ललन चतुर्वेदी के काव्य-संग्रह 'आवाज़ घर' की चारुमित्रा द्वारा की गई समीक्षा



'कविता की आवश्यकता क्या है' आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इस पर विचार करते हुए लिखा है 'मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी न किसी रूप में, पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा। बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मंडल बाँधता चला आ रहा है जिसके भीतर बँधा-बँधा वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का संबंध भूला-सा रहता है। इस परिस्थिति में मनुष्य को अपनी मनुष्यता खोने का डर बराबर रहता है। इसी से अंत:प्रकृति में मनुष्यता को समय-समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली आ रही है और चली चलेगी। जानवरों को इसकी ज़रूरत नहीं।' इस बात में कोई दो राय नहीं कि मनुष्यता के सामने खतरे आज कहीं अधिक हैं। आज का कवि इस बात से भलीभांति अवगत है और वह उन सभी शक्तियों के विरोध में खड़ा हैं जो मनुष्यता के विरोध में खड़े हैं। ललन चतुर्वेदी की कविताएं बिना किसी शोरोगुल के अपना मूल काम करती हैं। कवि की कविताओं को पढ़ते हुए चारुमित्रा लिखती है ललन चतुर्वेदी की कविताएँ 'हमारे मस्तिष्क में देर तक गूँजती रहती हैं। यह वह कविता है जो पाठक को चकित करने के बजाय उसके भीतर उतर कर काम करती है। यहाँ प्रभाव तात्कालिक नहीं, बल्कि संचयी है—धीरे-धीरे मन में जगह बनाता हुआ।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी के काव्य-संग्रह 'आवाज़ घर' की चारुमित्रा द्वारा की गई समीक्षा समय के सन्नाटों में दर्ज होती मनुष्यता की आवाज़।


समीक्षा

समय के सन्नाटों में दर्ज होती मनुष्यता की आवाज़


चारुमित्रा 


ललन चतुर्वेदी का काव्य-संग्रह आवाज़ घर (लिटिल बर्ड पब्लिकेशन) समकालीन हिंदी कविता में उन कृतियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाता है, जो शोरगुल, तात्कालिक उत्तेजना और भाषायी आक्रामकता के बजाय गहरे, टिकाऊ और विवेकपूर्ण प्रतिरोध का स्वर रचती हैं। यह संग्रह समय, समाज और कला के सापेक्ष सरोकारों को किसी वैचारिक नारे या घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में दर्ज करता है। इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें अभिव्यक्ति के सुर बहुत ऊँचे नहीं हैं, पर वे इतने स्पष्ट, संतुलित और आत्मविश्वासी हैं कि पाठक तक बिना किसी अलंकरण या भाषायी चकाचौंध के अपनी बात पहुँचा देते हैं।


यहाँ कविता न तो नारा है, न आत्मविलाप। यह उस मध्य-भूमि में खड़ी दिखाई देती है जहाँ संवेदना और विवेक एक-दूसरे से टकराते नहीं, बल्कि संवाद करते हैं। यह सोच की वह जगह है जहाँ पाठक ठहरता है, असहज होता है और अंततः सवालों के साथ अकेला रह जाता है। इस अर्थ में 'आवाज़ घर' की कविताएँ पाठक से त्वरित सहमति नहीं माँगतीं, बल्कि उसे अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी का एहसास कराती हैं।


अक्सर कहा जाता है कि कविता मौन में बोलती है, कि उसकी पंक्तियाँ शब्दों के बीच की रिक्तताओं की आवाज़ होती हैं। ललन चतुर्वेदी की कविताएँ इसी अर्थ में ‘बेआवाज़’ हैं। वे पढ़ते समय शोर नहीं करतीं, बल्कि पढ़े जाने के बाद हमारे मस्तिष्क में देर तक गूँजती रहती हैं। यह वह कविता है जो पाठक को चकित करने के बजाय उसके भीतर उतर कर काम करती है। यहाँ प्रभाव तात्कालिक नहीं, बल्कि संचयी है—धीरे-धीरे मन में जगह बनाता हुआ।


इस संग्रह पर विचार करते हुए कवि की साहित्यिक पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ललन चतुर्वेदी का साहित्य से लंबा और सतत जुड़ाव रहा है। लंबे समय तक केंद्रीय कार्यालय में हिंदी अधिकारी रहने का अनुभव उनकी भाषा में अनुशासन, संयम और स्पष्टता के रूप में दिखाई देता है। यह अनुभव कविता को न तो दफ़्तरी बनाता है और न ही बोझिल; बल्कि उसे अनावश्यक भावुकता, अति-उक्तियों और आत्ममुग्धता से बचाता है। उनकी भाषा में एक ठहराव है—ऐसा ठहराव जो बात को गंभीर बनाता है, भारी नहीं।


आज का समय एक तरह से ‘कत्लोगारक’ समय है—जहाँ आदमी मारा जा रहा है और आदमियत भी। विडंबना यह है कि मरने वाला भी आदमी है और मारने वाला भी आदमी। यह स्थिति किसी एक घटना, किसी एक खबर या किसी एक राजनीतिक प्रसंग तक सीमित नहीं है, बल्कि एक पूरी मानसिकता और सामाजिक संरचना का परिणाम है। ललन चतुर्वेदी की कविता इसी संरचनात्मक हिंसा को पहचानती है और उसी के भीतर से प्रश्न उठाती है—क्या मनुष्य का भविष्य इसी कत्लोगारत में निहित है?


कवि का प्रश्न सीधा है, लेकिन उसका उत्तर आसान नहीं। यही कारण है कि ये कविताएँ समाधान नहीं देतीं, बल्कि बेचैनी देती हैं। वे पाठक को आश्वस्त नहीं करतीं, बल्कि उसे सोचने के लिए मजबूर करती हैं। यह बेचैनी ही इन कविताओं की नैतिक उपलब्धि है, क्योंकि आज के समय में सबसे बड़ा संकट संवेदनहीनता और सहज स्वीकार का है।


संग्रह की कविता ‘जूते के बिना यात्रा’ विशेष रूप से ध्यान खींचती है। इसे पढ़ते हुए बाबा नागार्जुन सहसा याद आते हैं—वही धूल, वही पैदलपन, वही जीवन से सीधा संवाद। यह यात्रा केवल भौतिक नहीं है; यह जीवन की नैतिक यात्रा भी है। यहाँ जूते का न होना सिर्फ अभाव का संकेत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर टिप्पणी है जो आदमी को चलते रहने के लिए मजबूर तो करती है, लेकिन उसे गरिमा और सुरक्षा नहीं देती। यह कविता श्रम, संघर्ष और अनिवार्य गतिशीलता के यथार्थ को बिना किसी रोमानी आवरण के सामने रखती है।


यात्रा और जीवन की चर्चा के क्रम में आर. सी. प्रसाद मिश्र की कविता ‘जीवन का झरना’ और नीरज की प्रसिद्ध पंक्तियाँ स्मरण में आती हैं—

“जन्म कुछ, मृत्यु कुछ, बस इतनी-सी बात है

किसी की आँख खुल गई, किसी को नींद आ गई।”


ललन चतुर्वेदी की कविताएँ जीवन और मृत्यु को दार्शनिक अमूर्तन की तरह नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यहाँ मृत्यु कोई विराट अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन के भीतर मौजूद एक निरंतर संभावना है।


ललन चतुर्वेदी 


संग्रह की कविता ‘दुआएँ’ निजी दुख से अधिक संरचनात्मक चुप्पी का बयान है। यहाँ दुआ एक ऐसी क्रिया बन जाती है जो बार-बार उसी जगह अटक जाती है जहाँ सुनने वाला कोई नहीं है। यह कविता सत्ता, व्यवस्था और समाज की उस बेरुख़ी को उजागर करती है, जहाँ पीड़ा की आवाज़ दर्ज ही नहीं होती। यह एक तरह से सामूहिक बहरेपन की कविता है।


दैनिक जीवन की कठिनाइयों से जूझते आम आदमी का संत्रास इस संग्रह का केंद्रीय विषय है। कवि किसी एक वर्ग या समूह तक सीमित नहीं रहता। वह उस पूरे सामाजिक ढाँचे को देखता है जिसमें आम आदमी लगातार दबाव में जी रहा है—कभी भाषा के स्तर पर, कभी रोज़गार के स्तर पर, कभी पहचान और सम्मान के स्तर पर। यह दबाव इतना सामान्य हो चुका है कि हम उसे नियति मानने लगे हैं—और कवि इसी स्वीकृति को तोड़ता है।


‘मातृभाषा’ कविता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह कविता भाषा को केवल सांस्कृतिक गर्व या अस्मिता का प्रश्न नहीं बनाती, बल्कि उसे सामाजिक न्याय से जोड़ती है। कवि उस भाषा को सीखने की इच्छा प्रकट करता है जो हाशिए पर है—


“मैं गरीब-गुरबा की भाषा

सुनना–सीखना चाहता हूँ

उससे बतियाना चाहता हूँ

उसी की भाषा में।”


यह आकांक्षा सत्ता की भाषा से दूरी और मनुष्यता की भाषा से निकटता की आकांक्षा है।


‘कचरा’ कविता इस संग्रह की सबसे तीखी कविताओं में है। यहाँ कचरा केवल भौतिक अपशिष्ट नहीं, बल्कि मूल्य-ह्रास का रूपक है। ज्ञान बनाम बाज़ार का टकराव इस कविता का केंद्रीय तनाव है। जब आदमी खुद को ही कबाड़ी के तराज़ू पर तौलने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि अवमूल्यन चरम पर है—


“वह भीतर से बिलख उठा

लगा अपने ही अंगों को काट कर

रख रहा है कबाड़ी के तराज़ू पर।”


यह कविता मनुष्य के वस्तुकरण की प्रक्रिया को अत्यंत निर्मम ढंग से सामने रखती है।


संग्रह की अनेक कविताएँ—असंभव, ईश्वर और छाता, विशेषण के बिना, पिता अचानक आ जाते हैं, आदमी भी लेटर बॉक्स हो गया है!, सिस्टम के बैल, इलाहाबाद से प्रयागराज, काल के कपाल की अबूझ लिपियाँ—समाज, व्यवस्था और समय पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष हैं। ये कविताएँ किसी एक विचारधारा की घोषणाएँ नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण असहमति के दस्तावेज़ हैं।


यहाँ स्मृति का विशेष महत्त्व है। स्मृतियाँ कवि के लिए अतीत में लौटने का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य बने रहने की वजह हैं। स्मृति के बिना वर्तमान केवल यांत्रिक अस्तित्व में बदल जाता है—और यही खतरा इन कविताओं में बार-बार उभरता है।


स्त्री-विमर्श से जुड़ी कविताएँ इस संग्रह का एक सशक्त पक्ष हैं। बासठ बरस की पत्नी को पीटते हुए, वह स्त्री ही है जो…, स्त्री का दुःख, देह का अध्यात्म, स्त्री का बटुआ, स्त्री कहाँ कह पाती है मन की बात, औरतें बीमार नहीं पड़तीं!—ये कविताएँ उस संवेदनहीन सामाजिक दृष्टि को कठघरे में खड़ा करती हैं जो स्त्री को व्यक्ति नहीं, वस्तु मानती है।


यहाँ स्त्री-विमर्श न तो नारेबाज़ी है, न भावुक सहानुभूति। यह रोज़मर्रा की हिंसा, उपेक्षा और चुप्पी का दस्तावेज़ है। स्त्री-विमर्श की ये कविताएंँ स्त्री के वास्तविक स्वरूप को अभिव्यंजित करती हैं।


दिलचस्प यह है कि आवाज़ घर शीर्षक से संग्रह में कोई कविता नहीं है। लेकिन पूरी किताब पढ़ने के बाद पाठक का मन सचमुच बेआवाज़ हो जाता है। शायद यही इस शीर्षक का मर्म है—यह घर आवाज़ों का नहीं, बल्कि उन आवाज़ों का है जो दबा दी गई हैं, जो सुनी नहीं गईं।


यह संग्रह समय के सन्नाटों को तोड़ता है, लेकिन शोर मचा कर नहीं। यह संभावना की तलाश करता है, लेकिन झूठी उम्मीद नहीं बेचता। यह सत्ता से प्रश्न करता है, लेकिन भाषा को हिंसक नहीं होने देता। इसमें गाँव की गंध है, लोक के शब्द हैं और समकालीन यथार्थ की कड़वी पहचान है।


यह संग्रह समय के सन्नाटों में हस्तक्षेप करता है—शोर पैदा कर के नहीं, बल्कि उन चुप्पियों को दर्ज कर के जिन्हें अनदेखा करना आसान रहा है। यह संभावना की तलाश करता है, पर आश्वासन नहीं बाँटता; सत्ता से प्रश्न करता है, लेकिन प्रतिरोध की भाषा को हिंसक होने नहीं देता। यहाँ गाँव की गंध है, लोक के शब्द हैं और समकालीन यथार्थ की वह कड़वी पहचान भी, जिसे अक्सर काव्यात्मक सजावट के नीचे छिपा दिया जाता है।


इस अर्थ में' आवाज़ घर' समय का एक ज़रूरी दस्तावेज़ है—किसी समाधान-पत्र की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी साक्ष्य-भाषा के रूप में जो असमाप्त वेदनाओं को दर्ज करती है :


“वे वेदनाएँ अबूझ रहीं

जो हमारी भाषा में

रूपांतरित नहीं हो सकीं

जैसे कुल्हाड़ी के प्रहार से

विदीर्ण होते वृक्ष की कराह।”


यह कराह यहाँ रूपक भर नहीं है, बल्कि उस सीमा की पहचान है जहाँ भाषा विफल होती है—और वहीं से कवि का नैतिक साहस शुरू होता है। आवाज़ घर उन कराहों को दर्ज करने का ईमानदार प्रयास है—बिना शोर, बिना दिखावे, लेकिन उस सजगता के साथ जो जानती है कि हर पीड़ा को भाषा में बदलना संभव भी नहीं और आवश्यक भी नहीं।

 

कुल मिला कर ललन चतुर्वेदी की कविताएँ अपने समय के सन्नाटों में हस्तक्षेप करती हैं। वे शोर पैदा नहीं करतीं, बल्कि बर्फ़-सी जमी संवेदनाओं में हलचल पैदा कर उन्हें पुनः मानवीय अनुभव से जोड़ती हैं। इस संग्रह में कुल 95 कविताएँ शामिल हैं, जो बिना बनाव–सिंगार के, सहज और सरल कथ्य–शिल्प के माध्यम से अपनी बात रखती हैं। तार्किक चेतना के साथ रची गई इन कविताओं का फलक व्यापक है और वे समकालीन यथार्थ के विविध पक्षों को संवेदनशीलता के साथ उद्घाटित करती हैं।



पुस्तक : आवाज़ घर (कविता संग्रह) 

कवि : ललन चतुर्वेदी 

प्रकाशक : लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली 

मूल्य: ₹250.00



चारुमित्रा 


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