुरा क्यों कहते हैं।
कुलीन जैनमती कहती हैं कि स्त्रियों को मर्दों की सैकड़ों सख्त बातों को सुनना पड़ता है। उन्हें बात-बात पर मर्दों के द्वारा झिड़कियां दी जाती हैं। मर्दों की अदालत में औरतों की किसी बात की सुनवाई नहीं होती है। यहाँ स्त्रियों को रोज़ जुल्म और अपमान का प्याला पीना पड़ता है। इसके बाद भी मर्दवादी तंत्र कि करतूत देखिये कि उल्टे ही औरतों को ही कलहारी बता डाला है।
कुलीन जैनमती ने औरतों के चरित्र पर गढ़ी गयी मसल और जुमलों का विरोध करती हैं। यह लेखिका बिना किसी का नाम लिए हुए कहती है कि मर्दों ने स्त्रियों को ले कर ऐसी मसले गढ़ी जिनमें कहा गया है कि ‘औरतों को ढोल की तरह पीटना’ चाहिए। अपनी तरफ से जो चाहा औरतों पर ऐब और लांछन लगाया जबकि मर्द अपने गिरेबान में कभी झांक कर नहीं देखता है कि वो अपने चरित्र और चाल-चलन में कैसे है? कुलीन जैनमती लिखती हैं:
खुदा इस बात को खूब जानता है जो मुसीबत हमारे दिल पर गुजरी है अभी तक तवक़े नहीं टूटी थी इसलिये जीती हैं खुदा ने औरत को हकीकत में बड़ा माजूर पराधीन पैदा किया है। मर्द हजारों किस्म के जुल्म सख्ती औरतों पर करते हैं औरत बिचारी सब को बरदाश्त करती है और हर तरह की ताबेदारी करती है और जहां तक उससे हो सकता है मर्द के खिलाफ कोई काम नहीं करती मर्द हजारों बद फैली करते हैं औरत बिचारी अपने मुंह पर मुहर लगाए चुप रहती है फिर भी औरत बुरी मर्द अच्छे। औरतों में सब ऐब मर्दों में काई भी नहीं..।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कुलीन जैनमती मर्दवाद के बीहड़ इलाकों की उस सच्चाई से परिचित करवाती है जिसे मर्दतंत्र और पितृसत्ता के तरफदार अपने रसूख से ढकते आ रहे थे। उन्नीसवीं सदी में जैनमती ने अपने चिंतन में कहा कि मर्द अपनी फितरत और चाल-चलन में ‘शैतान के बंदे’ को भी मात दे डालते हैं और इन मर्दवादियों की अदालत में स्त्रियों को ‘चार पहर’ ‘चौसठ घड़ी’ दुख में जीवन व्यतीत करने का फरमान जारी किया जाता है। यहां तक कि मर्दतंत्र हर समय स्त्रियों को नीचा दिखाने के लिए तत्पर रहता है। कुलीन जैनमती बड़ी हिम्मत के साथ पुरुष तंत्र को बेनाकाब करती हैं और स्त्री अधिकारों और उनकी दावेदारी का सवाल बड़ी शिद्दत के साथ रखती है।
उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध हिंदी साहित्य इतिहास में ‘भारतेन्दु युग’ के नाम से जाना जाता है। हिंदी आलोचक और अध्येता विमर्श के बिंदु भारतेन्दु और उनके मंडल लेखकों की आभा के इर्दर्गिद तशालते रहे हैं। जबकि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में स्त्री लेखन और वैचारिकी मजबूती से प्रकट होती दिखायी देती है। बड़ी मज़े की बात यह है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास ‘भारतेन्दु युग’ की लेखिकाओं पर मौन दिखाई देता है। इस सदी के उत्तरार्ध में स्त्री लेखिकाओं की एक-दो बड़ी मारक पुस्तकें प्रकाशित हुई, जिनमें मर्दवादी तंत्र के कारनामे सामने आयें थे। औपनिवेशिक भारत में बीबी रत्नकुँवर और कुलीन जैनमती इन दोनों लेखिकाओं ने स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियों को बड़ी शिद्दत के साथ गति प्रदान की थी। कुलीन जैनमती अपने विमर्श में मर्दवादियों के चेहरा पर पड़े स्त्री विरोधी नक़ाब को हटाती और स्त्री विरोधी ख़याल पर सवालियां निशान खड़ा करती हैं। इन्होंने ‘घरेलू’ और ‘रसोई’ माडल वाली निर्मित स्त्री छवि को धक्का दे कर स्त्री की बौद्धिक छवि निर्मित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। यह पितृसत्ता और मर्दवाद के तरफ़दारों के लिए चौकाने और अचरज भरी बात रही होगी कि रोटी बेलने वाली स्त्रियाँ साहित्य सृजन के परिसर में कैसे परिवेश कर गई।
सुरेश कुमार स्वतंत्र शोध अध्येता हैं। इन दिनों नवजागरणकालीन साहित्य पर स्वतंत्र शोधकार्य कर रहें है। इनके लेख हंस, तद्भव, आलोचना, पाखी, कथाक्रम, पक्षधर, समाजिकी, प्रतिमान , नई धारा, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, मंतव्य आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
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