अनन्त कुमार सिंह की कहानी 'मदार के फूल'


अनन्त कुमार सिंह 

भारतीय जाति व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी उसमें निहित असमानता है। इस असमानता को ले कर समय समय पर उन जातियों द्वारा प्रतिवाद किया जाता है। यह प्रतिवाद आज भी जारी है। बिहार में भूमिहार सामंती वर्ग के खिलाफ भूमिहीन मजदूरों ने एक लम्बी लड़ाई लड़ कर अपना हकों हुकूक पाने के लिए संघर्ष किया और बहुत हद तक उसे प्राप्त भी किया। जमींदार और उनकी जमींदारी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। कहानीकार अनन्त कुमार सिंह ने वह दौर देखा और जाना था। जन पक्षधरता के चलते उन्होंने उन भूमिहीनों को हक की लड़ाई में साथ दिया जो अभी तक किनारे कर दिए गए थे। अनन्त बाबू की एक लोकप्रिय कहानी है 'मदार के फूल'। इसी नाम का उनका एक संग्रह भी है। बीते 5 अप्रैल 2026 को उनका निधन हो गया। उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'चौराहे पर', 'लातूर गुम हो गया', और 'राग भैरवी' के अतिरिक्त 'कठफोड़वा तथा अन्य कहानियां', 'तुम्हारी तस्वीर नहीं है यह', 'प्रतिनिधि कहानियां', 'ब्रेकिंग न्यूज', 'नया साल मुबारक हो तथा अन्य कहानियाँ' तथा 'अब और नहीं' उनके अन्य प्रकाशित कहानी संग्रह हैं। अनंत कुमार सिंह ने 'ताकि बची रहे हरियाली' और 'नागफांस लिए घट के भीतर' नामक दो उपन्यास भी लिखे। यह विडम्बना की बात है कि नेट की दुनिया में उनकी कोई कहानी कहीं भी उपलब्ध नहीं थी। इस व्यथा को कवि शैलेन्द्र शान्त ने हाल में ही व्यक्त किया था। जितेन्द्र कुमार जनपथ पत्रिका के सम्पादन के क्रम में अनन्त जी से जुड़े हुए थे। हमने जितेन्द्र जी से उनकी कहानी उपलब्ध कराने का आग्रह किया जिसे स्वीकार कर उन्होंने हमें उनकी चर्चित कहानी 'मदार के फूल' उपलब्ध कराई। इस कहानी के रुद्र बाबू ढहती हुई उस जमींदारी व्यवस्था के प्रतीक हैं जिसकी पहले काफी हनक हुआ करती थी। अनन्त बाबू की स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं अनन्त कुमार सिंह की कहानी 'मदार के फूल'। इस कहानी को उपलब्ध कराने के लिए हम जितेन्द्र कुमार जी के आभारी हैं।



'मदार के फूल'


अनन्त कुमार सिंह 


कल की सुबह गए और आज शाम को लौटे आ रहे हैं- रुद्र प्रताप बाबू? गांव के उत्तरी छोर पर देवी स्थान के पास बने चबूतरे पर बैठे लोग आश्चर्य से ताक रहे थे उन्हें आते हुए। तरह-तरह की बातें कर रहे थे वे लोग। इतनी जल्दी तो वे कभी लौटते नहीं थे। एक बार निकले तो महीनों तक घूम-फिर कर ही आते थे। अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते थे। जब पूरी तरह निराश हो जाते, जेब जवाब देने लगती, तब ही लौटना होता उनका।


लेकिन इस बार तुरंत लौट गए। आज उनके कदम में भी तेजी है। उनका भक्त बटोही भी उनके कदम से कदम मिलाता बढ़ता आ रहा है। वही तो है, जिसने उनका साथ अभी तक नहीं छोड़ा। दोनों जबान बेटे किनारा कर गए। उनसे अलग हो कर अपना-अपना घर बसा लिया, लेकिन बटोही तो उनका हनुमान है।


"लगता है काम बन गया," चबूतरे पर बैठा एक आदमी बोला।


"हां, लगता तो है। इतनी जल्दी तो बाबा लौटने वाले थे नहीं," दूसरे ने कहा।


"हो सकता है, दूसरे काम से कहीं गए हों। नहीं तो आजकल शादी-विवाह का मामला इतनी जल्दी निपट जाता है।"


तीसरे ने कहा, "हां भाई। पंद्रह वर्ष से तो वे एड़ी-चोटी एक किए हुए हैं, कहां तय-तमन्ना हुआ?" एक बूढ़े आदमी ने कहा, "जमाना पैसे का है। आप खानदानी हैं, इस बात को महत्त्व कौन देता है? अच्छे खानदान के नाम पर शादी हो जाने वाली बात होती, तो उनकी बेटी तीस वर्ष की नहीं हो जाती।" एक ने समर्थन किया।


"हां भाई। यह तो गांव बाहर बात हो गई। चौदह से पंद्रह और ज्यादा से ज्यादा सोलह-सतरह तक, पहुंचते-पहुंचते तो शादी हो ही जाती है इस गांव में। गांव के बभनटोल से लेकर चमरटोल तक कहीं, कभी ऐसी हुई है अनहोनी?"


"तो क्या करें बेचारे? किसी डोम चमार के यहां बेटी को दे दें? हाड़ और खानदान भी तो चाहिए और फिर इतना तो जरूर चाहिए कि लड़की सालों भर खा-पी सके।"


"हां, तो एक बीघा जो बचा है, उसे किस मोह में रखे हुए हैं? लीलार पर खानदान का टीका लगाए तो चंदह वर्ष बीस गए अब और बात करने की गुंजाइश नहीं रह गई थी, रुद्र बाबू एकदम नजदीक आ गए थे। चेहरा एकदम ताजा-खिला हुआ यात्रा की थकान के बावजूद आंखें चमकती हुई। चेहरे की दिव्य आभा झुर्रियों के बावजूद अपना असर दिखाती हुई। पैसठ वर्ष के बढ़ापे के बावजूद नवजवानों जैसी फलांगली चाल और बटोही का काला-कलूटा रूप भी चमक रहा था। वह अभी उनसे हाथ लचका कर बातें किए जा रहा था।


उनके सामने आते ही चबूतरे पर बैठे लोगों ने राम-सलाम किया और एक ने तो पूछ ही लिया, "कुछ काम बना बाबा?"


"अभी क्या कहूं? बात रास्ते पर तो आई है?" रुद्र बाबू बात दबा कर बोले।


"कहां चाचा?" एक दूसरे ने पूछा।


"अरे भाई... भूल रहा हूं नाम...। मखदुमपुर टेसन से उतर कर जाना होता है। पाइबिगहा बाजार है न। उसी के बगल का एक गांव," वैसे नाम उनकी जुबान पर ही था लेकिन बताया नहीं। आजकल कोई बात बनाने में सहयोगी हो, न हो, बात बिगाड़ने में बहुत लोग आगे बढ़ जाते हैं।


खैर। कोई कुछ करता रहे अब तो बात पक्की हो गई है। जहां भावी होता है, वहीं घूम-फिर कर आदमी पहुंच जाता है। इतने दिनों से भटकते रहे, कितनी जिल्लतें उठाई। कितनी परेशानियों को झेला और नजदीक में ही राम के जैसा वर था। कितना सुंदर और सुशील है लड़का। खानदान ऊंचा है ही। जमींदारी वाली बात नहीं रही वहां भी, लेकिन लड़के पर बीस बीघा धरती तो है। गांव में पुरानी हवेली को ही मरम्मत कर कितना नया बना दिया है लोगों ने। लड़का नौकरी नहीं कर रहा है उससे क्या? घर की ही सम्पत्ति है और फिर नौकरी के लिए कोशिश कर ही रहा है। बी. ए. है, कहीं न कहीं नौकरी तो मिल ही जाएगी। कुंडली के अनुसार सात वर्ष छोटा है माधुरी से। लेकिन उन लोगों को क्या पता? माधुरी की उम्र कम करा कर नई कुण्डली ही बना दी है राजेंद्र मिसिर ने। उम्र में फर्क से क्या होगा? माधुरी को तो जितना बढ़ना था, बढ़ गई। उन लोगों को तो इसका आभास भी नहीं होगा। अब तो झट-पट रुपए का इंतजाम कर गंगा नहाना है।


लेकिन अभी घर पर भी वह नहीं कहेंगे शादी तय हो जाने की बात। औरतों के पेट में तो बात पचती नहीं। उसमें भी खुशी की बात। वैसी खुशी जो उन लोगों के जीवन की बहुत बड़ी खुशी थी। माधुरी की शादी के बाद रह ही क्या जाएगा उन लोगों को करने के लिए? और फिर अब जिंदगी ही कितने दिनों की है? बचे हुए एक बीघे की कीमत भी अच्छी मिल रही है। आखिर खेत डीह का है-धूर-गनौरा से भरा हुआ। सौदा गरजू का नहीं होता तो उसकी कीमत साठ-सत्तर हजार से कम नहीं मिलती। चालीस हजार भी कम नहीं। तीस हजार में शादी पार लग जाएगी। बाकी के दस हजार जिंदगी भर की खुराकी।


अब ये जल्द ही जमीन रजिस्ट्री कर देंगे। अब तक पलीता राम आ ही गया होगा कोलवरी से। एक मुश्त पैसा दे देता है वह। और भी जमीन उसने खरीदी है गांव में-उधार बाकी, टिकट बदलने का फेरा ही नहीं रखता। तीन-तीन भाई काम कर रहे हैं खदान में। उन लोगों को पैसा कमाने का ध्यान है, जमीन खरीद कर सुखपूर्वक रहने की चिंता है। गांव के और मजदूरों की तरह लाल झण्डा ले कर नहीं घूमता है वह। घूमता रहता तो इतना कुछ कहां से होता? क्या कर लिए गांव के मजदूर या रैयत? यही न कि गांव के आम गरमजरुआ और मालिक मरमजरूआ जमीन को अपने कब्जे में कर लिया झंडे की बदौलत। उसमें वे लोग खेती कर रहे हैं। पहले जो मजदूर गांव से भाग कर पंजाब चले गए थे, अब वहां से लौट कर गांव आ गए हैं उन खेतों में खेती करने। पूरे गांव में जमींदारों की आधी जमीन भी नहीं बच पाई है और इतने बहुवंश हो गए हैं कि खाना-पीना भी मुहाल है। मजदूरों से लड़‌ भिड़ सकें, इतनी शक्ति नहीं बची है उनके पास। वैसे अपने संस्कार के चलते भले मूंछें ऐंठ लें, लेकिन अंदर कुछ दम नहीं बचा है। उन्हीं की जमीन पर उन्हीं के सामने दूसरो कोई हल चलाए? और रुद्र बाबू की तो तीस बीघा जमीन इन लोगों के कब्जे में है। बहुत कुछ बिक गया था पहले ही। पांच-पांच बीघा हथिया कर बैठे हैं दोनों बेटे। और अपने जिम्मे रखे पांच बीघे में से एक बीघा बचा है। चार बीघे पहले तीन बेटियों की शादी करने और रोटी चलाने में खतम हो गए थे। वर ढूंढने में पहले भी खर्च हुआ था, अब भी हो रहा है। जमीन तो एक कट्ठा भी नहीं बचती। गांव के मजदूरों ने यह एलान कर दिया है कि गांव में जो बटइया करेंगे-अपने से खेती नहीं करेंगे, उनकी जमीन पर भूमिहीनों का कब्जा रहेगा। रुद्र बाबू की जमीन बची हुई है तो सिर्फ इसलिए कि मजदूरों को उनकी स्थिति से सहानुभूति है। बेटी का ब्याह करना है। यह वे लोग महसूस करते हैं। पेट चलाना है, यह तो हर कोई देख रहा है। और फिर यह भी देख रहे हैं लोग कि बेटों ने भी उन्हें अलग कर दिया है।


"प्रणाम बाबा" घर के बिल्कुल पास अयोध्या ने उन्हें अपनी धुन में आता देख रोक दिया। एकाएक वह चौंक से गए। चेहरे पर भरपूर मुस्कराहट दौड गई। क्या कुछ बोल गए, पता नहीं चला। लेकिन शायद शादी तय हो जाने वाली बात नहीं कह सके। यह सब कुछ तो घर पर भी नहीं कहेंगे, ऐसा ही सोच रखा है।



जैसे ही रुद्र बाबू अपने घर के आंगन में बटोही के साथ पहुंचे, पत्नी लपकते हुए उनके पास आ गई। जल्दी आ जाने का कारण पूछने के पहले उनके चेहरे पर नजर गई। वैसा संतुष्ट भाव तो पंद्रह वर्ष से वह कभी नहीं देख पाई थी उनके चेहरे पर। एकदम पहचान में आ जा रहा था उनका चेहरा। पत्नी को कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं हुई। उड़ासी हुई खटिया बटोही की मदद से फैला दी। नीचे बैठ गई वह और कुछ दूरी पर बटोही। फिर पानी देने के लिए खुद नहीं गई, माधुरी को पुकारने लगी। माधुरी भी ओट में छिप कर अपने बाबू जी को देख रही थी। उसके मन में भी कई तरह के सपने साकार होते से लग रहे थे। वैसे इन पंद्रह वर्षों में तो वह सैकड़ों बार इन स्थितियों से गुजर चुकी है। पंद्रह-बीस की उम्र तक एक उमंग भरी कल्पना थी। बाबू जी जाते सपना बीनने लगती, निराश हो कर लौटते, मलीन हो जाती। प्रकट भी नहीं होने देती। फिर धीरे-धीरे वह कुंठित-सी होने लगी। अभ्यस्त हो गई निराशाओं को झेलते-झेलते। चेहरे की तेज वह नहीं रह गई, जो पहले थी। उमंगे जवान होते-होते बूढ़ी हो गई। लगने लगा अब वह कभी पति नाम के व्यक्ति से नहीं मिल सकेगी। फिर भी टिमटिमाती आस ही सही, थी तो जरूर। कभी न कभी तो भगवान वह दिन दिखाएंगे। उसने क्या बुरा किया है? भगवान की पूजा करती है। मां-बाबू जी की सेवा करती है। घर का खाना बनाने से ले कर सफाई तक वही करती है। इच्छा तो होती है-भाभियों के साथ मिल कर भी काम करें, लेकिन वे लोग सटने ही नहीं देतीं। दीदी बदले रहती हैं, मनो कोई संबंध न हो। सोच कर उसे काफी अफसोस होता है। आखिर ऐसा बेगानापन क्यों? उस समय उसे लगने लगता है कि वह एकदम अकेली है। अपनी तरह की एकमात्र वही है। लेकिन उस समय केवल एक चीज पर उसकी नजर देर तक टिकी रहती है। पुरानी ढ़हती दीवारों की तरफ वह गौर से देखने लगती है। पता नहीं कैसे वहां पर ढेर सारे मदार के पौधे उग आए हैं। ठीक उसकी तरह के अनुपयोगी। देखती रहती है वह उन पौधों को उन बेकार पौधों को जिसे कोई नहीं पूछता। देखते-देखते दया आने लगती है उन पर । उस समय यह अपनी यह इच्छा छोड़ देती है कि उन्हें जड़ से काट कर हटा दिया जाए। वैसे अलग रहने पर वह उन्हें साफ करने की सोचती है। यह सब सोचने के बावजूद अपने घर को सजा कर रखने वाली माधुरी ऐसा नहीं कर पाती। उसे लगने लगता है कि कम से कम ये पौधे तो अपनी ओर उसका ध्यान आकृष्ट करते हैं। समानता है दोनों में।


अभी बाबू जी को देख कर वह कई तरह की मीठी कल्पनाएं करने लगी थी। अपनी सहेलियों से सुनी कई सुहागरात, कई नोकझोंक, कई प्रसव पीड़ाएं, कई किलकारियां उसे महसूस होने लगी थीं। और मां की आवाज सुन कर आवाज से भी तेज उत्साह में वह आगे बढ़ गई थी बाबूजी को पानी देने के लिए।


उस समय सभी तरफ से ध्यान हटा कर भविष्य के ताने-बाने बुनने पर केंद्रित हो गई थी। यहां तक कि घर की बदहाली की याद उसे नहीं आ रही थी। और न मदार के पौधे जिनसे उसका एक विचित्र किस्म का संबंध था।


तेज कदमों से वह बढ़ती गई पानी लेकर बाबू जी के लिए।


लेकिन जाते-जाते वह कनखी से मदार के पौधों को भी देखने से अपने आपको रोक नहीं सकी-अनायास हो गया ऐसा। और उसने निश्चय कर लिया कि कल ही वह उन पौधों को काट कर फेंक देगी। उसकी यह सोच दृढ़ होती गई। उत्साह से भरा था उसका चेहरा-रोम-रोम मानो पुलक रहा था।


रुद्र बाबू की बूढ़ी आंखें ने भी महसूस किया बेटी का उत्साह और उसके उत्साह से परत-दर-परत छिपी उसकी खुशी चेहरे पर उजागर हो गई। वे और भी ज्यादा खिल गए-उत्साहित हो गए और इस उत्साह में अपना निर्णय भूल गए।


"माधुरी की मां। अब हमारी चिंता दूर हो गई। बात पक्की हो गई है। लड़के वाले बड़े नेक आदमी हैं। पच्चीस हजार रुपए में बात पक्की हो गई!" सुनते ही पत्नी बोल उठी, "मैं तो आपको देखते ही समझ गई थी। अच्छा! बताइए लड़का कैसा है? खानदान, धन-दौलत...।"


और रुद्र बाबू सारी बातें कह गए। बीच-बीच में बटोही भी हां में हां मिलाता रहा। माधुरी ओट में छिप कर सुनती रही। उसके शरीर में सनसनाहट होने लगी, पैरों में पंख लग गए-आकाश में उड़ने लगी वह।


राख में भी इतनी गर्मी छिपी हुई है, इसका आभास खुद से नहीं था।


"हम लोगों को कुछ खिलाओगी भी या बात ही सुनती रहोगी।" रुद्र बाबू उत्साह में ही कह गए। पत्नी ने पूछा, "क्या बना दूं?" "अरे भूख लगी है भाई। जल्दी में हलुआ ही ठीक रहेगा।" रुद्र बाबू बोले और बटोही की तरफ मुखातिब हो गए। पत्नी उनका मुंह ताकने लगी। कुछ बोलते बन नहीं रहा था। एकाएक खिले हुए चेहरे पर चिंता की रेखाएं दौड़ गई।


पत्नी वहां से चली गई। माधुरी के पास जा कर कानाफूसी करने लगी। और फिर एकदम निराश-सी हो गई। फिर वह आंगन में आ कर विमूढ़-सी खड़ी हो गई। बरामदे के चूल्हे में आग नहीं जलाई गई।


स्थिति को देख कर रुद्र बाबू को कुछ आभास हुआ। पत्नी के मनोभावों को वे पढ़ने लगे और ऐसे में उनका चेहरा भी उतर गया ।


"मालिक। मैं जरा घर से हो लेता। बाल-बच्चों को पता चल जाता कि हम आ गए हैं।"


"कुछ खा लेते।"


"नहीं मालिक। वहां उतना खा लिया है कि अब रात तक नहीं खा सकूंगा।" बटोही शायद स्थिति को समझ गया था। तह में जा कर इतना तो नहीं समझ सकता था कि आज मालिक के यहां न चीनी है न गुड़, न घी है न डालडा, न सूजी है न बेसन, लेकिन कुछ बाधा जरूर है हलुआ बनने में। वैसे घर की वास्तविक स्थिति क्या चल रही है यह रुद्र बाबू जानते थे, उनकी पत्नी जानती थी और बेटी माधुरी। व्याहता बेटियों को भी कमोवेश इसका अनुभव था और इसलिए कभी मां और माधुरी की साड़ी, बाबू जी की धोती भेंट स्वरूप भेज देती थी। अगहनी फसल के बहाने चूड़ा, भदई फसल के बहाने मकई अकसर भेजती रहती थी। इसी सब से तो किसी-किसी प्रकार गाड़ी खिंच रही थी। वरना खेत बेच कर आए रुपयों में बरक्कत कहां? यह बात दोनों बेटे-पतोहू भी समझते थे लेकिन समझते हुए भी अनजान बने रहते थे। उन लोगों ने तो नाता ही तोड़ लिया था मां-बाप से। वही मां-बाप जिन्होंने तीन बेटियों की शादी की। बेटों को पाल-पोस कर बड़ा किया। पढ़ाने लिखाने की भी कोशिश की थी, लेकिन मैट्रिक से आगे नहीं बढ़ सके दोनों।


अपनी प्रतिष्ठा बचाने में ही लगे थे रुद्र बाबू। वैसे गांव वाले क्या नहीं समझते? समझते ही होंगे। लेकिन उन्होंने अपने जमीन बेच कर सब कुछ किया। किसी गोतिया के आगे हाथ तो नहीं फैलाया। गांव के ऐरू-गैरू के यहां से कर्जा तो नहीं लिया। पैसा लिया उसी से जिसको जमीन दी। कहां किसी के सामने झुके हैं रुद्र बाबू। हरदम पास रहने वाला बटोही भी नहीं जान पाता कि वे किस स्थिति में जी रहे हैं-ऐसा ही समझते हैं रुद्र बाबू।


लेकिन क्या यह बात छिपी हुई है? कौन नहीं जानता कि तीन बेटियों की शादी में तीन बीघे बिक गए। एक बीघा खाने-पीने में बिक गया। और बाकी के एक बीघे से जो बटैया फसल आती है, वह होती ही कितनी है? उसमें भी चाव चिकने भोजन का है। सब दिन का खाया हुआ मुंह है, कैसे माने? वैसे अब कहां मिल पाता है उन्हें जैसा पैंतीस-चालीस वर्ष पहले मिलता था। सहाई साव का रसगुल्ला तो अब सपना हो गया। हिसाबी साव की जलेबी, रघु अमीर के यहां का घी, पेंदी महतो के यहां का छालीदार दही एवं शुद्ध छेना। रैयतों के यहां से सलामी के रूप में आए बकरे। और फिर घर पर दूध, घी, मांस की कमी कहां थी? इन सबसे तो छिलबिल रहता था घर-दुआर। और अब तो मेहमानों के सामने भले ही ओठ में घी लगा कर बाहर आएं, उन्हें भले ही हलुआ पूरी खिला दें, लेकिन उनका अपना रोज का भोजन नमक रोटी भी मुहाल है।


लोग समझें या न समझें, स्थिति यही है उनकी। और उनके गोतिया-दियाद जो मजदूरों और रैयतों की अपेक्षा बहुत थोड़ी-सी संख्या में हैं, सभी की हालत तो नाजुक ही है। शराब और केस मुकदमा से सम्पत्ति दहनी शुरू हुई जो अब मजदूरों के कब्जे तक आ गई है। अब वह गीदड़ भभकी तो काम करती नहीं। कई बार काम भी किया, लेकिन कब तक चले। मजदूर, पीनिया और रैयत ही ज्यादा संख्या में थे। जोर आजमाइश में ये लोग पीछे पड़ गए। कई बार बाहर से मंगवाए गुंडे, पुलिस का भी सहारा लिया, लेकिन कब तक। पुलिस तो पैसों के पीछे भागती है। खानदान को चाट कर क्या उसे संतोष मिलता? नतीजा हुआ ये लोग दब गए, अब और भी दबते जा रहे हैं।


अब कोई मवेशी मरने पर चमार के यहां गाली देते हुए नहीं बुलाने जाता। नाई, बढ़ई, लौहार, कहार सभी अपनी मर्जी से ही काम करते हैं। अब दरवाजे पर कोई दरबार लगाने नहीं जाता। सलामी में बकरे, घी, दूध, दही नहीं भेजे जाते। सारे लोग तो इस स्थिति से परिचित हैं ही लेकिन रुद्र बाबू कुछ ज्यादा खराब स्थिति में हैं अपने बेटों के चलने।...


बटोही चला गया। रुकने के लिए विशेष जोर नहीं दे सके रुद्र बाबू। पिछली बात सोचते रहे देर तक। क्या से क्या हो गया। पता नहीं अब आगे क्या होगा।



"आपने कह दिया हलुआ बनाने को? कुछ भी नहीं है घर में..."


"मैं समझ गया था माधुरी की मां। शायद बटोही भी समझ गया। काफी समझदार है।"


"क्या सोचेगा बटोही?"


"छोड़ो भी माधुरी की मां। आज बहुत खुशी का दिन है। हम लोग भूखे भी रह सकते हैं। अब झटपट शादी का दिन तय कर देना है। छेका पांच सौ एक्यावन मैंने दे दिया है।"


"पैसे कहां से आए? पैसे तो अब है नहीं-खोराकी के भी नहीं बचे हैं?"


"पलीता का बाप रमधनिया पेशगी दिया था न, दे दिया है उसी रुपए को। अब धाती तो रहेगी। इस दशहरे के अवसर पर पलीता को रुपए ले कर आना है-शायद आ भी गया हो। रुपया मिलते ही मैं पेशगी देने चला जाऊंगा। दोनों लाट साहब को क्या फिकिर कि बहन की शादी करनी है? मां-बाप को खाने के लिए अनाज नहीं है। धिक्कार है ऐसे बेटों पर। ऐसी स्वार्थी औलाद दुश्मन को भी भगवान न दें।"


"क्यों उन लोगों को याद कर अपना मन कड़वा करते हैं?" पत्नी ने समझाया लेकिन खुद उदास हो गई।


"कुछ भी नहीं है घर में माधुरी की मां? गेहूं तो पिसवाया था एक पसेरी?"


"आटा तो है ही। माधुरी रोटी बना रही है," पत्नी की बात सुन कर भूख और भी जाग गई रुद्र बाबू की। वैसे यह भूख चोर भूख ही थी-खुशी से तो उनकी भूख मर गई थी। आंखें रह-रह कर सजल हो जातीं। बार-बार वहां की बातें पत्नी को सुनाने लगते। लग रहा था इतनी खुशी उन लोगों को कभी नहीं मिली थी-जमींदारी के समय भी नहीं।


"बटोही तो चला गया। रहता तो उसे भूइयांडीह भेजता पलीतवा को देखने के लिए। आ गया होता तो कल रजिस्ट्री हो जाती-रुपए मिल जाते। देर करना ठीक नहीं है।"


"मालिक। हमारे यहां ईख पेराया है। नया गुड़ नेवान के लिए घर वाली ने भेजा है।" कहते हुए बटोही आंगन में आ गया। कुछ पल के लिए वे दोनों बटोही को अपलक देखते रहे... निःशब्द। इस तरह देखने से बटोही सहम-सा गया। कहीं मालिक बुरा तो नहीं मान गए?


"सोचा कि गरम गुड़ मालिक खा लेते..." बटोही ने खुशामदी लहजे में कहा और रुद्र बाबू की आंखें सजल हो गई। गला रूंध गया। कुछ बोलना चाह कर भी नहीं बोल पाए। कृतज्ञ भाव से उसके चेहरे पर देखते हुए मुस्करा दिए ।


"काहे को कष्ट किया बटोही।" रुंधी आवाज में उन्होंने कहा।


वाकई कितना ख्याल करता है बटोही। सारे गांव में एक यही तो है। मैंने किया था तो निभा रहा है। और लोगों की तरह नमकहराम नहीं हुआ। क्या वे या उनके पूर्वज सारे लोगों को शोषण करते थे? प्रताड़ित करते थे? जानवरों की तरह काम लेते थे और चिड़ियों की खुराक भर भोजन देते थे?... यही सब कुछ तो कहते हैं आज के लौंडे। कहते हैं उसी का बदला ले रहे हैं। बटोही को भी बहकाने की कोशिश लोगों ने की। लेकिन बटोही सच्चा आदमी है। सब दिन देखे हुए है। वह कैसे भूल सकता है भला...।


"तुम्हारे जाने के बाद हलुवा बनाने को मैंने मना कर दिया। भूख लगी थी। रोटी बन गई है," उन्होंने बटोही को बताया फिर पत्नी को कहा, "दो जगह खाना लाओ भाई। नया गुड़ के साथ रोटी अच्छी लगेगी"... पत्नी बरामदे में जा कर थाली में रोटी लगाने लगी। परोस कर उन दोनों के सामने रख दी। बटोही थोड़ा हट कर जमीन पर ही पालथी मार कर बैठ गया। रुद्र बाबू खटिया पर ही थाली संभालने लगे।


पहला कौर मुंह में डालने वाले ही थे कि मालिक... मालिक का स्वर सुनाई पड़ा। नजर उठा कर देखा और पलीता के बाप रामधनिया को देख कर आंखें चमक गईं। चेहरा खिल उठा। बड़ा मौके पर आ गया। अब तुरंत काम बन जाएगा। हो सकता है वह भी उनके आने की खबर पा कर ही आया हो।


"अभी तुरंत ही आया हूं रामधनी। भूख लगी थी। देख नहीं रहे हो रोटी गुड़ खाने बैठ गया। तुम भी खाओ," उन्होंने कहा और उसकी तरफ नजर उठाई। उसकी तरफ देख कर उन्हें आशंका हुई। वह सर नीचे किए खड़ा था। भय, चिंता और झिझक का भाव उसके चेहरे पर था। लग रहा था कोई अपराध कर के वह आ रहा है।


"क्या बात है रामधनी?"


"मालिक हमसे कुछ बोला नहीं जाता। हम पुराने लोग जुबान के पक्का होते हैं... चाहे बाबू-भैया हों या हम परजा लोग, जुबान कभी नहीं हारे । लेकिन... लेकिन ... हम लाचार हैं मालिक।"


"बात तो बताओ उनकी आशंका बढ़ती जा रही थी।


"मालिक। हम बयान दे दिए और पलीता ने पैसा लौटाने को भेजा है। वह उस जमीन को नहीं खरीदेगा सस्ती जमीन उसे मिल रही है। वह मेरा बेटा है लेकिन मुझे डांट रहा है। क्यों बयान दे दिया? कहते कहते और भी गमगीन हो गया वह बूढ़ा रामधनी। और रुद्र बाबू की आंखें तो मानो पथरा सी गई। बिना हिले डुले वे उसे देखने लगे। मुंह की तरफ बढ़ता हुआ पहला कौर थाली में लौट गया। बटोही भी अवाक रहा। पूरे घर में मातम छा गया।


रुद्र बाबू को तो लग रहा था वे आकाश से नीचे पथरीली जमीन पर गिर गए हैं। बवण्डर-सा भर गया उनके भीतर। शायद गरजू समझ कर पलीता ऐसा कर रहा है। इज्जत की बात में ऐसा धोखा? कितना दिन बदल गया। पुराने दिनों की बात होती तो पहले तो इस बूढे की हड्डी-पसली चूर हो जाती, तब निपटा जाता उस पलीतवा से। कोलवरी से कुछ कमा नहीं लिया कि अब यहां तक मन बढ़ गया।


"इ तो पलीता बड़ा गलत कह रहा है। जुबान की भी कीमत होती है। और फिर कहां उसे मिल रही है मुफ्त की जमीन?" बटोही बोला।


"हम कुछ नहीं जानते बटोही भाई, पलीता दोपहर को ही आया था। बयाना देने की बात उसके आते ही कह दी थी। उसने उस समय कुछ नहीं कहा। लेकिन रघु अहीर का बेटा जमुना यादव पता नहीं क्या-क्या पाठ पढ़ा रहा है उसे। पलीता के आते ही वह भी मेरे घर आ गया और अभी तक जमा हुआ है। उसी के कहने पर पलीता...।"



रुद्र बाबू का खून सूख गया। एकदम मूरत बन गए। कभी-कभी एक ज्वार-सा आता और गुजर जाता। लगता कि अभी साले पलीतवा के यहां लाठी ले कर जाएं और उसका माथा ही चूर दें। कितना बड़ा दगा कर रहा है और यह रघुवा की औलाद जमुनवा!... एक-एक की धुलाई की जरूरत है। उन्हीं पर अपना गुबार मिटा रहे हैं खानदानी? क्या किया है उन्होंने? न कभी कोड़ों से पीटा है, न बहू-बेटियों को इज्जत लूटी है। जाति के अनुसार काम। काम के अनुसार दाम। यहां से पांच मील दूर पर ही उस बड़े स्टेट में क्या नहीं होता था... गालियों से बातें होती थीं, कोड़ों से समाचार पूछा जाता था, गरीबों की बहू-बेटियां परोसी जाती थीं मेहमानों के आगे. . क्या बिगाड़ लिया उन लोगों का झंडे ने? उस समय तो नजर उठाने का सवाल ही नहीं था... और अब भी झंडा उठते ही उनकी संगीनें गरजने लगती हैं... हमसे बदला ले रहे हैं...हूं. ...ठेस लगी है पहाड़ से और घर की सिलवट फोड़ने पर आमादा हैं?


अब क्या होगा? अब तो जल्दी में कोई खेत लेने को तैयार भी नहीं होगा। कितने दिनों से बात तय होते-होते यहां तक पहुंची... और अब? संयोग से बात भी पक्की हो गई शादी की। दस दिन के अंदर सारा रुपया जमा कर देना है। नहीं देने पर तो वे लोग शादी से इनकार भी कर सकते हैं। दोष तो उनका रहेगा नहीं। उन लोगों ने तो सभी कुछ साफ-साफ कह दिया है। पैसा मिलने पर ही आगे की कार्रवाई करनी है उन्हें। पांच सौ एक्यावन की क्या कीमत। उन्होंने भी तो बड़ा कहलाने के लिए कह दिया है तुरंत रुपया दे देने को। देर होने से तो कई बातें सामने आ जाएंगी। उनकी औकात का पता लग सकता है। लड़की की उम्र भी जान सकते हैं लोग। कौन कबूल करेगा तेईस वर्ष के लड़के के लिए तीस वर्ष की लड़की।


अब वह क्या करें? जान भी नहीं चली जाती। लेकिन जान जाने से क्या माधुरी की शादी हो जाएगी? माधुरी की मां को भोजन मिल सकेगा? उनकी आत्मा को चैन मिलेगा?... सोचते-सोचते लगा कि जेठ-बैसाख की तेज आंधी में वे फंस गए हैं। आग बरसाती गर्मी, धूल और अंधड़ से आंखें भी बंद हो गई हैं। और इस चक्रवात में वे बुरी तरह डगमगा रहे हैं।


सचमुच वे लगभग नीम बेहोश हो गए। खाना रखा रहा, वे खटिया पर पसर गए। बटोही उनका बदन दबाने लगा। पत्नी दौड़ कर आ गई। माधुरी भी मां के पीछे-पीछे आ गई। सभी के चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई थी। रामधनी चुपके से खिसक गया।


देर तक उन्हें पंखा झला गया। बटोही आशान्वित करता रहा लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाए। पत्नी का चेहरा उड़ा रहा। चिंताओं में डूबने-उतराने लगी। अगर इन्हें कुछ हो गया... भगवान न करें ऐसा हो... क्या-क्या सोच जाती है वह? बिना जड़ के डाली का क्या अस्तित्व। आखिर अब क्या होगा? इस वर्ष तो वे किसी भी हालत में शादी कर ही देना चाहते हैं। एक शादी के लिए तो वह तैयार नहीं हो सकी थी। तिलक भी नहीं देना था। खानदान भी अच्छा था। लेकिन लड़का दोआह था। दो बेटे मरी हुई पत्नी से थे। देखने में एकदम बूढ़ा लगता था। क्या करती वह? आखिर मां है न। गरज का मतलब क्या है, कुआं में ढकेल दे? और फिर माधुरी ने भी तो यह सब कुछ सुन कर अन्न-पानी त्याग दिया था। घबड़ाहट में वह अक्सर जान देने पर उतारू हो जाती है। अपने घर की इज्जत और मां-बाप की मजबूरियों के सामने, शायद मर जाना ही अच्छा लगता है। उसे ।


अभी तो माधुरी के मन में कई तरह के विचार आ रहे थे। उसका जी हदर-हदर कर रहा था... मन में अपराध-बोध की भावना प्रबल हो रही थी। यह सब कुछ उसी के चलते हो रहा है। लेकिन वह एकदम सहज-सी दीखने का प्रयास कर रही थी।  बाबू जी के माथे पर तेल की मालिश कर वह पंखा झल रही थी। अनायास ही उसकी नजर मदर के पौधे पर चली गई।


काफी देर तक यह सब होता रहा। स्थिति कुछ सामान्य सी हुई। बटोही आश्वासन देते हुए घर चला गया। घर का चूल्हा उपवास पर ही रहा। मां बेटी अपने कमरे में चली गईं और ड्योढ़ी में अपनी खटिया पर रुद्र बाबू लेट गए।  


उनके सामने अंधकार ही अंधकार नजर आ रहा था। गहराती शाम भी अंधेरा फैलाने लगी थी। इन स्थितियों से उन्हें अकबकाहट महसूस हो रही थी। दिल एकदम चंचल हो गया था। नींद का तो सवाल ही नहीं था।


घर आते हुए उन्होंने सोचा था पहुंचते ही आराम करूंगा, थकावट दूर होगी। लेकिन अभी उलझनों का रेला... अब तो पलीता जमीन नहीं लेगा। जब जमुना ने बहका दिया तो वह लेगा नहीं। कोलवरी में काम करने वाले सम्पन्न लोग भी जमुना का लोहा मानने लगे। उसे नेता स्वीकार कर लिया?


देर तक सोचने के बाद उन्होंने यही निर्णय लिया कि अभी पलिता के यहां जा कर उसे समझाना ही ठीक रहेगा। यह विचार मन में आते ही उन्होंने टार्च उठाया और भूइयांडीह की तरफ बढ़ गए। दस-बीस कदम आगे बढ़ते ही वे एकाएक रुक से गए। क्या उनका जाना ठीक रहेगा? कैसा लगेगा उनका जाना? आज तक नाहीं गए राढ़-रेआन के दरवाजे पर। किसी को बुलाना भी होता था तो नौकर-बराहील जाते थे या फिर दूर से तेज आवाज में बुला लेते थे और अभी घर जाना?


वह भी जा कर खुशामदी लहजे में बतिआना... उसे मनाना...?


तब फिर चारा क्या है? हे भगवान, कैसा जमाना आ गया? सपने में भी सोचा था ऐसा ?...


और फिर वे बढ़ने लगे। कभी कदम तेज हो जाते, कभी एकदम मद्धिम। दरअसल मन में उठ रहे भावों के अनुसार ही उनके कदम उठ रहे थे।


एकदम शांत बने वे जाएंगे। भूइयांहीड में प्रवेश करते ही लोग चौंक उठेंगे। उनके साथ कई भूइयां मुसहर साथ हो जाएंगे। झुक झुक कर लोग सलाम करेंगे। आने का कारण पूछेंगे। भीड के साथ ही वे जा पाएंगे पलीता के घर तक। बीच डीह में घर है उसका । लोगों को अपने साथ जाते हुए कैसे रोक सकेंगे? और फिर क्या कारण बताएंगे आने का? वैसे बात तो वहां भी छिपी नहीं होगी ...और वे भूइयांडीह में प्रवेश कर गए। सबसे पहले पड़ने वाला घर सीबरत का था। अपनी झोपड़ी के आगे दो खटिया बिछाए था, जिस पर लोग ठसाठस बैठे थे। आवाजें भी आ रही थी। शायद सुखदेव है, लोचन है, पुनीत है, छेदी है, कलटर है, जज है, ...और भी हैं।


उनके कदम धीरे-धीरे बढ़ने लगे। अब तो वे लोग उठेंगे ही खटिया से।



वे बढ़ते रहे-सोचते रहे और आगे बढ़ गए। देखा कई लोगों ने और नजरें फेर कर बातों में जमे रहे। किसी ने टोका नहीं, किसी ने पूछा नहीं। खटिया मचमचाती रही।


उनकी भवें तन गईं। क्रोध से शरीर कांपने लगा। लगा कि गालियों से बेध दें उन लोगों को। लाठी उठा कर हुरिया दें ।... लेकिन वे बढ़ते रहे। जाते हुए कई लोग मिले। लूदन बकरी दुह रहा था और पलीता अपने घर के सामने जमुना के साथ खटिया पर बैठा गप्प कर रहा था। और भी कई लोग उनके साथ थे। नजदीक आ कर उन्होंने देखा और सुना भी। वे लोग जोर-जोर से बोल रहे थे। लग रहा था वे काफी गुस्से में हैं।


वे एकदम से ठिठक गए और कुछ बोलने के लिए सोचने लगे। आवाज देने पर तो लोग भरभराकर उठ जाएंगे ।


"बाबू लोग अपना लक्षण सुधार नहीं रहे हैं," एक बोला।


"अरे भाई, उनका बस नहीं चल रहा है। संख्या में ज्यादा होते तो उजाड़ ही देते," दूसरा कह रहा था। "बाज कहां आ रहे हैं लोग? सच ही कहावत है चोर चोरी से जाए-तुम्बाफेरी से नहीं... आखिर क्या सोच कर उसने डकैती में यहां के लोगों का नाम थाने में लिखवा दिया चुपके से...। नेक्सलाइट हैं... नेक्सलाइट हैं... ठीक है तो हम नेक्सलाइट बन कर ही दिखा देते हैं..." यह कड़कती आवाज जमुना ही थी।


अब कैसे पुकारें... वे किसी को? यहां तो इस तरह की बातें हो रही हैं। करेगा, एक, बदनाम होगा हर कोई।...


"रामधनी..." एकाएक वे बोल पड़े और जवाब में कई चौंकने वाली आवाजें आई। वे लोग देर तक उन्हें देखते रहे, उठा कोई भी नहीं।


लेकिन झटके से रामधनी उन तक पहुंच गया।


"मालिक आप यहां? आप यहां से चले जाइए मालिक। पुलिस में नाम होने से यहां सब कोई बौखलाया हुआ है.. आप चले जाइए।”


रामधनी की बात सुन कर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। लेकिन गुस्से को पीना पड़ा।


"हम जमुना और पलीता से बात करना चाहते हैं।"


"सबेरे कर लीजिएगा मालिक...।"


पलीता और जमुना के साथ बैठक जताए लोग उन्हीं को देखने लगे थे। फुसफुसाहट में कई तानें भी उभर रही थीं जो रुद्र बाबू को बुरी तरह बेध रही हैं। इतना अपमान तो जिंदगी में उन्हें कभी नहीं मिला था। तिलमिलाकर रह गए। रुद्र बाबू लौटने की सोचने लगे। जो होगा देखा जाएगा। अब ऐसी हालत में क्या किया जाए।


और घर पर उनकी पत्नी और बेटी बेहाल हो रही थी। कहां चले गए? दरवाजे पर देखा गया, अगल-बगल खोजा गया, कई लोगों से पूछा गया। मंदिर के पुजारी ने भी नहीं कह दिया। कुआं तक झांक आई पत्नी और फिर अशुभ की आशंका में कांप गई।


और अब दोनों अपने स्तर से खोजने में असफल हो गई तो बैठ कर सिसकने लगीं।


एकाएक माधुरी उठ गई। आंखों को अपनी साड़ी की कोर से उसने पोंछा। कुछ देर तक ऊहापोह की स्थिति में बनी रही।


"मां! मैं अभी आ रही हूं" रुंधी आवाज में उसने कहा और फिर तेज कदमों से आंगन पार करने लगी। मां का प्रश्न कहां?... क्यों?... किसलिए?... भी वह नहीं सुन सकी।


आंगन पार कर वह दरवाजे के बाहर आ गई और तेज कदमों से लगभग दौड़ते हुई आगे बढ़ने लगी।


माधुरी के इस तरह जाने ने मां को भौंचक बना दिया। कभी बाहर नहीं निकलने वाली लड़की कहां गई। आशंकाओं से घिर गई मां। क्या जान देने चली गई? क्या कहीं भाग गई? मां भी माधुरी का पीछा करने के लिए बढ़ी। लेकिन कहां उनका बूढ़ा शरीर और कहां उसकी जवानी। तुरंत ही हांफने लगी और माधुरी को दौड़ते जाती हुई देखती रही।


चिल्लाने की इच्छा हो रही थी शोर मचाने की इच्छा हो रही थी, लेकिन इससे तो हंगामा हो जाता। कैसे मुंह दिखाएगी? और अगर कुछ अनहोनी हो गई तब?.. . चुप रहने से तो... और वह अनायास बेटों के घर की तरफ बढ़ गई। उन बेटों के घर की तरफ जिनकी निष्ठुरता से तंग आ कर कसम खा ली थी उनके घर न जाने की। वैसे मां का मन बराबर उछाल मारता लेकिन उनकी बेरुखी सामने आ जाती।


लेकिन अभी... अभी वह गई और स्थिति को बता कर रोने लगी। दोनों भाई पहले तो रोना देखते रहे, एक-दूसरे की तरफ नजरें चुरा कर ताकते रहे फिर तेजी से बाहर निकल गए और वह दरवाजे पर ही छाती पिटती रही।



थोड़ी देर बाद रामधनी के साथ सर झुकाए, रुद्र बाबू आ गए। माधुरी की बात सुन कर व्यग्र से हो गए। कुछ देर के लिए उनकी बोलती ही बंद हो गई। यह क्या हो गया?


चीख-चीख कर उन्होंने लोगों को बुलाया। कई लोग बात जानते ही गांव के चारों तरफ दौड़ पड़े। कुछ लोग उनके पास सांत्वना देने के लिए ठहर गए। बटोही भी शोर सुन कर पहुंच गया उनके पास। आस-पड़ोस की औरतें आ गई। दोनों बहुएं भी आ गईं। ढेर सारी औरतें रुद्र बाबू की पत्नी के साथ रोने-पीटने लगीं। कोई-कोई थक कर चुप भी करातीं।


रुद्र बाबू तो एकदम जड़ बन गए थे। एक शब्द भी उनके मुंह से नहीं निकल पा रहा था। वे सिर झुकाए बैठे थे लोगों के बीच। होंठ कांप रहे थे। आंसू बह रहे थे बिना रोक-टोक के। बहते हुए आंसुओं से उन्हें ऐसा लग रहा था मानो शरीर का सारा खून आंखों के रास्ते आंसू की शक्ल में निकल रहा हो।


खोजने गए लोग बारी-बारी से लौटते आ रहे थे। हरेक आने वाले पर वे आशा से चौंक कर नजरें उठाते। आंखों से ही पूछते और इनकार सुन कर और भी पीला पड़ने लगते ।


अभी कुछ घंटे पहले जो उत्साह, जो ताजगी उनके चेहरे पर वर्षों बाद आई थी, एकदम लुप्त हो गई थी और वीरानी ने अपना कब्जा जमा लिया था। 


लोग आगे की योजना पर बातें कर रहे थे। क्या किया जाए? आखिर कहां जा सकती है वह? क्या कुल का नाम डुबाएगी? ऐसे लक्षण तो नहीं थे उसके। इसके जैसा स्वभाव तो किसी का नहीं है।


में मारे लोग चितित थे। गांव-समाज की इज्जत का प्रश्न था यह और द 


इतनी नेक, इतनी मिलनसार, इतनी समझदार, इतनी सहनशील लड़की के बारे में वे सारे लोग चिन्तित थे। और रुद्र बाबू के लिए उन्हें तो लग रहा था कि वे बिना कपड़ों के बैठे हैं सभी के सामने।


कि इतने में वहां पर उपस्थित कई लोग एकाएक चौंक गए। कई टार्चों के प्रकाश और लालटेन की रोशनी के साथ दस-बारह लोग इधर ही आ रहे थे। दूर से ही पलीता राम और जमुना यादव की आवाज आ रही थी। लोग समझ नहीं पा एकाएक कि क्या हो रहा है। क्यों आ रहे हैं लोग? जितने लोग, उतनी संभावनाएं।


माधुरी भी उन लोगों के साथ आती दिखाई पड़ गई। लोग अवाक थे। वे लोग एकदम पास आ कर ठहर गए। कुछ देर भीड की तरफ लोगों ने देखा। माधुरी भी नजरें घुमा कर अपने मां-बाबू जी समेत और लोगों को देखने लगी।


"माधुरी दीदी ने मुझे भैया कहा है। उसकी शादी धूमधाम से होगी," एकाएक जमुना बोल पड़ा।


"रजिस्ट्री मेरे नाम से हो या जमुना भैया के नाम कोई फर्क नहीं। रजिस्ट्री कल ही होगी," पलीता बोला। रुद्र बाबू के साथ बैठे लोग एकदम चुप थे, केवल ताक रहे थे टुकुर-टुकुर। आश्चर्य से सुनने लगे थे इन दोनों की बात। एकदम अजगुत-सा लग रहा था यह सब कुछ।


"हमारी लड़ाई सिद्धांत की है, और वह रहेगी। माधुरी दीदी से हमारी लड़ाई नहीं है। कल रजिस्ट्री होगी।" जमुना ने कहा, भीड़ की तरफ देखा और फिर वह अपने गांव की तरफ मुड़ गया। उसके साथ आए लोग उसके साथ जाने लगे।


भीड अवाक सब कुछ देखती रही। रुद्र बाबू को तो पता ही नहीं चल रहा था। वे हंसें या रोएं।


माधुरी ने जाती हई भीड़ को देखा, बाबू जी पर नजर गई, मां के सूखे आंसुओं पर भी उसकी नजर गई। सारे लोगों को उसने गौर से देखा। अनायास ही उसकी नजर आकाश की तरफ चली गई। चांद अपना दूधिया प्रकाश बिखेरने लगा था। वह बढ़ गई आंगन की ओर।


मकान के उत्तरी हिस्से में बाई तरफ नजर पड़ते ही वह बरबस मुस्करा पड़ी-सचमुच मुस्करा पड़ी वह। गिरी हुई दीवार के ठीक नीचे उग आए मदार के पौधों में कई फूल खिले हुए थे। उसे लगा कि मदार के वे फूल मुस्करा रहे हैं। मदार के फूल उसे सफेद बुलबुलों की तरह प्रतीत हो रहे थे। और उसकी सफेदी उसके अंतर तक बेधती चली जा रही थी।


ऐसा नहीं होता लेकिन उसे लगा कि उन फूलों से सुगंध की बौछारें उठ रही हैं। उसने तय किया कि मदार के पौधों को कतई नहीं काटेगी।



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