शिवकुमार मिश्र का आलेख 'मिट्टी से जुड़ी कवि-संवेदना'
हमारे चारों तरफ लोक जीवन अपने अंदाज में जी रहा होता है। इस जीवन में अथाह पीड़ा, असमाप्य संघर्ष है लेकिन लोक की अदम्य जिजीविषा इस पीड़ा और संघर्ष को कभी मुखर नहीं होने देती। यह अलग बात है कि विकास की होड़ में दिन प्रतिदिन हम लोक से कटते जा रहे हैं। केशव तिवारी सही मायनों में लोक के कवि हैं। उन्होंने न केवल उसे देखा है बल्कि जिया भी है। इसीलिए उनकी कविताओं में यह लोक अपने चटख अंदाज में दिखाई पड़ता है। चर्चित आलोचक जीवन सिंह के सम्पादन में एक किताब आई है 'साँसों को पढ़ता कवि'। इस किताब में कुल 23 लेखकों के आलेख संकलित किए गए हैं। ये आलोचक तीन पीढ़ियों के हैं। इनमें एक तरफ जहां शिव कुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ आलोचक हैं वहीं दूसरी तरफ भरत प्रसाद, अविनाश मिश्र और सन्तोष अर्श जैसे युवा आलोचक भी हैं। केशव की कविताई पर यह किताब एक मुकम्मल पड़ताल है। बानगी के तौर पर हम शिव कुमार मिश्र का आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन्होंने केशव तिवारी के पहले कविता संग्रह पर लिखा था। शीघ्र ही इस किताब से एक और आलेख हम प्रकाशित करेंगे जो कवि के इधर की कविताओं पर आज की पीढ़ी के आलोचक का होगा। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिव कुमार मिश्र का आलेख 'मिट्टी से जुड़ी कवि संवेदना'।
आलेख
'मिट्टी से जुड़ी कवि-संवेदना'
शिवकुमार मिश्र
समकालीन कविता का एक अच्छा खासा-हिस्सा जब अनुभव संवेदनों के बजाय कोरे विचार के स्तर पर या फिर महज कथन-भंगिमाओं के नाते कविता के रूप में जाना-पहचाना जा रहा हो, अपनी मिट्टी से जुड़ी, लोकजीवन में रची-बसी किसी कविता से रूबरू होना कितना सुखद और प्रीतिकर अनुभव हो सकता है, समकालीन काव्य परिदृश्य में एक अजाने कवि 'केशव तिवारी' की कविता इसका साक्ष्य है। केशव तिवारी ने ठीक ही अपने संकलन को 'इस मिट्टी से बना' नाम दिया है। सचमुच, कविता के नाम पर जो कुछ भी इस संकलन में है, लगभग सारा-का-सारा उस मिट्टी की ही देन है, जो कवि के पोर-पोर में रची-बसी है।
आधुनिक भाव बोध के पैरोकारों की निगाह में भले ही यह केशव तिवारी के कवि की सीमा हो, मेरी दृष्टि में केशव के कवि की यह वह दुर्लभ पूँजी है, जो उसी को नसीब होती है जिसने सही मायने में लोक को जाना-पहचाना हो, उसे उसके पूरेपन में जिया हो। केशव तिवारी की कवि-संवेदना में वस्तुतः लोक से ऊपर कुछ भी नहीं है। यदि अपवाद रूप में कुछ है भी, तो वह भी लोकचेतना के प्रशस्त सरोकारों से ही संवेदित है। लोकजीवन से पाये और अर्जित किये गये अनुभव संवेदन ही कवि की संवेदना से छन कर कविता के रूप में हमारे सामने आये हैं। आज के समय में, जब सभ्यता पर रोज-ब-रोज चढ़ते नये-नये आवरण स्मृति के रूप में भी लोक को लील लेने पर आमादा हों, लोक हमारे जीवन और अनुभवों से, तेजी से गायब होता जा रहा है, समझा जा सकता है कि बाँदा जनपद का यह कवि अपनी संवेदना में कितनी शिद्दत से लोक की इस दुर्लभ पूँजी को बनाये और बचाये हुए है।
कथ्य और कथन-भंगिमाओं के आभिजात्य से कोसों दूर केशव तिवारी की कविता लोक में रचे-बसे मन की कविता है, जो नितांत सहज और पारदर्शी तो है ही, लोक की एक-एक धड़कन को महसूस करने वाला, अपनी मिट्टी की महक और गमक से आपूर्ण, लोक के हर्षोल्लास और कष्ट-क्लेश को समभाव से ग्रहण करने वाला है। लोक का नर जीवन और नरेतर जो कुछ है, लोक जिनमें अपनी चरितार्थता पाता है. दोनों ही कवि की संवेदना में अपने-अपने ढंग से जीवित हैं-
अबकी बचा रहा गेहूँ
गेरुआ के प्रकोप से बची रही सरसों
माह की मार से खूब हिली सुग्गे
राजा की लाल चोंच गेहूँ के हरे खेतों के बीच।
यह समय है बीच खेत में खड़े हो कर
दूर-दूर तक निहारने का खुरदरी हथेलियों से
टीसती बिवाइयाँ सहलाने का
कुआरियों का बड़ी बूढ़ियों से
किसी पुराने विवाह गीत के मनुहार का
और यह समय है
सुअरों के भी
थूथन उठाने का।
फसल पक कर खलिहानों में पहुँचेगी तो सुअरों के थूथन भी उठेंगे। सहज और अकृत्रिम अभिव्यक्ति है यह। फसल के निरापद खलिहानों तक पहुँचने की आशा से उपजे सुख की, और उन आशंकाओं की भी कि सुअरों के थूथन भी उठेंगे।
दर्शन और विचारों के घटाटोप और रचना-शिल्प के नये-नये प्रयोगों की खातिर सोची हुई कविता और किसी सहज, स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति में क्या फर्क होता है, केशव तिवारी की उपर्युक्त कविता साक्ष्य है, इस फर्क का। विचारों में कविता का बड़प्पन आँकने वालों को भले ही यह सहज अभिव्यक्ति निराश करे, जिनमें धरती के रंग और और कष्ट-क्लेश के संदर्भ क्या और कैसे हैं, केशव तिवारी की कविता उन्हें जरूर आश्वस्त करेगी कि तमाम आपदाओं-विपदाओं के बीच भी लोक जीवित है और जीवित रहेगा।
केशव तिवारी की कविताओं से हो कर गुजरना वस्तुतः लोक से हर्षोल्लास और दुःखदाह के ऐसे ही विविध संदर्भों से हो कर गुजरना है। ये वे लोकजन हैं, उनकी मिट्टी जिनके प्राणों के भीतर तक समाई हुई है, जो उससे अलग हो ही नहीं सकते। आपदाएँ उन्हें उससे अलग होने को मजबूर भी करें, तो भी मिट्टी का वशीकरण खींच लायेगा उन्हें।
अपने पास ई गाँव छोड़ के कहाँ जायेंगे मालिक
ई की माटी मा वसीकरण है
वसीकरण है, मालिक खींच लायेगी हजार कोस से
अब तो यही हमार सरग है यही है हमार नरक।
उन्हें इसी मिट्टी में जीना और मरना है, जो उनके रंध्र-रंध्र में समाई हुई है। जितनी सहज़ और पारदर्शी अभिव्यक्ति है केशव तिवारी की, उतना ही सहज़ पारदर्शी उनका जीवन है, जिनके सुख-दुःख के क्षण उनकी कविताओं में मूर्त हुए हैं। सुख-दुःख इनके जीवन में वैसे ही घुले-मिले हैं जैसे दूध और पानी। दुख-दर्दों की सात पर्तों के भीतर से ये खींच लाते हैं सुख के कुछ क्षण और हर्षोल्लास के इन क्षणों के भीतर से रह-रह कर झाँका करते हैं। इनके कष्ट और क्लेश इस लोकजीवन में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की भागीदारी अधिक सघन और स्थायी है, जिन्हें हर हाल में उसी मिट्टी में जीना और मरना है जिसने उन्हें, जन्म दिया है और जो उससे छिटक कर कहीं जा भी नहीं सकती है। जाहिर है कि संकलन की अनेक कविताएँ, स्त्री जीवन के संदर्भों से जुड़ी कविताएँ हैं जो अपने दुःख और ददाँ में भी गीत बन कर फूटता है.....। 'अगिया बेताल मौसम' की कनकनाती दुपहरिया में गंवई-गाँव के किसी घर से फूटता सम्मिलित नारी-स्वर, ढोलक की थाप के साथ प्रायः ही सुना जा सकता है-
'उन्हें तो बस अवसर की तलाश रहती है
और ये जुर-बटुर कर देने लगती हैं
अपने दुखों को स्वर
ठाढ़ी सिया पछताएँ लवकुश बन मा भए
सिया के दुःख में बोलता है इनका भी दुःख
अपनी ही रची हुई दुनिया में तिरस्कृत
अपने ही जवान होते बेटे से
बात करती थरथराती
ये जहाँ इनके तेज बोलने पर भी पाबंदी है
ये वहीं पर गा रही हैं।'
इस लोकजीवन में कभी-कभार आ जाने वाले भरथरी गायक भी हैं। परंतु
'हमारे अच्छे दिनों की तरह ही ये देर तक टिकते नहीं
पर जितनी देर भी रुकते हैं
झाँक जाते हैं
आत्मा की गहराइयों तक.....
वे टेरते हैं चिकारे पर
रानी पिंगला का दुःख
सब काम छोड़
दीवारों की ओट से चिपक जाती हैं स्त्रियाँ
यह वही समय होता है
जब आप सुन सकते हैं
समूची सृष्टि का विलाप ।'
केशव तिवारी के संकलन में संबंधों पर भी कविताएँ हैं। 'माघ-पूस के कठिन जाड़े में अलाव की आँच की तरह पिता', और 'नीम की गझिन छाया-सी सदानीरा माँ'-जिनकी अब स्मृतियाँ ही हैं और माँ तथा पिता की त्रासद-स्मृतियों की तरह ही लंबे समय तक कचोटने वाली एक और स्मृति भी-
'यह दुःख तो टिकेगा ही दिनों तक
पिता की उदास आँखों में
पत्नी के खामोश चेहरे पर
छाया रहेगा भेड़ियों के डर-सा
बच्चों की चहचहाहट पर...
यह दुख
टहलेगा घर का एक-एक कोना
बजायेगा स्मृतियों की साँकल
एक-एक कर खुलेंगे अतीत के किवाड़
चूल्हे पर चढ़ी खाली बटुई की तरह
धिकने लगेगा सारा घर
खूँटी पर टँगे थे उसके कपड़े भी
जिनमें अभी बाकी है
उसके होने का अहसास।'
अवसाद और दुःख के साथ, और कुछ भी है जो जीवित है, डूबने और मगन होने का अवसर भी देता है, मसलन, नानी-
जाने कब के उजड़ गये कचरी-वन
उड़ गये मुरइला-मुरइली
पर नानी के नकटा और कजरी में आज भी हरियर हैं वन
अब भी बोलती हैं मुरइली बुढ़ाय गयी नानी
गिनते-गिनते
पुन्नवासी अमावस
मनाते-मनाते नाती-नातिनों की खैर...
अबके शिवरात में तुम फिर गाना नानी
भोले बाबा का बियाह और
जुड़ायेंगे हम निरख-निरख तुम्हारा पोपला मुँह।
संबंधों की इसी श्रृंखला में 'गवनहार आजी' भी हैं जो उत्तराधिकार में अपनी बहू को दे गयी हैं अपना गला-
'पूरे गाँव में
आजी जैसी गवनहार नहीं थी'
परंतु माँ और आजी के बीच एक फर्क था
आजी के जो गीतों में था
वह उनके जीवन में भी था
माँ के जो गीतों में था
वह उनके जीवन से धीरे-धीरे छिटक रहा था....
जाँत नहीं रह गये थे पर
जतसार में तुरंत पिसे गेहूँ की महक बनी रही
एक भी रंगरेज नहीं बचे थे
पर केसर रंग धोती रँगाव मोरे राजा
का आग्रह बना रहा
कुएँ कूड़ेदानों में तब्दील हो गये हैं
पर सोने की पगरी
और रेशम और रेशम की डोरी के बिना
एक भी सोहर पूरा नहीं हुआ....
माँ के गीतों को सुन कर लगता था
जैसे कोई तेजी से सरकती गीली रस्सी को
भीगे हाथों से पकड़ने की कोशिश कर रहा है।'
लोकजीवन के खट्टे-मीठे अहसास ही नहीं, उपमा उत्प्रेक्षाएँ भी ठेठ लोक जीवन से गृहीत हैं इन कविताओं में, और उनकी व्यंजकता तथा ताज़गी को वहीं समझ पायेंगे जिन्होंने लोक को जिया हो-
'जैसे सोंधाता है
नयी मँगरी का पानी
दोहनी में पका दूध
भार में भूंजा चना सोंधाता है
मुझे वैसी ही सेंधाती है
तुम्हारी हँसी, बग्गड़.....।
जितना जरूरी है कोठार में
अनाज का बचे रहना
उतनी ही जरूरी है तुम्हारी हँसी, बग्गड़।'
और भी कुछ व्यक्ति-चित्र हैं संकलन में। एक कविता 'केदार' पर है, बाँदा जिनके नाते कविता के नक्शे पर है। बेनी माधव, 'बाँकें', खैराड़ा-जंक्शन का गेट मैन-वे कविताएँ हैं जो देर तक मन में टिकी रहती हैं, जिन्हें बड़ी आत्मीय संवेदना के साथ कविताओं में सजीव किया गया है। गेटमैन की एक झलक देखें-
'आसपास फूले पलाश के बीच
खाकी धूसर वर्दी पहने
सर पर लाल पगड़ी बाँधे
जैसे कोई पलाश का पेड़ ही
चल कर आ गया है .......
सब कुछ ठीक-ठाक गुजर जाने पर
पटरी पर बैठ कर सूँट रहा है बीड़ी
यह बूढ़ा ठिगना
लाल पगड़ी वाला पलाश।'
मिट्टी से जुड़ी केशव की कवि-संवेदना मिट्टी से जुड़ी निष्प्राण चीजों को भी किस तरह सजीव करती है आदमी, उसके श्रम और उसके हुनर की संगति में, संकलन की एक बेहद बेहतरीन कविता 'घड़ा' उसका प्रमाण है-
'अभी कुछ देर पहले ही
वह कचरे और कंकड़ से सना
मिट्टी का लोंदा था
पहली बार मिला है इसे
गति और कौशल का संयोग
उखड़ती साँसों और
बीड़ी।के कसैले धुएँ के बीच
आकार पा रहा है ये
धरती के ही रंग का यह
जब आँवा से पक कर निकलेगा
तब भोर के सूरज से कहेगा
देखो, मेरा रंग
तुम्हारे रंग से कम चटख नहीं है
मुझे बनाने वाला
तुम्हें बनाने वाले से ज्यादा हुनरमंद है
जब पहुँचेगा बाजार
तो टनक-टनक कर देगा
अपने खरे होने का सबूत
ये उनकी तरफ आँख भी नहीं करेगा
जिन्हें नहीं है इसकी जरूरत
और जिन्हें होगी इसकी जरूरत
उनके लिए गला डुबा कर भी
निकाल लायेगा पानी।'
पत्नी से संबंधित कविताएँ उस दाम्पत्य प्रेम को सजीव करती हैं केदार, नागार्जुन, त्रिलोचन की कविताओं में जो सघन हो कर बराबर मूर्त होता रहा है 'चौथ का चाँद' कविता की ये पंक्तियाँ-
'दिन-भर का निर्जला उपवास
घर-भर का टहलबूत
पूरी बखरी में
फिरिहिरी की तरह नाचती तुम
क्लांत चेहरे पर ये
थकी-थकी-सी मुस्कान
जैसे हलकोर दिया गया है
काई लगा जल
दुनिया भर के संकटों से मुझे बचाये रखने का
ये तुम्हारा मासूम प्रयास
एकटक आकाश पर इंतजार में
टिकी आँखें
पर जाने कहाँ बिलम गया है
ये मुआ चौथ का चाँद ।'
ऐसी ही एक कविता है 'दीवट का दिया' पुरुष पक्ष की ओर से-
'मैं तुम्हारी कोठरी के दीवट पर रखा दिया हूँ
तुम मेरे पास आओ
लटियाए बालों को सुलझाओ
पाटी पारो
माथे पर लगाओ
लाल रंग वाली बड़ी टिकुली
माँग भर सेंदुर
एड़ी भर महावर रचाओ और मैं
तुम्हारी मद्धिम रोशनी में झिलमिलाऊँ
जैसे छरहर नीम की छाँह में
झिलमिलाता है चाँद।'
लोक पर संकट है परंतु बाजार अभी गाँव की हाट पर हावी नहीं हो सका है। लोक जिंदा है अपनी अंतर्निहित ऊर्जा के बल पर और जिंदा रहेगा।
अपवाद रूप में कुछ कविताएँ लोकजीवन से इतर लोकचेतना के प्रशस्त संदर्भों पर हैं। कुछ और भी, परंतु जिन सबसे हो कर गुजरना तेजी से क्षरित हो रहे लोक को सज़ीव अपने बीच पाना है। बड़बोलेपन से कतई अलग संकलन की ये कविताएँ तथाकथित आधुनिक-बोध वाले कवियों की रचनाधर्मिता के लिए सचमुच कसौटी हैं।
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| शिव कुमार मिश्र |


कविता के मर्म को उद्घाटित करती एक अनुभूति समृद्ध आलोचक की आलोचना। आलोचना को ऐसा ही होना चाहिए बधाई।
जवाब देंहटाएंये कविताएँ तथाकथित आधुनिक-बोध वाले कवियों की रचनाधर्मिता के लिए सचमुच कसौटी हैं।
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