ममता जयंत का आलेख 'साहस सीमा और संवेदना का समेकन मित्रो'
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| कृष्णा सोबती |
आम तौर पर स्त्रियों से हमारा समाज यह अपेक्षा करता है कि वे अपनी जुबान न खोलें, और दुःख दर्द को अपनी नियति मान कर उसे सह जाएं। अगर वह अपनी बात या व्यथा कहती है तो उस स्त्री को मुँहफट और निर्लज्ज जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। कृष्णा सोबती एक दूरदर्शी रचनाकार रही हैं। हिंदी साहित्य में जब नारी विमर्श का कोई नामलेवा तक नहीं था कृष्णा जी उन विमर्शों को सामने लाती हैं जो स्त्रियों के दुःख दर्द को उजागर करते हैं। वे ऐसी लेखिका हैं जो साहस के साथ स्त्री मन की व्यथा को सामने लाती हैं। ममता जयंत मित्रो मरजानी का पुनर्पाठ करते हुए लिखती हैं 'भारतीय समाज में मातृत्व को इतना अधिक महिमामण्डित किया गया है कि बाँझ स्त्री, चाहे उसके बाँझपन का असली कारण पुरुष ही क्यों न हो, संतान न होने पर दोषी स्त्री को ही ठहराया जाता है, किंतु कृष्णा सोबती की मित्रो एक निर्भीक तथा स्पष्ट बोलने वाली स्त्री है, डर-शर्म उसके यहाँ नहीं हैं। सच कितना भी कड़वा क्यों न हो वह बोले बिन नहीं चूकती। जब परिवार द्वारा उसके मातृत्व पर प्रश्न उठाया जाता है, तो वह खुले शब्दों में अपने पति की कमजोरी तथा नपुसंकता की ओर इशारा करती है।' प्रयाग पथ का हालिया अंक कृष्णा सोबती पर केन्द्रित है। इस अंक में ममता जयंत का एक विचारपरक आलेख मित्रो मरजानी पर है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ममता जयंत का आलेख 'साहस सीमा और संवेदना का समेकन मित्रो'।
'साहस सीमा और संवेदना का समेकन मित्रो'
ममता जयंत
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती उन स्त्री कथाकारों में से एक हैं जिन्होंने न स्त्री विमर्श के नाम पर कोई आन्दोलन छेड़ा, न किसी खेमे में खड़ी मिलीं, न चर्चाओं के केंद्र में रहने की कोशिश ही की। उनकी कहानियाँ संख्या की दृष्टि से भले ही कम हैं लेकिन उनकी विशिष्ट पहचान बनाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। कृष्णा सोबती की कहानियों में स्त्री की आत्मसजगता, और परम्परागत समाज में उसकी घुटन और उससे बाहर निकलने की छटपटाहट पूरी प्रामाणिकता के साथ आती है। इन कहानियों में मुख्यतः तीन तरह की प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं।
पहली वे जो प्रेम और स्त्री-पुरुष संबंधों की कहानियाँ हैं। जिनमें ‘बादलों के घेरे’, ‘गुलाब जल गंडेरिया’, ‘दादी अम्मा’, ‘कहीं नहीं-कोई नहीं’ जैसी कहानियाँ शामिल हैं।
दूसरी वे जो स्त्री मन की पीड़ा को सामाजिक संदर्भों में चित्रित करती हैं। जैसे- ‘तिन पहाड़’, ‘डार से बिछुड़ी’, 'मित्रो मरजानी’, ‘ऐ लड़की’ और ‘नाम पट्टिका’ जैसी लम्बी कहानियाँ।
इनके अलावा तीसरी वे कहानियाँ हैं जो देश विभाजन और साम्प्रदायिकता संबंधी त्रासदी को सामने लाती हैं। ‘सिक्का बदल गया’ और ‘ज़िन्दगीनामा’ इसी तरह की कहानियों के उदाहरण हैं। इन सभी कहानियों में उनकी स्त्री दृष्टि बेहद प्रभावशाली ढंग से उभर कर आती है जिसके कारण वे अपने समय की लेखिकाओं से अलग खड़ी दिखाई देती हैं।
लगभग छः दशक पूर्व 1967 में जब कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ प्रकाशित हुआ, तब न स्त्री विमर्श केन्द्र में था न अन्य किसी विमर्श की उपस्थिति आज की तरह थी। आज जब स्त्री लेखन पितृसत्ता की होड़ में कहीं आगे है तब ‘मित्रो मरजानी’ का पुनर्पाठ कई विडंबनाओं को समेटे हुए है। स्त्री चेतना का जो आख्यान कृष्णा सोबती ने ‘मित्रो मरजानी' में रचा है वह अभूतपूर्व है। इस उपन्यास में स्त्री की देह आसक्ति और उसकी निजी चेतना का खुलासा कृष्णा सोबती ने जिस बेबाकी के साथ किया है वह हिन्दी साहित्य जगत में मिसाल के तौर पर कायम है।
‘मित्रो मरजानी’ एक मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी के रूप में स्त्री संबंधी कथा का ज्वलंत उदाहरण है। इस उपन्यास में कृष्णा जी ने स्त्री मन का आंतरिक चित्रण और वैवाहिक संबंधों का विश्लेषण जिस अनूठे ढंग से किया है वह उनकी पारदर्शिता और स्त्री बोधगम्यता का प्रतीक है। यहाँ गुरदास और धनवन्ती नामक दम्पति का परिवार है जिसमें उनके तीन बेटे और तीन बहुएँ हैं, इनके अलावा एक पुत्री भी है। कहानी की शुरुआत गुरुदास के बचपन से बुढ़ापे तक के सफ़र को याद करते मसूढ़े में उठी पीर से होती है जब दूध के दांत उखड़ने के दिनों का स्मरण करते हुए वे कहते हैं- ‘अरे, कहाँ चले गए वे सुहाने दिन और कहाँ गए अपने अम्मा बापू? इन्हीं भूली बिसरी यादों के बीच धनवन्ती की उपस्थिति होती हैं। मध्यमवर्गीय परिवार की यह कहानी उपन्यास की जिस मुख्य पात्र ‘मित्रो’ को केंद्र में रख कर बुनी गई है उसकी मुखरता उपन्यास की प्रसिद्धि का एक बड़ा कारण है।
उपन्यास में मित्रो मँझली बहू यानि ‘सुमित्रावन्ती’ के किरदार के रूप में सामने आई है। एक ऐसी स्त्री जो अपनी यौन इच्छाओं के प्रति सजग है और अपनी आजाद ख़याली के लिए जानी जाती है। उसके भीतर निज चेतना के तार झंकृत होते हैं जिसका देह राग हर किसी को सुनाई देता है। सारी सीमाओं और तमाम मजबूरियों के बाद भी मित्रो अपनी दैहिक इच्छाओं को बेहिचक ज़ाहिर करने से नहीं रोक पाती। देह आसक्ति स्त्री हो या पुरुष हर व्यक्ति में कम या ज्यादा होती ही है लेकिन उसे ईमानदारी से उजागर करना और अभिव्यक्ति का विषय बनाना हर दौर में कठिन रहा है। ख़ासकर स्त्रियों के लिए। कोई स्त्री क्या देखती, क्या सोचती और अपनी इच्छाओं के प्रति कितनी सजग है इस बात को कृष्णा सोबती ने ‘मित्रो मरजानी' में पूरी संजीदगी से उठाया है।
स्त्री अस्मिता और उसकी मुक्ति का सवाल कृष्णा सोबती के रचनात्मक चिंतन का केंद्र रहा है। इस उपन्यास में भी उनका नारीवादी दृष्टिकोण साफ झलकता है। रचना के काल खंड में मित्रों जैसे चरित्र को पाठक के सम्मुख रखना अपने आप में एक साहसिक कार्य है। मित्रो-मरजानी की रचना प्रक्रिया के बारे में स्वयं सोबती जी का कथन है कि "पुरानी नीवों शहतीरों को हिलाने वाला मित्रो का सा जलजला उठ ही आए तो आप ही बन जाती है 'मित्रो-मरजानी' की सी कहानी।" सही अर्थों में मित्रो के भीतर एक आदिम अगन की दहकती, महकती गंध है जिसे पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों ने दबाया हुआ है। ‘मित्रो मरजानी’ का रुपक इन्हीं सामाजिक मूल्यों को अपदस्थ करता हुआ स्त्री-विमर्श का एक नया पाठ प्रस्तुत करता है। वह उन पुरानी नीवों और खोखले अनुशासन की चूलें हिला देने वाला साहसिक नारीवादी पाठ है जो मर्दवादी समाज के लिए चिंता का विषय हो सकता है। उपन्यास में सोबती जी ने मित्रो के माध्यम से सदियों से उत्पीड़ित स्त्री के मनोविज्ञान को समझने और उसे जाहिर करने की यह सफल कोशिश की है, कि वह कैसे नपुसंक व्यक्ति के साथ अपनी यौन इच्छाओं का होम करती है। लेकिन क्यों? यही तीखा प्रश्न ‘मित्रो मरजानी’ के केंद्र में है।
कथावस्तु के अनुसार मित्रो कामेच्छा की मारी एक अतृप्त स्त्री है। उसमें जहाँ पुरुषों की सी कामुकता है वहीं अल्हड़ स्त्री सा बड़बोलापन भी है। वह पुरुष का सामिप्य चाहती है, ऐसी निकटता जो उसे शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह संतुष्ट कर सके। इसी इच्छा के चलते वह अपने पति से इतर जाने की भी कोशिश करती है। उसका यह आचरण जहाँ शर्मनाक लगता वहीं उसकी सरलतम प्रकृति को भी दर्शाता है। मित्रो मुँहफट भले ही हो लेकिन निर्लज्ज नहीं है। वह नैतिक मूल्यों का सम्मान करने वाली स्त्री है, इसीलिए वह नहीं चाहती कि उसकी माँ उसके पति के साथ किसी भी तरह का संबंध स्थापित करे।
कृष्णा जी सुखी दापंत्य जीवन के लिए यौन संबंध को जीवन का महत्वपूर्ण अंग मानती हैं। यह किसी भी इंसान की वह निजी जरूरत है जो आत्मतुष्टि के लिए आवश्यक है। इसी अतृप्ति के चलते मित्रो मरीचिका सी भटकती फिरती है। सामान्यतः स्त्री समाज प्रदत्त संस्कारों के नियंत्रण में संस्कारित रूप से प्रस्तुत होती है। लेकिन मित्रो समाज रचित आदर्शों और सभ्य समाज की परतों को छील कर, नग्न प्राकृतिक रूप में बाहर निकलती है। मित्रो मानो काम भावना के बहाने अपने स्त्री होने को स्वीकार करने का आग्रह करती है। उसमें अपनी पहचान को ले कर कहीं कोई अफ़सोस नहीं है।
कृष्णा सोबती के इस उपन्यास में चित्रित, नारी जीवन में परंपरागत एवं आधुनिक मूल्यों का टकराव दृष्टिगोचर होता है। मित्रो जहाँ एक आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती है वहीं उसकी सास और जेठानी परंपरागत नारी के रूप में चित्रित हुई हैं। सुहागवंती एक जगह कहती है- ‘बहन मित्रो, घनी रात गई। अब चिंता जंजाल छोड़ तनिक आराम कर लो’। मित्रो ओठ बिचका उल्टा उत्तर देते हुए कहती है- “चिंता-जंजाल किसको? मैं तो चिंता करने वाली के पेट ही नहीं पड़ी।” यह वो आतुर मगर संवेदनशील स्त्री है जिसे यौवन की अमिट प्यास है। यौवन के उद्दाम आवेग के कारण वह न तो सास की सुनती है, न जेठ-जिठानी की लिहाज़ करती है। गोया शर्म का अर्थ ही नहीं जानती। वह अपनी जेठानी सुहागवंती से कहती है ‘कि-बनवारी कहता है, मित्रो, तेरी देह क्या निरा शीरा है-शी-रा! उस नाश होने से कहती हूँ... अरे इसी शीरे में तेरी जान को डंक मारते सर्पों की फौजें पलती हैं।" वह अपने कपड़े उतार कर बेहिचक अपनी जेठानी के सामने लेट जाती है। सुहाग शर्म से रजाई खींच मुँह ढक लेती है और कहती है-- "इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती औरत की देह निरे पाप का घट है।"
सोबती की यह पात्र ढोंग और पाखंड नहीं जानती और न हीं उसमें सतियों का सा सत् बल है जिस वातावरण में वह पली है उसे स्पष्ट करते हुए कहती है- सात नदियों की तारु, तवे सी काली मेरी माँ और मैं गोरी-चिट्टी उसके गोद पड़ी। कहती है, इलाके के बड़भागी तहसीलवार की मुँहादरा है मित्रो। अब तुम्हीं बताओ जिठानी, तुम सा सत् बल कहाँ से पाऊँ लाऊँ।" यहीं आगे कहती है- देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं पहचानता।... बहुत हुआ हफ्ते पखवारे... और मेरी इस देह में इतनी प्यास है इतनी प्यास कि मछली सी तड़पती हूँ।" यह सुन सुहाग का मुँह तमतमा जाता है और कहती है-- "देवरानी बहू बेटियों के लिए घर गृहस्थी की रीति ही लक्ष्मण की लीक। जाने अनजाने फैलागी नहीं कि..." यह मित्रो को दबाने समझाने की एक कोशिश भर है।
उपन्यास में मित्रो के अलावा उसकी सास धनवंती, जेठानी सुहागवंती, देवरानी फुलावंती और ननद जनको जैसी अन्य कई स्त्रियाँ हैं। ये सभी स्त्रियाँ कहीं न कहीं पितृसत्ता को पोषित करती नज़र आती हैं। अपने या दूसरों के हक़ में लड़ने की कूवत उनमें नहीं है। इसके बरक्स मित्रो सिर्फ सवाल ही नहीं उठाती समस्या भी खड़ी करती है। गोया स्त्री मन को अभिव्यक्त करने की पूरी जिम्मेदारी मित्रो ने ही ले रखी है।
मित्रो आधुनिक युग की वह स्वच्छंद स्त्री है जिससे परिवार में हर सदस्य के साथ उसका संघर्ष चलता रहता है। पति उससे यहाँ तक कह देता है कि "यह नूरमहलन इस घर का नाम धरम सब ले डूबेगी या फिर मुझे ही काले पानियों भिजवाएगी।" तथा “यह कूड़ा मेरे भाग था इससे तो कोई चूड़ी चमारन अच्छी थी।” मित्रो जिस वातावरण तथा संस्कार में पली-बढ़ी है, वह कुछ ऐसा है जिसके कारण मित्रो उस परंपरा से चले आने वाले रुढ़ियों और नियमों को स्वीकार नहीं कर पाती, जो भारतीय हिंदू परिवार की बहू कहलाने के लिए ज़रूरी हैं। न उसे घूँघट की परवाह है, न परदे की, न नजर शर्मीली है और न वाणी गुमसुम। वह पति और जेठ के सामने नंगे सिर चारपाई पर बैठी हँसती रहती है। ससुर के आने पर भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी मौके गुरुदास गरजते हुए कहते हैं- "सरदारी लाल तेरे होश ठिकाने हैं? बहू से कह कपड़ा करे” तथा "यह कलजुग है कलजुग! आँख का पानी उतर गया तो फिर क्या घर-घराने की इज्जत और क्या लोक-मरजाद।" यहाँ संबंधों की मर्यादा को ले कर जद्दोजहद है। संबंध जो परंपरागत अर्थों में बंधन के प्रतीक थे वे अब सहज होते जा रहे है। वस्तुतः परंपरागत एवं आधुनिक मूल्यों का टकराव हमेशा चलता रहा है।
कृष्णा सोबती के यहाँ स्त्री महज एक कोख नहीं है बल्कि मातृत्व सुख उनके लिए नारी को ईश्वर से मिला एक अनुपम उपहार है। सृष्टि सृजन के साथ ही नारी जाति को नव-जीवन के सर्जन का सामर्थ्य प्राप्त हुआ है। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे नारी का यह वरदान उसके लिए अभिशाप बनता चला गया। स्त्री का संपूर्ण अस्तित्व जैसे मातृत्व में ही सिमट कर रह गया। जो स्त्री प्राकृतिक रूप से माँ नहीं बन पाती लोगों को उसका जीवन व्यर्थ लगने लगता है।
भारतीय समाज में मातृत्व को इतना अधिक महिमा मण्डित किया गया है कि बाँझ स्त्री, चाहे उसके बाँझपन का असली कारण पुरुष ही क्यों न हो मगर संतान न होने पर दोषी स्त्री को ही ठहराया जाता है, किंतु मित्रो एक निर्भीक तथा स्पष्ट बोलने वाली स्त्री है, डर-शर्म उसके यहाँ नहीं हैं। सच कितना भी कड़वा क्यों न हो वह बोले बिन नहीं चूकती। जब परिवार द्वारा उसके मातृत्व पर प्रश्न उठाया जाता है, तो वह खुले शब्दों में अपने पति की यौन संबंधी कमजोरी तथा नपुसंकता की ओर इशारा करती है कि यदि उसमें (उसके पति) ऊर्जा है तो वह सौ-सौ कौरवों को जन्म दे सकती है। वह कहती है- ‘अम्मा! पांच सात क्या, मेरा बस चले तो गिन कर सौ कौरव जन डालूँ, पर अम्मा, अपने लाड़ले बेटे का भी तो आड़-तोड़ जुटाओ! निगोड़े मेरे पत्थर के बूत में भी कोई हरकत तो हो! धनवंती के बदन पर काँटे उग आए। छिः छि बहू! ऐसे बोल कुबोल नहीं उच्चारे जाते।’ यहाँ मित्रो का मंतव्य साफ है कि अगर उसकी कोख आज यदि हरी नहीं हुई तो इसमें उसका क्या दोष? स्त्री पहली बार अपने अनुभवों के साथ खुल कर सामने आती है और पुरुष की नपुंसकता की ओर इशारा करती है। ऐसी स्त्रियों को समाज अक्सर बेहया या चरित्रहीन ठहराता है। उनके व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यहाँ सवाल सिर्फ स्त्री की यौन कामना का नहीं है बल्कि उनकी अपनी इच्छा या कि आत्मसजगता का है। उपन्यास में कृष्णा जी ने ऐसे अनेक तीखे प्रश्नों को पुरजोर तरीके से उठाया है।
उपन्यास में माँ न बन पाने का दुःख कहीं न कहीं मित्रों को भी है। उसके व्यवहार में पायी जाने वाली कटुता अचानक ही उबल पड़ने वाला आक्रोश और विशेष रूप से पति सरदारी लाल के संदर्भ में परिवार वालों के समक्ष सुनाई जाने वाली जली-कटी बातों के पीछे कहीं न कहीं उसकी पीड़ा ही है। जो कभी निर्लज्जता के रूप में प्रकट होती है तो कभी तानों के रूप में। इसीलिए मित्रो अपनी सास के समक्ष उलाहने देते हुए कहती है- "सुरखरु हो बैठो, अम्मा! तुम्हारे इस बेटे के यहाँ कुछ होगा तो मित्रो चूहड़ी के पैरों का धोवन पी अपना जन्म सुफल कर लेगी।" इतना ही नहीं जिस मातृत्व की उपलब्धि के लिए नारी नौ महीने तक नाना प्रकार के कष्ट झेलती है, मृत्यु से साक्षात्कार करती है और अंततः बच्चे के जन्म पर खुशी से फूली नहीं समाती, वह बच्चा उसके अर्थात माँ के नाम से नहीं बल्कि पिता के नाम से जाना जाता है। बच्चे को समाज में सम्मान दिलाने के लिए माँ की नहीं बल्कि पिता की जरुरत ज्यादा मानी जाती है। एक जगह मित्रो कहती भी है- “जिन्द जान का यह कैसा व्यापार? अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म!” अवैध बच्चे समाज के लिए एक भद्दी गाली बन कर रह जाते हैं। मातृत्व की यह पराजय समस्त नारी जाति के अवमूल्यन का प्रतीक है।
उपन्यास में लेखिका ने शोषण की समस्या को भी यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। हमारे समाज में पुरुष की अपेक्षा नारी की स्थिति कुछ कमजोर नज़र आती है। जबकि मानवीय स्तर पर स्त्री-पुरुष दोनों समान हैं। लेकिन पितृसत्तात्मक समाज ने आज भी नारी को बिस्तर की शोभा तक ही सीमित रखा है। अधिकार तृप्त पुरुष नारी को उपभोग की वस्तु मानकर उसके व्यक्तित्व और आत्मा का तिरस्कार करता रहा है। इस उपन्यास में भी यही हुआ है, उसका पति मित्रो की इच्छाओं की कोई परवाह नहीं करता, सिर्फ उसके ऊपर दूसरों की इच्छाएँ थोपी जाती हैं। पति द्वारा हमेशा उसे मारा, दुत्कारा जाता है। यही कारण है कि मित्रो चिड़चिड़ी हो जाती है। सास-जेठानी की अच्छी बातें भी उसे बुरी लगने लगती है। सास द्वारा उसकी तबियत के विषय में पूछने पर वह खुंखार शेरनी की तरह छपट पड़ती और कहती है कि "जले पर नमक छिड़कने से कुछ नहीं होगा अम्मा! मांँ बेटे मिल छील-छाल मित्रों का अचार क्यों नहीं डाल लेते?" यहाँ लगता है जैसे लेखिका मित्रो के माध्यम से देश काल को संदेश देना चाहती हैं कि स्त्रियों को इस तरह के शोषण का विरोध करना चाहिए, फिर वह शारीरिक, मानसिक या अन्य किसी प्रकार का शोषण क्यों न हो। आत्मसम्मान तथा आत्मरक्षा के प्रति सजग होना हर व्यक्ति का परम कतर्व्य है।
अधिकारों के लिए मनुष्य को लड़ना चाहिए तथा उसके न मिलने पर मौन नहीं रहना चाहिए। दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र में लिखा भी है-
"छीनता हो स्वत्व तेरा, और तू त्याग तप से काम ले, यह पाप है।
पुण्य है। विछिन्न कर देना उसे, बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है।"
इस उपन्यास में लेखिका ने नई पीढ़ी की एक ऐसी स्त्री का चरित्र उजागर किया है जो अपने आत्मसम्मान को बचाने की पुरजोर कोशिश करती है। जिसे न किसी आदर्श का भय है, न समाज का और न परिवार जनों का ही। वह स्वयं को पुरुष से कम नहीं मानती बल्कि परिवार में सबकी बातों का खुल कर उत्तर देती है। सच है कि हमारे समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं है लेकिन मित्रों किसी भी पात्र से अपनी अस्मिता को ठेस नहीं पहुँचने देती। एक जगह वह कहती है कि “जेठानी मेरे जेठ से कह रखना जब तक मित्रो के पास यह इलाही ताकत है मित्रो मरती नहीं।” कहानी में जेठ हों या पति, सास हो या देवरानी जेठानी, वह अपनी अस्मिता को आहत नहीं होने देती। सरदारी उसे पीटता है तथा नजरे नीची करने को कहता है किंतु वह ऐसा कुछ भी नहीं करती बल्कि बिफर कर सिर और ऊंचा कर ढिठाई से सामना करती है। सोबती जी जिस आधुनिक और जागरूक नारी का चित्र उकेरती हैं वह वस्तु से व्यक्ति बनती नजर जा रही है और अपनी आत्मरक्षा करने के लिए तत्पर है। इस उपन्यास की लोकप्रियता का कारण अगर ‘मित्रो’ की मुखरता है तो इसकी सफलता की वजह रचनाकार की वैचारिकी और स्त्री चेतना की बोधगम्यता है। उपन्यास में मित्रो ने तमाम जिम्मेदारियों और बंदिशों के बाद भी अपने सवाल और सरोकारों को बरकरार रखा है।
कृष्णा सोबती की रचनाओं ने जहाँ वृहत्तर ऊँचाई और पाठक वर्ग की भरपूर सराहना पाई है वहीं उनके स्त्री चरित्रों की सामाजिक छवि और उनकी मुखरता व निर्भीकता को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। समकालीन आलोचकों ने उन पर कई तरह के प्रश्नचिन्ह लगाए हैं।
इस उपन्यास में पहला सवाल मित्रो के सम्भ्रांत और साधन सम्पन्न परिवार से मध्यमवर्गीय परिवार में आने पर ही है। मित्रो की माँ बालो अन्य माँओं जैसी पारम्परिक नहीं है वह जहाँ सुंदर सुडौल दामाद को देख आकर्षित होती है वहीं बेटी की कामना जान उसके लिए उचित पुरुष का इन्तजाम करती है। बावजूद इसके मित्रो अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि में वापिस लौटती है। मित्रो का यूँ लौटना माँ के जीवन में आए सन्नाटे के प्रति कोई संवेदना हो सकती है लेकिन पाठक को कहीं न कहीं अचम्भित जरूर करती है। क्या सचमुच मित्रो के लिए यह वापसी जरूरी थी? ऐसे और भी कई सवाल हैं। लेकिन यह आलोचना का केवल एक पक्ष है। इसके अलावा एक दूसरा पक्ष यह भी है कि साहित्य में किसी समाज के प्रति कितनी घृणा परोसी जा सकती है। इसके उदाहरण भी कृष्णा सोबती के यहाँ बखूबी मिलते हैं। इस उपन्यास में उन्होंने मित्रो के लिए एक नहीं कई-कई बार तरह-तरह से जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया है। माना यह क्षेत्रीय या आम बोलचाल की भाषा हो सकती है लेकिन सोचने की बात ये कि एक सच्चा सजग रचनाकार कैसे अपनी रचना में ऐसे शब्दों को स्थान दे सकता है? एक जगह मित्रो का पति सरदारी लाल कहता है- ‘यह कूड़ा मेरे भाग रखा था! इससे कोई चूड़ी चमारन अच्छी थी।’ यहाँ पहले वाक्य में बात खत्म हो सकती थी बिना दूसरा वाक्य जोड़े। लेकिन लेखिका को इन शब्दों का प्रयोग जरूरी जान पड़ा। आगे भी कृष्णा सोबती ने- चूड़ी-चमारिन, मिरासी, कंजर, भिश्ती, भाड़, भटियारिन, घुइयां आदि शब्दों को अपने संवादों में गाली की तरह इस्तेमाल किया है। क्या सचमुच एक दबंग रचनाकार के लिए रचना में प्रभाव पैदा करने को बिरादरी विशेष की निरादरी जरूरी है?
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
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सम्पर्क
मोबाइल : 9315605580




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