रवि रंजन का आलेख 'नदी का मर्सिया और स्मृतियों का कचनार: केशव तिवारी की कविता का समकालीन पाठ'


केशव तिवारी 


जीवन के अस्तित्व के लिए पानी जरूरी है। लेकिन दिन ब दिन पानी के स्रोत सिमटते जा रहे हैं। एक खबर के अनुसार जमीन से जितना पानी भारत निकाल रहा है उतना कोई देश नहीं निकालता। इस काम से पृथ्वी की हालत लगातार खराब होती जा रही है। इससे पृथ्वी के संतुलन पर लगातार खराब असर पड़ रहा है। यहां तक की पृथ्वी अपनी धुरी से ही खिसकती जा रही है। दुनिया में जमीन से जितना जल निकाला जा रहा है उसका 25 फ़ीसदी से ज्यादा केवल भारत में हो रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पाया गया है कि नदियां सूखती जा रही हैं। ऐसा वैश्विक स्तर पर हो रहा है। केशव तिवारी की बकुलाही, चन्द्रावल, पहुज, क्वारी, सिंध, धसान, उर्मिल, चेलना और जेमनार जैसी लुप्तप्राय नदियों पर केंद्रित कविताएँ समकालीन हिंदी साहित्य में इको-क्रिटिसिज्म (पारिस्थितिकीय आलोचना) का एक जीवंत और मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को चेरिल ग्लोटफेलिटी (Cheryl Glotfelty) की इस स्थापना के निकष पर परखा जा सकता है कि "साहित्यिक अध्ययन को भौतिक जगत के साथ अंतर्संबंधों की तलाश करनी चाहिए।" केशव तिवारी इन नदियों को केवल जलधाराओं के रूप में नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक स्मृति' और 'जैविक अस्मिता' के रूप में चित्रित करते हैं। इको-क्रिटिसिज्म का 'स्थान का सौन्दर्यशास्त्र' (Aesthetics of Place) यहाँ अत्यंत मुखर है; ये नदियाँ केवल भूगोल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये उस बुंदेलखंडी और आंचलिक चेतना की धमनियां हैं, जिनके सूखने का अर्थ एक पूरी सभ्यता का 'डिहाइड्रेशन' (जलीकरण का अभाव) है। सार्त्र ने 'व्हाट इज़ लिटरेचर?' (1947) में स्पष्ट किया था कि लेखक शब्दों के माध्यम से दुनिया को प्रकट करता है और उसे बदलने की ज़िम्मेदारी उठाता है। केशव तिवारी की 'उसकी कविता' शीर्षक रचना में भी यही उत्तरदायित्व झलकता है। कवि अपनी कलम को 'तलवार' समझ कर किसी रोमानी भ्रम में नहीं जीता, बल्कि वह अपनी 'असमर्थता' को जानते हुए भी लिखने का जो चुनाव करता है, वही उसे एक सच्चा 'प्रतिबद्ध रचनाकार' बनाता है। यहाँ लिखना पलायन नहीं, बल्कि एक नैतिक हस्तक्षेप है।" केशव अपनी कविताओं के जरिए लगातार यह लेखकीय हस्तक्षेप कर रहे हैं। हाल ही में कवि का एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’। रवि रंजन ने इस संग्रह की एक बारीक पड़ताल पियरे बोर्दियु, कार्ल मार्क्स, एमिल दुर्खीम, ज़िगमुंट बॉमन, हर्बर्ट मार्क्यूस, अंतोनियो ग्राम्शी, मिशेल फूको, रोलां बार्थ आदि विचारकों के हवाले से की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख 'नदी का मर्सिया और स्मृतियों का कचनार : केशव तिवारी की कविता का समकालीन पाठ'।


'नदी का मर्सिया और स्मृतियों का कचनार: केशव तिवारी की कविता का समकालीन पाठ'


रवि रंजन


केशव तिवारी का सद्य:प्रकाशित कविता संग्रह ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ समकालीन हिंदी कविता के शोर-शराबे और सतही नारों के बीच अपनी एक अलग और गंभीर पहचान दर्ज कराता है। जहाँ आज की बहुतेरी कविताएँ प्रगतिशीलता और जनवाद के नाम पर मात्र आक्रोश व्यक्त करने तक सीमित रह गई हैं, वहीं तिवारी की ये सौ-सवा सौ से अधिक कविताएँ अपनी कलात्मक गरिमा और कवित्व की बुनियादी शर्तों को अक्षुण्ण रखती हैं। यह संग्रह भारतीय समाज और सामान्य मनुष्य के जीवन यथार्थ की जटिल परतों को उघाड़ते हुए हमारे भीतर की संवेदनाओं और विचारों की गहराई से थाह लेता है। इसमें शब्दों का चयन और भावों की अभिव्यक्ति चालू मुहावरों से मुक्त है, जो पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ यथार्थ की कड़वाहट और संवेदना का माधुर्य एक साथ घुले-मिले हैं। अपनी संवेदनात्मक सघनता के कारण यह कृति न केवल समकालीन कविता के परिदृश्य में एक श्रेष्ठ हस्तक्षेप है, बल्कि यह हमारे समय के मनुष्य के दिल-ओ-दिमाग़ का एक सच्चा तहज़ीबी दस्तावेज़ भी बन कर उभरती है।

इस कविता संग्रह की पहली कविता 'जोग' मानवीय संवेदनाओं, स्मृतियों के अनकहे जुड़ाव और समय के साथ आने वाली परिपक्वता का एक गहरा शब्द-चित्र है।

कविता की शुरुआत एक बच्ची के माध्यम से होती है, जो अपनी माँ के आँसुओं का कारण उस जोगी को मानती है जो उसके दरवाज़े पर 'सीधा-पानी' (भिक्षा) लेने आया है। बच्ची की नादानी इस बात में झलकती है कि वह जोगी से दूर चले जाने को कहती है क्योंकि उसकी माँ उसे सुन कर रोती है। यहाँ जोगी का संगीत या उसकी उपस्थिति माँ के भीतर दबे किसी पुराने और गहरे 'तार' को छेड़ देती है। कवि 'माँ के मन का तार' और 'जोगी के सारंगी के तार' के बीच एक ऐसा अदृश्य संबंध दिखाता है, जिसे बाहरी दुनिया विशेषकर एक बच्चा नहीं समझ सकता।

कविता का मध्य भाग जोगी के आंतरिक द्वंद्व और उसके 'जोग' की दार्शनिकता को स्पष्ट करता है। जोगी केवल संगीत नहीं सुना रहा, बल्कि वह एक 'आवाज़ की तड़प' को सुरों की बेचैनी के साथ समाज को लौटा रहा है। कवि स्पष्ट करता है कि यह मार्ग सहज नहीं है; जोगी जानता है कि एक बार यदि सुर जाग गए, तो पूरी ज़िंदगी उनके साथ जागना पड़ता है। यहाँ 'जोग' कोई हार-जीत का खेल नहीं, बल्कि पूरी तन्मयता के साथ जिया जाने वाला एक अनुभव है।

कविता के अंत में कवि एक भविष्यद्रष्टा की भूमिका में आता है। वह कहता है कि 'लड़की अभी बच्ची है', इसलिए वह माँ के दुख और जोगी के वैराग्य के मर्म को नहीं समझ पा रही। लेकिन एक समय ऐसा आएगा जब उसके अपने सपनों में 'उदास सारंगी का सुर' लहराएगा। वह क्षण उसकी परिपक्वता का होगा, जहाँ वह जीवन के दुखों और स्मृतियों के साथ साक्षात्कार करेगी। तब उसे वह दरवाज़े से लौटता हुआ जोगी ज़रूर याद आएगा, जिसे उसने कभी दूर जाने को कहा था। यह कविता स्मृतियों के संचय और मानवीय संवेदनाओं के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण की एक सूक्ष्म अभिव्यक्ति है।

'जोग' कविता पितृसत्तात्मक संरचना, सांस्कृतिक स्मृतियों और लोक-चेतना के अंतर्संबंधों का एक सघन समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है। यह कविता उस 'अनकहे दुख' को स्वर देती है, जो समाज के हाशिए पर रहने वाली स्त्री और वैरागी के बीच एक भावनात्मक सेतु बनाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो जोगी का आगमन केवल एक भिक्षाटन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पियरे बोर्दियु (Pierre Bourdieu) के 'हैबिटस' (Habitus) की अवधारणा को पुष्ट करता है, जहाँ अतीत के संस्कार और स्मृतियाँ व्यक्ति के वर्तमान व्यवहार को संचालित करती हैं। बोर्दियु के अनुसार, "हैबिटस संरचनात्मक व्यवस्थाओं की वह प्रणाली है जो व्यवहार को उत्पन्न और व्यवस्थित करती है" (Habitus is a system of durable, transposable dispositions which functions as the generative basis of structured, objectively unified practices). माँ के भीतर जोगी की सारंगी से जागने वाली 'तड़प' उसी गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक संस्कार का परिणाम है, जो स्त्री की दमित इच्छाओं और उसके अतीत के अलगाव को संबोधित करता है।

कविता में 'बच्ची' का हस्तक्षेप एमिल दुर्खीम (Emile Durkheim) के 'सामूहिक चेतना' (Collective Consciousness) के सिद्धांत के विलोम के रूप में देखा जा सकता है। दुर्खीम का मानना था कि "सामूहिक चेतना समाज के सदस्यों में साझा विश्वासों और भावनाओं का कुल योग है" (The totality of beliefs and sentiments common to average citizens of the same society forms a determinate system which has its own life; one may call it the collective or common conscience). बच्ची अभी उस 'सामूहिक चेतना' या उन वयस्क दुखों के व्याकरण से अपरिचित है, इसलिए वह जोगी को भगा देना चाहती है। उसके लिए जोगी की उपस्थिति केवल माँ को रुलाने वाला एक बाह्य कारक है, जबकि समाजशास्त्रीय रूप से वह जोगी एक 'सांस्कृतिक मध्यस्थ' (Cultural Mediator) है जो माँ के एकाकीपन और सामाजिक बंधनों के बीच की रिक्तता को सुरों से भर रहा है।

यहाँ जोगी का 'जोग' और उसकी सारंगी मैक्स वेबर (Max Weber) के 'करिश्माई सत्ता' और 'वैराग्य' (Asceticism) के समाजशास्त्र से जुड़ते हैं। वेबर के अनुसार, "वैराग्य का उद्देश्य दुनिया के भीतर रहते हुए भी दुनिया से ऊपर उठना है।" (Asceticism meant to take the world as it is and to use it for its own purposes). जोगी का यह कथन कि 'जोग में हारा-जीता नहीं, जिया जाता है', उस अस्तित्वपरक समाजशास्त्र की ओर संकेत करता है जहाँ दुख का समाजीकरण (Socialization of pain) होता है। माँ का रोना केवल व्यक्तिगत विलाप नहीं है, बल्कि वह उस सामूहिक स्त्री-नियति का रुदन है जिसे सीमोन द बोवुआर (Simone de Beauvoir) ने 'अन्य' (The Other) की श्रेणी में रखा था। बोवुआर के शब्दों में, "स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है" (One is not born, but rather becomes, a woman). कविता में माँ की पीड़ा उस संरचनात्मक हिंसा और अलगाव की गूँज है जो उसे समाज में एक मौन अस्तित्व बनाए रखती है, और केवल जोगी का संगीत उस मौन को भंग करने का साहस करता है।

अंत में, कविता भविष्य की ओर संकेत करते हुए बच्ची के बड़े होने और उसके सपनों में 'उदास सारंगी के सुर' के आने की बात करती है। यह कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' के बजाय 'अनुभवों के द्वंद्वात्मक विकास' को दर्शाता है। यहाँ ज़िगमुंट बॉमन (Zygmunt Bauman) की 'तरल आधुनिकता' (Liquid Modernity) के संदर्भ में यह देखा जा सकता है कि कैसे मानवीय संवेदनाएँ और स्मृतियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित होती हैं। बॉमन कहते हैं कि "स्मृतियाँ समाज को जोड़ने वाला वह गोंद हैं जो समय के बहाव में भी पहचान को बनाए रखती हैं" (Memory is the glue that keeps identity intact in the flow of time). जब वह बच्ची बड़ी होगी, तो वह जोगी केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक 'सांस्कृतिक प्रतीक' (Cultural Symbol) बन जाएगा, जो उसे अपनी जड़ों और स्त्री-संवेदना की निरंतरता से जोड़ेगा। इस प्रकार, 'जोग' कविता व्यक्तिगत पीड़ा को एक व्यापक सामाजिक संरचनात्मक विमर्श में तब्दील कर देती है, जहाँ संगीत, स्मृति और समय का त्रिकोण समाजशास्त्रीय यथार्थ की परतें खोलता है।


Zygmunt Bauman


'जोग' कविता सौन्दर्यशास्त्र के धरातल पर भाव, ध्वनि और दर्शन का एक त्रिकोणीय विन्यास रचती है। इसका आस्वादन करते समय सबसे पहले 'करुण रस' की एक सूक्ष्म धारा प्रस्फुटित होती है, जो पारम्परिक शोकपरक करुणा से भिन्न, एक 'उदात्त संवेदनात्मक' सौन्दर्य को जन्म देती है। भारतीय काव्यशास्त्र के आलोक में देखें तो यहाँ 'ध्वनि' का प्रयोग अत्यंत कलात्मक है। आनंदवर्धन के ध्वनि सिद्धांत के अनुसार, जब शब्द अपने वाच्यार्थ को छोड़ कर एक गहरे व्यंग्यार्थ की ओर संकेत करते हैं, तो वही काव्य की आत्मा होती है। कविता में 'सारंगी के तार' और 'माँ के मन के तार' का जुड़ाव एक ऐसी प्रतीकात्मक 'अनुरणन' ध्वनि पैदा करता है, जहाँ संगीत केवल श्रव्य माध्यम नहीं रहता, बल्कि वह दृश्य और अनुभूति के स्तर पर एकाकार हो जाता है। यहाँ सारंगी की 'उदास तान' और माँ के 'अश्रु' के बीच एक बिम्बात्मक संगति है, जो पाठ के सौन्दर्य को गहनता प्रदान करती है।

सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से यह कविता 'सादगी के शिल्प' (Aesthetics of Simplicity) का उत्कृष्ट उदाहरण है। कविता में कोई जटिल अलंकार-योजना नहीं है, बल्कि 'सहजता' ही इसका मुख्य अलंकार है। बेनेदेत्तो क्रोचे (Benedetto Croce) के 'अंतःप्रज्ञा' (Intuition) के सिद्धांत के अनुसार, कला आंतरिक अभिव्यक्ति है। जोगी का यह बोध कि 'जोग में हारा-जीता नहीं, जिया जाता है', उस कलात्मक सत्य को उद्घाटित करता है जहाँ अनुभव और अभिव्यक्ति के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। यह 'जीना' ही कला का वह सौन्दर्य है जो उसे तर्क से ऊपर ले जा कर 'रस' की श्रेणी में स्थापित करता है। कविता में प्रयुक्त 'सीधा-पानी' जैसे शब्द लोक-जीवन के सौन्दर्यबोध को समाहित किए हुए हैं, जो कविता के धरातल को मिट्टी की गंध से जोड़े रखते हैं।

कविता के उत्तरार्ध में जो 'भविष्यबोध' है, वह इमेनुअल कांट (Immanuel Kant) के 'निरपेक्ष सौन्दर्यबोध' (Disinterested Satisfaction) के निकट है। बच्ची का जोगी को भगाना एक तात्कालिक प्रतिक्रिया है, लेकिन कवि का यह कहना कि एक दिन वह जोगी उसे याद आएगा, 'अनुभूति के परिपक्व होने' की प्रक्रिया है। यहाँ सौन्दर्य केवल वर्तमान की वस्तु नहीं है, बल्कि वह 'स्मृति की संचित निधि' है। जब बच्ची के अपने सपनों में 'उदास सारंगी का सुर' लहराएगा, तब वह दुःख का एक ऐसा सौन्दर्य होगा जो उसे मनुष्यता के व्यापक दुःख से जोड़ेगा। टी. एस. इलियट (T. S. Eliot) के 'वस्तुपरक समीकरण' (Objective Correlative) के सिद्धांत के अनुसार, यहाँ 'सारंगी' और 'जोगी' वे बाह्य उपकरण हैं जो पाठक के भीतर एक विशिष्ट भाव-स्थिति उत्पन्न करने में सफल होते हैं।

वस्तुत:, 'जोग' का सौन्दर्यशास्त्र दुःख को उत्सव या विलाप में बदलने के बजाय उसे 'धारण करने' की कला सिखाता है। यह कविता 'मौन' का भी एक सौन्दर्य रचती है—माँ का मौन रुदन और जोगी का सुरों के साथ जागना। यह मौन पाठक के हृदय में एक स्थायी प्रभाव (Aesthetic Effect) छोड़ता है, जो कविता समाप्त होने के बाद भी एक 'अनुगूँज' की तरह बना रहता है। यह सौन्दर्यशास्त्र जीवन के अभावों और वैराग्य को भी एक काव्यात्मक गरिमा प्रदान करता है, जिससे 'जोग' एक व्यक्तिगत प्रसंग से ऊपर उठ कर सार्वभौमिक मानवीय संवेदना का प्रतिनिधि पाठ बन जाता है।

इस संग्रह की 'माँग' कविता सत्ता, व्यवस्था और सामान्य मनुष्य की बुनियादी आकांक्षाओं के बीच व्याप्त विद्रूप संबंधों का एक अत्यंत सघन और मर्मस्पर्शी पाठ है। कविता का प्रारंभ महान उर्दू शायर मीर तकी मीर के उल्लेख से होता है, जहाँ कवि यह सवाल उठाता है कि आखिर मीर ने क्या माँगा था। उत्तर में प्राप्त होने वाली माँगें—"कुछ देर चैन से सोना" और "थोड़ी-सी शराब"—मनुष्य की अत्यंत प्राथमिक, सहज और प्राकृतिक आवश्यकताओं की ओर संकेत करती हैं। ये माँगें किसी विलासिता का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसे थके हुए मनुष्य की पुकार हैं जो जीवन की जद्दोजहद के बीच रूहानी और शारीरिक सुकून की तलाश में है।

कविता के अगले विन्यास में यह माँगों का फलक और विस्तृत होता है, जहाँ कुछ लोग 'थोड़ा-सा आसमान' माँगते हैं, तो कुछ 'मश्क' (पानी का पात्र) और कुछ 'कंपास' (दिशा-सूचक) । यहाँ 'आसमान' मनुष्य की वैचारिक और आत्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक है, 'मश्क' जीवन के लिए अनिवार्य जल और संसाधनों का, तथा 'कंपास' भटकाव भरे समय में सही दिशा और उद्देश्य की खोज का बिम्ब है। ये माँगें दर्शाती हैं कि मनुष्य के लिए रोटी-कपड़ा-मकान के साथ-साथ गरिमा, संसाधन और भविष्य की स्पष्टता कितनी अनिवार्य है।

कविता का सबसे कड़वा और मारक पक्ष व्यवस्था के उस चरित्र को उजागर करता है जहाँ जनता और शासक के बीच एक 'सतर्क' और चाटुकार मध्यस्थ वर्ग खड़ा है। कवि कहता है कि जब कभी 'प्रभुओं' (सत्ताधीशों) का मन पिघला भी, तो 'दरबारियों' ने उन्हें तुरंत आगाह कर दिया । यह दरबारी संस्कृति उस तंत्र का हिस्सा है जो शासक को जनता के दुखों से दूर रखती है और बुनियादी माँगों को भी एक षड्यंत्र या खतरे के रूप में पेश करती है। कविता के अंत में दरबारियों का यह कहना कि "आपको नहीं मालूम ये क्या माँग रहे हैं!", एक गहरे दमनकारी बोध को व्यक्त करता है। सत्ता को यह डर सताता है कि यदि जनता ने 'चैन', 'पानी' और 'दिशा' जैसी बुनियादी चीज़ों पर अपना हक जताना शुरू कर दिया, तो उसकी एकाधिकारवादी नींव हिल सकती है। इस प्रकार, 'मांग' कविता साधारण मनुष्य की न्यायपूर्ण जरूरतों और उसे नकारने वाले क्रूर सत्ता-तंत्र के बीच के शाश्वत द्वंद्व को सूक्ष्मता से रेखांकित करती है।

'माँग' कविता वस्तुत: जूलिया क्रिस्तेवा के 'अंतर्पाठीयता' (Intertextuality) के सिद्धांत का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रतीत होती है, जहाँ एक पाठ दूसरे पाठ के भीतर न केवल मौजूद होता है, बल्कि उसे नए अर्थों से समृद्ध भी करता है। क्रिस्तेवा के अनुसार, "कोई भी पाठ स्वयं में पूर्ण नहीं होता, वह अनेक पाठों के अवशेषों से बना एक मोजेक (Mosaic) होता है" (Any text is constructed as a mosaic of quotations; any text is the absorption and transformation of another)। इस कविता के केंद्र में मीर तकी मीर का सुप्रसिद्ध शेर— 'सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो/ अभी टुक रोते रोते सो गया है'—एक 'अनुपस्थित उपस्थिति' (Absent Presence) के रूप में कार्य करता है। कविता में जब कवि कहता है कि मीर ने केवल 'कुछ देर चैन से सोना' माँगा था, तो वह सीधे तौर पर मीर के उस शेर की वेदना और थकान को अपने भीतर समाहित कर लेता है। यहाँ अंतर्पाठीयता केवल एक संदर्भ मात्र नहीं है, बल्कि वह कविता के रचनात्मक मूल्य को एक ऐतिहासिक विस्तार देती है। मीर का शेर जिस 'मर्म' और 'रुदन के बाद की नींद' की बात करता है, वह केशव तिवारी की कविता में व्यवस्था के विरुद्ध एक 'मौन प्रतिवाद' की तरह उभरता है। जब पाठक इस कविता को पढ़ता है, तो उसके अवचेतन में मीर का वह समूचा परिवेश और उनकी फकीराना बेबसी कौंध जाती है, जिससे कविता का कैनवास मीर के कालखंड से ले कर वर्तमान तक विस्तृत हो जाता है।

इस अंतर्पाठ की मौजूदगी से कवित्व जिस तरह उत्कर्ष प्राप्त करता है, उसका सबसे बड़ा कारण 'अर्थ का घनत्व' है। क्रिस्तेवा मानती हैं कि अंतर्पाठीयता पाठ को एक 'बहु-आयामी स्थान' (Multi-dimensional space) प्रदान करती है। मीर के शेर का 'सोना' केवल नींद नहीं है, बल्कि वह दुनिया की क्रूरताओं से मिली एक अस्थाई मुक्ति है। केशव तिवारी जब अपनी कविता में इस 'सोने' को एक 'माँग' के रूप में दर्ज करते हैं, तो वे नींद का समाजीकरण और राजनीतिकरण कर देते हैं। यहाँ कवित्व की शक्ति इस बात में है कि वह एक अत्यंत व्यक्तिगत और शारीरिक क्रिया (सोने) को सत्ता के विरुद्ध सबसे बड़ी 'डिमांड' बना देती है। मीर का शेर कविता को एक 'तरल संवेदनशीलता' प्रदान करता है, जिससे 'सत्ता' और 'दरबारियों' की कठोरता और अधिक विद्रूप हो कर सामने आती है। यदि कविता में मीर का यह अंतर्पाठ न होता, तो 'माँग' केवल एक राजनीतिक वक्तव्य बनकर रह सकती थी, लेकिन मीर की मौजूदगी ने इसे 'क्लासिक' गरिमा और मानवीय करुणा से भर दिया है।

इसके अलावा, यह अंतर्पाठ 'रचनात्मक संवाद' की एक ऐसी प्रक्रिया को जन्म देता है जहाँ अतीत का कवि वर्तमान के कवि के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा होता है। मीर के शेर में जो 'आहिस्ता बोलने' की हिदायत है, वह इस कविता में सत्ता की उस 'सावधानी' और 'दरबारियों की सतर्कता' के साथ एक विरोधाभासी संबंध बनाती है। मीर के यहाँ शांति की अपील सहानुभूति से उपजी है, जबकि केशव तिवारी की कविता में शांति (नींद) की माँग को दरबारियों द्वारा एक खतरे के रूप में पेश किया गया है। यह 'व्यंग्यात्मक अंतर्पाठीयता' (Ironic Intertextuality) कविता के वैचारिक मूल्य को बढ़ाती है। इस प्रकार, मीर के शेर का अंतर्पाठ कविता में केवल एक अलंकरण नहीं है, बल्कि वह उस 'सांस्कृतिक स्मृति' को सक्रिय करता है, जो पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि सदियाँ बीत जाने के बाद भी मनुष्य की सबसे बुनियादी माँग 'शांति से सो पाना' आज भी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यही कारण है कि यह कविता अपने संक्षिप्त कलेवर के बावजूद एक महाकाव्यात्मक व्याप्ति प्राप्त कर लेती है।



'नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा' कविता संग्रह की 'उनके और तुम्हारे पास' कविता सामाजिक जड़ता, सत्ता की चालाकी और आम आदमी की नियति के बीच के द्वंद्व को रेखांकित करती है। कविता की शुरुआत इस कड़वे सच से होती है कि बाहरी तौर पर ऋतुएँ बदलती हैं, सावन में धनखेत हरे होते हैं और बारिश अपने उन्माद के साथ आती है, लेकिन हाशिए पर खड़े लोगों के जीवन में 'कुछ नहीं बदल रहा है'। कवि 'बीमार लुटे चेहरों' के माध्यम से उस वर्ग की ओर इशारा करता है, जिसकी स्थिति समय के बीतने के बावजूद जस की तस बनी हुई है। यहाँ प्रकृति का परिवर्तन मानवीय जीवन की स्थिरता (स्थिर दुरावस्था) के साथ एक गहरा विरोधाभास रचता है।

कविता का मध्य भाग समाज के विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाओं और उनकी 'दृष्टि' पर केंद्रित है। कवि कहता है कि जो लोग देख रहे हैं, वे उसे दूसरों को ठीक से 'दिखा नहीं पा रहे' और जो सुखी (उल्लसित) हैं, उन्हें सतह के पार देखने की फुर्सत या समझ नहीं है। यहाँ सबसे तीखा प्रहार उन 'चतुर' लोगों पर है जो वास्तविकता को जानते-देखते तो हैं, लेकिन सत्य को प्रकट नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनकी 'दुकान' (निजी हित या धंधा) बंद होने का डर है । यह हिस्सा बौद्धिक और व्यापारिक वर्ग की अवसरवादिता पर चोट करता है।

बदलाव की आकांक्षा के संदर्भ में कवि दो तरह के दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है—एक वे जो बुनियादी और आमूल-चूल परिवर्तन चाहते हैं, और दूसरे वे जो केवल अपने 'मतलब भर का बदलाव' चाहते हैं। यह 'सुविधाजनक क्रांति' की मानसिकता का पर्दाफाश है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ सत्ता और जनता के बीच के ऐतिहासिक संबंध को 'घोषणाओं' और 'संस्कार' के रूप में परिभाषित करती हैं। कवि कहता है कि 'उनके' (सत्ताधीशों) के पास केवल बड़ी-बड़ी घोषणाएँ हैं, जबकि 'तुम्हारे' (आम आदमी) के पास युगों से उन घोषणाओं को सुनते आने का 'संस्कार' है । यहाँ 'संस्कार' शब्द का प्रयोग अत्यंत व्यंग्यात्मक है, जो दर्शाता है कि कैसे सुनने की इस निरंतरता ने आम जनता को निष्क्रिय और अभ्यस्त बना दिया है। रनिंग मैटर के रूप में यह कविता सामाजिक बदलाव की विफलता और सत्ता की वाचालता के बीच पिसते हुए आम आदमी की विडंबनापूर्ण शांति का दस्तावेज़ बन जाती है।

केशव तिवारी की यह कविता सामाजिक गतिहीनता, वर्ग-भेद और सत्ता के वर्चस्ववादी चरित्र का एक सघन समाजशास्त्रीय पाठ प्रस्तुत करती है। कविता के आरम्भ में ऋतुओं के बदलने और प्रकृति के उल्लास के विपरीत 'बीमार लुटे चेहरों' में कोई बदलाव न आना, समाजशास्त्री पियरे बोर्दियु के 'संरचनात्मक पुनरुत्पादन' के सिद्धांत की पुष्टि करता है। बोर्दियु के अनुसार, समाज की संरचनाएँ इस प्रकार कार्य करती हैं कि वे असमानता को निरंतर बनाए रखती हैं। बोर्दियु अपनी पुस्तक 'डिस्टिंक्शन' में तर्क देते हैं कि "सामाजिक दुनिया अपनी वस्तुनिष्ठता को बनाए रखने के लिए व्यक्ति की स्थिति को पूर्व-निर्धारित कर देती है" (The social world is accumulated history, and if it is not to be reduced to a discontinuous series of instantaneous mechanical equilibria between agents who are treated as interchangeable particles, it must be integrated into the theory of society in the form of capital and its reproduction - Distinction: A Social Critique of the Judgement of Taste, 1984)। कविता में सावन और धनखेतों का हरा होना केवल एक प्राकृतिक क्रिया नहीं है, बल्कि वह उस 'सांस्कृतिक पूँजी' का अभाव दिखाती है जो उन 'बीमार चेहरों' तक कभी नहीं पहुँच पाती।

कविता में 'दिखाने' और 'देखने' की विफलता पर जो टिप्पणी की गई है, वह विशेष रूप से उन लोगों के संदर्भ में है जिनकी 'दुकान बंद' होने का डर है। यह स्थिति अंतोनियो ग्राम्शी के 'सांस्कृतिक वर्चस्व' (Cultural Hegemony) के सिद्धांत से गहराई से जुड़ती है। ग्राम्शी के अनुसार, बौद्धिक वर्ग अक्सर सत्ता के हितों का संरक्षण करता है ताकि यथास्थिति बनी रहे। ग्राम्शी अपनी जेल डायरी में लिखते हैं कि "वर्चस्व केवल बल के प्रयोग से नहीं, बल्कि आम सहमति के निर्माण से भी काम करता है" (Hegemony is not just the use of force, but the complex interlocking of political, social, and cultural forces - Selections from the Prison Notebooks, 1971)। कविता में 'चतुर' लोग वे ही हैं जो सत्य को देखने के बावजूद उसे समाज के सामने इसलिए नहीं लाते क्योंकि उनका निजी हित उस व्यवस्था के बने रहने में है। यह 'मौन' और 'दिखाने की अक्षमता' वास्तव में व्यवस्था द्वारा निर्मित एक सचेत सामाजिक प्रक्रिया है।

बदलाव की दोहरी मानसिकता—'बुनियादी बदलाव' बनाम 'मतलब भर का बदलाव'—समाजशास्त्रीय रूप से क्रांतिकारी और सुधारवादी धाराओं के द्वंद्व को दर्शाती है। हर्बर्ट मार्क्यूस ने 'वन डाइमेंशनल मैन' में स्पष्ट किया है कि कैसे आधुनिक समाज में विरोध को भी 'उपभोग' की वस्तु बना दिया जाता है। मार्क्यूस के शब्दों में, "समाज की प्रगतिशील शक्तियाँ अक्सर उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं जिसका वे विरोध करती हैं" (The containment of social change is perhaps the most striking achievement of advanced industrial society - One-Dimensional Man, 1964)। कविता में 'मतलब भर के बदलाव' की चाहत रखने वाले लोग उसी 'एकआयामी मनुष्य' के प्रतीक हैं, जो व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के बजाय केवल अपनी सुख-सुविधाओं का विस्तार चाहते हैं।

कविता का समापन 'घोषणाओं' और 'संस्कारों' के बीच के ऐतिहासिक संबंध से होता है, जो मिशेल फूको के 'शक्ति और ज्ञान' (Power/Knowledge) के अंतर्संबंधों को उद्घाटित करता है। सत्ता के पास 'घोषणाएँ' हैं जो वास्तव में उसके शासन करने का औजार हैं, जबकि जनता के पास उसे सुनते रहने का 'संस्कार' है। फूको अपनी पुस्तक 'डिसिप्लिन एंड पनिश' में बताते हैं कि "शक्ति केवल दमन नहीं करती, बल्कि वह व्यवहार के ऐसे तंत्र बनाती है जहाँ लोग स्वतः आज्ञाकारी बन जाते हैं" (Power produces; it produces reality; it produces domains of objects and rituals of truth - Discipline and Punish: The Birth of the Prison, 1975)। यहाँ 'सुनने का संस्कार' वास्तव में जनता का वह अनुकूलन (Conditioning) है, जिसके माध्यम से वे सत्ता के झूठ को अपनी नियति मान लेते हैं। इस प्रकार, यह कविता केवल चंद पंक्तियाँ नहीं, बल्कि सत्ता की वाचालता और लोक की विवशता के बीच के समाजशास्त्रीय 'यथास्थितिवाद' का एक सूक्ष्म दस्तावेज़ है।

'उनके और तुम्हारे पास' कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय विश्लेषण वस्तुपरक यथार्थ और प्रतीकात्मक बिम्बों के बीच निर्मित होने वाले तनाव पर आधारित है। सौन्दर्यशास्त्र के धरातल पर यह कविता 'विद्रूप के सौन्दर्य' (Aesthetics of the Grotesque) और 'विपर्यास' (Contrast) की तकनीक का सहारा लेती है। कविता के आरम्भ में 'धनखेतों के हरे होने' और 'सावन के उन्माद' का जो चित्र है, वह पारंपरिक रूप से उल्लास और माधुर्य गुण का प्रतीक है, किन्तु कवि तुरंत ही इसे 'बीमार लुटे चेहरों' के साथ जोड़ कर एक 'सौन्दर्यपरक आघात' (Aesthetic Shock) पैदा करता है। यहाँ प्रकृति का सौन्दर्य मानवीय विडंबना को और अधिक गहरा करने के लिए एक 'कंट्रास्ट' के रूप में प्रयुक्त हुआ है। रूसी रूपवाद (Russian Formalism) के 'अपरिचयीकरण' (Defamiliarization) सिद्धांत के अनुसार, कवि यहाँ परिचित दृश्यों (सावन, बारिश) को एक अपरिचित और विचारोत्तेजक संदर्भ में प्रस्तुत करता है, जिससे पाठक की संवेदना जड़ता को छोड़ कर सक्रिय हो जाती है।

कविता में 'दिखाने' और 'देखने' की प्रक्रिया के बीच जो अवरोध है, वह 'दृष्टि के सौन्दर्यशास्त्र' (Aesthetics of Gaze) को रेखांकित करता है। कवि यहाँ यह संकेत देता है कि सत्य का प्रदर्शन केवल तकनीक या कौशल का विषय नहीं है, बल्कि वह नैतिक साहस का विषय है। 'दुकान बंद होने के डर' का बिम्ब एक ऐसा कलात्मक मोड़ है जो उच्च आदर्शों के ढोंग को उजागर करता है। यहाँ कविता 'अलंकृति' के बजाय 'अनावृत्ति' (Stripping down) के मार्ग पर चलती है। यह उस 'न्यूनतमवादी' (Minimalist) शिल्प का हिस्सा है जहाँ कवि भारी-भरकम शब्दों के बजाय रोज़मर्रा की भाषा से तीक्ष्ण व्यंग्य उत्पन्न करता है। 'चतुर लोगों' का मौन यहाँ एक प्रकार की 'नकारात्मक उपस्थिति' है, जो कविता के प्रभाव को और अधिक सघन बनाती है।

सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा 'बदलाव' की धारणा का विश्लेषण है। 'बुनियादी बदलाव' और 'मतलब भर का बदलाव' के बीच का अंतर केवल वैचारिक नहीं, बल्कि रूपात्मक (Formal) भी है। कविता यहाँ एक दार्शनिक अंतर्दृष्टि विकसित करती है जहाँ 'सुविधा' और 'क्रांति' के द्वंद्व को शब्दों में बांधा गया है। अंत में, 'घोषणाओं' और 'संस्कारों' के बीच का संबंध एक 'लयबद्ध त्रासदी' की रचना करता है। यहाँ 'संस्कार' शब्द का प्रयोग एक विडंबनापूर्ण 'काव्यात्मक न्याय' (Poetic Justice) की तरह है, जो यह दिखाता है कि कैसे सत्ता का सौंदर्यबोध (Aesthetics of Power) जनता की निष्क्रियता पर टिका होता है। यह कविता 'दुख' को महिमामंडित करने के बजाय उसे उसकी पूरी नग्नता और बेबसी में प्रस्तुत करती है, जो पाठ को एक 'उदात्त' (Sublime) करुणा से भर देता है। इस प्रकार, यह पाठ सौंदर्यशास्त्र के उन प्रतिमानों को चुनौती देता है जो केवल सुखद अनुभूतियों को कला मानते हैं, और यह स्थापित करता है कि यथार्थ की कड़वाहट को कलात्मक गरिमा के साथ व्यक्त करना ही वास्तविक सौन्दर्य है।

विवेच्य कविता संग्रह की 'इस धरा पर' कविता प्रकृति के चक्र, मानवीय विवशता और अस्तित्व के संकट के बीच एक गहरा अंतर्संबंध स्थापित करती है। कविता का आरंभ एक विदाई के दृश्य से होता है, जहाँ 'अंतिम फल' का गिरना केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि एक पूरी संभावना का अंत है। कवि ने 'अंतिम फल' के साथ 'एक इंतज़ार' के छिटक जाने की जो बात कही है, वह इस भौतिक संसार में आशा के टूटने का अत्यंत सूक्ष्म बिम्ब है। यहाँ फल का गिरना केवल गुरुत्वाकर्षण की क्रिया नहीं, बल्कि उन 'भूखी लाचार नज़रों' के लिए एक त्रासद अंत है, जिनका जीवन उस फल की प्राप्ति पर टिका था। कविता में 'बच्चे', 'बूढ़े' और 'राहगीर' जैसे प्रतीकों के माध्यम से समाज के उन अलग-अलग वर्गों को दर्शाया गया है, जिनके लिए प्रकृति का उल्लास और उसका अभाव अलग-अलग मायने रखता है। जहाँ राहगीर के लिए फल को देखना केवल एक क्षणिक खुशी या दृश्य है, वहीं लाचार नज़रों के लिए वह जीवन की अनिवार्य ज़रूरत है।

कविता का मध्य भाग रिक्तता और पूर्णता के द्वंद्व को स्पष्ट करता है। 'सूनी जगहों' का पक्षियों द्वारा आबाद रखना इस सत्य की ओर संकेत करता है कि प्रकृति कभी भी पूर्णतः शून्य नहीं होती; वह अपने भीतर जीवन के नए विकल्पों को जन्म देती रहती है। 'पक्षियों का रैन-बसेरा' उस निरंतरता का प्रतीक है जो ध्वंस और अभाव के बीच भी बनी रहती है। कवि यहाँ 'मुश्किल आवाजाही' के माध्यम से उस संघर्ष को रेखांकित करता है जो जीवन को गतिमान रखता है। प्रकृति विकल्पों से भरी है—एक पेड़ खाली होता है तो दूसरा भरता है, एक जीव जाता है तो दूसरा आता है, लेकिन इस 'विकल्पों से भरी प्रकृति' के समानांतर मनुष्य की जो विवशता है, वह कविता को एक दार्शनिक ऊंचाई प्रदान करती है।

कविता का समापन एक चौंकाने वाले और गहरे सत्य के साथ होता है—'कि मुक्ति कहीं कोई विकल्प नहीं'। यह पंक्ति कविता के पूरे परिदृश्य को बदल देती है। कवि यह संकेत देता है कि चाहे प्रकृति कितनी भी विकल्पपूर्ण क्यों न हो, मनुष्य जिस अस्तित्वपरक संकट या पीड़ा में फँसा है, उससे भागने का कोई रास्ता नहीं है। मुक्ति का विकल्प न होना एक तरह के 'ट्रैप' या नियति की ओर इशारा करता है, जहाँ जीव को इसी धरा पर, इसी आवाजाही और इसी संघर्ष के बीच बने रहना है। यहाँ 'हादसे' शब्द का प्रयोग अत्यंत प्रभावी है, जो यह बताता है कि विकल्पहीनता का बोध मनुष्य के लिए किसी बड़ी दुर्घटना से कम नहीं है। यह कविता अपनी सूक्ष्म बुनावट में प्रकृति की सुंदरता और जीवन की निष्ठुरता के बीच एक ऐसा संतुलन बनाती है, जो पाठक को जीवन के अनिवार्य दुखों और उसकी निरंतरता पर सोचने के लिए विवश कर देता है।

‘इस धरा पर’ कविता पारिस्थितिकीय आलोचना की दृष्टि से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण रचना है। जाहिर है कि इको-क्रिटिसिज्म साहित्य और भौतिक पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन है, जो इस मूल धारणा पर आधारित है कि मानवीय संस्कृति और प्राकृतिक जगत एक-दूसरे से कटे हुए नहीं बल्कि परस्पर निर्भर हैं। इसके सैद्धांतिक आधारों में सबसे महत्त्वपूर्ण 'पर्यावरण-केंद्रित' (Eco-centric) दृष्टिकोण है, जो 'मानव-केंद्रित' (Anthropo-centric) विश्वदृष्टि को चुनौती देता है। चेरिल ग्लोटफेलिटी (Cheryll Glotfelty) और विलियम रुएकर्ट  (William Rueckert)  जैसे विचारकों ने इसे एक ऐसे विमर्श के रूप में स्थापित किया जो यह देखता है कि साहित्य में प्रकृति को केवल एक पृष्ठभूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय 'एजेंट' या पात्र के रूप में कैसे प्रस्तुत किया गया है। इसका एक अन्य आधार 'गहरी पारिस्थितिकी' (Deep Ecology) है, जो मानती है कि इस धरा पर मौजूद सभी जीवों का अपना आंतरिक मूल्य है, चाहे वे मनुष्य के लिए उपयोगी हों या न हों। इसके अलावा, यह 'स्थान के सौन्दर्यशास्त्र' (Aesthetics of Place) और संसाधनों के 'न्यायपूर्ण वितरण' जैसे मुद्दों को भी अपनी सैद्धांतिक परिधि में लेता है।

'इस धरा पर' कविता को जब हम इको-क्रिटिसिज्म के इन निकषों पर परखते हैं, तो यह कविता प्रकृति और मनुष्य के बीच के जटिल और अनिवार्य संबंधों का एक सूक्ष्म दस्तावेज़ सिद्ध होती है। कविता का आरंभ ही 'वृक्ष' और 'अंतिम फल' के माध्यम से होता है, जो प्रकृति की नश्वरता और निरंतरता के चक्र को दर्शाता है। इको-क्रिटिसिज्म की दृष्टि से यहाँ फल का गिरना केवल एक वानस्पतिक घटना नहीं है, बल्कि वह एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की हलचल है। कवि ने 'भूखी लाचार नज़रों' और 'पक्षियों के रैन-बसेरे' का जो द्वंद्व दिखाया है, वह संसाधनों के लिए होने वाले अंतर-प्रजातीय संघर्ष और सह-अस्तित्व को उजागर करता है। यहाँ 'पक्षी' और 'इंसान' दोनों एक ही धरा के संसाधनों पर आश्रित हैं, जो मानव-केंद्रित अहंकार को तोड़ कर जीव-जगत की समानता की स्थापना करता है।

कविता में 'विकल्पों से भरी प्रकृति' का विचार इको-क्रिटिसिज्म के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है जिसे 'प्रकृति की स्वायत्तता' कहा जाता है। जब मनुष्य का बनाया हुआ कोई ढांचा सूना होता है, तो प्रकृति उसे अपने तरीके से—पक्षियों या अन्य जीवों के माध्यम से—पुनः आबाद कर लेती है। यह दर्शाता है कि प्रकृति मनुष्य की अनुपस्थिति में भी स्वयं को संचालित करने में सक्षम है। 'मुश्किल आवाजाही' का बिम्ब उस जैविक संघर्ष को व्यक्त करता है जो डार्विनियन उत्तरजीविता से आगे जा कर एक साझा पारिस्थितिकीय नियति की ओर संकेत करता है। कवि यहाँ प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं मानता, बल्कि उसे एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखता है जो निरंतर सक्रिय और संवादरत है।

कविता का अंतिम निष्कर्ष—'कि मुक्ति कहीं कोई विकल्प नहीं'—पारिस्थितिकीय चेतना का चरम बिंदु है। इको-क्रिटिसिज्म के तहत यह माना जाता है कि मनुष्य इस पृथ्वी के जाल (Web of Life) का हिस्सा है और वह इससे 'मुक्त' हो कर कहीं नहीं जा सकता। 'मुक्ति' का अभाव यहाँ नकारात्मक नहीं है, बल्कि यह इस धरा के प्रति हमारी 'बद्धता' और ज़िम्मेदारी का बोध कराता है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हमारे 'हादसे' और हमारी 'खुशियाँ' इसी भौतिक पर्यावरण के भीतर घटित होते हैं। इस प्रकार, 'इस धरा पर' कविता अपने संक्षिप्त कलेवर में उस वृहद् पारिस्थिकीय सत्य को धारण करती है, जहाँ प्रकृति और मनुष्य एक अविभाज्य इकाई के रूप में सह-अस्तित्व बनाए रखने के लिए विवश और प्रयासरत हैं।

इस संग्रह की 'अविश्वास इतना' कविता वर्तमान 'सत्यातीत समय' (Post-truth Era) की उस जटिल मानसिक और सामाजिक अवस्था का दस्तावेज़ है, जहाँ तथ्य और सत्य गौण हो गए हैं और भावनाओं या व्यक्तिगत विश्वासों को ही परम सत्य मान लिया गया है। सैद्धांतिक दृष्टि से 'सत्यातीत समय' वह है जहाँ वस्तुनिष्ठ सत्य के बजाय ऐसी सूचनाओं का बोलबाला होता है जो व्यक्ति के पूर्वाग्रहों को पुष्ट करती हों। इस युग में सत्य का विखंडन हो चुका है और 'अविश्वास' ही संबंधों का नया आधार बन गया है।

कविता का आरंभ ही एक प्रकार की दूरी और अलगाव से होता है: 


"चीज़ें दूर ही नहीं थीं 

वे दूर और दूर होती जा रही थीं"। 


यहाँ दूरी केवल भौतिक नहीं, बल्कि वैचारिक और संवेदनात्मक भी है। 'पाने की इच्छाओं' का प्रवल होना उस उपभोक्तावादी समाज की ओर संकेत करता है जहाँ मनुष्य वस्तुओं की अंधी दौड़ में अपने विवेक को खो चुका है। कवि एक अत्यंत मारक सत्य का उद्घाटन करता है कि कैसे परंपरागत और अनुभवजन्य ज्ञान को "बड़ी चतुराई से लगभग पुराना और व्यर्थ साबित किया जा चुका था"। सत्यातीत समय की यह एक बड़ी विशेषता है कि वह संचित मानवीय अनुभवों और विवेक को 'आउटडेटेड' बताकर एक ऐसी नई सूचना-क्रांति खड़ी करता है जिसका कोई ठोस आधार नहीं होता।

कविता की ये पंक्तियाँ—


"जीना किसी को था 

उम्र कोई और तय कर रहा था"


—उस परतंत्रता की ओर संकेत करती हैं जहाँ व्यक्ति का अपना आत्म (Self) व्यवस्था या तकनीकी तंत्र के अधीन हो गया है । यह 'सत्यातीत' दौर का वह विद्रूप है जहाँ हमारी पसंद, हमारे विचार और यहाँ तक कि हमारी जीवन-शैली भी 'एल्गोरिदम' या सत्ता द्वारा संचालित सूचनाओं से तय होती है।

भ्रम और अविश्वास की पराकाष्ठा कविता के अंत में दिखाई देती है : 


"भ्रम इतना कि 

दक्षिण से पुकारता कोई 

कब उत्तर से प्रगट हो जाए"। 


यह दिशाहीनता और अनिश्चितता का बोध है, जहाँ शब्द अपना अर्थ खो चुके हैं। 'अविश्वास इतना कि कब बोले और कब मुकर जाए' —यह पंक्ति आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना है। सार्वजनिक विमर्श में संवाद की विश्वसनीयता समाप्त हो गई है। जब सत्य की कोई साझा ज़मीन नहीं बचती, तो मनुष्य एक ऐसे 'अविश्वास' के घेरे में कैद हो जाता है जहाँ हर कथन संदिग्ध है और हर वादा एक संभावित मुकराव है। केशव तिवारी की यह कविता अत्यंत कम शब्दों में उस आधुनिक त्रासदी को पकड़ती है जहाँ मनुष्य ने भौतिक उन्नति तो की है, लेकिन परस्पर विश्वास और सत्य की मौलिक पहचान को पूरी तरह खो दिया है।

'समय की पुकार सुनने के लिए' कविता मानवीय चेतना के उस निर्णायक क्षण को स्वर देती है जहाँ अतीत का विलाप समाप्त होता है और भविष्य के निर्माण का संकल्प शुरू होता है। इस कविता का सूक्ष्म पठन यह उद्घाटित करता है कि कैसे एक व्यक्ति आत्म-पीड़ा से मुक्त हो कर एक व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर कदम बढ़ाता है।

कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—


"जाने के कारण थे 

न रुक पाने की मजबूरियाँ थीं"


—प्रस्थान की एक अनिवार्य पृष्ठभूमि तैयार करती हैं। यहाँ 'जाना' केवल भौगोलिक विस्थापन नहीं है, बल्कि एक मानसिक और वैचारिक प्रस्थान है। 'न रुक पाने की मजबूरी' उस आंतरिक बेचैनी को दर्शाती है जो यथास्थितिवाद (Status quo) को स्वीकार नहीं कर पाती। इसके मूल में 'दुनिया बदलने का गहरा दबाव' है, जो यह स्पष्ट करता है कि व्यक्ति का यह कदम निजी स्वार्थ से नहीं, बल्कि एक उच्च आदर्श और वैश्विक परिवर्तन की कामना से प्रेरित है।


"अब बहुत हो गया वाले अंदाज़ में 

उठ खड़ा होना था" 


जैसी पंक्तियाँ एक बड़े विस्फोट और चरम सीमा की ओर संकेत करती हैं। यह उस 'सामूहिक आक्रोश' की परिणति है जो जब व्यक्ति के भीतर जागता है, तो वह जड़ता को तोड़ कर खड़ा हो जाता है। यहाँ 'उठ खड़ा होना' प्रतिरोध का एक शक्तिशाली बिम्ब है। कवि समय की नब्ज़ को पहचानते हुए कहता है कि 


'समय की पुकार सुनने के लिए 

बहुत सारी पुकारों को 

अनसुना करना था'। 


यह एक अत्यंत गहरा विरोधाभास (Paradox) है; एक बड़ी आवाज़ सुनने के लिए छोटी, मोह-ग्रस्त और भावनात्मक पुकारों को त्यागना पड़ता है। यहाँ 'अनसुना करना' निष्ठुरता नहीं, बल्कि लक्ष्य के प्रति एकाग्रता का प्रतीक है।

कविता का अंतिम विन्यास—


"मेड़ पर बैठ 

पिछले सूखे पर 

बिसूरने का नहीं 

बढ़के फ़सल काटने का समय था"


—एक कृषि-संस्कृति के रूपक के माध्यम से कर्म का सन्देश देता है। 'मेड़ पर बैठ कर बिसूरना' अतीत की असफलताओं और दुखों में डूबे रहने का प्रतीक है, जो निष्क्रियता को जन्म देता है। कवि स्पष्ट करता है कि समय का तकाज़ा 'रुदन' नहीं बल्कि 'सृजन' और 'उपलब्धि' है। 'फ़सल काटना' यहाँ उस संघर्ष के परिणाम को प्राप्त करने का संकेत है, जिसके लिए पूर्वजों या स्वयं ने कभी पसीना बहाया था। यह कविता शोक-गीत से शुरू होकर एक विजय-गीत या 'एक्शन प्लान' में तब्दील हो जाती है, जहाँ 'समय की पुकार' का अर्थ है—अतीत के खंडहरों से निकलकर भविष्य के खेतों में अपनी जगह बनाना।

'समय की पुकार सुनने के लिए' कविता मानवीय संकल्प और क्रांतिकारी बदलाव की अनिवार्य शर्तों का एक अत्यंत प्रभावशाली दस्तावेज़ प्रतीत होती है। जब हम इस रचना के अंतिम काव्यांश को पूर्ववर्ती पंक्तियों के साथ जोड़कर देखते हैं, तो कविता का फलक 'उठ खड़े होने' से आगे बढ़ कर 'अंतिम प्रस्थान' और 'पूर्ण विसर्जन' तक विस्तृत हो जाता है।

कहना न होगा कि समय की पुकार सुनना कोई सहज क्रिया नहीं, बल्कि एक कठोर अनुशासन है। कविता के प्रथम भाग में 'दुनिया बदलने का गहरा दबाव' और 'मजबूरियाँ' प्रस्थान का तर्क निर्मित करती हैं। यहाँ 'अब बहुत हो गया' का अंदाज़ उस बिंदु को दर्शाता है जहाँ बर्दाश्त की सीमा समाप्त होती है और प्रतिरोध का जन्म होता है। लेकिन कविता का दूसरा भाग इस प्रतिरोध को एक दार्शनिक और क्रियात्मक गहराई देता है। कवि स्पष्ट करता है कि समय की पुकार सुनने के लिए केवल शोर से दूर होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि 'बहुत सारी पुकारों को अनसुना करना' पड़ता है। ये पुकारें संभवतः मोह, पारिवारिक जुड़ाव और वे व्यक्तिगत सुख हो सकते हैं जो मनुष्य को यथास्थिति से बाँधे रखते हैं।

अंतिम पंक्तियाँ—

"बहुत-बहुत कुछ 

एक झटके में भूलना था"

—त्याग की उस पराकाष्ठा को दर्शाती हैं जो किसी भी बड़े उद्देश्य के लिए अनिवार्य है। 'भूलना' यहाँ विस्मृति नहीं, बल्कि अतीत के बोझ से खुद को आज़ाद करना है। संचित स्मृतियाँ और बीता हुआ कल अक्सर भविष्य की राह में बेड़ियाँ बन जाते हैं, इसलिए 'एक झटके में' उन्हें छोड़ना साहसिक निर्णय है। इसके बाद 'बड़ी भरोसे की विस्तृत नदी' को 'एक साँस में पार करना' जोखिम और अटूट विश्वास का अप्रतिम बिम्ब है। 'भरोसे की नदी' वह सुरक्षित क्षेत्र (Comfort Zone) है जिसे हम जानते हैं, लेकिन 'समय की पुकार' उस नदी के उस पार है। उसे 'एक साँस में' पार करना उस एकाग्रता और गति को दर्शाता है जहाँ संशय के लिए कोई स्थान नहीं है।

यह कविता 'पिछले सूखे पर बिसूरने' (अतीत के विलाप) को अस्वीकार कर 'फसल काटने' (वर्तमान की उपलब्धि) पर ज़ोर देती है। यह कर्म और वैराग्य के बीच का एक ऐसा पुल है, जहाँ वैराग्य केवल अपने स्वार्थों से है और कर्म पूरी दुनिया को बदलने के लिए। अंततः, यह पाठ पाठक को प्रेरित करता है कि यदि समय की पदचाप सुननी है, तो उसे अपने भीतर के कोलाहल को शांत कर, पुराने किनारों के मोह को त्याग कर, एक अनिश्चित लेकिन उज्ज्वल भविष्य की ओर छलांग लगानी होगी। यह कविता 'निश्चय' की कविता है, जो मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्ति और सामयिक उत्तरदायित्व का बोध कराती है।

'समय की पुकार सुनने के लिए' कविता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण सामाजिक गतिशीलता, व्यक्तिगत एजेंसी और ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांतों के आलोक में किया जा सकता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह कविता एक 'संक्रमणकालीन अवस्था' (Liminal State) को चित्रित करती है, जहाँ एक कर्ता (Actor) पुरानी सामाजिक संरचनाओं को त्यागकर एक नई व्यवस्था के निर्माण की ओर अग्रसर होता है। काल मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के निकष पर देखें तो 'दुनिया बदलने का गहरा दबाव' वह चेतना है जो तब उत्पन्न होती है जब पुरानी उत्पादन की स्थितियाँ और सामाजिक संबंध व्यक्ति के विकास में बाधक बन जाते हैं। मार्क्स के अनुसार, "चेतना जीवन को निर्धारित नहीं करती, बल्कि जीवन चेतना को निर्धारित करता है" (It is not the consciousness of men that determines their existence, but their social existence that determines their consciousness - A Contribution to the Critique of Political Economy, 1859)। कविता में 'जाने के कारण' और 'न रुक पाने की मजबूरियाँ' इसी सामाजिक यथार्थ की उपज हैं।


कविता में 'बहुत सारी पुकारों को अनसुना करना' एमिल दुर्खीम के 'सामाजिक एकता' और 'सामूहिक चेतना' के सिद्धांतों के साथ एक दिलचस्प अंतर्संबंध बनाता है। दुर्खीम का मानना था कि समाज व्यक्ति पर कुछ निश्चित दबाव डालता है, लेकिन केशव तिवारी की कविता में कर्ता उन पारंपरिक 'पुकारों' (सामाजिक अपेक्षाओं और बंधनों) को सचेत रूप से अनसुना करता है ताकि वह 'समय की पुकार' यानी व्यापक सामाजिक हित को सुन सके। यह मैक्स वेबर के 'सामाजिक क्रिया' (Social Action) के सिद्धांत, विशेषकर 'मूल्य-तर्कसंगत क्रिया' (Value-rational action) के करीब है, जहाँ व्यक्ति किसी बड़े उद्देश्य या मूल्य के लिए अपनी तत्कालीन सुख-सुविधाओं का त्याग करता है। "अब बहुत हो गया" का उद्घोष व्यवस्था के प्रति उस अलगाव (Alienation) की चरम सीमा है, जो अंततः विद्रोह या बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार बनती है।

कविता का अंतिम हिस्सा, जो 'अतीत के सूखे पर बिसूरने' के बजाय 'फसल काटने' और 'भरोसे की नदी पार करने' की बात करता है, एंथनी गिडिंस के 'संरचनाकरण के सिद्धांत' (Theory of Structuration) को पुष्ट करता है। गिडिंस के अनुसार, मनुष्य केवल सामाजिक संरचनाओं का गुलाम नहीं है, बल्कि अपनी 'एजेंसी' (Agency) के माध्यम से उन संरचनाओं को बदल भी सकता है। "बहुत-बहुत कुछ एक झटके में भूलना" उस 'वि-सामाजीकरण' (Desocialization) की प्रक्रिया है, जहाँ व्यक्ति पुरानी रूढ़ियों और जड़ स्मृतियों को त्याग कर एक नए सामाजिक भविष्य की ओर बढ़ता है। 'भरोसे की नदी' यहाँ उस साझा सामाजिक विश्वास का प्रतीक है, जिसे पार करना एक बड़े सामूहिक जोखिम और परिवर्तन का सूचक है। इस प्रकार, यह कविता व्यक्तिगत संकल्प को एक व्यापक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित करती है, जहाँ व्यक्ति का 'जाना' समाज के 'बदलने' की अनिवार्य शर्त बन जाता है।

'नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा' संग्रह की  'आग और आवाज' कविता लघु कलेवर में एक विराट दार्शनिक और मानवीय सत्य को उद्घाटित करती है। इस कविता का सूक्ष्म पठन प्रकृति के बिम्बों के माध्यम से मनुष्य के अस्तित्वगत अनिवार्य तत्त्वों की खोज की प्रक्रिया है।

कविता का आरंभ 'पलाश के जंगलों' के दृश्य से होता है, जिसे कवि ने 'आग के फूल' कहा है। पलाश का फूल अपनी प्रखर लालिमा के कारण भारतीय कविता में अक्सर आग का बिम्ब रचता है। कवि का यह कहना कि वह 

"आग के फूल देखने लगा 

उनके ओस खाए पेड़ों पर"

एक अद्भुत विरोधाभास (Paradox) है। 'ओस' शीतलता और शांति का प्रतीक है, जबकि 'पलाश' दाहक सौंदर्य का। इन दोनों का एक ही पेड़ पर होना जीवन की जटिलता और उसमें समाहित परस्पर विरोधी तत्वों के सह-अस्तित्व को दर्शाता है।

कविता के मध्य में कवि एक महत्त्वपूर्ण स्थापना देता है : 

"बिना उन फूलों के 

मैं पलाश की कल्पना भी नहीं कर सकता"। 

यह केवल एक वानस्पतिक सत्य नहीं है, बल्कि एक गहरी 'अनिवार्यता' का बोध है। पलाश की पहचान उसका वह 'आग जैसा फूल' ही है। इसी तर्क को कवि मनुष्य के संदर्भ में विस्तारित करता है। जैसे पलाश का फूल उसकी आत्मा है, वैसे ही मनुष्य की 'आवाज' उसकी असल पहचान है।

कवि मनुष्य में "उसी आवाज को खोजता" है जिसे छोड़ कर वह अलग होता है। यहाँ 'आवाज' शब्द अत्यंत व्यंजनापूर्ण है। यह केवल ध्वनि नहीं है, बल्कि मनुष्य का विवेक, उसका प्रतिवाद, उसकी मौलिकता और उसकी चेतना है। जिस प्रकार बिना आग जैसे फूलों के पलाश अपनी सार्थकता खो देता है, वैसे ही अपनी मौलिक 'आवाज' (चेतना/ प्रतिरोध) के बिना मनुष्य भी मात्र एक हाड़-मांस का पुतला रह जाता है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ— 

"ये पेड़ और मनुष्य का मामला नहीं 

आग और आवाज़ का मसला है"

— कविता को एक ऊँचे दार्शनिक धरातल पर ले जाती हैं। यहाँ 'आग' (पलाश का फूल) और 'आवाज' (मनुष्य की चेतना) एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। कवि यह स्पष्ट करता है कि यह कविता प्रकृति-चित्रण या मानव-स्वभाव के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस 'तेज' और 'सत्य' के बारे में है जो किसी भी सत्ता या वस्तु की सार्थकता तय करता है। 'आग' यदि पलाश का धर्म है, तो 'आवाज' मनुष्य का धर्म है। यदि ये दोनों लुप्त हो जाएँ, तो फिर न पेड़ बचेगा, न मनुष्य। इस प्रकार, यह कविता मनुष्य को उसकी खोई हुई 'आवाज' को पुनः प्राप्त करने और अपने 'भीतरी ताप' (आग) को बचाए रखने का एक मौन आह्वान बन जाती है। 

विवेच्य संग्रह की  'कुछ कम' कविता अपनी संक्षिप्तता के बावजूद एक गहरा रचनात्मक अभिप्राय और नैतिक द्वंद्व समेटे हुए है। इस कविता का सूक्ष्म पठन यह उद्घाटित करता है कि कैसे एक रचनाकार का अपनी जड़ों और यथार्थ के साथ जो संबंध है, वह केवल अनुराग का नहीं बल्कि एक 'रचनात्मक पश्चाताप' या 'अपराधबोध' का भी है।

कविता का आरंभ उन तत्त्वों की सूची से होता है जो जीवन की मौलिकता का आधार हैं—"जंगल नदी पहाड़ खेत किसान"। कवि इन्हें अपने इतने करीब पाता है कि उन्हें छू कर उनका हाल जान सकता है। यहाँ 'छूना' और 'हाल लेना' केवल भौतिक स्पर्श नहीं है, बल्कि उस जीवंत अनुभव का हिस्सा बनना है जिससे अक्सर शहर या बौद्धिक जगत में रहने वाला कवि कट जाता है। इन प्राकृतिक और मानवीय संदर्भों के बीच 'मनचाहा वक्त' गुज़ारना एक प्रकार की आत्मिक शांति का मार्ग है।

कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ वहाँ आता है जहाँ कवि स्वीकार करता है कि इस निकटता का एक प्रयोजन है : 

"कविता में जिए अपने अपराधबोध को 

कुछ कम कर सकते हो"। 

यह पंक्ति एक रचनाकार की उस आंतरिक छटपटाहट को स्वर देती है जिसमें उसे लगता है कि शब्दों के माध्यम से यथार्थ को व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। वह अक्सर अभाव और संघर्ष को अपनी कविता का विषय तो बनाता है, लेकिन वह स्वयं उस अभाव को नहीं जीता। यथार्थ के इस 'सौंदर्यीकरण' से जो अपराधबोध (Guilt) पैदा होता है, कवि उसे मिटाने के लिए वापस उन्हीं खेतों और किसानों के बीच जाता है। यह एक प्रकार का नैतिक संतुलन बनाने की कोशिश है।

अंतिम पंक्तियाँ—

"आह! 

कितना मासूम बयान! 

कितना पीड़ादायक!"

—कविता के अर्थ को पूरी तरह उलट देती हैं। यहाँ कवि स्वयं पर व्यंग्य करता है। वह जानता है कि महज कुछ समय बिता कर अपने अपराध बोध को 'कुछ कम' कर लेना एक 'मासूम' यानी भोली कोशिश है, क्योंकि इससे वह मूल संकट या पीड़ा समाप्त नहीं होती। यह 'पीड़ादायक' इसलिए है क्योंकि यह रचनाकार की उस विवशता को उजागर करता है जहाँ वह चाहकर भी पूरी तरह उस यथार्थ का हिस्सा नहीं बन पाता जिसे वह कागज़ पर उकेरता है। इस प्रकार, 'कुछ कम' कविता रचना की ईमानदारी और रचनाकार की सीमाओं के बीच के संघर्ष का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी साक्ष्य है।

इस संग्रह की 'देहरी दुनिया' कविता लोक तत्त्वों के गहरे अंतर्पाठ से बुनी गई एक ऐसी दिलचस्प रचना है, जहाँ लोक भाषा और लोक छंद केवल शैलीगत प्रयोग नहीं, बल्कि कविता की आत्मा बन कर उभरते हैं। इस कविता में 'गोदा-गादी', 'चील-बिल्लौआ' जैसे शब्द-बिम्ब और 'पकनी-फुटनी काया' जैसे लोक मुहावरे पाठ में एक अनूठी ताजगी भर देते हैं। कविता की लय लोकगीतों, विशेषकर 'चैता' या लोक-धुनों के छंद से अनुप्राणित है, जो इसे केवल बौद्धिक पाठ न बना कर एक 'श्रव्य' अनुभव में बदल देती है। 'रामखेलावन' जैसे संबोधन और 'करनी के फल खाओ' जैसी लोक-नीति की बातें कविता को मिट्टी की गंध और रसमयता से सराबोर कर देती हैं, जिससे पाठक सीधे अपनी लोक-संस्कृति से जुड़ जाता है।

कविता के मूल पाठ में हर पद के अंत में 'राग बिलावल गाओ' के उल्लेख का विशेष औचित्य है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में 'राग बिलावल' प्रातः काल का राग है, जो उल्लास, शुचिता और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

कविता जब 'देहरी दुनिया' (घर की दहलीज) को लाँघने और 'सात समुंदर' पार करने की बात करती है, तो 'राग बिलावल' उस यात्रा के लिए एक सकारात्मक मानसिक भूमिका तैयार करता है। यह राग अज्ञान और भ्रम के अंधकार के बाद ज्ञान और कर्म के 'सूर्योदय' का आह्वान है।

जब कवि कहता है कि "ज्ञानी से अच्छा अज्ञानी, फिर भी बीन बजाए", तब 'राग बिलावल' गाने की हिदायत एक प्रकार का रचनात्मक 'प्रतिरोध' बन जाती है। कविता का संदेश है कि जीवन की विद्रूपताओं और 'कविता के भवफंद' के बीच भी मनुष्य को अपने भीतर की रागिनी और ऊर्जस्विता (बिलावल) को जीवित रखना चाहिए।

विद्यापति का संदर्भ देते हुए "बूढ़ बसंत तरुन भये धाविल" की पंक्तियाँ जब बिलावल के साथ जुड़ती हैं, तो यह समय की धारा में पुराने अनुभवों और नई ऊर्जा के संगम को पुष्ट करती हैं। 'राग बिलावल' यहाँ केवल गायन नहीं, बल्कि जीवन को उसकी संपूर्णता और लयबद्धता में जीने का एक 'मेटाफर' (रूपक) है।

इस प्रकार, लोक छंदों की रसमयता और शास्त्रीय राग के अनुशासन का यह संगम कविता को एक 'टोटल आर्ट फॉर्म' बना देता है, जहाँ राग बिलावल अंततः मुक्ति और वैचारिक स्पष्टता का स्वर सिद्ध होता है।

केशव तिवारी की 'हलचलें' कविता में भोर के उस संधिकाल का सूक्ष्म चित्रण है, जहाँ रात का अंधकार छँट रहा है और जीवन की सक्रियता के छोटे-छोटे संकेत मिलना शुरू हो रहे हैं। इस कविता का गहन सूक्ष्म पठन (Close Reading) प्रकृति, मनुष्य और पशु-जगत के बीच के उस 'भरोसेमंद' अंतर्संबंध को उजागर करता है, जो आधुनिक जीवन की बड़ी हलचलों के बीच भी अपनी मौलिकता बचाए हुए है।

कविता की शुरुआत "आखिरी पहर कोहरे में है" से होती है, जो एक अनिश्चितता और ओझल होते समय का प्रतीक है। कोहरे के इस धुंधलके में जो 'दृश्य' उभरते हैं, वे ग्रामीण और अर्ध-शहरी जीवन की दैनिक जद्दोजहद के बिम्ब हैं— शहर जाने वाला कोई व्यक्ति, किसी दुख-तकलीफ़ के कारण निकला कोई राहगीर, या खूँटे से छूटा हुआ कोई जानवर। यहाँ 'सन्नाटा' निष्क्रियता का परिचायक नहीं है, बल्कि वह "बोलचाल भर" से टूटता है, जो यह दर्शाता है कि संवाद ही जीवन को गति देता है। बिस्तर पर लेटे-लेटे किसी वृद्ध द्वारा 'बाबा की चौपाई' (रामचरितमानस) दोहराना उस सांस्कृतिक सातत्य और विश्वास का प्रतीक है, जो कठिन समय में भी मनुष्य को सहारा देता है।

कविता में समय के परिवर्तन को एक 'करवट' के रूप में देखा गया है। "रोशनी के अलछौहे पंख" और पूर्व की दिशा का "लोहार की भट्ठी के लोहे-सा" सुलगना सूर्योदय की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। लोहार की भट्ठी का बिम्ब सृजन और कठोर श्रम का संकेत देता है, जो आने वाले दिन की चुनौतियों और निर्माण की ओर इशारा करता है। कवि इन "छोटी-छोटी हलचलों" से एक गहरा 'आश्वासन' प्राप्त करता है। उसके लिए यह केवल सुबह होना नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि "लोग जग गए हैं", और उनके साथ ही जानवर, पेड़ और संपूर्ण प्रकृति भी चैतन्य हो गई है।

कविता का समापन एक दार्शनिक और मानवीय ऊँचाई पर होता है। दुनिया की "बड़ी-बड़ी हलचलों" (संभवतः राजनीतिक या वैश्विक उथल-पुथल) के बीच, कवि एक अकेले मनुष्य के "अपने सहाबे" (साहस और आत्मबल) के साथ जगने को सबसे बड़ी घटना मानता है। अंत में "धरती के सबसे भरोसेमंद दोस्त" का इस 'ठंड और कोहरे' के बीच जगना, जीवन की अपराजेय जिजीविषा और आपसी भरोसे की जीत का उत्सव है। यह कविता छोटे-छोटे मानवीय और प्राकृतिक परिवर्तनों के माध्यम से एक बड़े वैश्विक संकट के बीच आशा की किरण खोजने का रचनात्मक प्रयास है।

'हलचलें' कविता इको-क्रिटिसिज्म (पारिस्थितिकीय आलोचना) के सिद्धांतों के आलोक में मनुष्य और प्रकृति के बीच के उस आदिम और अटूट अंतर्संबंध को पुनर्कल्पित करती है, जहाँ 'पर्यावरण' केवल एक परिदृश्य नहीं, बल्कि एक जीवित सह-अस्तित्व है। इस निकष पर कविता का सबसे प्रबल पक्ष इसका 'पारिस्थितिकीय-केंद्रित' (Eco-centric) दृष्टिकोण है। कविता का आरंभ 'कोहरे' और 'ठंड' जैसे प्राकृतिक तत्वों के साथ होता है, जो मनुष्य की गतिविधियों को सीमित करते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह रोकते नहीं। इको-क्रिटिसिज्म यह मानता है कि प्रकृति की अपनी एक 'एजेंसी' या क्रियाशीलता होती है। यहाँ कोहरा केवल एक मौसम नहीं है, बल्कि वह एक सक्रिय वातावरण है जिसके भीतर जीवन की छोटी-छोटी हलचलें—जैसे कोहरे में ओझल होता शहर जाने वाला व्यक्ति या खूँटे से छूटा जानवर—आकार लेती हैं।

कविता में 'खूँटे से छूटे जानवर' और 'कोहरे' के बीच जो द्वंद्व है, वह 'जीव-केंद्रित' चेतना को रेखांकित करता है। कवि यहाँ मनुष्य, पशु और प्रकृति को एक ही धरातल पर रखता है। जब वृद्ध व्यक्ति बिस्तर पर लेटे-लेटे 'बाबा की चौपाई' दुहराता है, तो वह एक ऐसी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी (Cultural Ecology) का संकेत देता है जहाँ मानवीय विश्वास प्रकृति की लय के साथ तालमेल बिठाते हैं। इको-क्रिटिकल दृष्टि से, 'पूर्व का लोहार की भट्ठी जैसा सुलगना' एक अत्यंत सशक्त बिम्ब है। यह प्रकृति के भीतर चल रहे निरंतर 'निर्माण और ऊर्जा' के चक्र को मानवीय श्रम (लोहार) के साथ जोड़ता है। यह दर्शाता है कि ऊर्जा का स्रोत (सूर्य) और मानवीय कर्म (भट्ठी) एक ही वृहद् पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से हैं।

कविता का 'रचनात्मक अभिप्राय' उस समय और स्पष्ट होता है जब कवि "बड़ी-बड़ी हलचलों" के बजाय "दुनिया के सबसे भरोसेमंद दोस्त" के जगने की बात करता है। इको-क्रिटिसिज्म की शब्दावली में इसे 'डीप इकोलॉजी' (Deep Ecology) कह सकते हैं, जहाँ सूक्ष्म प्राकृतिक बदलावों को सामाजिक-राजनीतिक शोर से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। कवि का 'भरोसा' उस पारिस्थितिकी पर है जो ठंड, कोहरे और अंधकार के बावजूद स्वयं को पुनः सक्रिय करती है। यह कविता 'मानव-केंद्रित अहंकार' (Anthropocentrism) को चुनौती देती है, क्योंकि यहाँ मनुष्य की जागृति तभी सार्थक मानी गई है जब उसके साथ जानवर और प्रकृति भी चैतन्य होते हैं। अंततः, 'हलचलें' कविता यह संदेश देती है कि हमारी मुक्ति और हमारा भविष्य किसी कृत्रिम व्यवस्था में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे उसी 'भरोसेमंद' रिश्ते में है जो हर सुबह कोहरे को चीर कर हमें जगाता है। इस प्रकार, यह पाठ पारिस्थितिकीय संतुलन और वैश्विक सह-अस्तित्व का एक गहन काव्यात्मक साक्ष्य बन जाता है।


मजाज लखनवी


इस संग्रह की कविता 'मजाज़ की क़ब्र देख कर' जूलिया क्रिस्तेवा के अंतर्पाठीयता (Intertextuality) के सिद्धांत का एक मर्मस्पर्शी और जटिल विस्तार है। क्रिस्तेवा का मानना है कि "प्रत्येक पाठ एक संकलित पाठ (Compendium) है, जो अन्य पाठों के साथ निरंतर संवाद करता है।" इस कविता में मजाज़ लखनवी की सुप्रसिद्ध नज़्म 'आवारा' न केवल एक संदर्भ के रूप में मौजूद है, बल्कि वह कविता की वैचारिक रीढ़ की तरह कार्य करती है। 'आवारा' नज़्म की वह सुप्रसिद्ध टेक— 

"ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, 

ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ"

—प्रस्तुत कविता के मौन अंतरालों में गूँजती रहती है। केशव तिवारी जब मजाज़ की क़ब्र के सामने खड़े होते हैं, तो वे केवल एक व्यक्ति की समाधि नहीं देख रहे होते, बल्कि वे उस 'वहशत' (बेचैनी) और 'आवारागी' के ऐतिहासिक दस्तावेज़ से साक्षात्कार कर रहे होते हैं जो लखनऊ की सड़कों पर 'रात और रेल' के बिम्बों के साथ कभी गूँजी थी। अंतर्पाठीयता यहाँ 'अवशोषण और रूपांतरण' की प्रक्रिया है; मजाज़ की नज़्म का 'शहर' और केशव की कविता की 'क़ब्र' के बीच एक ऐसा सेतु बनता है जहाँ 'भटकन' का अंत 'स्थिरता' में नहीं बल्कि एक अनंत दुःख में तब्दील हो जाता है।

व्यावहारिक आलोचनात्मक मूल्यांकन की दृष्टि से यह कविता मजाज़ की 'आवारा' नज़्म के उस विद्रोही और रूमानी स्वर को आज के समय की निष्ठुरता के साथ जोड़ती है। मजाज़ की नज़्म में जो 'चाँद', 'तारे' और 'शहर की चकाचौंध' आवारागी के गवाह थे, केशव की कविता में वे 'स्मृति के मलबे' की तरह उपस्थित हैं। कविता का सृजनात्मक मूल्य तब और बढ़ जाता है जब कवि मजाज़ की उस 'बग़ावत' को याद करता है जो उन्होंने अपनी नज़्मों में व्यवस्था के विरुद्ध की थी। 'आवारा' नज़्म का नायक जहाँ समाज से तिरस्कृत हो कर भी अपनी अस्मिता की तलाश में भटकता है, वहीं केशव की कविता उस नायक की अंतिम परिणति (क़ब्र) पर पहुँचकर एक प्रकार की काव्यात्मक संवेदना' की पुनरावृत्ति करती है। यह अंतर्पाठ पाठक के भीतर एक दोहरा प्रभाव पैदा करता है: एक ओर मजाज़ की आवाज़ की वह खनक है जो "शहर की रात" में गूँजती थी, और दूसरी ओर वर्तमान कवि का वह भारी मन जो उस आवाज़ के 'शांत' हो जाने पर शोककुल है।

क्रिस्तेवा के 'फेनोटैक्स्ट' और 'जीनोटैक्स्ट' के निकष पर देखें तो मजाज़ की नज़्म का 'पाठ' इस नई कविता के भीतर एक गहरे सांस्कृतिक अवचेतन (Genotext) की तरह काम कर रहा है। केशव तिवारी ने मजाज़ की नज़्म के प्रतिध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग न करते हुए भी उसकी 'आत्मा' को जिस तरह पकड़ा है, वह उनकी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि का परिचायक है। कविता केवल मजाज़ को श्रद्धांजलि नहीं देती, बल्कि वह 'आवारा' नज़्म के उस शाश्वत प्रश्न को फिर से जीवित करती है कि क्या वह 'ग़म-ए-दिल' आज भी उतना ही गहरा है। यह पाठ दर पाठ चलने वाली यात्रा है जहाँ मजाज़ का 'आवारा' नायक और केशव का 'प्रेक्षक' कवि एक ही मानवीय त्रासदी के दो छोर बन जाते हैं। इस प्रकार, यह कविता अंतर्पाठीयता के माध्यम से एक मृत कवि की आवाज़ को वर्तमान की संवादहीनता के विरुद्ध एक शक्तिशाली प्रतिवाद बना देती है, जिससे कविता का कवित्व अपने तात्कालिक संदर्भों को लाँघ कर एक व्यापक वैश्विक करुणा में रूपांतरित हो जाता है।

केशव तिवारी की 'शिकायत' कविता  सत्ता, व्यवस्था और मनुष्य के बीच के उस 'अदृश्य' युद्ध का दस्तावेज़ है, जहाँ हथियार शब्दों के नहीं, बल्कि 'खामोशी' और 'अपील' के हैं। इस कविता का सूक्ष्म पठन (Close Reading) यह उद्घाटित करता है कि कैसे एक साधारण सा शब्द 'शिकायत' एक बड़े राजनीतिक और दार्शनिक प्रश्न में तब्दील हो जाता है। कविता का आरंभ एक ऐसी स्थिति से होता है जहाँ संवाद के सारे मार्ग अवरुद्ध हैं। जब कवि कहता है कि "शिकायत करने के लिए/ एक जगह चाहिए थी", तो वह केवल एक भौतिक स्थान की माँग नहीं कर रहा, बल्कि उस 'लोकतांत्रिक स्पेस' की खोज कर रहा है जहाँ एक कमज़ोर आवाज़ को सुना जा सके। यह 'जगह' का अभाव ही आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी है, जहाँ ऊँची अट्टालिकाएँ और विस्तृत सड़कें तो हैं, लेकिन दुःख दर्ज कराने के लिए कोई कोना नहीं बचा है।

कविता में 'शिकायत' का स्वरूप पारंपरिक नहीं है। यहाँ शिकायत केवल अभावों की नहीं, बल्कि उस 'अस्तित्वगत संकट' की है जिसे व्यवस्था ने सामान्य मान लिया है। कवि ने जिस सूक्ष्मता से 'शिकायत' और 'प्रार्थना' के बीच की धुंधली रेखा को पकड़ा है, वह उसकी रचनात्मक परिपक्वता का प्रमाण है। जब व्यवस्था इतनी बहरी हो जाए कि वह केवल 'जयघोष' सुनना चाहे, तो वहाँ 'शिकायत' करना भी एक क्रांतिकारी कदम बन जाता है। यहाँ 'शिकायत' करना खुद को 'जीवित' और 'जागरूक' घोषित करना है। कविता का शिल्प अत्यंत संयत है, जो पाठक को एक 'मौन शोर' की अनुभूति कराता है। यह उस 'खामोश गुस्से' की कविता है जो दीवारों से टकरा कर वापस आ जाती है, लेकिन खत्म नहीं होती।

कविता का सबसे गहरा मर्म उसके अंतिम हिस्से में छिपा है, जहाँ शिकायत करने वाला स्वयं यह सोचने पर मजबूर होता है कि उसकी आवाज़ पहुँचेगी भी या नहीं। यहाँ 'अनिश्चितता' का बोध कविता को एक उत्तर-आधुनिक (Post-modern) विस्तार देता है। व्यवस्था ने मनुष्य को इस कदर 'अनुकूलित' (Conditioned) कर दिया है कि उसे अपनी जायज़ शिकायत दर्ज कराने में भी एक प्रकार का संकोच या भय महसूस होता है। यह 'भय' शब्दों के बीच की खाली जगहों में पढ़ा जा सकता है। कवि यहाँ सत्ता के उस क्रूर चरित्र को अनावृत करता है जो संवाद को 'शोर' और असहमति को 'अपराध' करार दे देती है।

वस्तुत:, 'शिकायत' कविता एक ऐसी आवाज़ है जो गुम हो जाने के डर के बावजूद अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहती है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि जब तक हमारे पास 'शिकायत' करने का साहस बचा है, तब तक हमारे भीतर की मनुष्यता जीवित है। केशव तिवारी ने इस छोटी सी कविता के माध्यम से सत्ता के उस विशालकाय तंत्र को चुनौती दी है जो यह दावा करता है कि सब कुछ ठीक है। यह कविता 'सब कुछ ठीक है' के सरकारी दावे के खिलाफ एक आम आदमी का 'शोक-पत्र' और 'विरोध-पत्र' दोनों है। इस प्रकार, यह पाठ अपनी सूक्ष्म बुनावट में राजनीतिक चेतना और मानवीय संवेदना का एक अनूठा संगम सिद्ध होता है।

इस संग्रह की 'आवाज़ दो'  समकालीन कविता के परिदृश्य में 'पुकार' और 'पहचान' के संकट को स्वर देने वाली एक बीज-रचना है। इस कविता से गुज़रते हुए यह उद्घाटित करता है कि यहाँ 'आवाज़' केवल एक ध्वन्यात्मक क्रिया नहीं है, बल्कि वह अस्तित्व की अनिवार्य शर्त और प्रतिरोध का अंतिम माध्यम है। कविता का आरंभ एक प्रकार के शून्य और सन्नाटे से होता है, जहाँ "आवाज़ देना" एक ऐसी क्रिया के रूप में उभरता है जो इस जड़ संसार में हलचल पैदा कर सके। कवि ने यहाँ आवाज़ को 'पुल' की तरह इस्तेमाल किया है—एक ऐसा सेतु जो 'स्व' (Self) को 'पर' (Other) से जोड़ता है। जब कवि कहता है "आवाज़ दो", तो वह केवल किसी को बुला नहीं रहा, बल्कि वह उस संवादहीनता को तोड़ रहा है जिसे आधुनिक समाज ने अपनी नियति मान लिया है।

कविता का विस्तार उस 'अनुनय' और 'अधिकार' के बीच के बारीक द्वंद्व को प्रकट करता है, जहाँ आवाज़ का खो जाना मनुष्य के 'होने' के मिट जाने के समान है। केशव तिवारी यहाँ बहुत ही सूक्ष्म बिम्बों का प्रयोग करते हैं—जैसे कोहरे में ओझल होता कोई चेहरा या भीड़ में खोती हुई कोई पुकार। यहाँ 'आवाज़' एक प्रकार की 'सांस्कृतिक पहचान' (Cultural Identity) भी है। वह "आवाज़" जो इतिहास के हाशिए से आती है, वह "आवाज़" जो सत्ता के गलियारों में अनसुनी कर दी गई है, और वह "आवाज़" जो हमारे भीतर के सोए हुए मनुष्य को जगाती है। कविता का शिल्प एक ऊँचे सुर से शुरू होकर धीरे-धीरे एक 'मौन गहराई' में उतरता है, जो पाठक को आत्म-साक्षात्कार के लिए विवश करता है।

रचनात्मक दृष्टि से यह कविता 'एकता' और 'सामूहिकता' का आह्वान है। "आवाज़ दो" का मुहावरा एक ऐसा साझा स्वर तैयार करता है जहाँ "मैं" और "तुम" मिल कर "हम" में रूपांतरित हो जाते हैं। कवि यहाँ यह संकेत देता है कि जब सब कुछ छीन लिया जाए, जब शब्द अर्थ खोने लगें और जब चारों ओर एक 'संयोजित शांति' (Manufactured Silence) थोप दी जाए, तब केवल एक 'पुकार' ही वह औज़ार बचती है जिससे व्यवस्था की दीवारों में दरार पैदा की जा सकती है। यह कविता 'मिशेल फूको' के शक्ति-विमर्श के निकष पर भी परखी जा सकती है, जहाँ आवाज़ देना सत्ता के वर्चस्व के विरुद्ध एक 'लघु-प्रतिरोध' (Micro-resistance) है।

कविता के अंतिम चरण में यह 'आवाज़' एक ब्रह्मांडीय व्याप्ति प्राप्त कर लेती है। यह केवल मनुष्य की आवाज़ नहीं रह जाती, बल्कि प्रकृति, पशु और उन तमाम मूक तत्वों की आवाज़ बन जाती है जिनकी व्यथा को कोई भाषा नहीं मिली। केशव तिवारी की भाषा यहाँ अत्यंत पारदर्शी है, लेकिन उसके पीछे छिपी चिंता बेहद गहरी है। "आवाज़ दो" की बार-बार होने वाली आवृत्ति एक 'मंत्र' की तरह काम करती है, जो पाठक के भीतर एक नैतिक ज़िम्मेदारी का बोध कराती है। यह पाठ अंततः यह स्थापित करता है कि जीवित होने का सबसे बड़ा प्रमाण 'आवाज़ देना' है; क्योंकि जो बोल नहीं सकता, वह कम से कम पुकार तो सकता है, और जिसकी पुकार ज़िंदा है, उसकी उम्मीद अभी मरी नहीं है। इस प्रकार, यह कविता अपने विस्तार में एक राजनीतिक वक्तव्य और अपनी गहराई में एक मानवीय प्रार्थना बन जाती है।

केशव तिवारी के कविता-संग्रह की शीर्षक कविता 'नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा'  पारिस्थितिकीय समाजशास्त्र (Environmental Sociology) और मार्क्सवादी भौतिकवाद के अंतर्संबंधों का एक सघन पाठ प्रस्तुत करती है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह कविता प्रकृति के 'वस्तुकरण' (Commodification) और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले 'अलगाव’' (Alienation) के संकट को चित्रित करती है। जब कवि कहता है कि नदी का मार्सिया (शोक-गीत) पानी ही गाएगा, तो वह अंतोनियो ग्राम्शी के 'सबऑल्टर्न' (Subaltern) विमर्श को एक स्वाभाविक  विस्तार देता है। यहाँ नदी वह हाशिए का समाज है जिसका शोषण सत्ता और पूँजी द्वारा किया गया है, और 'पानी' वह एकमात्र साक्ष्य या गवाह है जो उस शोषण की आंतरिक पीड़ा को व्यक्त करने की क्षमता रखता है। ग्राम्शी के अनुसार, "हाशिए के समूहों की अपनी कोई स्वायत्त आवाज़ नहीं होती जब तक कि वे स्वयं अपनी ऐतिहासिक स्थिति को शब्द न दें" (The history of subaltern social groups is as complex as the history of dominant class groups, although the former is without autonomy - Selections from the Prison Notebooks, 1971)।

कविता का समाजशास्त्रीय मर्म 'शोक' के निजीकरण के विरुद्ध 'शोक के समाजीकरण' में निहित है। मार्सिया आमतौर पर एक विलाप होता है, लेकिन यहाँ यह एक राजनीतिक वक्तव्य बन जाता है। हबर्ड मार्क्यूस ने अपनी पुस्तक 'वन डाइमेंशनल मैन' में जिस 'तकनीकी तर्कसंगतता' (Technological Rationality) की बात की है, वह नदी को केवल एक 'संसाधन' (Resource) के रूप में देखती है। कविता इस तर्क को चुनौती देती है और यह स्थापित करती है कि नदी का मरना केवल एक पारिस्थितिकीय क्षति नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता और उसकी 'सामूहिक स्मृति' (Collective Memory) का विनाश है। फ्रांसीसी समाजशास्त्री मौरिस हाल्बवाक्स (Maurice Halbwachs) के 'कलेक्टिव मेमोरी' के सिद्धांत के अनुसार, समाज अपनी पहचान अपनी स्मृतियों के आधार पर बुनता है; यदि नदी सूखती है, तो उस समाज की सांस्कृतिक पहचान भी सूखने लगती है।

कविता के अंतर्निहित स्वर में एक 'परिस्थितिकीय न्याय' (Ecological Justice) की माँग छिपी है। पानी का मर्सिया गाना उस प्रतिरोध का प्रतीक है जिसे मिशेल फूको 'सत्य का शासन' (Regime of Truth) कहते हैं। सत्ता नदी के सूखने या प्रदूषित होने पर जो आधिकारिक नैरेटिव (Official Narrative) तैयार करती है, 'पानी' का शोक-गीत उस नैरेटिव को ध्वस्त कर देता है। फूको के शब्दों में, "जहाँ शक्ति है, वहीं प्रतिरोध भी है" (Where there is power, there is resistance - The History of Sexuality, 1976)। यहाँ पानी का गायन उस व्यवस्था के विरुद्ध एक 'प्राकृतिक विद्रोह' है जो जीवन के आधारभूत तत्वों को भी मुनाफे की वस्तु में बदल देती है। इस प्रकार, यह कविता केवल जल-संकट की बात नहीं करती, बल्कि यह उस सामाजिक विखंडन का विश्लेषण करती है जहाँ मनुष्य और प्रकृति के बीच का जैविक अनुबंध टूट चुका है। यह पाठ अंततः यह चेतावनी देता है कि जब विनाश पूर्ण होगा, तो उसका साक्ष्य भी वही देगा जो उस विनाश का अंतिम शिकार है।

'नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा' कविता संरचनावाद (Structuralism) और उत्तर-संरचनावाद (Post-structuralism) के भाषाई और दार्शनिक सिद्धांतों के बीच एक झूलता हुआ पाठ है। संरचनावादी दृष्टि से, यह कविता 'नदी', 'पानी' और 'मर्सिया' जैसे प्रतीकों के एक व्यवस्थित तंत्र (System of signs) का निर्माण करती है। फर्डिनेंड डी सस्यूर के अनुसार, भाषा अर्थ का उत्पादन 'विभेद' (Difference) के माध्यम से करती है। यहाँ 'नदी' और 'पानी' के बीच का संरचनात्मक संबंध वैसा ही है जैसा 'संकेतक' (Signifier) और 'संकेतित' (Signified) का होता है। कविता की संरचना में 'मार्सिया' एक ऐसी विधा है जो केवल शोक को प्रकट नहीं करती, बल्कि वह उस संपूर्ण सामाजिक-भाषिक संरचना को सक्रिय करती है जहाँ मृत्यु और स्मृति का व्याकरण तय होता है। सस्यूर का मानना था कि "भाषा में केवल भेद हैं, बिना किसी सकारात्मक पद के" (In language there are only differences without positive terms - Course in General Linguistics, 1916).

उत्तर-संरचनावादी निकष पर यह कविता संरचनावाद की 'निश्चित अर्थ' वाली धारणा को विखंडित (Deconstruct) कर देती है। देरिदा के 'डिफ़रांस' (Différance) सिद्धांत के अनुसार, अर्थ कभी भी स्थिर नहीं होता, वह हमेशा स्थगित (Deferred) रहता है। कविता का शीर्षक ही एक विरोधाभास पैदा करता है—शोक-गीत (मर्सिया) आमतौर पर मनुष्य गाते हैं, लेकिन यहाँ 'पानी' को कर्ता (Agency) बनाया गया है। यह 'लोगोसेंट्रिज्म' (केंद्रवाद) पर प्रहार है, जहाँ मनुष्य को अर्थ का एकमात्र केंद्र माना जाता है। देरिदा के अनुसार, "पाठ के बाहर कुछ भी नहीं है" (There is nothing outside-of-the-text - Of Grammatology, 1967). यहाँ नदी का अस्तित्व और उसका शोक एक ऐसे अंतहीन पाठ में बदल जाता है जहाँ पानी, विलाप और अस्तित्व एक-दूसरे में विलीन हो रहे हैं।

रोलां बार्थ के 'लेखक की मृत्यु' के मंतव्य को देखें तो यह कविता लेखक के नियंत्रण से मुक्त हो कर 'पाठक' और 'पाठ' के बीच एक नया संबंध बनाती है। बार्थ का मानना था कि "लेखक की मृत्यु के मूल्य पर ही पाठक का जन्म होता है" (The birth of the reader must be at the cost of the death of the Author - Image-Music-Text, 1977). इस कविता में जब पानी मार्सिया गाता है, तो लेखक पीछे हट जाता है और प्रकृति स्वयं अपनी व्याख्या करने लगती है। यह 'रीडेबल' (Readable) पाठ से 'राइटेबल' (Scriptible) पाठ की ओर संक्रमण है, जहाँ पाठक स्वयं अर्थों की बहुलता में शामिल होता है।

मिशेल फूको के 'डिस्कोर्स' (Discourse) और 'पावर' के सिद्धांतों के आलोक में, 'नदी का मार्सिया' सत्ता के उस नैरेटिव को चुनौती देता है जो नदी के विनाश को 'विकास' की भाषा में छुपाता है। फूको के अनुसार, "सत्य का उत्पादन शक्ति के तंत्र के भीतर होता है" (Truth is a thing of this world: it is produced only by virtue of multiple forms of constraint - Power/Knowledge, 1980). यहाँ पानी का गाना एक 'जवाबी-डिस्कोर्स' (Counter-discourse) है, जो सत्ता द्वारा थोपे गए सन्नाटे को तोड़ता है। कविता यह सिद्ध करती है कि संरचनाएँ स्थिर नहीं हैं; जब मूल संरचना (नदी) ढहती है, तो उसके भीतर के तत्व (पानी) नई संरचनाएँ और नए अर्थ गढ़ने लगते हैं। इस प्रकार, यह कविता संरचनावाद के 'सिस्टम' और उत्तर-संरचनावाद के 'विखंडन' का एक बेजोड़ संगम है, जहाँ अंततः 'पानी' का स्वर ही सत्य की एकमात्र गूँज बनकर उभरता है।

केशव तिवारी की  बकुलाही, चन्द्रावल, पहुज, क्वारी, सिंध, धसान, उर्मिल, चेलना और जेमनार जैसी लुप्तप्राय नदियों पर केंद्रित कविताएँ समकालीन हिंदी साहित्य में इको-क्रिटिसिज्म (पारिस्थितिकीय आलोचना) का एक जीवंत और मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को चेरिल ग्लोटफेलिटी (Cheryl Glotfelty) की इस स्थापना के निकष पर परखा जा सकता है कि "साहित्यिक अध्ययन को भौतिक जगत के साथ अंतर्संबंधों की तलाश करनी चाहिए।" केशव तिवारी इन नदियों को केवल जलधाराओं के रूप में नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक स्मृति' और 'जैविक अस्मिता' के रूप में चित्रित करते हैं। इको-क्रिटिसिज्म का 'स्थान का सौन्दर्यशास्त्र' (Aesthetics of Place) यहाँ अत्यंत मुखर है; ये नदियाँ केवल भूगोल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये उस बुंदेलखंडी और आंचलिक चेतना की धमनियां हैं, जिनके सूखने का अर्थ एक पूरी सभ्यता का 'डिहाइड्रेशन' (जलीकरण का अभाव) है।

इन कविताओं का सूक्ष्म विश्लेषण 'मानव-केंद्रित अहंकार' (Anthropocentrism) के विरुद्ध एक प्रबल प्रतिवाद प्रस्तुत करता है। कवि जब धसान या उर्मिल के लुप्त होने की व्यथा लिखता है, तो वह 'गहरी पारिस्थितिकी' (Deep Ecology) के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है जिसे अर्ने नाएस ने प्रतिपादित किया था—कि प्रकृति का मूल्य मानवीय उपयोगिता से स्वतंत्र है। यहाँ नदियाँ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे सिंचाई का साधन हैं, बल्कि इसलिए कि उनका अपना एक 'स्वायत्त अधिकार' था। बकुलाही या चेलना जैसी छोटी नदियों का विस्मृति में चले जाना उस 'पर्यावरणीय अन्याय' (Environmental Injustice) की ओर संकेत करता है, जहाँ विकास की बड़ी परियोजनाओं के शोर में सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्रों की हत्या कर दी गई। कवि की दृष्टि यहाँ 'ईको-ओंटोलॉजी' (Eco-ontology) वाली है, जहाँ वह अनुभव करता है कि नदी का अस्तित्व मिटना दरअसल मनुष्य के अपने अस्तित्व के एक हिस्से का मरुस्थलीकरण है।

इन कविताओं में 'प्रकृति की एजेंसी' का लुप्त होना सबसे पीड़ादायक पक्ष है। इको-क्रिटिसिज्म के निकष पर, जब कोई नदी 'लुप्त' होती है, तो वह केवल भौतिक रूप से नहीं मरती, बल्कि वह उस भाषा और उन बिम्बों से भी बाहर हो जाती है जो उसे जीवित रखते थे। केशव तिवारी ने सिंध और पहुज जैसी नदियों के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे औद्योगिक अतिक्रमण और रेत माफिया ने नदियों को 'पवित्र' से 'पण्य' (Commodity) में बदल दिया है। यह 'मार्क्सवादी पारिस्थितिकी' (Marxist Ecology) का वह विद्रूप चेहरा है जहाँ पूँजी के संचय के लिए प्रकृति का 'आदिम संचय' किया जाता है। इन कविताओं का पाठ पाठक को एक 'पारिस्थितिकीय अपराधबोध' (Ecological Guilt) से भर देता है, जहाँ लुप्त होती हर नदी एक 'मर्सिया' बन जाती है जिसे गाने के लिए अब पर्याप्त पानी भी शेष नहीं है।

अंततः, यह  काव्य-विस्तार एक 'ईको-डिस्कोर्स' तैयार करता है जो हमें चेतावनी देता है कि जेमनार या क्वारी जैसी नदियों का मरना एक वैश्विक जल-संकट का पूर्वाभ्यास है। केशव तिवारी की भाषा यहाँ 'ग्रीन लैंग्वेज' की तरह काम करती है, जो तकनीकी विकास के दावों को 'हरित' शब्दावली के माध्यम से विखंडित करती है। इको-क्रिटिसिज्म के निकष पर ये कविताएँ एक ऐसी परवाह की नैतिकता (एथिक्स ऑफ केयर) की माँग करती हैं, जहाँ मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक विनीत अंश होना था। इन कविताओं का महत्त्व इस बात में है कि वे केवल विलाप नहीं करतीं, बल्कि वे उन मृतप्राय धाराओं के नाम लेकर उन्हें हमारी चेतना में पुनर्स्थापित करने का एक साहसिक और नैतिक प्रयास करती हैं।

संग्रह की 'उसकी कविता' सृजन की प्रक्रिया, रचनाकार के अंतर्द्वंद्व और कविता के सामाजिक-नैतिक सरोकारों पर केंद्रित एक आत्म-रचनात्मक (Meta-poetic) पाठ है। इस कविता का गहराई से पाठ यह उद्घाटित करता है कि एक 'सच्ची कविता' केवल शब्दों का विन्यास नहीं होती, बल्कि वह उन अनकहे अनुभवों और अनसुनी आवाजों का मूर्त रूप होती है जिसे अक्सर मुख्यधारा का विमर्श अनदेखा कर देता है। इस कविता का आरंभ 'उसकी' (रचनाकार की) कविता की विशिष्टता को रेखांकित करने से होता है, जहाँ कविता कोई सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि जीवन के खुरदरे यथार्थ से उपजी एक अनिवार्य अभिव्यक्ति है।

कविता का विस्तार यह दर्शाता है कि 'उसकी कविता' में उन 'हाशिए के बिम्बों' की प्रधानता है जो सत्ता और बाज़ार की चमक-धमक से दूर हैं। कवि यहाँ यह संकेत देता है कि एक रचनाकार का धर्म उन चीजों को शब्द देना है जो चुप करा दी गई हैं। 'उसकी कविता' में जो सादगी और सीधापन है, वह दरअसल एक 'सचेत चुनाव' है। यह सादगी जटिलताओं को छिपाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए है। सूक्ष्मता से देखें तो यहाँ 'कविता' स्वयं एक पात्र (Protagonist) की तरह उभरती है, जो अपने रचयिता से भी अधिक स्वतंत्र और साहसी है। यह रिल्के के इस विचार को पुष्ट करती है कि कविता केवल भावनाएँ नहीं, बल्कि 'अनुभव' है।

कविता के मूल पाठ में 'अनुपस्थिति' का एक गहरा बोध है। वह जो दिखाई नहीं देता, वह जो महसूस तो होता है पर व्यक्त नहीं हो पाता—'उसकी कविता' उसी रिक्त स्थान को भरने का प्रयास है। केशव तिवारी ने यहाँ बहुत ही महीन बुनावट के साथ यह प्रतिपादित किया है कि कविता का सौंदर्य उसके 'अलंकारों' में नहीं, बल्कि उसकी 'ईमानदारी' में है। जब कविता जीवन के संघर्षों, मिट्टी की गंध और मनुष्य की जिजीविषा को अपनी लय बनाती है, तभी वह 'उसकी' से 'सबकी' कविता बन पाती है। यह कविता सृजन के उस एकांत और सार्वजनिक दायित्व के बीच के संतुलन को भी दर्शाती है, जहाँ कवि अपनी निजता को खोए बिना वैश्विक करुणा का हिस्सा बनता है।

वस्तुत: यह पाठ इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि 'उसकी कविता' वास्तव में एक 'प्रति-संसार' (Counter-world) का निर्माण है। एक ऐसा संसार जहाँ सत्य को उसके नग्न रूप में देखा जा सके और जहाँ अविश्वास के दौर में भी 'भरोसे' की एक बारीक लकीर खींची जा सके। यह कविता रचनाकार की उस विवशता और शक्ति दोनों का साक्ष्य है, जहाँ लिखना केवल एक शौक नहीं बल्कि जीने का एकमात्र संभव ढंग रह जाता है। इस प्रकार, यह रचना समकालीन कविता के सिद्धांतों और व्यवहार के बीच एक सेतु की तरह है, जो हमें कविता के वास्तविक प्रयोजन—अर्थात् मनुष्यता की रक्षा—की याद दिलाती है।


ज्यां पॉल सार्त्र


ज्यां पॉल सार्त्र की आत्मकथा 'द वर्ड्स' (1964) में व्यक्त उनकी प्रसिद्ध स्वीकारोक्ति—"बहुत पहले मैं अपनी कलम को तलवार समझ बैठा था; आज मुझे अपनी असमर्थता का ज्ञान है। फिर भी मैं लिखता हूँ"—केशव तिवारी की कविता 'उसकी कविता'  के विश्लेषण के लिए एक अनिवार्य दार्शनिक प्रस्थान बिंदु प्रदान करती है। सार्त्र का यह बयान 'लेखन की शक्ति' और 'लेखन की सीमा' के बीच का वह तनाव है, जो इस कविता के अंतर्पाठ में पूरी सघनता के साथ मौजूद है। सार्त्र के 'प्रतिबद्ध साहित्य' (Engagement) के निकष पर यदि हम 'उसकी कविता' को परखें, तो यह रचना एक 'स्थित व्यक्ति' (Situated individual) की अभिव्यक्ति के रूप में उभरती है, जो इतिहास और समाज से भागता नहीं, बल्कि उसे अपनी कविता का आधार बनाता है।

कविता में 'उसकी कविता' का जो स्वरूप वर्णित है, वह सार्त्र की उस 'आत्म-प्रवंचना' (Bad faith) से मुक्त है जहाँ लेखक यह भ्रम पाले रहता है कि लिखना ही अपने आप में एक पूर्ण राजनीतिक कर्म है। सार्त्र ने 'व्हाट इज़ लिटरेचर?' (1947) में स्पष्ट किया था कि लेखक शब्दों के माध्यम से दुनिया को प्रकट करता है और उसे बदलने की ज़िम्मेदारी उठाता है। केशव तिवारी की 'उसकी कविता' शीर्षक रचना में भी यही उत्तरदायित्व झलकता है। कवि अपनी कलम को 'तलवार' समझ कर किसी रोमानी भ्रम में नहीं जीता, बल्कि वह अपनी 'असमर्थता' को जानते हुए भी लिखने का जो चुनाव करता है, वही उसे एक सच्चा 'प्रतिबद्ध रचनाकार' बनाता है। यहाँ लिखना पलायन नहीं, बल्कि एक नैतिक हस्तक्षेप है।

सार्त्र के अनुसार, लेखक 'इतिहास' में स्थित होता है। केशव तिवारी की इस कविता में भी 'उसकी कविता' का चरित्र ऐतिहासिक और सामाजिक यथार्थ से निर्मित है। यह कविता उन लोगों, दृश्यों और सरोकारों के प्रति उत्तरदायी है जो व्यवस्था के हाशिए पर हैं। यदि सार्त्र का लेखक 'शब्दों' को एक हथियार की तरह उपयोग करने के मोह से मुक्त हो कर उन्हें 'उत्तरदायित्व' की भाषा बनाता है, तो केशव तिवारी की 'उसकी कविता' का नायक भी शब्दों को एक ऐसी गवाही के रूप में पेश करता है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। "फिर भी मैं लिखता हूँ" का सार्त्रीय ज़िद भरा स्वर इस कविता की अंतर्धारा है—यह जानते हुए भी कि कविता अकेले दुनिया नहीं बदल सकती, वह इस 'असमर्थता' के विरुद्ध एक निरंतर गूँजती आवाज़ है।

व्यावहारिक स्तर पर, 'उसकी कविता' में यथार्थ का जो सीधा और अनलंकृत चित्रण है, वह सार्त्र के उस विचार को पुष्ट करता है जहाँ साहित्य को एक 'खुलासा' (Disclosure) माना गया है। कविता जब उन चीजों के बारे में बोलती है जिनके बारे में राजनीति खामोश है, तो वह सार्त्र के 'एक्शन' (Action) का ही एक रूप बन जाती है। 'उसकी कविता' में जो 'अकेलापन' और 'संघर्ष' है, वह सार्त्र की उस पीड़ा से जुड़ता है जहाँ लेखन प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप का विकल्प तो नहीं बन सकता, लेकिन उसके बिना कोई भी हस्तक्षेप नैतिक रूप से अधूरा है। वस्तुत:, यह कविता इस महान सत्य को प्रतिपादित करती है कि लेखक की सार्थकता उसकी 'कलम की ताकत' के अहंकार में नहीं, बल्कि उसकी 'लिखने की मजबूरी' और 'सामाजिक जवाबदेही' के अंतर्संबंधों में निहित है। यह पाठ सार्त्र के उन शब्दों का काव्य-रूपांतरण प्रतीत होता है जहाँ लिखना एक 'स्थित व्यक्ति' का दुनिया के प्रति प्रेम और उसकी चिंताओं का एक अनिवार्य परिणाम बन जाता है।

इस संग्रह की 'आवाज़ को पता है' कविता आज के सत्यातीत समय (Post-truth Era) की उस सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करती है, जहाँ सूचनाओं के शोर और नियोजित झूठ के बीच 'सत्य' की पहचान करना लगभग असंभव बना दिया गया है। इस ‘सत्यातीत दौर’ में, जहाँ वस्तुनिष्ठ तथ्यों के बजाय व्यक्तिगत विश्वासों और जनमत के हेरफेर  को प्राथमिकता दी जाती है, यह कविता 'आवाज़' को एक ऐसे आदिम और विश्वसनीय साक्ष्य के रूप में स्थापित करती है जिसे सत्ता या तकनीक पूरी तरह भ्रमित नहीं कर सकती। कविता का मूल पाठ इस सत्य को रेखांकित करता है कि भले ही बाहरी तौर पर अर्थों का विखंडन हो गया हो, लेकिन 'आवाज़' के भीतर जो अनुभवजन्य सच्चाई है, वह अपनी पहचान स्वयं सुरक्षित रखती है।

सत्यातीत समय की एक बड़ी त्रासदी यह है कि यहाँ शब्दों को उनके संदर्भों से काट कर उन्हें पेश किया जाता है। कविता इस विडंबना पर प्रहार करती है कि बाहरी जगत में अविश्वास और भ्रम का चाहे जितना बड़ा जाल बिछा हो, "आवाज़ को पता है" कि उसे कहाँ से निकलना है और उसका वास्तविक मर्म क्या है। यहाँ 'आवाज़' केवल ध्वनि नहीं, बल्कि मनुष्य की 'अन्तरात्मा' और उसकी 'जैविक स्मृति' का प्रतीक है। जब समाज में 'सत्य' को 'वैकल्पिक तथ्यों' (Alternative facts) से दबाया जा रहा हो, तब यह कविता घोषित करती है कि मनुष्य का अंतर्ज्ञान और उसकी मौलिक पुकार अभी भी उस प्रपंच को समझने में सक्षम है। यह उस अति-यथार्थ (हाइपर-रियलिटी) के विरुद्ध एक प्रतिरोध है जहाँ स्क्रीन पर दिखने वाला सच वास्तविक जीवन के सच को निगल जाता है।

गहराई से देखें तो यह कविता एक 'ख़ामोश प्रतिवाद' है। सत्यातीत दौर में आवाजों को दबाने से ज्यादा ख़तरनाक उनका 'भटकाव' है। कवि यहाँ आवाज़ की उस 'नियत' और 'दिशा' की बात करता है जो उसे अपने उद्गम (Source) से जोड़ती है। सत्ता चाहे जितना भी नैरेटिव बदल ले, "आवाज़ को पता है" कि उसका दर्द क्या है और उसकी माँग क्या है। यह कविता आज के समय के उस 'सूचना-युद्ध' (Information War) की विद्रूपता को अनावृत करती है जहाँ सत्य को इतना शोर-शराबे वाला बना दिया गया है कि वह सुनाई ही न दे। केशव तिवारी इस शोर के बीच एक 'एकाग्र आवाज़' की वकालत करते हैं, जो झूठ की परतों को भेदकर अपना रास्ता बनाना जानती है।

व्यावहारिक आलोचना के निकष पर, यह कविता उस 'अविश्वास' को भी संबोधित करती है जो आज के मनुष्य के भीतर घर कर गया है। जब हम हर सूचना पर संदेह करते हैं, तब "आवाज़ को पता है" जैसी स्थापना हमें एक बुनियादी 'भरोसे' की ओर ले जाती है। यह पाठ अंततः यह प्रतिपादित करता है कि सत्यातीत समय चाहे जितना भी प्रभावी हो जाए, वह मनुष्य की उस मौलिक आवाज़ को नहीं छीन सकता जो उसकी आँखों, उसके स्पर्श और उसके सरोकारों से उपजती है। यह कविता शब्दों के खोए हुए गौरव को वापस दिलाने का एक संकल्प है, जहाँ आवाज़ केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य की अंतिम शरणस्थली बन जाती है। इस प्रकार, यह रचना समकालीन समय के झूठ के विरुद्ध एक मर्मभेदी मानवीय गवाही है।

इस कविता के एक अंश पर थोड़ा ठहर कर विचार करें-


मेरे ऊपर उस स्त्री का बोझ है

जो जीवन भर रोती रही

पर चुका नहीं उसका दुख 


कविता में जब प्रोटागोनिस्ट कहता है, "मेरे ऊपर उस स्त्री का बोझ है", तो यहाँ 'बोझ' शब्द की समाजशास्त्रीय और दार्शनिक गहराई के मद्देनज़र उसका अर्थ नकारात्मक 'भार' नहीं, बल्कि एक 'नैतिक ऋण' (Ethical Debt) है। यह बोझ उस पुरुष की चेतना पर है जो यह देख रहा है कि उसके साथ जीवन बिताने वाली स्त्री (पत्नी) ने व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपने सुखों की बलि दे दी। "पर चुका नहीं उसका दुख" - यह पंक्ति इस विडंबना को उजागर करती है कि एक पुरुष अपनी पत्नी के प्रति चाहे कितना भी समर्पित क्यों न हो जाए, वह उस 'पितृसत्तात्मक व्यवस्था' और 'पारिवारिक ढाँचे' द्वारा दिए गए सामूहिक दुखों की भरपाई अकेले नहीं कर सकता। संयुक्त परिवार में अक्सर स्त्री ही वह धुरी होती है जो सबके दुखों को सोखती है, लेकिन उसका अपना दुख एक 'अनंत शेष' की तरह बचा रह जाता है। पुरुष यहाँ उस व्यवस्था के प्रतिनिधि के रूप में खुद को 'दोषी' महसूस कर रहा है। "जो जीवन भर रोती रही" - यह रोना केवल आँखों से बहता पानी नहीं है। यह उस 'अदृश्य श्रम' और 'भावनात्मक दमन' का प्रतीक है जिसे समाज अक्सर 'त्याग' या 'ममता' का नाम दे कर महिमामंडित कर देता है। कवि यहाँ इस महिमामंडन को नकार कर उसे सीधे 'दुख' कह रहा है। एक जिम्मेदार पुरुष के रूप में वह यह महसूस करता है कि इस स्त्री ने जो खोया, उसकी कीमत वह कभी नहीं चुका पाया। यह अहसास उसे एक 'सांस्कृतिक और पारिवारिक बोझ' की तरह दबाए हुए है।

यहाँ एक जिम्मेदार पुरुष का विवेक जागृत है। वह देख रहा है कि स्त्री ने जो निवेश (इन्वेस्ट) किया, उसके बदले उसे वह गरिमा और सुख नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। वह खुद को इस कर्ज से मुक्त करना चाहता है। बावजूद इसके, यह केवल 'संयुक्त परिवार के बोझ' से मुक्ति की पेशकश नहीं है, बल्कि यह उस 'पुरुषवादी ढांचे' से मुक्ति की तड़प है जिसमें स्त्री का दुख कभी खत्म ही नहीं होने दिया जाता। यह एक व्यक्तिगत आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) है कि जिस व्यवस्था का वह हिस्सा है, उसने उस स्त्री के साथ न्याय नहीं किया। कविता की ये पंक्तियाँ वस्तुत: एक जागरुक इंसान के 'प्रायश्चित' की पंक्तियाँ हैं। वह उस स्त्री के प्रति केवल 'पति' नहीं, बल्कि एक 'सह-मानव' के रूप में अपनी हार स्वीकार कर रहा है। वह कहना चाहता है कि मेरे हिस्से की जो सुरक्षा और प्यार उसे मिला, वह उसके उस विराट दुख के सामने बहुत बौना साबित हुआ जो उसने समाज और परिवार की देहरी पर सहा है। वस्तुत: यह कविता उस 'ऐतिहासिक अपराधबोध' (Historical Guilt) की ओर भी इशारा करती है जो हर संवेदनशील पुरुष अपनी सहचर स्त्री के प्रति महसूस करता है।

इस संग्रह की 'पठार में कचनार' कविता एक अत्यंत शक्तिशाली रूपक के माध्यम से जिजीविषा, संघर्ष और सौंदर्य के अंतर्संबंधों को व्याख्यायित करती है। इस कविता का रचनात्मक अभिप्राय उस 'असंभव' को संभव बनाने की मानवीय और प्राकृतिक शक्ति की खोज है, जो सबसे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी खिलने का साहस रखती है। 'पठार' यहाँ जड़ता, कठोरता, अभाव और एक ऐसे रूखे यथार्थ का प्रतीक है जहाँ जीवन की संभावनाएँ क्षीण दिखाई देती हैं। वहीं 'कचनार' उस कोमलता, रंग और सृजन का प्रतिनिधि है जो अपनी जड़ें पत्थर के सीने में गाड़कर भी फूल देने की क्षमता रखता है।

कविता का गहरा अभिप्राय यह है कि सौंदर्य केवल अनुकूल परिस्थितियों की उपज नहीं है; बल्कि सबसे प्रखर सौंदर्य वही है जो 'पठार' जैसे कठिन समय और समाज में जन्म लेता है। कवि यहाँ कचनार के माध्यम से उन संघर्षशील मनुष्यों की ओर संकेत करता है जो अभावों के 'पठार' में रह कर भी अपनी मानवीय गरिमा और संवेदनशीलता को बचाए हुए हैं। रचनात्मक स्तर पर यह कविता 'द्वैत' (Duality) का सृजन करती है—एक ओर पत्थर की निष्ठुरता है और दूसरी ओर कचनार की लाली और कोमलता। यह विरोधाभास ही जीवन की वास्तविक ऊर्जा है।

कविता के मूल पाठ की गहन संरचना में गोताखोरी करने पर यह स्पष्ट होता है कि कचनार का खिलना केवल एक वनस्पति जगत की घटना नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक विस्फोट' है। जब सब कुछ धूसर और मटमैला हो, तब कचनार का गुलाबी या बैंगनी रंग एक 'प्रतिरोध' की तरह उभरता है। कवि यह प्रतिपादित करना चाहता है कि रचनाकार या क्रांतिकारी का स्वभाव भी कचनार जैसा होना चाहिए—जो व्यवस्था की कठोरता (पठार) को स्वीकार तो करता है, लेकिन उसके सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय उसे अपनी सुंदरता से चुनौती देता है। पठार का मौन और कचनार का मुखर सौंदर्य मिलकर एक ऐसा संतुलन बनाते हैं जहाँ जीवन अपनी संपूर्णता में प्रकट होता है।

'पठार में कचनार' कविता एक व्यापक आश्वासन है। यह हमें संदेश देती है कि स्मृतियों, प्रेम और सृजन के फूल किसी भी 'बंजर' कालखंड में खिल सकते हैं। कविता का रचनात्मक स्वर यहाँ एक दार्शनिक ऊँचाई प्राप्त कर लेता है, जहाँ 'पठार' दुःख की शाश्वतता है और 'कचनार' उस दुःख के बीच मिलने वाला वह क्षणिक लेकिन पूर्ण आनंद, जो जीने का अर्थ प्रदान करता है। केशव तिवारी ने इस छोटी सी कविता में प्रकृति के माध्यम से यह संदेश दिया है कि कठोरतम यथार्थ भी उस कोमल सत्य को नहीं दबा सकता जो अपनी मिट्टी और अपनी पहचान के प्रति ईमानदार है। इस प्रकार, यह पाठ अपनी सादगी में एक विराट जीवंतता का घोषणापत्र बन जाता है।

इस संग्रह की 'कालिंजर' कविता इतिहास के खंडहरों के बीच से वर्तमान की धड़कनें सुनने का एक गंभीर प्रयास है। इस कविता का इतिहास-बोध केवल अतीत के गौरवगान या राजाओं की वंशावली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समय की उस निष्ठुर गति का विश्लेषण करता है जो पत्थर की दीवारों में कैद होकर रह गई है। सूक्ष्म पठन की दृष्टि से, कालिंजर यहाँ केवल एक अभेद्य दुर्ग नहीं है, बल्कि वह मानवीय महत्त्वाकांक्षा, सत्ता के उत्थान-पतन और 'काल' (Time) के अजेय होने का एक मूर्त रूपक है। कवि जब इस दुर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ता है, तो वह केवल पत्थर नहीं छूता, बल्कि उन हजारों वर्षों की खामोशी को स्पर्श करता है जिसने चन्देलों से ले कर मुगलों और अंग्रेजों तक के पदचाप सुने हैं।

कविता में इतिहास-बोध 'काल' और 'अकाल' के द्वंद्व पर आधारित है। कालिंजर का अर्थ ही है 'काल को जर्जर कर देने वाला', लेकिन कवि यहाँ एक सूक्ष्म विरोधाभास दिखाता है। वह पाता है कि काल को जीतने का दावा करने वाला दुर्ग स्वयं समय की मार से जर्जर है। यहाँ 'नीलकंठ महादेव' का बिम्ब अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शिव का विषपान और कालिंजर का यह स्थान, कविता को एक मिथकीय और ऐतिहासिक गहराई प्रदान करता है। कवि यह प्रश्न उठाता है कि जिस नीलकंठ ने विष पी कर सृष्टि बचाई, क्या वह इस दुर्ग के ऐतिहासिक रक्तपात और हिंसा को भी पी सका? यह इतिहास की उस कड़वाहट की ओर संकेत है जो युद्धों और विजय-अभियानों के पीछे छिपी होती है।

कविता के विस्तार में 'मूर्तियों' और 'शिलालेखों' का जिक्र केवल पुरातात्विक रुचि नहीं है, बल्कि वह उन गुमनाम शिल्पकारों और श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश है जिनका नाम इतिहास की मुख्यधारा में दर्ज नहीं है। 'कालिंजर' का गहराई से पाठ यह उद्घाटित करता है कि सत्ताएँ बदलती रहती हैं, लेकिन पत्थर पर उकेरी गई पीड़ा और सौंदर्य स्थायी हो जाते हैं। कवि की दृष्टि यहाँ 'हेगेलियन' इतिहास-बोध के करीब दिखती है, जहाँ द्वंद्वात्मकता के माध्यम से चेतना का विकास होता है, किंतु साथ ही वह 'वाल्टर बेंजामिन' के उस विचार को भी पुष्ट करती है कि "इतिहास हमेशा विजेताओं द्वारा लिखा जाता है।" केशव तिवारी इस कविता में उन दरारों की बात करते हैं जहाँ पराजितों की स्मृतियाँ शरण लेती हैं।

कविता का अंतिम हिस्सा वर्तमान और अतीत के बीच एक 'सेतु' बनाता है। दुर्ग के ऊँचे बुर्जों से जब कवि नीचे की दुनिया को देखता है, तो उसे 'इतिहास' एक ठहरी हुई झील की तरह नहीं, बल्कि एक बहती हुई नदी की तरह महसूस होता है। कालिंजर का पथरीला यथार्थ और उसके नीचे बहती छोटी-छोटी नदियाँ—यह दृश्यबोध यह स्पष्ट करता है कि सत्ता के प्रतीक (दुर्ग) भले ही ढह जाएँ, लेकिन जीवन (नदी/लोक) निरंतर प्रवाहित रहता है। अंततः, यह कविता इतिहास को एक 'संग्रहालय' की वस्तु मानने के बजाय उसे एक 'जीवंत चेतावनी' की तरह प्रस्तुत करती है। केशव तिवारी ने कालिंजर के माध्यम से यह रचनात्मक अभिप्राय सिद्ध किया है कि मनुष्य की श्रेष्ठता दुर्ग बनाने में नहीं, बल्कि समय की क्रूरता के बीच अपनी करुणा और सृजनशीलता को बचाए रखने में है। इस प्रकार, यह पाठ इतिहास, मिथक और वर्तमान की चिंताओं का एक सघन कोलाज बन जाता है।

‘कालिंजर’ कविता के अलावा कवि केशव तिवारी की 'कालिंजर’ विषयक  कविता शृंखला इतिहास के एक जड़ स्मारक को प्रकृति की परिवर्तनशील गतियों के साथ जोड़कर उसे एक 'जैविक इकाई' के रूप में प्रस्तुत करती है। 'जेठ में कालिंजर' कविता दुर्ग की उस कठोरता और अजेयता का चित्रण करती है जो तपन और लू के बीच निखरती है। यहाँ जेठ केवल एक मौसम नहीं, बल्कि उन युद्धों और रक्तपात की ऊष्मा का प्रतीक है जिसे इस दुर्ग ने सदियों तक सहा है। पत्थर का दहकना यहाँ इतिहास की प्रखरता और सत्ता के संघर्ष की याद दिलाता है, जहाँ सब कुछ झुलस जाने के बावजूद दुर्ग का 'अहं' अडिग खड़ा रहता है।

'आसाढ़ में कालिंजर' कविता में पाठक एक संवेदनात्मक परिवर्तन महसूस करता है। यहाँ पत्थर की निष्ठुरता पर जब वर्षा की पहली बूंदें पड़ती हैं, तो वह 'नीलकंठ महादेव' के अभिषेक की तरह प्रतीत होता है। आसाढ़ में कालिंजर अपनी ऐतिहासिक कठोरता को त्याग कर एक 'सृजनात्मक तरलता' ग्रहण करता है। दुर्ग की दरारों में उगती घास और सोंधी मिट्टी की गंध यह दर्शाती है कि प्रकृति किस प्रकार इतिहास के घावों पर मरहम लगाती है। यह कविता विनाश के बीच 'पुनर्निर्माण' और 'जिजीविषा' का सुंदर बिम्ब प्रस्तुत करती है।

'शिशिर में कालिंजर' का वैशिष्ट्य उसके दार्शनिक एकांत और उदासी (Melancholy) में निहित है। कोहरे की चादर में लिपटा दुर्ग ऐसा लगता है मानो वह अपने ही अतीत की गहरी धुंध में खो गया हो। यहाँ शिशिर का सन्नाटा समय की उस 'शीतलता' का परिचायक है जो बड़े से बड़े साम्राज्य और उनकी महत्वाकांक्षाओं को अंततः शांत कर देती है। यह कविता पाठक को एक 'आत्म-चिंतन' की स्थिति में ले जाती है, जहाँ इतिहास एक ठहरी हुई स्मृति बन जाता है और कोहरे के बीच से झाँकती धूप की कतरनें बीते हुए गौरव के धुंधले अहसास की तरह आती हैं।

'बसंत में कालिंजर' इस श्रृंखला की सबसे जीवंत कड़ी है। यह कविता 'असंभव' के खिलने का उत्सव है। जहाँ कभी तलवारें खनकती थीं और खून बहता था, वहाँ कचनार और पलाश के फूलों का खिलना इतिहास के प्रति एक 'प्राकृतिक विद्रोह' है। बसंत यहाँ दुर्ग के खंडहरों को एक 'नवजीवन' प्रदान करता है। यह कविता सिद्ध करती है कि समय का चक्र भले ही साम्राज्यों को निगल जाए, लेकिन बसंत के रूप में जीवन और सौंदर्य का आगमन अपरिहार्य है। यहाँ कालिंजर केवल एक किला नहीं है।

इन कविताओं को कालिंजर जैसे एक ही विषय पर होने के बावजूद अलग-अलग शीर्षकों के अंतर्गत लिखने का औचित्य अत्यंत गहरा और सैद्धांतिक है। इसका मुख्य कारण 'समय की बहुआयामी प्रकृति' को पकड़ना है। कोई भी ऐतिहासिक स्थल केवल भूगोल का हिस्सा नहीं होता, वह समय के साथ बदलता हुआ एक 'अनुभव' होता है। अलग-अलग शीर्षक देने का औचित्य इस बात में है कि कवि यह दिखाना चाहता था कि इतिहास 'स्थिर' (Static) नहीं है। जेठ का कालिंजर एक 'योद्धा' है, आसाढ़ का कालिंजर एक 'प्रेमी' है, शिशिर का कालिंजर एक 'तपस्वी' है और बसंत का कालिंजर एक 'पुनर्जन्म' है।

यह विभाजन पाठक को 'दृश्य बोध' (Visual Perception) की विविधता प्रदान करता है। यदि इन सबको एक ही शीर्षक में समाहित कर दिया जाता, तो ऋतुओं के साथ बदलने वाले दुर्ग के 'मूड' और 'मनोविज्ञान' के साथ न्याय नहीं हो पाता। केशव तिवारी ने इस वर्गीकरण के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि सत्य कभी एकरेखीय नहीं होता; वह ऋतुओं की तरह बदलता रहता है। कालिंजर पर लिखी गई ये कविताएँ यह सिद्ध करती हैं कि इतिहास को केवल तारीखों और युद्धों से नहीं, बल्कि प्रकृति की उन धड़कनों से भी पढ़ा जाना चाहिए जो हर मौसम में पत्थरों के सीने में नई लय पैदा करती हैं। इस प्रकार, यह शीर्षक-विभाजन ऐतिहासिक यथार्थ और प्राकृतिक परिवर्तन के बीच एक अनिवार्य 'संवाद' स्थापित करने का कलात्मक माध्यम है।


देरिदा 


इस संग्रह की 'विषाद' कविता देरिदा के विखंडनवाद (Deconstruction) के सिद्धांतों को व्यावहारिक धरातल पर उतारने वाला एक उत्कृष्ट पाठ है। देरिदा का मानना था कि किसी भी पाठ का कोई एक स्थिर, केंद्रगामी या 'परम अर्थ' नहीं होता; अर्थ हमेशा स्थगित (Deferred) रहता है। 'विषाद' कविता में 'विषाद' शब्द स्वयं एक स्थिर अर्थ खो देता है। देरिदा के 'लोगोसेंट्रिज्म' (Logocentrism) के विरोध के आलोक में देखें तो यह कविता विषाद को केवल 'दुःख' के विलोम के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी उपस्थिति के रूप में प्रस्तुत करती है जो दुःख और सुख के द्वैत (Binary Opposition) को ही ध्वस्त कर देती है। यहाँ विषाद वह नहीं है जो बाहर से आरोपित है, बल्कि वह है जो भाषा और अस्तित्व के भीतर की 'अनुपस्थिति' से पैदा होता है।

देरिदा के 'डिफरांस' (Différance) के निकष पर, कविता का मूल पाठ यह संकेत देता है कि विषाद का बोध इसलिए है क्योंकि हम किसी ऐसी चीज़ की प्रतीक्षा में हैं जो 'वहाँ' नहीं है। कविता में जो सन्नाटा, जो ठहराव और जो अर्थों की रिक्तता है, वह उस 'अंश' (Trace) की तलाश है जो हर शब्द के पीछे छिपा होता है। जब कवि विषाद का वर्णन करता है, तो वह वास्तव में उन तमाम चीज़ों का वर्णन कर रहा होता है जो 'विषाद नहीं हैं', और इसी प्रक्रिया में विषाद का अपना अर्थ बिखर जाता है। देरिदा के अनुसार, "पाठ के बाहर कुछ भी नहीं है" (Il n'y a pas de hors-texte), और यह कविता इस बात को प्रमाणित करती है कि विषाद कोई बाहरी तत्व नहीं, बल्कि स्वयं जीवन के पाठ की बुनावट में शामिल एक 'डेरिवाइटिव' या विचलन है।

विखंडनवादी दृष्टि से, कविता के केंद्र में स्थित 'मौन' दरअसल एक अत्यंत मुखर भाषिक क्रिया है। कविता यह सिद्ध करती है कि जिस 'पूर्णता' या 'सत्य' की हम तलाश करते हैं, वह हमेशा अधूरा रहता है। विषाद यहाँ उस अधूरेपन की स्वीकृति है। देरिदा ने 'अपोरिया' (Aporia) की बात की है—एक ऐसी स्थिति जहाँ विरोधाभासी तर्क आपस में टकराते हैं और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते। 'विषाद' कविता का मूल पाठ पाठक को इसी 'अपोरिया' में छोड़ देता है, जहाँ दुःख सुख में बदलता नहीं, बल्कि दुःख का अपना अर्थ ही विखंडित हो कर एक व्यापक अस्तित्वगत बेचैनी में फैल जाता है।

वस्तुत: केशव तिवारी की यह रचना विखंडनवाद के इस मंतव्य को पुष्ट करती है कि भाषा कभी भी अनुभव को पूरी तरह 'पकड़' नहीं सकती। 'विषाद' शब्द का प्रयोग करते ही कवि उस अनुभव को सीमित कर देता है, लेकिन कविता के भीतर के बिम्ब उस सीमा को तोड़कर अर्थों की बहुलता (Plurality of meanings) पैदा करते हैं। यह कविता अर्थ के किसी एक केंद्र की स्थापना करने के बजाय, अर्थ के बिखरने और पुनर्गठित होने की प्रक्रिया का उत्सव मनाती है। इस प्रकार, 'विषाद' केवल एक मनोदशा की कविता नहीं रह जाती, बल्कि वह भाषा और यथार्थ के बीच के अस्थिर संबंधों का एक दार्शनिक विखंडन बन जाती है।

केशव तिवारी की 'उत्साह की ऊब' कविता समकालीन मनुष्य की उस मानसिक स्थिति का सूक्ष्म चित्रण है जिसे मनोविश्लेषण शास्त्र में 'इच्छा का संकट' माना जाता है। इस कविता का परीक्षण करते हुए लाकाँ (Jacques Lacan) का यह मंतव्य अत्यंत प्रासंगिक है कि "मनुष्य की इच्छा हमेशा अन्य की इच्छा होती है" (Man's desire is the desire of the Other - The Four Fundamental Concepts of Psychoanalysis, 1973). कविता का शीर्षक ही एक 'विरोधाभास' (Oxymoron) है, जो लाकाँ के 'जुइसों' (Jouissance) के सिद्धांत को पुष्ट करता है—जहाँ अत्यधिक आनंद या उत्साह अंततः एक प्रकार की पीड़ा या रिक्तता (ऊब) में बदल जाता है।


लाकाँ

लाकाँ के अनुसार, हमारे भीतर एक 'असंभव रिक्तता' होती है जिसे हम वस्तुओं या उपलब्धियों से भरने की कोशिश करते हैं। कविता का 'उत्साह' वह 'काल्पनिक' (The Imaginary) क्षेत्र है जहाँ हमें लगता है कि हम पूर्ण हो रहे हैं, लेकिन जैसे ही वह उत्साह चरम पर पहुँचता है, 'यथार्थ' (The Real) की कड़वाहट हमें 'ऊब' की ओर धकेल देती है। लाकाँ का मानना था कि "इच्छा का लक्ष्य पाना नहीं, बल्कि इच्छा करते रहना है" (Desire is a relation of being to lack. This lack is the lack of being properly speaking. It isn't the lack of this or that, but lack of being whereby the being exists - The Seminar of Jacques Lacan, Book II, 1954-1955). कविता के मूल पाठ में यह 'ऊब' दरअसल उस प्राप्ति का परिणाम है जो अंततः मनुष्य को खालीपन का अहसास कराती है।

परवर्ती मनोविश्लेषणवादी विचारक स्लावोज ज़िज़ेक (Slavoj Žižek) के 'सुपर-ईगो' (अधि-अहम) संबंधी मंतव्य के निकष पर देखें तो आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमें "आनंद लेने का आदेश" देती है। ज़िज़ेक कहते हैं कि "आज का सुपर-ईगो कहता है: आनंद लो!" (The contemporary superego enjoins us to enjoy - For They Know Not What They Do: Enjoyment as a Political Factor, 1991). कविता में 'उत्साह' का प्रदर्शन इसी सामाजिक दबाव का हिस्सा है, लेकिन इस 'अनिवार्य आनंद' के पीछे जो थकान है, वही 'ऊब' बन कर उभरती है। कवि यहाँ उस कृत्रिम ऊर्जा को अनावृत करता है जिसे मनुष्य ओढ़े रहता है, जबकि भीतर वह पूरी तरह से 'विखंडित' है।

कविता का सूक्ष्म विश्लेषण यह भी उद्घाटित करता है कि 'उत्साह की ऊब' असल में 'उदासीनता' (Melancholy) का एक आधुनिक रूप है। जूलिया क्रिस्तेवा के अनुसार, "विषादग्रस्त व्यक्ति के लिए भाषा अपनी अर्थवत्ता खो देती है" (For the melancholic, signs no longer have any meaning - Black Sun: Depression and Melancholy, 1989). कविता में शब्दों और उत्साह के बीच जो फासला है, वह इसी अर्थहीनता की गूँज है। जब उत्साह एक 'परफॉरमेंस' (Performance) बन जाए, तो मनुष्य का 'स्व' (Self) उससे अलग हो जाता है और यही अलगाव 'ऊब' का कारण बनता है।

वस्तुत: केशव तिवारी की यह कविता पाठक को उस 'मनोवैज्ञानिक शून्य' के सामने खड़ा करती है जहाँ हर प्राप्ति एक नया अभाव पैदा करती है। कविता यह सिद्ध करती है कि 'ऊब' कोई नकारात्मक भावना नहीं, बल्कि उस 'सत्य' का उद्घाटन है कि बाहरी चमक-धमक हमारे आंतरिक एकांत को नहीं भर सकती। यह पाठ लाकाँ और ज़िज़ेक के उन दार्शनिक मंतव्यों का काव्य-प्रतिरूप है जो हमें चेतावनी देते हैं कि 'इच्छाओं की पूर्ति' ही अक्सर 'इच्छा की मृत्यु' बन जाती है। इस प्रकार, 'उत्साह की ऊब' समकालीन सभ्यता की मनोवैज्ञानिक विसंगतियों का एक गहरा और विस्तृत क्लिनिकल डायग्नोसिस या निदान  बनकर उभरती है।

केशव तिवारी की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता को एक नए गहरे आयाम में ले जाती हैं, जहाँ व्यक्तिगत पीड़ा सामूहिक स्मृति से, प्रकृति का विनाश मानवीय जिजीविषा से और परंपरा की छवियाँ आधुनिक यथार्थ से गुँथ जाती हैं। इनमें न कोई नारेबाजी है, न सस्ता विद्रोह, बल्कि एक शांत, ईमानदार और गहरी नैतिक जागरूकता है जो पाठक को बिना ऊँची आवाज के सोचने और महसूस करने पर विवश कर देती है। ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ संग्रह की कविताएँ साबित करती हैं कि जब नदियाँ सूख रही हों, स्मृतियाँ काँटों में बदल रही हों और सभ्यता मलबे में तब्दील हो रही हो, तब भी कविता का काम यही है कि वह सूखी नदियों में पानी की आवाज, काँटों में फूल की संभावना और मलबों में मानवीय गरिमा की अंतिम चिंगारी को बचाए रखे। यह संग्रह हिंदी कविता में एक सशक्त और संवेदनशील हस्तक्षेप है जो कविता की मूल गरिमा और उसकी नैतिक शक्ति को पुनः स्थापित करता है। 



सन्दर्भ 


बुनियादी पाठ:


तिवारी, केशव, ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा,’ कविता संग्रह, 2024, हिन्दयुग्म प्रकाशन, नोएडा.


अन्य सन्दर्भ ग्रन्थ  :


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‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा,’ केशव तिवारी

कविता संग्रह, 2024,

हिन्दयुग्म प्रकाशन, पेपरबैक, 

मूल्य ₹249, कुल पृष्ठ 157


रवि रंजन 


सम्पर्क:   


प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), 

हिन्दी विभाग, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 

हैदराबाद   


ई मेल : raviranjan@uohyd.ac.in 


मोबाइल : 9000606742



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