मुत्सुमी मियामोतो की कविताएँ, हिन्दी अनुवाद : पंकज मोहन
![]() |
| पंकज मोहन |
आज के समय में जब छल छद्म का आधिक्य है, विद्वता का निर्लज्ज प्रदर्शन है, झूठ ही जीवन पद्धति बनती जा रही है, अविश्वास इतना कि विश्वास कर पाना कठिन है, कहीं तो कोई है जिस पर यकीन किया जा सकता है। कहीं तो कोई है जो चुपचाप बिना किसी अभिलाषा के अपना काम निरन्तर किए जा रहा है। कभी बेहतर लोगों की भरमार रही होगी, लेकिन आज के समय में तो ऐसे लोग अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं। पंकज मोहन ऐसे ही व्यक्ति हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है। जिनसे कुछ सीखा गुना जा सकता है। उनकी सादगी के क्या कहने। कल पंकज जी ने अपने जीवन के सत्तर वर्ष पूरे कर लिए। पहली बार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की विलम्बित बधाई। कुछ दिन पहले उन्होंने जापानी कवयित्री मुत्सुमी मियामोतो की कविताओं का उम्दा अनुवाद किया था। आज हम पंकज जी द्वारा अनुदित कविताओं को उन्हीं की एक टिप्पणी के साथ पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
जापानी कवयित्री मुत्सुमी मियामोतो
1980 के दशक में, जब मैं सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी का छात्र था, मैंने कोरिया की कुछ प्रमुख साहित्यिक रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसी कारण कोरिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में मैं नियमित रूप से भाग लेता था। जापान की प्रसिद्ध कवयित्री मुत्सुमी मियामोतो (宮本 むつみ, जन्म 14 जनवरी 1933) से मेरा प्रथम परिचय 1986 में सेओल एशियन गेम्स के अवसर पर आयोजित एशियाई कवि सम्मेलन में हुआ। 1988 में भी एक साहित्यिक कार्यक्रम में मेरी उनसे मुलाकात हुई। हमारी अंतिम भेंट जुलाई 1990 में सियोल अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन के दौरान हुई, जहाँ हम दोनों ने पूरे दिन साथ-साथ कोरिया के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया। मुत्सुमी मियामोतो समकालीन जापानी काव्य जगत की एक सक्रिय और महत्वपूर्ण स्वर थीं। दैनन्दिन जीवन के कठोर यथार्थ के सूक्ष्म अनुभव, आंतरिक परिदृश्य, स्वप्न, समय और स्मृति के तंतुओं से बुनी हुई अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने एक वैकल्पिक यथार्थ अथवा “एक और समय” की खोज की।
1969 में प्रकाशित अपनी प्रथम काव्य पुस्तक (जिसमें उनकी आरंभिक रचनाएँ संकलित हैं) के उपसंहार में मुत्सुमी ने लिखा था कि कविता लिखते समय उन्हें हमेशा यह महसूस हुआ कि वे समुद्र के किनारे खड़े उस बच्चे की तरह हैं, जो तैरना सीख रहा हो।” उनकी दूसरी कविता पुस्तक “इसुतोरी असोबी” (椅子とり遊び - म्यूजिकल चेयर्स) थी। 1983 में प्रकाशित उनकी काव्य पुस्तक “ओइशी जिकान” (おいしい時間), अर्थात् ‘सुस्वादु समय’, दैनंदिन जीवन के चिंतनशील पलों पर केंद्रित है। “मो हितोत्सु नो जिकान” (もうひとつの時間 - एक और समय) नवंबर 1984 में प्रकाशित हुआ। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में मृत्यु की ओर धीरे-धीरे पांव बढाते अपने कैन्सर-ग्रस्त पति की स्मृति में जो कवितायें उन्होंने लिखीं, उनमें हृदयस्पर्शी सहज संवेदना और संघर्षमय परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर आगे बढने की आंतरिक शक्ति और अदम्य जिजीविषा का अद्भुत समन्वय है।
1990 में मैंने उनसे दो वादे किये। मेरा पहला वादा था कि मैं जापान जाने पर उनसे जरूर मिलूंगा। उन्होने कहा कि उनके बडे भाई ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद जापान की उच्च प्रशासनिक सेवा ज्वायन की, लेकिन बाद मे वे सांसद और शिक्षा राज्यमंत्री बने, इसलिये उनके भाई मेरे आवास और जापान के प्रमुख विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक भ्रमण की व्यवस्था कर देंगे। 1990 के पहले मैं टोक्यो जहां वे रहती थीं, कई बार गया, लेकिन 1990 के बाद मुझे जापान के दूसरे शहरों की यात्रा करने का अवसर मिला, लेकिन समयाभाव के कारण मैं टोक्यो की यात्रा न कर पाया। मेरा दूसरा वादा था कि मै उनकी कुछ रचनाओं को हिन्दी समाज के सामने प्रस्तुत करूंगा। 1991 मे मैंने पटना से निकलने वाली "नई धारा" पत्रिका में उनकी दो कविताओं के अनुवाद प्रकाशित किये। हाल मे उनकी दो और कवितायें मैंने हिन्दी मे अनूदित की। हाल में मालूम हुआ कि 18 नवम्बर 2024 को वे असार संसार से विदा हो गई। यह संक्षिप्त लेख उनकी पवित्र स्मृति की वेदी पर अर्पित मेरी श्रद्धांजलि है।
पंकज मोहन
मुत्सुमी मियामोतो की कविताएँ
हिन्दी अनुवाद : पंकज मोहन
एकान्त रीति
देर रात बीमार आदमी के पास से लौटती हूँ
फिर सफेद दीवार वाले अपने मकान के सफेद दरवाजे को खोल कर
बिस्तर पर सफेद चादर को ओढ़ कर सो जाती हूँ
फिर स्वप्न देखती हूँ कि एक सफेद रास्ते पर दूर, बहुत दूर चली जा रही हूँ
उस असीम, अज्ञात पथ पर लैम्पपोस्ट की धुंधली रोशनी मेरा मार्गदर्शन कर रही है।
घर बहुत फीका दिखता है, बहुत बीरान
जब वह मानव के स्वस्थ, उष्म उसाँसों से स्पन्दित न हो
दीवारें, मेज, छत
सब कुछ नरमाई के अदृश्य केंचुल को छोड़ रुखड़े और सख्त बन जाते हैं।
घर में (हीटर का) ईंधन जलाती हूँ
लपटें धीरे-धीरे साँस लेने लगती हैं
और रुकी हवा में गति आ जाती है,
तब मैं एक रेकार्ड चलाती हूँ।
वही डीलन टॉमस के फर्नहिल का रेकार्ड है
कवि की आवाज में पढ़ी हुई कविता का रेकार्ड--
'टाईम हेल्ड मी ग्रीन ऐण्ड डायिग'
जब हम अपने जीवन के वासन्ती यौवन के क्षण' को जी रहे होते हैं,
ठीक उसी पल समय हमें चुपके से मौत के करीब भी ले जा रहा होता है।
अतीत के हरे-सुनहरे, उन्मुक्त दिन उभर कर कमरे को भर देते हैं
डीलन टॉमस का सप्राण स्वर गूंज उठता है और कमरे में प्राण फूंक देता है।
शय्यात्याग के पूर्व
प्रातः अपनी शय्या पर
हम गत रात के सपनों के बारे में बातें करते हैं
यद्यपि हम दोनों ने मृतक को देखा
वे एक ही आदमी नहीं थे।
सुबह की रोशनी में
जब हमारी पलकें खुलती हैं
जीवित व्यक्तियों की छवि शीघ्र विलीन हो जाती है
किन्तु मृतकों की छवि देर तक रसी-बसी रहती है
हमारी पुतलियों में
जैसे जमीन में पेड़ों को जड़ जमीं रहती है।
न जाने किस देश-जाति की कथा है
उनका विश्वास है कि गहरी नींद में सोये आदमी को अचानक उठाना ठीक नहीं है
क्योंकि सपनों की दुनिया से वापस लौटने के लिए आत्मा को समय चाहिए
और मृतक को अंधकार की दुनिया में लौटने के लिए भी समय की जरूरत है।
घरों में
बहुमंजिली इमारतों में
होटलों में
अस्पतालों में
लोगों को अपनी-अपनी रातें होती हैं।
मैं उन अभेद्य अन्धकारों के बारे में सोचती हूँ जिन्होंने कभी प्रकाश को नहीं जाना
जो सिर्फ पुतलियों के पीछे बसे होते हैं
और जुड़े होते हैं गहराई में गड़ी प्राचीन वीथियों से।
हम दोनों अपनी पलकें बन्द किये लेटे हुए हैं
क्या हमने निविड़ अंधकार में डूबे पथों पर अलग-अलग भ्रमण किया है?
"यह इस वर्ष की सबसे ठंडी सुबह है" दूरदर्शन के उद्घोषक की तेज आवाज चीर देती है
जाड़े की सुबह की बर्फीली हवा को।
प्रलोभित
देर रात मैं खिड़की को धीरे-से बंद कर देती हूँ।
झींगुरों की आवाज़ें अचानक क्षीण हो जाती हैं,
पर अंधेरा तेज़ी से दबे पांव घुस आया है कमरे में,
और मेज़, पर्दों और लैंपशेड पर फैलते हुए
मुझे घेर लेता है, और प्रतीक्षा करता है मेरे सोने की,
उस समय मैं कपड़े बदल रही होती हूँ
या मैं बाल को कंघी से संवार रही होती हूँ।
बजता है पिआनो-वादन का संगीत “मृत राजकुमारी के लिए पावणे!”
मुझे अदृश्य रात्रि-अतिथियों की फुसफुसाहट सुनाई देती है
उस क्षण अनगिनत सम्मोहक हाथ मेरी ओर बढ़ आते हैं
और मैं अंधेरे में लेटी हुई एक राजकुमारी बन जाती हूँ।
मंद मंद नृत्य करती हुई परछाइयों से घिरी हुई
सोलहवीं सदी की एक राजकुमारी का नरम बिस्तर है।
और कुछ दूरी पर चंदोवा है गर्म रेत का
अन्य राजकुमारी के ऊपर छाया हुआ:
वह ईसा पूर्व के समय से निद्रामग्न है,
उसके बालों में अभी भी लगा हुआ है
पुलक पंखी आभूषण, उसकी सगाई का प्रतीक।
कमरा अदृश्य अतिथियों से खचाखच भरता जा रहा है
जैसे शोकाकुल लोग अपने स्वजन के अंतिम संस्कार के लिए इकट्ठा हुये हों।
जब उनके पैर चुपचाप धीरे-धीरे मंद गति से पावणे नृत्य कर रह होते हैं,
मैं नीचे उतरती जाती हूँ,
एक मृत राजकुमारी के बाद दूसरी का स्थान लेती हुई।
मुझे पानी की आवाज़ सुनाई देती है,
एक झील है जो मृत आत्माओं को इकट्ठा कर रही है।
अचानक मैं महसूस करती हूं कि मेरा गला सूख गया है।
सुबह होती है।
देखती हूं कि किसी अनजाने घर के पास
अजीब-सी बेचैनी में डूबा हुआ
एक कबूतर पानी पी रहा है, तालाब के किनारे झुककर।
आह, कितनी तृप्ति के साथ!
टिकट
तुम अपने मजबूत और गर्म हाथ में मेरा हाथ थाम लेते थे,
"तुम कहीं खो न दो इन्हें"
यह कह कर तुम मेरे हाथ से रेलगाडी का टिकट ले लेते थे
और फिर तुम दोनों टिकटों को अपने हाथ में संभाल कर रख लिया करते थे।
जब कभी हम साथ यात्रा करते थे, तो तुम यही करते थे।
तुम्हारे हाथ तेज-तर्रार न थे, लेकिन उनमे उत्साह और आनन्द लबालब भरे थे
मेरा बहुत ख्याल रखा उन हाथों ने।
लेकिन पता नहीं कब एक असाध्य रोग ने तुम्हे घेर लिया
और तुम्हारे उष्मावान और सशक्त शरीर को धीरे-धीरे गला कर
घुन-खाये पतले शहतीर में बदल दिया।
तुम्हारे पैर अशक्त हो गये और तुम लंगड़ा कर चलने लगे
मैं हमेशा तुम्हारे साथ होती थी
हम संभल-संभल कर, आहिस्ते-आहिस्ते चलते थे
एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर
जैसा हम वर्षों पहले करते थे।
एक दिन सहसा
तुम्हारी उंगलियां जो पतली और ठंडी हो गयी थीं, को छू कर मुझे अजीब-सा अनुभव हुआ
मुझे घबराहट और बेचैनी भी हुई
मुझे लगा
हम दोनो के अस्तित्व के भी दो टिकट हैं
और तुमने दोनो टिकटों को अपनी हथेली में कस कर दबा रखा है।
दूसरे दिन सूर्योदय के समय
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव से मुक्त हो कर
जब तुम अकेले आकाशगंगा एक्सप्रेस को पकडने दौड़े
मुझे ज्ञात था कि सुदूर आसमान मे कहीं
किसी स्टेशन पर एक टिकट आरक्षित था
वह आरक्षण था मेरे नए जीवन के लिये
मुझे प्रतीक्षा है उस दिन का
जब मेरी नवजीवन-यात्रा का आरम्भ होगा
और हम फिर मिलेंगे।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें