हितेन्द्र पटेल का आलेख 'सुमित सरकार (1939-2026) का जाना'
![]() |
| सुमित सरकार |
किसी भी समय के इतिहास को समझने में इतिहासकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पढ़ने पढ़ाने के क्रम में हम किन इतिहासकारों की किताबों से हो कर गुजर रहे हैं, यह बात बहुत मायने रखती है। आधुनिक इतिहास को जानने समझने के लिए एक दौर में सुमित सरकार, विपन चन्द्र, सब्यसाची भट्टाचार्य, रजनी पाम दत्त की किताबें आवश्यक होती थीं। बेहतर समझ के लिए आज भी इन किताबों की अपनी भूमिका है। इन सबमें सुमित सरकार की किताब और किताबों से अलग थी। पहली बार पढ़ते हुए यह बोझिल सी लगी। आज इसे महसूस कर रहा हूं क्योंकि हम एक खास किस्म का इतिहास पढ़ने के अभ्यस्त थे जबकि सुमित सरकार एक अलग तरह का इतिहास लिख रहे थे जिसमें राजनीतिक परिस्थितियों को सामाजिक इतिहास के जरिए जानने समझने और विश्लेषण पर जोर था। लीक से अलग हट कर नई बातों से हो कर गुजरते हुए ये दिक्कतें आती हैं। इस बात में कोई संशय नहीं कि सुमित सरकार की Modern India 1885–1947 आज भी एक उम्दा किताब है। उनके पिता सुशोभन सरकार थे जो बीसवीं सदी के बंगाल के असाधारण प्राध्यापक और मार्क्सवादी इतिहासकार थे। पिता का प्रभाव उनके व्यक्तित्व और लेखन पर पड़ना स्वाभाविक ही है। सुमित सरकार के बारे में हितेन्द्र पटेल लिखते हैं 'वे राष्ट्रवाद के विरोधी इतिहासकार नहीं थे। लेकिन वे राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की सुविधा के भीतर रहने वाले इतिहासकार भी नहीं थे। कांग्रेस नेतृत्व की ऐतिहासिक भूमिका स्वीकार करते हुए भी वे यह पूछते रहे कि जनता और नेतृत्व का संबंध वास्तव में कैसा था। जनता केवल किसी नेता की पुकार पर चलने वाला निष्क्रिय समुदाय नहीं थी। उसकी अपनी आकांक्षाएँ, अपने संघर्ष और अपने दबाव थे।' बीते 13 अगस्त 2026 को सुमित सरकार का निधन हो गया। उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हितेन्द्र पटेल का आलेख 'सुमित सरकार (1939-2026) का जाना'।
स्मरण में है आज जीवन
'सुमित सरकार (1939-2026) का जाना'
हितेन्द्र पटेल
13 अगस्त 2026 को सुमित सरकार नहीं रहे। वे 87 वर्ष के थे। आधुनिक भारत का इतिहास पढ़ने-पढ़ाने वाली कम से कम दो-तीन पीढ़ियों के लिए यह केवल एक बड़े इतिहासकार का जाना नहीं है। हमारे इतिहास-बोध का एक हिस्सा उनके जरिए बना था। Modern India 1885–1947 से परिचित हुए बिना आधुनिक भारत का विद्यार्थी होना एक समय लगभग असंभव था। दिल्ली विश्वविद्यालय में उन्होंने 1974 से 2004 तक पढ़ाया और उनके विद्यार्थियों की स्मृतियों में वे असाधारण शिक्षक के रूप में भी उपस्थित हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि एक पीढ़ी के लिए आधुनिक भारत की समझ बनाने में उनकी बड़ी भूमिका है ।
आधुनिक भारत के इतिहासकारों में मैं उन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण लोगों में रखता हूँ। बिपन चंद्र और सुमित सरकार के नाम शायद सबसे ज्यादा लोगों तक पहुँचे। लेकिन अपने हिसाब से इस सूची में मैं सब्यसाची भट्टाचार्य और सर्वपल्ली गोपाल को भी जोड़ता हूँ। चारों बहुत अलग प्रकृति के इतिहासकार थे। इसलिए किसे किससे बड़ा कहा जाए, यह प्रश्न मुझे बहुत उपयोगी नहीं लगता। इतिहासकारों की असली पहचान उनकी प्राथमिकताओं से बनती है—उन्होंने कौन-सा प्रश्न महत्त्वपूर्ण समझा, किस तरह के स्रोत को बोलने दिया और अपने समय की किन बौद्धिक सुविधाओं को स्वीकार करने से इनकार किया।
लोकप्रियता भी यहाँ एक आपेक्षिक शब्द है। सर्वपल्ली गोपाल को कौन सामान्य अर्थ में लोकप्रिय इतिहासकार कहेगा! फिर भी उनकी कुछ पुस्तकों ने आधुनिक भारत को समझने के हमारे तरीके को इतनी गहराई से प्रभावित किया कि मैं उन्हें एक दूसरे अर्थ में लोकप्रिय कहूँगा। सब्यसाची भट्टाचार्य ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में इतिहास को अपेक्षाकृत व्यापक पाठक तक ले जाने की ओर सचेत ध्यान दिया। बंगाल के इतिहास और टैगोर पर उनकी किताबें इस यात्रा का हिस्सा थीं। लेकिन आज बात सुमित सरकार की।
![]() |
| सुशोभन सरकार |
पिता की छाया, पर अपनी राह
सुमित सरकार की कहानी में सबसे पहले सुशोभन सरकार का नाम आना चाहिए। उनके पिता सुशोभन सरकार बीसवीं सदी के बंगाल के असाधारण अध्यापक और मार्क्सवादी इतिहासकार थे। Presidency College में उनकी अध्यापकीय प्रतिष्ठा किंवदंती जैसी थी। बरुन दे ने उन्हें Communist Party of India के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाला व्यक्ति कहा था। वे उस बंगाली वाम बौद्धिक परंपरा के प्रतिनिधि थे जिसमें मार्क्सवाद पार्टी की सदस्यता से कहीं बड़ा बौद्धिक और नैतिक संसार था। (देखें Barun De, “Susobhan Sarkar (1900–1982): A Personal Memoir,” Social Scientist, Vol. 11, No. 2, 1983. दे ने सुशोभन सरकार की CPI के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और उनके बौद्धिक-नैतिक व्यक्तित्व पर विस्तार से लिखा है। )
यह फर्क समझना जरूरी है। बंगाल में ‘लेफ्ट’ का अर्थ कभी केवल CPI(M) नहीं रहा। कम्युनिस्ट बौद्धिक परंपरा CPI(M) के जन्म से बहुत पुरानी थी। बल्कि साहित्य, इतिहास, रंगमंच और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में पुराने CPI संसार ने जिस स्तर के बुद्धिजीवी पैदा किए, उसका इतिहास अलग से लिखा जाना चाहिए। बाद में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे और विशेषकर CPI(M) के लंबे शासन के कारण ‘वाम’ और ‘CPI(M)’ को लगभग समानार्थी समझ लेने की प्रवृत्ति बनी। पर वे कभी एक चीज नहीं थे।
मेरी अपनी पीढ़ी ने इसके कुछ विचित्र परिणाम भी देखे। वाम होना एक तरह की सांस्कृतिक पूँजी हो सकती थी; लेकिन किस वाम परंपरा से आपका रिश्ता था, यह भी कभी-कभी महत्त्वपूर्ण हो जाता था। उस दुनिया को याद करते हुए मन में एक व्यंग्य आता है—आप लेफ्ट के हैं, ठीक है; लेकिन CPI(M) के तो नहीं हैं न? जाइए, सेकेंड रो में बैठिए! इसे फिलहाल एक व्यक्तिगत टिप्पणी की तरह ही रहने देना चाहिए। बंगाल की अकादमिक संस्थाओं, राजनीतिक संरक्षण और बौद्धिक प्रतिष्ठा के पारस्परिक संबंधों का गंभीर इतिहास अभी लिखा जाना बाकी है।
सुमित सरकार इसी संसार से निकले, लेकिन उनका निर्माण केवल पिता की विरासत से नहीं हुआ। वे Presidency College के छात्र रहे, फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम. ए. और पीएच.डी. की। कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ाया, बर्दवान विश्वविद्यालय में भी रहे और अंततः दिल्ली चले गए। 1974 से अगले तीन दशक उनकी मुख्य कर्मभूमि दिल्ली विश्वविद्यालय रही।
यह स्थानांतरण भी शायद सामान्य घटना नहीं था। सुमित सरकार और सब्यसाची भट्टाचार्य—दोनों का बौद्धिक निर्माण कलकत्ता में हुआ, लेकिन राष्ट्रीय स्तर की उनकी बड़ी पहचान दिल्ली से बनी।
भारत में अकादमिक ख्याति का भी अपना भूगोल है। परिवार, संस्थान और महानगरीय अवस्थिति—ये प्रतिभा का स्थान नहीं ले सकते, लेकिन प्रतिभा को दिखाई देने या न दिखाई देने देने में इनकी भूमिका से इनकार करना कठिन है। कुछ अपवाद हमेशा होंगे। राम शरण शर्मा जैसे लोग शायद इसी कारण और भी असाधारण दिखाई देते हैं।
पहले वाले सुमित सरकार
मुझे सबसे अधिक आकर्षित करने वाले सुमित सरकार उनके शुरुआती पंद्रह-बीस वर्षों के सुमित सरकार हैं। 1973 में प्रकाशित The Swadeshi Movement in Bengal, 1903–1908 उनकी पीएच.डी. से निकली पुस्तक थी और आज भी स्वदेशी आंदोलन पर बुनियादी अध्ययनों में गिनी जाती है। इसमें बंगाल के स्वदेशी आंदोलन की बहुत बारीकी से पड़ताल हुई। इसमें वह तरीका दिखाई देता है जो आगे चल कर सुमित सरकार की पहचान बना—राजनीतिक विचार, नेतृत्व, सामाजिक संरचना और जन-भागीदारी को एक साथ पढ़ना। अगला और सबसे बड़ा पड़ाव आया जब उन्होंने Modern India 1885–1947 लिखा । यह 1983 में प्रकाशित हुई, सामान्य ‘टेक्स्ट बुक’ हो कर भी सामान्य टेक्स्ट बुक नहीं बनी। Macmillan ने इसे 1983 में प्रकाशित किया था। वैसी किताब फिर नहीं लिखी गई। इस वाक्य को मैं सोच-समझ कर लिख रहा हूँ।उस किताब में राष्ट्रीय आंदोलन केंद्र में है, लेकिन राष्ट्रवाद को महापुरुषों की कहानी में बदलने से लगातार बचने की कोशिश है। आर्थिक परिवर्तन है, किसान हैं, मजदूर हैं, आदिवासी प्रतिरोध है, सांप्रदायिकता है, औपनिवेशिक राज्य है और कांग्रेस नेतृत्व की सीमाएँ भी हैं। राजनीति अपने सामाजिक शरीर के साथ दिखाई देती है। यही सुमित सरकार मुझे सबसे अधिक आकर्षित करते हैं।
वे राष्ट्रवाद के विरोधी इतिहासकार नहीं थे। लेकिन वे राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की सुविधा के भीतर रहने वाले इतिहासकार भी नहीं थे। कांग्रेस नेतृत्व की ऐतिहासिक भूमिका स्वीकार करते हुए भी वे यह पूछते रहे कि जनता और नेतृत्व का संबंध वास्तव में कैसा था। जनता केवल किसी नेता की पुकार पर चलने वाला निष्क्रिय समुदाय नहीं थी। उसकी अपनी आकांक्षाएँ, अपने संघर्ष और अपने दबाव थे। इसी बिंदु पर उनकी छोटी-सी लेकिन मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक आती है—‘Popular’ Movements and ‘Middle Class’ Leadership in Late Colonial India: Perspectives and Problems of a ‘History from Below’। यह Sakharam Ganesh Deuskar Lectures से बनी और 1983 में K. P. Bagchi से प्रकाशित हुई।( इसे एक ट्रेन यात्रा में 1991 में पढ़ा था और इसका प्रभाव भुलाए नहीं भूलता) आज फिर से इसे पढ़ने की जरूरत है।
यह छोटी पुस्तक एक बड़े प्रश्न से जूझती है—भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में मध्यवर्गीय नेतृत्व और लोकप्रिय आंदोलनों का रिश्ता क्या था? क्या जनता केवल नेतृत्व द्वारा संगठित (Mobilise) की जाती थी? क्या उसकी राजनीति का अपना कोई तर्क था? और यदि था तो राष्ट्रीय आंदोलन की कहानी किसकी कहानी है?
यहाँ सुमित सरकार कांग्रेस-विरोधी हो कर नहीं, बल्कि इतिहासकार हो कर कांग्रेस नेतृत्व को देखते हैं। मुझे लगता है आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास के लिए यहीं कोई ऐसी चाबी थी जिसे हमने बाद में कहीं खो दिया। वह चाबी जो अस्सी के दशक में खो गई। मैं इस बात को थोड़ा जोखिम लेकर कह रहा हूँ।
अस्सी के दशक में भारतीय इतिहास लेखन बहुत समृद्ध हुआ। सामाजिक इतिहास आया। Subaltern Studies आया। स्त्रियों, जाति, श्रमिकों, आदिवासियों, धर्म, संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन के प्रश्न इतिहास के केंद्र में आए। यह सब आवश्यक था। पुराने राजनीतिक इतिहास की सीमाएँ वास्तविक थीं।
सुमित सरकार स्वयं Subaltern Studies के शुरुआती दौर के महत्त्वपूर्ण इतिहासकारों में थे। Subaltern Studies III में 1984 में प्रकाशित उनका प्रसिद्ध निबंध “The Conditions and Nature of Subaltern Militancy : Bengal from Swadeshi to Non-Co-operation, c. 1905–22” इसी दौर का है। लेकिन समस्या कहीं और हुई।
पुराना राजनीतिक इतिहास सही अर्थ में बदला नहीं; वह धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। इसे मैं तब बेहतर समझ सका जब मैं 1919 से 1921 के बीच आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ’ लिख रहा था। एक तरफ पुरानी शैली का राजनीतिक इतिहास बचा जिसमें नेता, पार्टी, अधिवेशन, प्रस्ताव, चुनाव और संवैधानिक घटनाएँ थीं। दूसरी तरफ शानदार सामाजिक इतिहास विकसित हुआ जिसने उन तमाम संसारों को खोला जिन्हें पुराने राजनीतिक इतिहास ने अनदेखा किया था। बीच की जमीन कुछ खाली हो गई। मेरे हिसाब से इसे ही भरने के लिए हमें साहित्य या अन्य स्रोतों की शरण में जाने की जरूरत है ।
वह जमीन जहाँ राजनीति को समाज से जोड़ कर पढ़ा जाता; जहाँ कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी या किसी अन्य राजनीतिक संगठन को केवल नेतृत्व के इतिहास के रूप में नहीं बल्कि समाज के अलग-अलग हिस्सों से उसके जटिल संबंधों के भीतर देखा जाता; जहाँ Popular initiative और Elite leadership दोनों साथ दिखाई देते। युवा सुमित सरकार उस बीच की जमीन पर खड़े थे। इसीलिए कभी-कभी मुझे लगता है—अस्सी के दशक में वह चाबी कहीं गुम हो गई जिससे आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास की कई गुत्थियाँ सुलझ सकती थीं। पूरी तरह नहीं। लेकिन बहुत हद तक।
दूसरे सुमित सरकार
इसके बाद एक दूसरे सुमित सरकार धीरे-धीरे सामने आते हैं। यह कहना गलत होगा कि पहले सुमित सरकार समाप्त हो गए। किसी बड़े इतिहासकार की बौद्धिक यात्रा इतनी यांत्रिक नहीं होती। लेकिन उनकी प्राथमिकताएँ जरूर बदलती हैं। सामाजिक इतिहास, संस्कृति, धर्म, सामुदायिक पहचान, gender और historiography के प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं।
Writing Social History इस परिवर्तन का एक बड़ा पड़ाव है। पुस्तक के आठ निबंध late-colonial India के ठोस ऐतिहासिक अध्ययनों को इतिहास लेखन के व्यापक विवादों से जोड़ते हैं। Oxford University Press ने इसे 1997 में प्रकाशित किया।
इस यात्रा का एक और रोचक पक्ष था। जिस Subaltern Studies से वे आरंभिक दौर में गहराई से जुड़े थे, बाद में उसी की दिशा के वे सबसे तीखे आलोचकों में हो गए। “The Decline of the Subaltern in Subaltern Studies” केवल किसी पुराने सहयोगी की नाराजगी नहीं थी। उसमें इतिहास में material relations, सामाजिक संरचना, वर्ग और अनुभव की ठोस दुनिया के लुप्त होते जाने को लेकर बेचैनी थी।
2002 की Beyond Nationalist Frames : Postmodernism, Hindu Fundamentalism, History में उनकी चिंता और विस्तृत हो चुकी थी—postmodernism की कुछ प्रवृत्तियों और हिन्दुत्ववादी इतिहास-बोध के बीच बिल्कुल समानता स्थापित किए बिना वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि Enlightenment, secularism या सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की हर आलोचना राजनीतिक रूप से निष्पाप नहीं होती। पुस्तक 2002 में प्रकाशित हुई।
इन बाद के सुमित सरकार के प्रति मेरे मन में बहुत आदर है। लेकिन वैसा लगाव नहीं है जैसा युवा सुमित सरकार से है। यह शायद मेरी अपनी सीमा है।
मेरी दिलचस्पी उस इतिहासकार में अधिक है जो राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीति के भीतर लोकप्रिय राजनीति के स्वायत्त स्वर को खोज रहा था; जो नेतृत्व की आलोचना करते हुए भी राजनीति को छोड़ नहीं रहा था; और जो यह समझने की कोशिश कर रहा था कि राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक शक्तियाँ एक-दूसरे को कैसे बनाती हैं।
![]() |
| बिपन चन्द्र |
बिपन चंद्र से अंतर
यहीं बिपन चंद्र और सुमित सरकार का फर्क मेरे लिए दिलचस्प हो जाता है। दोनों मार्क्सवादी बौद्धिक संसार से निकले। दोनों के लिए औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, साम्राज्यवाद और राष्ट्रीय आंदोलन केंद्रीय विषय थे। दोनों ने आधुनिक भारत की पूरी पीढ़ियों को पढ़ाया। लेकिन राष्ट्रवाद के प्रति उनका बौद्धिक तापमान अलग था। बिपन चंद्र की परियोजना का केंद्रीय आग्रह भारतीय राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक वैधता, उसके Anti-colonial character और उसकी व्यापक उपलब्धि को समझना था। सुमित सरकार की निगाह बार-बार उसकी भीतरी दरारों, सामाजिक सीमाओं और नेतृत्व-जन संबंधों पर जाती थी। एक अर्थ में दोनों को साथ पढ़े बिना हम भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को पूरा नहीं समझ सकते। एक राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक शक्ति बताता है; दूसरा उसकी आंतरिक बेचैनी सुनाता है। इस फर्क को किसी एक को ‘सही’ और दूसरे को ‘गलत’ कह कर खत्म नहीं करना चाहिए। यही इतिहास लेखन की सुंदरता है।
बंगाल, दिल्ली और अकादमिक सत्ता
यहाँ मैं फिर अपने पुराने भटकाव की ओर लौटना चाहता हूँ। हम इतिहासकारों के विचारों पर बहुत लिखते हैं लेकिन इतिहासकार किस संस्थागत दुनिया में काम करता है, उस पर कम लिखते हैं। किस विश्वविद्यालय में नौकरी मिली, किस शहर में रहा, किस बौद्धिक मंडली से जुड़ा, किस पार्टी या विचारधारा से उसकी निकटता मानी गई—इन चीजों का प्रभाव अकादमिक प्रतिष्ठा पर पड़ता है।
सुमित सरकार कलकत्ता से दिल्ली चले गए और दिल्ली में रह कर राष्ट्रीय स्तर के इतिहासकार बने। बरुन दे की यात्रा दूसरी थी। उनके काम का स्तर असाधारण था लेकिन उनका संस्थागत जीवन Presidency–Calcutta University की मुख्यधारा से अलग रहा। वे IIM Calcutta में रहे और बाद में Centre for Studies in Social Sciences, Calcutta के संस्थापक निदेशक बने। इस इतिहास को केवल ‘किसे नौकरी मिली, किसे नहीं मिली’ के सरल फार्मूले में बदलना ठीक नहीं होगा; लेकिन बंगाल की अकादमिक दुनिया की अपनी ring system थी—और शायद अब भी है।
केंद्र, परिधि और परिधि की भी परिधि।
कभी योग्यता आपको केंद्र तक लाती है। कभी नेटवर्क। कभी राजनीति। कभी पारिवारिक और संस्थागत पूँजी। अक्सर इनका कोई मिश्रण। इस पर अलग से लिखना चाहिए। आज नहीं।
और फिर नंदीग्राम
यह कहना भी गलत होगा कि बाद के वर्षों में सुमित सरकार की राजनीतिक संवेदना समाप्त हो गई थी। 2007 का नंदीग्राम इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण है। 14 मार्च 2007 की पुलिस गोलीबारी के बाद सुमित सरकार और तनिका सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से मिला अपना रबींद्र पुरस्कार लौटा दिया और पुरस्कार राशि को नंदीग्राम राहत के लिए देने का निर्णय किया। इस घटना ने मुझे तब बहुत प्रभावित किया था। यह किसी दक्षिणपंथी व्यक्ति का CPI(M) विरोध नहीं था। एक ऐसे इतिहासकार का प्रतिरोध था जिसकी पूरी बौद्धिक निर्मिति वाम परंपरा के भीतर हुई थी। यहीं किसी विचारधारा की वास्तविक नैतिक परीक्षा होती है।
अपने विरोधी की आलोचना करना आसान है। अपने लोगों की सत्ता की आलोचना करना कठिन। सुमित सरकार ने वह किया। शायद यहीं सुशोभन सरकार की विरासत भी किसी गहरे अर्थ में उपस्थित थी—पार्टी से बड़ी बौद्धिक ईमानदारी।
दो सुमित सरकार?
इसलिए “दो सुमित सरकार” कहना अंततः एक सुविधा भर है। एक युवा इतिहासकार—स्वदेशी आंदोलन, राष्ट्रवाद, middle-class leadership, popular initiative और ‘history from below’ की समस्याओं से जूझता हुआ। दूसरा—social history, culture, religion, gender, historiography, postmodernism और हिन्दुत्व की राजनीति से मुठभेड़ करता हुआ। दोनों के बीच कोई दीवार नहीं है।
बल्कि शायद एक प्रश्न दोनों को जोड़ता है—सत्ता के बड़े आख्यानों के भीतर मनुष्य की वास्तविक सामाजिक दुनिया कहाँ है? युवा सुमित सरकार यह प्रश्न राष्ट्रवादी नेतृत्व से पूछते थे। बाद के सुमित सरकार यही प्रश्न इतिहास लेखन की नई रूढ़ियों और नई राजनीति से पूछते रहे। मेरी अपनी पसंद फिर भी पहले सुमित सरकार की ओर अधिक है। क्योंकि मुझे आज भी लगता है कि आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास को फिर से जीवित करने के लिए हमें उस शुरुआती सुमित सरकार के पास लौटना होगा।
राजनीतिक इतिहास का अर्थ प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और चुनावों का वृत्तांत नहीं है। राजनीति उस जगह पैदा होती है जहाँ समाज सत्ता से मिलता है। किसान नेता की भाषा को कैसे समझता है, मजदूर राष्ट्रवाद को अपनी रोजमर्रा की दुनिया में कैसे अनुवाद करता है, मध्य वर्ग जनता को mobilise करते हुए उससे क्या सीखता और क्या छिपाता है, जाति राजनीतिक संगठन को कैसे बदलती है, समुदाय राष्ट्र की भाषा को किस तरह ग्रहण करता है—ये सभी राजनीतिक इतिहास के प्रश्न हैं।
सुमित सरकार के शुरुआती काम में इस इतिहास की संभावना थी। इसीलिए उनकी मृत्यु पर मुझे उनकी उपलब्धियों की सूची बनाने की इच्छा नहीं हो रही। एक खोई हुई संभावना याद आ रही है। एक चाबी। शायद हमने उसे बहुत जल्दी रख कर भूल जाने दिया।
और चलते-चलते एक और बात। सुमित सरकार और सब्यसाची भट्टाचार्य दोनों कलकत्ता से दिल्ली गए थे। सब्यसाची बाद में कोलकाता लौट आए। क्यों लौटे? उसकी कहानी भी कभी लिखनी चाहिए। अभी सुमित सरकार को याद करना ठीक है। विशेषकर पहले वाले सुमित सरकार को।




टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें