युद्ध के विरुद्ध कविता : 6, तसलीमा नसरीन की कविताएँ
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| तसलीमा नसरीन |
युद्ध हमेशा मनुष्यता के प्रतिपक्ष में खड़ा होता है जबकि कविता मनुष्यता के पक्ष में खड़ी होती है। इस तरह कविता मनुष्य और मनुष्यता के लिए एक गहरी आश्वस्ति के रूप में दिखाई पड़ती है। तसलीमा नसरीन ने युद्ध के खिलाफ कविताएं लिखी हैं। उनके कविताओं की अनुवादक जयश्री पुरवार लिखती हैं "आज के इस दहशत और अस्थिरता से भरे समय में मन बार-बार उन्हीं कविताओं की शरण में लौटता है, जहाँ शब्दों में करुणा, अर्थों में आश्वासन और लय में एक गहरा मानवीयता का स्पर्श है। चारों ओर भय, अविश्वास और अनिश्चितता के कुहासा में वे पंक्तियाँ संवेदना, विश्वास और जीवन के प्रति अटूट आस्था का का आलोक भर देती है।" इन दिनों हम युद्ध के खिलाफ कविताएं शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इसके अन्तर्गत आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं तसलीमा नसरीन की कविताएँ। मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद जयश्री पुरवार ने किया है।
युद्ध के विरुद्ध कविता : 6
तसलीमा नसरीन की कविताएँ
(मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद : जयश्री)
खेला
निर्दोष इज़राइली की हत्या किए जाने पर मुझे कष्ट होता है
निर्दोष फ़िलिस्तीनी की हत्या किए जाने पर मुझे कष्ट होता है,
किसी भी निर्दोष मनुष्य की हत्या किए जाने पर मुझे होता है कष्ट।
मैं तुम लोगों की तरह कोई एक पक्ष नहीं ले पाती।
तुम लोग इज़राइल से प्यार करने पर फ़िलिस्तीनियों के खून से होली खेलते हो
तुम लोग फ़िलिस्तीन से प्यार करने पर इज़राइलियों के खून से होली खेलते हो
मैं ऐसा नहीं कर सकती।
इज़राइल और फ़िलिस्तीन की माटी और मानुष में मैं कोई फ़र्क नहीं कर पाती।
यहूदी और मुसलमान में मैं कोई भेद नहीं कर पातीं।
जिस किसी भी निर्दोष का खून ही मेरे लिए खून है,
किसी भी निर्दोष का आर्तनाद मेरे लिए आर्तनाद है,
किसी निर्दोष की भी मृत्यु मेरे लिए है मृत्यु।
हामास की रॉकेट मुझको भी जला सकती थी,
इज़राइल की मिसाईल मुझे ईंट-पत्थर के नीचे डालकर
मुझे भी श्वास रोध कर मार सकती थी।
मैं हो सकती थी इजराइल की एक यहूदी,
हो सकती थी एक फ़िलिस्तीनी मुसलमान।
जब मैं एक इज़राइली शिशु की मृत्यु देखती हूँ
मेरे एक टुकड़े अस्तित्व की मृत्यु होती है,
जब मैं एक फ़िलिस्तीनी शिशु की मृत्यु देखती हूँ,
मेरे एक टुकड़े अस्तित्व की मृत्यु होती है।
बहुत दिनों से मैं कमरा भर अंधेरे में धूकपुका रही हूँ,
दीवाल पर पीठ टिकी हुई है।
बहुत दिनों से मैं अपने अस्तित्व का अनुभव नहीं कर पा रही,
दीवाल पर पीठ टिकी हुई है।
अब की बार बोधबुद्धि से, विवेक से अचानक उद्भासित हो आलोक,
उस आलोक से झलमला उठे चराचर जगत,
मनुष्य लज्जा से चेहरा ढाकेगा, बंद करेगा हत्या हत्या का खेला,
और मैं दौड़कर जाऊँगी दिगंत की ओर,
जहाँ तप्त मरुभूमि की देह से सट कर बहा जा रहा है शीतल समुद्र।
(प्रेरणा अंशु में प्रकाशित)
युद्ध
उनके पास शस्त्र हैं, इसलिए युद्ध में उतरे हैं।
उन्हें विनाश अच्छा लगता है, इसलिए युद्ध में उतरे हैं।
चलो तुम और मैं चुम्बन लें होठों पर,
चलो मध्यम उँगली दिखायें युद्धबाज़ लोगों को।
चुम्बन से सिक्त हो कर चलो तुम और मैं एक देश बन जायें,
आज से तुम्हारा नाम रशिया, मैं यूक्रेन।
तुम अगर क्यूबा, अल सल्वाडोर, निकारागुआ,
तुम अगर पनामा,
तुम अगर इराक़, अफ़ग़ानिस्तान,
मैं अमेरिका।
तुम आज इजरायल, मैं फ़िलिस्तीन,
मैं भारत, तुम चीन।
चलो चुम्बन लें, और मध्यम उँगली उठायें
नृशंसता और विनाश के ढेर की ओर।
जितने शस्त्र हैं दुनिया में, जितने परमाणु बम , सब इकट्ठा करें
एक गहन चुम्बन के सामने कोई इन्हें खड़ा नहीं कर पाएगा,
सब हार जाएँगे।
कोई भयंकर मरणास्त्र भी एक सादे चुम्बन से ज़्यादा शक्तिशाली नहीं हैं।
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| जयश्री पुरवार |
सम्पर्क
मोबाइल : 7905220370


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