कमल किशोर कमल का संस्मरण 'रघु राय का प्रयागराज से था गहरा नाता'


रघु रॉय 


भारत के विश्वप्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय का कल 26 अप्रैल 2026 को निधन हो गया। रघु रॉय और फोटोग्राफी जैसे एक दूसरे के पर्याय थे। उन्होंने अपने हुनर से फोटोग्राफी जैसी कला को शीर्ष पर पहुंचा दिया। आमतौर पर यह कहा जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होते हैं। हम तस्वीरों को मूक शब्द भी कह सकते हैं। ये ऐसे शब्द होते हैं जो हमारे दिलो दिमाग में आसानी से उतर आते हैं। कमल किशोर 'कमल' इलाहाबाद के ही नहीं भारत के भी जाने माने फोटोग्राफर हैं। उन्होंने एक से बढ़ कर एक नायाब चित्र उतारे हैं जिन्हें आज भी उनके संग्रह में देखा जा सकता है। रघु रॉय उनके गुरु थे। गुरु के हुनर को शिष्य की फोटोग्राफी में सहज ही देखा जा सकता है। महाकुम्भ के आयोजन के समय रघु रॉय इलाहाबाद आ कर काम करते थे। कमल किशोर का सहयोग उन्हें लगातार प्राप्त होता रहता था। हमारे अनुरोध पर कमल किशोर ने पहली बार के लिए एक संस्मरण लिख भेजा है। रघु रॉय की स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कमल किशोर 'कमल' का संस्मरण 'रघु राय का प्रयागराज से था गहरा नाता'।


'रघु राय का प्रयागराज से था गहरा नाता'


कमल किशोर 'कमल'


मेरे गुरु जाने-माने फ़ोटोग्राफ़र पद्मश्री रघु राय का शनिवार को निधन हो गया। वे 83 साल के थे। रघु राय का निधन भारतीय कला जगत की अपूरणीय क्षति है। वे देश के उन कुछ छायाकारों में एक थे जिन्होंने फोटोग्राफी को कला का रूप देने में महती भूमिका निभाई थी। उन्होंने बताया कि छायाकार के पास दो खोजी आंखें और संवेदनाओं से भरा एक हृदय है तो वह कैमरे के एक क्लिक से वह भी कह सकता है जो एक महाकाव्य के विस्तार में भी कह पाना संभव नहीं है। रघु राय महज़ फोटोग्राफर नहीं थे,बल्कि उन्होंने अपने कैमरे के माध्यम से देश के लोगों के सुख-दुख को सघनता से दर्ज किया। आज उनके चित्र बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को समझने का माध्यम हैं। आपातकाल घोषणा के पहले की श्रीमती इंदिरा गांधी की बॉडी लैंग्वेज को कैमरे के माध्यम से इतने महीन रूप से उन्होंने दर्ज किया, कि आपातकाल के बाद वही फोटो महत्वपूर्ण समाचार पत्रों का हिस्सा बन गए।



देश के गली–मोहल्लों,  बाज़ारों  के इतने जीवंत चित्र उन्होंने उतारे हैं, हम उन्हें देख कर विस्मित होते हैं। जब तक आपकी दृष्टि जिंदगी में धंसी हुई ना हो, आप किसी चीज को दृश्यमान कर ही नहीं सकते। आजादी के बाद का भारत का सांस्कृतिक इतिहास उनके चित्रों के बिना अधूरा है। मदर टेरेसा, महात्मा गांधी दलाई लामा को कैमरे के माध्यम से उनकी उपस्थिति को हमेशा हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।



एक यायावरी और गहरी खामोशी रघु रॉय के जीवन का हिस्सा थी। कहते हैं आंखों की भाषा सबसे गहरी है। और जो उसे भाषा को संप्रेषित कर दे वह दृष्टि विशेष है। रघु रॉय ने यह कई बार संभव कर के दिखाया। राजस्थान के मरुस्थल में उतरता हुआ इंदिरा गांधी का हेलीकॉप्टर और धूल धूसरित होते हुए लोगों की उड़ती हुई धोतियां। एक गहरा व्यंग्य उभरता है, लोकतंत्र और शक्ति संरचनाओं पर। आम आदमी की व्यवस्था को प्रकट करते हुए कैमरा रघु रॉय के हाथ में आ कर ताकत बन गया मूक लोगों की। कहते हैं की तस्वीर बहुत कुछ कहती है। रघु रॉय ने इस बात को संभव कर के दिखाया। उन्होंने तस्वीर खींचना नहीं बल्कि तस्वीर लिखना और पढ़ना सिखाया है। एक तस्वीर में पूरी कहानी कैसे लिखी जाती है वह समझाया।



रघु रॉय से मेरी मुलाकात 1989 में प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में हुई थी। मैं उनकी किताब 'इंदिरा गांधी' देख रहा था। वो पीछे से आ कर खड़े हो गए। मेरे बड़े ध्यान से देखने को देख कर प्रभावित हुए थे। तब तक मैं पूरी किताब तीन बार पलट चुका था। मेरी निगाह मिलते ही वे बोले 'कैसी लगी किताब'। मैंने कहा 'बहुत ही शानदार'। पर मैं इसे खरीद नहीं सकता। मेरे पास इतने पैसे भी नहीं है। मैं उस समय हाईस्कूल का विद्यार्थी था। उन्होंने वो किताब दुकान वाले से मांगी और उस पर मोटे स्केच से लिखा (विद बेस्ट कॉमलीमेंट kamal kishor Kamal) उस दिन से मैं  उनके संपर्क में आया। फिर जब भी उनके घर या ऑफिस जाता तो वो मुझे अपनी कोई न कोई किताब साइन कर के जरूर देते।    



सन् 2001 के कुंभ में मेरी बनाई डॉक्यूमेंट्री का उद्घाटन प्रयागराज कुम्भ के मीडिया सेंटर में किया था। उनके साथ कई कुम्भ मैंने साथ साथ रह कर कवर किया है। सन् 2001 में वो जब कुम्भ के लिए आने वाले थे तो दो तीन दिन पहले ही लैंडलाइन पर फोन आया। उधर से आवाज़ आई 'मैं आ रहा हूं और एक हफ्ता रहूंगा'। जिस दिन एयरपोर्ट पर आए तो मैंने खुद जा कर उन्हें रिसीव किया।



मुझे देखते ही बोले 'प्यारे तुम हो तो सब काम आसान हो जाएगा'। उनके ठहरने की व्यवस्था 'कॉक्स एंड किंग्स' में थी। बीबीसी वाले उनके ऊपर डॉक्यूमेंट्री शूट करने वाले थे। उनके रिपोर्टर ने मुझसे कहा 'कुम्भ में जो सबसे बेस्ट स्पॉट हो वहां रघु सर को ले चलिए। वो फोटो शूट करेंगे और हम लोग पीछे से उन्हें विडियो में शूट करेंगे। क्योंकि हम लोग दिखाएंगे कि भारत में सदी के पहले कुम्भ को देश के नामचीन फोटोग्राफर रघु राय अपने कैमरे में किस तरह कैद करते हैं'। जब जब वो कोई बाबा या किसी की तस्वीर उतारते तो बीच-बीच में डॉक्यूमेंट्री को देखने वाले लोगों के लिए उस तस्वीर के बारे में, और अपना अनुभव बताते जाते। मैं भी उनके साथ कुम्भ की तस्वीरें उतारता रहा। मेरी तस्वीरें रोज़ हिंदुस्तान टाइम्स में ऑल एडिशन में छपती रही। उन दिनों हिंदुस्तान टाइम्स ने मुझे फोटो फीचर की भी जिम्मेदारी दे रखी थी। मेरी बाईलाइन के साथ दसियों फ़ोटो छपती और अगले दिन रघु सर मेरी तस्वीरों पर बात करते और एप्रिशिएट करते। वह जमाना निगेटिव फिल्म का था। मैं रोज़ 5-6 फिल्म खरीद कर जाता था शाम होते ही सब खत्म हो जाती थी। रघु सर फिल्म के साथ साथ ट्रांसपेंसी भी खींच रहे थे। और वो फिल्म और ट्रांसपेसी झोला भर के लाए थे। कभी-कभी मेरी फिल्म खत्म हो जाती तो सर कहते मुझ से ले लो पर मुझे अकेला छोड़ कर मत जाओ। मैं गुम हो जाऊंगा। कभी-कभी तो कहते हमारे साथ ही ठहरो घर आने जाने में दिक्कत होगी। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। मैं कई दिन उनके टेंट में ही रहा। हिन्दुस्तान को फोटो कैंप आफिस में ही दे देता। वहां स्कैन हो कर शाम को दिल्ली लखनऊ जाती।  2006 में डिजिटल कैमरा आ गया था। फिर बहुत आसानी हो गई।



2013 के कुम्भ में रघु राय सर ने कहा मेरे ठहरने की व्यवस्था कही शोरगुल से अलग करो। तो उस समय सूचना विभाग के हेड ए के शर्मा जी ने मेरी बड़ी मदद किया। क्योंकि सारे वीवीआईपी टेंट फुल हो चुके थे। बीबीसी ने 5-6 कैंप बुक कर लिया था। दुनिया भर से फोटोग्राफर, रिपोर्टर आ रहे थे। मैंने शर्मा जी से कहा कि सर के लिए कोई साउंड प्रूफ जगह उपलब्ध करवाइए। उन्होंने डी जी के कमरे को खुलवा दिया और कहा कि वो आपके गुरु तो हैं पर हम लोगों ने उनकी तस्वीरें बचपन से देखी हैं। हम लोग भी उनकी बेहतरीन तस्वीरों के प्रशंसक हैं। आप उनके साथ इसी बड़े रुम में ठहरिए। वह काफी बड़ा कमरा विद बाथरूम था। और बिल्कुल साउंड प्रूफ ऐसा लग रहा था जैसे घर में हो।



रघु जी मेरी व्यवस्था से बहुत खुश रहते। वे हर बड़े फोटोग्राफर, अपने देश के साथ-साथ विदेश के लोगों से भी, मिलवाते और मेरी तस्वीरों की प्रशंसा करते। उनके परिवार वालों का मुझ पर बहुत भरोसा था। रघु रॉय सर के अलावा उनकी पत्नी, उनके असिस्टेंट सब यही कहते सर आपकी बहुत तारीफ करते हैं और कहते हैं कि कमल किशोर सारी समस्याओं का समाधान चुटकियों में कर देगा।



2013 के कुम्भ में वे आए तो मैंने एक बड़ा असाइनमेंट ले लिया था। सर कहने लगे तुम्हारे बगैर मज़ा नहीं आएगा। तो मैंने कहा कि मैं समय निकाल कर रहूंगा और मेरे व्यस्त रहने पर मेरा दोस्त तारा चंद गवारिया पूरे कुम्भ में आपको घुमाएगा। वह आपसे मुलाकात करना चाहता है और आपका फैन भी है। उसको आपके पास लगा दूंगा। बीच-बीच में मैं भी आ जाऊंगा। इस बात पर वे राज़ी हो गए। वे मेरे घर भी कई बार आए। देश भर के फोटोग्राफरों ने उनकी जो तस्वीरें उतारी थीं उसका एक कलेक्शन 2019 में डिजाइन किया गया था, वह किताब अब छपने की प्रक्रिया में है। इस किताब में मेरी सर्वाधिक तस्वीरें है, वे तस्वीरें जिनमें मैंने रघु सर के साथ बिताए पलों को कैमरे में कैद किया था। वे जब भी इलाहाबाद या आस-पास आने का कार्यक्रम बनाते तो दो दिन पहले से ही मुझे फ़ोन कर देते कि मैं आ रहा हूं। कहीं बिज़ी मत रहना। मैं अपने सारे कार्यकम को रद्द कर पूरा समय उनके साथ बिताता। इस मामले में सबसे ज्यादा सौभाग्यशाली हूं कि मैंने उनके साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताया और उनसे बहुत कुछ सीखा। शायद तभी लोग मेरी तस्वीरें देख कर कहते हैं कि तुम बिल्कुल रघु रॉय की तरह तस्वीरें उतारते हो। 



कुम्भ पर उन्होंने एक कॉफी टेबल बुक बनाया जिसकी फोटो प्रिंट मुझे इस आशय से भेजा कि देखो ये तस्वीरें कब और कहां हमने तुम्हारे साथ खींचा था। इसका कैप्शन तुम करो। फिर मैंने सब चित्रों पर लिखा कि कौन सी फोटो किस सन् की है और तस्वीर के विवरण को लिखा। उस किताब की पहली डमी मुझे भेजा कि एक बार फ़िर से निगाह दौड़ाओ की कही कोई कमी न रह जाए। मैंने उसे फिर से देखा और फाइनल कर के भेजा । सहयोग में मेरा नाम उन्होंने दिया फिर मैंने उनसे कहा कि मेरे सहयोगी तारा चंद ने भी आपकी मदद किया था उसका भी नाम इस किताब में आना चाहिए। फिर उन्होंने ए. के. शर्मा का भी नाम दिया जिन्होंने उनके रहने की व्यवस्था मेरे अनुरोध पर किया था। उस किताब के अब तक कई संस्करण आ चुके हैं। सर कोई भी किताब प्रिंट करवाते तो मुझे एक प्रति जरूर सौंपते या मैं जब दिल्ली जाता तो मुझे साइन कर के जरूर देते। मेरे पास रघु राय सर के लगभग सभी कलेक्शन हैं। मैंने अपने घर में उनकी किताबों की एक अलग अलमारी बनाई है। उनकी किताबों को देखने के लिए तमाम लोग मेरे घर आते हैं और उनका कलेक्शन देखते हैं।



2013 के प्रयागराज कुम्भ में मैं स्कूटी से उन्हें ले कर कुम्भ की चक्रप्लेट वाली रोड पर जैसे ही गाड़ी चढ़ाई स्कूटी स्लिप करने लगी। रघु सर ने कहा यार इस पर चलने से गिर सकते हैं। हाथ पैर टूट सकते हैं। इस लिए कोई और व्यवस्था करो। मेले में बड़ी गाड़ी या कार प्रतिबंधित था। भीड़ में कितना और पैदल चला जाए। मीलों पैदल चलना मुश्किल था। फिर मैंने टी वी एस की मोपेड निकाली और उस पर रघु सर बैठे तो जहां डिसबैलेंस हो मैं पैर निकाल कर बैलेंस कर लेता। रघु जी को यह छोटी सवारी बड़ी रास आई। मेरे सहयोगी दोस्त तारा चंद ने एक तस्वीर बनाई जो यहाँ लगा रहा हूं।



रघु राय का जन्म 1942 में पंजाब के झंग (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। 1965 में उन्होंने 'द स्टेट्समैन' अख़बार में फ़ोटो पत्रकार और 1982 में इंडिया टुडे के लिए दस साल तक बतौर फ़ोटो संपादक काम किया। उनकी फ़ोटोग्राफ़ी पर कई सारी किताबें आ चुकी हैं, जिनमें 'रघु रायज़ डेल्ही', 'द सिख्स', 'कलकत्ता', 'ताजमहल', 'खजुराहो', 'मदर टेरेसा' आदि हैं। कला के लिए भारत सरकार ने उन्हें सन् 1971 में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया था।


रघु राय के साथ कमल किशोर कमल


(इस पोस्ट में प्रयुक्त सभी चित्र हमें कमल किशोर 'कमल' के सौजन्य से प्राप्त हुए हैं।)



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