नीरज सिंह की कहानी 'दूसरा आदम'
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| नीरज सिंह |
लोकतन्त्र की रीढ़ होते हैं चुनाव और इस चुनाव में जनता के एक एक वोट का महत्व होता है। हमारे देश में जाति पांति की व्यवस्था इस चुनाव पर भारी पड़ती रही है। गाँव के रसूखदार लोग तमाम तरह के भय दिखा कर कमजोर लोगों को वोट डालने से रोक दिया करते थे। चुनाव सम्पन्न हो जाता और लोकतन्त्र अपने अंदाजा में चलता रहता। आजकल ई वी एम का जमाना है। ई वी एम का अपना अलग गुणा भाग है। फूल प्रूफ दिखने वाली व्यवस्था पर भी तमाम सवाल उठाये जाते रहे हैं। नीरज सिंह सातवें आठवें दशक के प्रमुख कहानीकार रहे हैं। अपनी कहानी 'दूसरा आदम' में वे बड़ी बारीकी से इन चुनावों की हकीकत बता देते हैं। कहानी की ये पंक्तियाँ पढ़िए "भिखारी सिंह चीख उठता है-ठेंगा लिखा है तुम्हारे संविधान में। गोली मारो इस संविधान को मास्टर..। यह संविधान हिजड़ा है, नपुंसक संविधान है। आज ही गये थे न हम लोग बी० डी० ओ० के पास यह कहने कि वोट के दिन जबरदस्ती की जायेगी बाबुओं द्वारा। जवाब तो तुमने सुना था न बी० डी० ओ० का कि वह कुछ नहीं कर सकता। अगर वोट के दिन मारपीट होती है तो उसकी रोकथाम पुलिस करेगी। लेकिन अब तो मारपीट होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। अब तो पैसे की मार से ही तुम्हारे लोग अधमरे हो गये हैं मास्टर। अब उनमें उठने की शक्ति ही कहां है? कहते हो कि देश में कोई कमजोर नहीं, सब बराबर हैं। यह है प्रजातन्त्र? अगर सचमुच यही है तब तो यह सौ बार थूकने की चीज है।" आज भी कमोबेश स्थिति वही है। ये चुनाव इतने महंगे होते हैं कि सामान्य व्यक्ति चुनाव लड़ने के बारे में सोच तक नहीं सकता। और अगर एक बार सोच भी लिया तो उसकी राह इतनी आसान नहीं होती। पर्चा ख़ारिज कराने से ले कर तमाम अफवाहों का सामना कर पाना, मतदाताओं को पैसा, शराब और तरह तरह के उपहार बांटना सामान्य उम्मीदवारों के लिए संभव ही नहीं है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'दूसरा आदम'।
कहानी
'दूसरा आदम'
नीरज सिंह
इस बार गांव का मुखिया कौन हो रहा है भिखारी सिंह?
मुझे क्या मालूम। और अगर मालूम हो भी तो फिर मुझे उससे क्या लेना-देना?
क्यों? जगदीश मास्टर के स्वर में आश्चर्य का पुट है।
क्यों क्या, मुझे कौन मुखिया होना है मास्टर। बेरुखी से कहता है भिखारी सिंह बिल्कुल उदासीन स्वर में।
जगदीश मास्टर का उद्देश्य भिखारी को उदास करना नहीं था। ऐसी बातें तो आये दिन हुआ करती हैं भिखारी के बैठके में। प्रत्येक शाम को, अपनी तीन-चार बीघों की खेती से निपट कर छोटे किसान यहां आते हैं, शहर से कमा कर लौटने वाले मजदूर भी यहाँ आते हैं- चना-चबेना फांकते हुए। बाबुओं के खेतों में काम करने वाले मजदूर यहां आते हैं और यहां आता है जगदीश, गांव के लोअर प्राइमरी स्कूल का मास्टर। बगल में अखबार दबाये। बैठक में कदम रखते ही देश-विदेश की खबरें पटाखों की तरह फट पड़ने लगती हैं उसके मुँह से। आज भी अखबार में उसने पढ़ा था अमुक अमुक गांवों में पंचायत के चुनाव होने वाले हैं। गांवों की सूची में उसके गांव का नाम भी था। इसीलिए आने के साथ ही, आज उसने भिखारी से पूछा था- इस बार गाँव का मुखिया कौन हो रहा है भिखारी सिंह?
मगर भिखारी को विषय से सर्वथा उदासीन पा कर जगदीश मास्टर को आश्चर्य होता है- तुम मुखिया नहीं हो सकते? क्यों?
इस बार हल्के से हँस देता है भिखारी। बिल्कुल फीकी-सी हँसी।
मास्टर के इस आश्चर्यजनक क्यों पर। फिर कहता है - मैं मुखिया इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि मैं गरीब हूँ। मेरे यहां ट्रैक्टर नहीं है। हाथी नहीं है। मेरे यहाँ बैलों की चार जोड़ियां नहीं हैं और मेरे......।
मगर भिखारी की बात पूरी नहीं होने देता है मास्टर। ठहाके लगाने लगता है- बिल्कुल पागलों की तरह। और क्योंकि जगदीश मास्टर हँस रहा है, इसीलिए वहां उपस्थित दूसरे लोग भी हँसने लगते हैं। हँसने की बात पर गौर किए बगैर। लेकिन इस हँसी का अर्थ ढूँढ़ने की चेष्टा करता है भिखारी-आखिर तुम लोग हँसते क्यों हो?
भिखारी को उत्तर देने के लिए मास्टर को चुप होना पड़ता है। उसकी देखा-देखी अन्य लोग भी चुप हो जाते हैं। अब मास्टर कहता है- तुम बात ही ऐसी कह रहे हो। अरे भाई, अब अपने देश में प्रजातन्त्र है और यह प्रजातन्त्र पच्चीस वर्षों से स्थापित है यहां। अब अपने देश में अमीर-गरीब, ठाकुर-चमार, हिन्दू-मुस्लमान, सब एक समान हैं। सबको बराबर अधिकार हैं। इक्कीस बरस की उमर का प्रत्येक आदमी वोट दे सकता है। और इस वोट में बड़ी ताकत है भिखारी सिंह। इसी वोट से अपने देश में कोई कुछ भी बन सकता है। मुखिया, एम० एल० ए०, एम० पी० कुछ भी। समझे?
सब किसी को आश्चर्य होता है मास्टर की बात से। सचमुच अपने देश में ऐसा है क्या? नहीं। झूठ कहता है मास्टर। कहां हैं सबको बराबर अधिकार यहां? उसी दिन, जब गांव में मछली बिकने आई थी तो चमार टोले वाले अपने टोले में ले गये थे। अभी मोल तोल चल ही रहा था कि बाबुओं को इसकी खबर लगी। वे आये और मछली वाले को अपने साथ ले गये। हरखू और मोहर चमार के यहां तो औरतें मसाला तक पीसने लग गई थीं। इसीलिए वे लोग बाबुओं के आगे गिड़गिड़ाये थे। मगर उनकी गिड़गिड़ाहट से बाबुओं के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, वे मछली वाले को जबरन लिवा ही ले गये। चमारों का पूरा टोला खड़ा था वहां, मगर कोई चूँ भी नहीं कर सका। अब अगर सब किसी को बराबर अधिकार होने की बात कुछ भी सच होती तो फिर ऐसा क्यों होता? नहीं, ऐसा नहीं है इस देश में। मास्टर झूठ कहता है। लछमन दुसाध कहता है-धत् मास्टर साहब, तुम तो हमीं से मजाक करने लगे।
मजाक! मास्टर को लगता है जैसे किसी ने उसके बदन से करेंट छुआ दिया हो। तड़पते स्वर में कहता है-नहीं-नहीं... मैं तुम लोगों से झूठ नहीं बोलेगा? अरे ये बातें महज कहने को थोड़े ही हैं। यह सब तो अपने देश के संविधान में लिखा है।
सब लोग मुँह-बाये पी रहे हैं जगदीश मास्टर की बातों को। वह आगे कहता है - लेकिन तुम लोगों को इतना आश्चर्य क्यों हो रहा है? किसी दूसरे आदमी ने तुम लोगों को ये बातें नहीं बताईं क्या?
अरे, हमें कौन बताता है मास्टर जी... यह तो एक तुम ही हो जो हमें यह सब बतलाते हो। तुम्हारे पहले तो जितने भी मास्टर आये थे इस स्कूल में, सब बेनी सिंह के यहां रहते थे। उन्हीं के यहां खाते थे, बदले में उनके बच्चों को पढ़ाते थे। कई स्वरों की टकराहट के मध्य मास्टर को यही बातें सुन पड़ती हैं।
भिखारी को अपने मुखिया हो सकने की बात पर अब भी विश्वास नहीं होता। अविश्वनीय लहजे में फिर एक बार पूछता है - सच कहते हो मास्टर, क्या मैं मुखिया हो सकता हूँ?
हां भाई, तुमसे किसने कहा है कि गरीब आदमी मुखिया नहीं हो सकता?
और मास्टर के इस प्रश्न के उत्तर में भिखारी को उस दिन की याद आती है- जब वह आदित्य सिंह के यहां गया था। आज से तीन बरस पहले। वैसे तो भिखारी अपना बैठका छोड़ कर कहीं नहीं आता-जाता, मगर उस दिन गया था। और गया था इसलिए क्योंकि उसे बुलाया गया था एक विशेष काम के लिए। वह विशेष काम था गांव के नये मुखिया का चुनाव। शुरू से ही ऐसा हुआ करता है। प्रत्येक चौथे बरस गांव के ठाकुरों की पूरी बिरादरी किसी एक जगह बैठती है और उसी दिन गांव का नया मुखिया चुना जाता है। और क्योंकि भिखारी भी ठाकुरों की ही बिरादरी का था इसलिए ऐसी सभा में उसे भी बुलाया जाता है। उस दिन भी भिखारी को इसी कारण से बुलाया गया था। अभी मुखिया के लिए नामों की चर्चा आरम्भ भी नहीं हई थी कि भिखारी को मजाक सूझा।
और उसने कह दिया था- तुम मुझे ही मुखिया क्यों नहीं बना देते इस बार!
और सब लोग हँसने लगे थे। भिखारी भी हँसा था मगर थोड़ी ही देर में उसकी हँसी चुक गयी थी। कितना हँसता? मगर वे लोग थे कि थम ही नहीं रहे थे। बस ठहाके और ठहाके। भिखारी को टोकना पड़ा था-वाह! इसमें इतना हँसने की क्या बात है? मैंने कौन-सी ऐसी हँसी वाली बात कही है? मैं मुखिया नहीं हो सकता क्या? जब पिछले अठारह वर्षों में केवल हमारी ही बिरादरी के लोग तो मुखिया हुए हैं। जब आदित्य सिंह मुखिया हो सकते हैं, जब पारस सिंह मुखिया हो सकते हैं, जब जीत्तन सिंह, बेनी सिंह और रामायण सिंह मुखिया हो सकते हैं और जब अपनी बिरादरी के कुल नौ घरों में से सात घरों के लोग मुखिया हो सकते हैं, तब मैं क्यों नहीं हो सकता? अब तो मैं और शिवशंकर सिंह दो ही आदमी बचे हैं न? और क्योंकि शिवशंकर सिंह मुझसे उमर में छोटे हैं, इसलिए इस बार मुझे ही मुखिया बना दो। भिखारी के स्वर में दृढ़ता संमिश्रित थी इस बार।
मगर लोग थे कि भिखारी की बात समाप्त होते न होते फिर जोरों से हँसने लगे थे। भिखारी को बुरा लगा। तल्ख स्वर में बोला - वाह! यह क्या बात हुई कि मैं इतनी गम्भीरता से बात कर रहा हूँ और तुम लोग उसे हँसी में उड़ाये दे रहे हो। साफ-साफ कह दो, मुझे मुखिया बनाओगे कि नहीं इस बार?
भिखारी के स्वर की तेजी ने लोगों को चुप करा दिया था मगर तुरन्त ही उससे भी तेज स्वर में आदित्य सिंह बोल पड़े थे- क्या बढ़-बढ़ कर बोले जा रहा है रे भिखरिया? तब से सुन रहा हूँ।
सच ही तो कह रहा हूँ। इस बार मुखिया बनने की मेरी बारी है।
मुझे बनाओ।
मुखिया बनेंगे! स्वर को ऐंठते हुए आदित्य सिंह कहते हैं- इतना ही सच कहने वाले हुए हो तो यह सचाई क्यों नहीं समझते कि नंगा-लुच्चा मुखिया नहीं बन सकता। इतना ही शौक है मुखिया होने का तब समूचा खेत-बघार बेच देने की क्या जरूरत थी? तुम्हारा ही तो भाई है महेन्दर, जो आज बड़ा आदमी कहला रहा है। इसलिए कि उसने बाप-दादों की जायदाद को चौगुना कर लिया है। और वही तुम हो कि सब बेच-बांच कर सचमुच के भिखारी बन बैठे हो।
भिखारी चुपचाप रह गया था। कैसे कहता उन लोगों से कि महेन्दर ने बड़ा आदमी कहलाने के लिए कैसे-कैसे घृणित कर्म किये हैं- कि मां-बाप की जिन्दगी में ही महेन्दर पूरी जायदाद का आधा भाग ले कर अलग हो गया था। कि मां-बाप के मरने पर कफन से ले कर श्राद्ध तक एक पैसे का भी खर्च नहीं किया था महेन्दर ने। कि सात-सात बहनों की शादियाँ अकेले भिखारी ने ही की थीं, महेन्दर ने तो एक पैसा भी नहीं दिया था। मगर भिखारी ये सब बातें किससे कहने जाय। फिर ये बातें इन लोगों से छुपी हैं क्या? फिर तानाकशी करते हैं। करते हैं तो करें। मैं भिखारी ही सही।
लेकिन मन की बातों को प्रकट नहीं होने दिया भिखारी ने। सीधे-सीधे मतलब की बात पर केन्द्रित हो आया- कुछ भी हो, मैं जो हूँ, वही तो रहूँगा। तुम लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए। साफ कहो कि मुझे मुखिया बनाओगे कि नहीं?
सब लोगों को झुंझलाहट होने लगी थी। इस साले पर क्या सवार हो गया है आज। आखिर में जीत्तन सिंह ने झिड़कने के भाव में कह दिया -समझ लो, हम तुम्हें नहीं बनायेंगे मुखिया।
कैसे नहीं बनाओगे? भिखारी अड़ गया- तुम अपने लोग बने तो कुछ नहीं, अब मुझे बनाने के समय नानी मरने लगी। जब सात घरों में से पाँच घरों के लोग मुखिया हो सकते हैं तो मैं क्यों नहीं हो सकता? मैं भी तो तुम्हारी बिरादरी का हूँ।
अरे भिखारी, गठिया के दर्द से कराहते हुए बेनी सिंह ने कहा- बिरादरी का होने भर से कोई मुखिया नहीं होता रे। मेरी बात मान, इस बार शिवशंकर को मुखिया बनने दे। तू अगली बार बन जाना। समझा?
मगर भिखारी ने बात समझने की कोई कोशिश नहीं की। बोला-मगर यह कैसे होगा? शिवशंकर से उम्र में मैं बड़ा हूं, इसलिए पहले मेरा नम्बर होना चाहिए न?
बेनी सिंह ने तुरन्त कहा-धत् पगले! इस बड़ाई-छोटाई का क्या मतलब? अच्छा, एक बात बता - तेरे यहाँ हाथी है?
नहीं।
ट्रैक्टर है?
नहीं।
तेरे यहाँ चार जोड़ी बैल हैं?
नहीं।
इसीलिए तो कह रहा हूँ कि यह उम्र की बड़ाई-छोटाई कोई चीज नहीं है। तू तो जानता ही है, यह सब कुछ शिवशंकर सिंह के पास है। और मुखिया का मतलब ही है - श्रेष्ठ, प्रधान, प्रमुख। मान लो तुम मुखिया बनते हो और कल को तुम्हारे यहां कोई अफसर आ गया। अब तुम्हीं कहो, तुम उनकी खातिर का खर्चा कहां से उठा पाओगे?
भिखारी को अफसर की खातिर न कर पाने की असमर्थता दर्शाने वाला यह उदाहरण एकदम बेमानी लगा। बोला- यह कोई बात नहीं हुई। मुखिया बनाने का मन नहीं है तो साफ-साफ कह दो। यह झूठ-सच बतियाने की क्या जरूरत है!
हां-हां, जाओ, नहीं बनाते तुम्हें मुखिया। साले मुखिया बनेंगे। आदित्य सिंह बिगड़ने लगे थे। अब भिखारी के लिए वहां बैठना असह्य हो गया। वह गुस्से से पांव पटकता उठ खड़ा हुआ था।
तभी पारस सिंह और बेनी सिंह ने उसका हाथ पकड़ लिया था-अरे नहीं भिखारी, ऐसा नहीं करते। कहा न, अगली बार तुझे ही मुखिया बनाया जायगा।
और भिखारी को बैठना पड़ा था उनके आग्रह पर। यह सोच कर कि इन लोगों से वैर करना ठीक नहीं। इन लोगों से वैर करने के बाद तो मुखिया बनने की बात स्वप्न में भी नहीं सोची जा सकती। लेकिन आज? आज तो जगदीश मास्टर कह रहा है कि भिखारी मुखिया हो सकता है। यह उसका अधिकार है और ऐसा संविधान में लिखा है- अपने देश के संविधानन में।
“ठीक है। अब की बार जब बिरादरी की बैठक मुखिया के चुनाव के सिलसिले में होगी तो मैं उन लोगों से पूहूंगा कि वे लोग तीन बरस पहले के अपने आश्वासन के अनुसार इस बार मुझे मुखिया बनायेंगे कि नहीं," कहता है भिखारी सिंह।
और सचमुच इस बार जब नये मुखिया के चुनाव के उद्देश्य से बिरादरी बैठती है तो बिना किसी लाग-लपेट के भिखारी कह देता है-तुम लोगों को तीन बरस पहले की बात तो याद होगी जब शिवशंकर सिंह को मुखिया चुना गया था। उस समय मैंने भी स्वयं को मुखिया बनाये जाने का प्रस्ताव किया था। तब तुम लोगों ने कहा था कि इस बार न सही, अगली बार मुखिया मुझे ही बनाओगे। आज जबकि फिर से नये मुखिया का चुनाव होने वाला है, तब तुम लोगों का क्या खयाल है?
किस विषय में?
मुझे मुखिया बनाने के विषय में, और किस विषय में!
भिखारी की इतनी सी बात पर बिरादरी को तीन बरस पहले के ठहाके याद आ जाते हैं। ठहाके। बस ठहाके और भिखारी को फिर एक बार भौचक्का रह जाना पड़ता है- भला आज क्यों हँसने लगे हैं ये लोग? बेरुखी से पूछता है- इस बार क्यों हँस रहे हो तुम लोग?
तुम्हारी समझ पर। आदित्य सिंह कहते हैं और फिर एक सामूहिक ठहाका गूंज उठता है।
क्यों? नहीं बनाओगे मुझे मुखिया?
कैसे बनायेंगे! नंगा-लुच्चा भी भला मुखिया होता है कहीं।
भिखारी का मुंह लाल हो उठता है। घर बुला।कर यह अपमान। रुआंसे स्वर में कहता है- तब फिर क्या जरूरत थी यह कहने की कि अगली बार तुम्हें ही मुखिया बनाया जायगा?
इस प्रश्न का उत्तर देते हैं पारस सिंह। हँस कर कहते हैं - वह तो हमने यूं ही मजाक में कहा था।
मजाक में कहा था? भला इस तरह कहीं मजाक किया जाता है? ऐसा निर्मम मजाक! छीः! कहता है जगदीश मास्टर। अभी-अभी भिखारी ने उसे अपनी बिरादरी वालों के साथ हुई बातचीत का ब्यौरा दिया था।
सभी लोगों के मन में यही विचार है। भला इस तरह का मजाक किया जाता है। क्या नंगा-लुच्चा मुखिया नहीं हो सकता। ऐसा घृणित व्यवहार और कहलायेंगे शरीफ!
एक बात कहूं भिखारी सिंह?
क्या है मास्टर? कहो।
क्यों न तुम भी उन लोगों के मजाक का बदला मजाक से ही दो।
सबको आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा। तुम्हारे पैर न पकड़ ले तो फिर कहना।
सो कैसे?
वही तो कह रहा हूं।
और सचमुच आटे-दाल का भाव मालूम होने लगता है शिवशंकर सिंह को। कहां तो मौज में आये थे बी० डी० ओ० के पास यह कहने कि इस बार भी मुखिया वही रहेंगे और कहां आते ही बी० डी० ओ० की झाड़ सुननी पड़ रही है- क्यों साहब, आप तो कह रहे थे कि इस बार भी आप ही मुखिया होने वाले हैं। और वह भी सर्वसम्मति से। बिल्कुल निर्विरोध। लेकिन मालूम है, क्या हुआ है?
क्या हुआ है? हैरानी का भाव लिये पूछते हैं शिवशंकर सिंह।
अब यह पूछिये कि क्या नहीं हुआ। हुआ यह कि अब आप निर्विरोध मुखिया नहीं हो सकेंगे।
क्यों?
क्योंकि आपके यहां के भिखारी ने मुखिया के लिए अपना मनोनयन प्रस्तुत किया है।
सन्न रह जाते हैं शिवशंकर सिंह। सूखे कण्ठ से पूछते हैं- सच कह रहे हैं न हुजूर?
लीजिए, अब में झूठ भी कहने लगा। अरे साहब, यह सचाई तो मैं आपके भले के लिए प्रकट कर रहा है वरना मुझे क्या जरूरत थी आप लोगो से कहने की। यह कहिए कि आप लोग बड़े आदमी हैं, इसी से आतंकित सहानुभूति आप ही लोगों के साथ रहती है। नहीं तो हमें क्या! हम तो सरकारी आदमी ठहरे।
शाम को बेनी सिंह के यहां बाबुओं की चौपाल बैठती है। बैठने के साथ ही शिवशंकर सिंह बी० डी० ओ० के यहां की बातों का रोना रोने लगते हैं, मानो उनकी नाक पर छुरी चल रही हो ल। उनकी बात पूरी होते-न-होते सब लोग क्रोध से कांपने लगते हैं।
तो इस भिखरिया की यह हिम्मत! नामजदगी दाखिल कर आया? आदित्य सिंह का गुस्सा और तेज हो उठा है। ब्लड प्रेशर के मरीज हैं। तड़प कर कहते हैं - लेकिन इस ससुरे को यह बताया किसने कि मुखिया के लिए भी नामजदगी दाखिल की जाती है, वोट होता है?
जगदीश मास्टरवा ने बताया होगा। और कौन बतायेगा! वही साला है न अखबार दबाये घूमता है।
हां-हां, सारी बदमाशी उसी साले की है लेकिन इसको क्या कहोगे जब अपना खून ही दुश्मन हो जाय।
कौन कहता है कि भिखरिया अपना खून है। इस साले की बुद्धि और समझ तो उन छोटी जात वालों से भी गई-बीती है। ऊंचे संस्कार तो अब उसमें रहे ही नहीं। वह तो उन लुच्चों के जैसा ही खाता है, दिन-रात का उठना-बैठना भी उन्हीं लोगों के साथ है। उसकी प्रत्येक बात में अजब छोटापन झलकने लगा है।
खैर कुछ भी हो। कल हमें उस भिखारी के बच्चे को किसी भी तरह से समझा देना है कि वह अपनी नामजदगी वापस ले, नहीं तो उसकी खैर नहीं। - विषय का उपसंहार करते हुए आदित्य सिंह कहते हैं।
और सचमुच अगले दिन की चौपाल में बुलाया जाता है भिखारी को। आज उसके चेहरे पर विजय का भाव है। सबको आटे-दाल का भाव मालूम हो गया है। मजाक करने चले थे। कहते थे तू लुच्चा-लफंगा है, मुखिया नहीं बन सकता। भिखारी नहीं बनेगा मुखिया, लेकिन खुशामद तो करवायेगा ही। उन लोगों से कह देगा कि देखो, तुम लोग किसी कमजोर को दबा नहीं सकते, किसी गरीब पर अपने धन का रौब नहीं गालिब कर सकते। इसलिए कि अपने देश में प्रजातन्त्र है। यहां गरीब-अमीर सभी बराबर हैं, सबको बराबर अधिकार हैं। भिखारी के मन में आज जगदीश मास्टर के लिए बड़ी श्रद्धा का भाव है। सब उसी की तो करामात है। बड़ा गुणी आदमी है यह जगदीश मास्टर। बहुत खुश है भिखारी।
देख भिखरिया, अगर तुझे इस गांव में रहना है तो ठीक से रह, वरना समझ ले, हम तेरी सारी शेखी तेरे अन्दर घुसेड़ देंगे! बिना किसी पूर्व भूमिका के आदित्य सिंह कहते हैं।
हैं, यह कौन सा ढंग है खुशामद का? भिखारी जैसे आसमान से गिरता है- तो इन लोगों ने खुशामद के लिए नहीं बुलाया है उसे! उस पर रौब झाड़ेंगे, उसे डरायेंगे! नहीं, ऐसा नहीं होगा। किसी के रौब में नहीं आयेगा। बेरुखी से कहता है- आखिर बात क्या है? इतना गर्म क्यों हो रहे हो?
कह तो यूं रहा है जैसे समझ ही नहीं रहा हो। मुखिया के लिए नामजदगी दाखिल करने के लिए तुझ से किसने कहा था रे? - जीत्तन सिंह पूछते हैं।
किसी ने नहीं, मैंने अपने मन से दाखिल की थी।
क्यों?
अब इस क्यों का तो कोई जवाब नहीं है मेरे पास। मेरे जी में आया, मैंने दाखिल कर दी।
दाखिल कर दी, जीत्तन सिंह बुरा सा मुंह बना कर विष-बुझे लहजे में कहते हैं- घर में भूजी भांग नहीं है और चले हैं मुखिया बनने। चोट्टा कहीं का।
इस बार ताव में आ जाता है भिखारी। तमक कर वहां से चलने के लिए खड़ा होते-होते कहता है घर में भूजी भांग न सही, मैं तुमसे मांगने तो नहीं जाता।
और इस बार कई लोगों की बौखलाहट-भरी आवाजें एक साथ टूट पड़ती है भिखारी पर-देख भिखरिया, तू हम लोगों से रार मत मोल ले, हम तेरे अपने हैं। जैसा हम कहते हैं, वैसा ही कर।
अपने! भिखारी के मन में हँसी फूट पड़ती है इस सम्बोधन पर। ढंग से भिखारी तक नहीं कह सकते और चले हैं अपना कहने। उत्तेजना के प्रवाह में पूर्ववत् बहता हुआ कहता है भिखारी - यह 'अपने'-बेगाने की चर्चा छोड़ो और साफ-साफ कहो कि तुम लोग चाहते क्या हो?
यही कि तुम अपनी नामजदगी वापस ले लो।
इस बात से भिखारी की उत्तेजना तूफान का रूप ले लेती है- क्यों वापस ले लूं? इसलिए कि मेरे यहां हाथी और ट्रैक्टर नहीं है? मगर खुले कानों से इतना सुन लो कि मैं नामजदगी का पर्चा हर्गिज वापस नहीं लूंगा। चाहे जो हो। देश में प्रजातन्त्र है। हर छोटे-बड़े को समान अधिकार है। मुझे राष्ट्रपति के पद के लिए भी नामजदगी दाखिल करने का अधिकार है, यह तो मात्र मुखिया का पद ही है। पढ़ लो संविधान, उसमें यह बात साफ लिखी है।
प्रजातन्त्र! संविधान! आश्चर्य होता है अखिलेश सिंह को। बेनी सिंह का मंझला बेटा अखिलेश शहर में वकालत करता है। कल ही शिवशंकर-सिंह उसे अपने साथ लिये आये थे। यह सोच कर कि अखिलेश इस समस्या का समाधान ढूंढ़ने में मदद करेगा। यहां संविधान की चर्चा उसे चकित कर देती है। उसे लगता है, संविधान फट कर चिथड़े-चिथड़े हो गया है तभी तो उसके पन्ने इस गांव तक पहुंचे। वरना इस गांव में कौन जानता है ये बातें! बात बड़ी गम्भीर हो गई है, सोचता है अखिलेश।
अगले दिन गाँव के बीच वाले शिवाले पर एक सभा बुलाई जाती है, भिखारी सिंह की ओर से। गाँव की पूरी आबादी का दो-तिहाई से भी ज्यादा हिस्सा इस सभा में उपस्थित है। सबको पता है कि इस बार मुखिया का चुनाव वोट द्वारा होगा। सभा में भिखारी सिंह बताता है कि कल बाबुओं की चौपाल में उसके साथ कैसा व्यवहार किया गया। घर लौटते समय सभी लोगों में अतिरिक्त उत्साह नजर आता है। इस बार भिखारी को ही मुखिया बनाना है। वह अपना आदमी है, अपने बीच का आदमी है।
इधर बाबुओं के खेमे में इस सभा से अभूतपूर्व सरगर्मी फैल गई है। अगर कहीं सचमुच वोट हुआ ही तब तो हो गई गड़बड़। शिवशंकर सिंह मुखिया नहीं हो सकेंगे। उनको वे लुच्चे-लफंगे तो वोट देंगे नहीं और बिना उन लोगों के वोट के किसी का जीत पाना नामुमकिन है। किस उपाय से शिवशंकर मुखिया बने रह सकते हैं, यही उद्देश्य ले कर आज की चौपाल बैठी है।
मैं एक उपाय बताऊं? - अखिलेश सिंह अपने बुजुर्गों से इजाजत चाहता है।
हां-हां, कहो। तुम्हें इसीलिए तो बुलाया गया है।
तो फिर कैसा रहे अगर उन लोगों को वोट देने ही नहीं दिया जाये ?
बात तो ठीक है तुम्हारी, मगर लाठी के हाथ उन्हें रोकना तो ठीक नहीं होगा न? और इस प्रकार वे लोग मानेंगे भी नहीं। अपनी ही बिरादरी का भिखारी जो उनके साथ है। असली लड़ाई भी तो उसी से है न, इसीलिए उसी को दबा देने से सारा मामला ठण्डा पड़ जाएगा। उन लुच्चों से फौजदारी करने की सलाह तो मैं नहीं दूंगा। - जीत्त सिंह अपनी दूरदर्शिता प्रकट करते हैं।
मगर मैं फौजदारी करने की बात कर ही कहां कह रहा हूं। मेरा उपाय तो इस तरह का है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।
वह कैसे ?
और अखिलेश सिंह उन्हें बतलाता है। सबको लगता है, इस उपाय से ज्यादा सही उपाय हो ही नहीं सकता। यह उपाय जरूर कारगर होगा।
अखिलेश के सुझाव के अनुसार वैसे सभी लोगों को अगले दिन चौपाल में बुलाया जाता है जिन्होंने भिखारी सिंह को मुखिया बनाने की बात पर काफी उत्साह प्रकट किया था। जगदीश मास्टर को भी खबर दी गई थी लेकिन उसने यह कह कर कि मुझे भिखारी सिंह के साथ शहर जाना है, साफ इनकार कर दिया। लेकिन बाबुओं को भी उसके न आने की कोई चिन्ता नहीं है। न आये। अकेला चना क्या खाक भाड़ फोड़ेगा!
बाबुओं की ओर से उन लोगों से बातें करने का वही तरीका प्रयोग में लाया जा रहा है, जो एम० एल० ए० या एम० पी० के चुनावों में प्रयोग किया जाता रहा है। पहले की ही तरह इस बार भी आदित्य सिंह ही खड़े होते हैं उन लोगों से बातें करने के लिए। ये कहते हैं- अब तक तो तुम लोगों को पता हो ही गया होगा कि इस बार मुखिया के चुनाव में बोट पड़ने वाला है। भिखारी सिंह और शिवशंकर सिंह के बीच। हम लोग शिवशंकर सिंह की तरफ है और जानना चाहते हैं कि तुम लोग किस ओर हो? आप लोगों से उल्टा थोड़े ही रहेंगे मालिक। हम तो आपकी प्रजा है।
जिस ओर आप लोग रहेंगे, समझ लीजिए, हम लोग भी उधर ही है।
तो ठीक है। अगर तुम लोग हमारी तरफ हो, तब फिर सोमवार को तुम लोगों को वोट देने नहीं जाना होगा।
यही बात प्रत्येक चुनाव के पहले बाबुओं की ओर से कही जाती है। और जो हर बार इन 'लुच्चों' को स्वीकार करनी पड़ती है। विवशतः। कौन बैर करे इन बाबुओं से। वह भी वोट के लिए। वोट तो महज एक ही दिन होगा लेकिन इन बाबुओं के साथ तो जन्म-भर रहना है। लेकिन इस बार आदित्य सिंह की इस सलाह से एक अजीब किस्म का सन्नाटा कायम हो जाता है। ऐसा सन्नाटा जिसमें बेचैनी को जबरन दबाया गया हो। इस सन्नाटे को भंग करता है हरखू-
एक बात कहूं मालिक?
क्या है? कहो!
एक अरज है मालिक। अरज यह है कि अब मेरी मरने की उमर हो चली है लेकिन मैंने आज तक कभी वोट नहीं दिया है। सो आपसे प्रार्थना है कि इस बार मुझे वोट देने दिया जाये। जरा देखना चाहता हूं कि वोट कैसे दिया जाता है।
हरखू के इस आग्रह पर बाबुओं की नजरें एक-दूसरे से टकराती हैं। इसी टकराहट के मध्य विचार-विनिमय होता है और अन्त में कहा जाता है-ठीक है। एक वोट तुम दे लेना।
मैंने भी आज तक वोट नहीं दिया है। मुझे भी देने दिया जाये ।
मुझे भी मालिक...
मुझे भी......
इन आवाजों का शोर बाबुओं को परेशान कर देता है। अरे बाप! यह तो बड़ी भारी साजिश है सालों की। अगर इन्होंने बोट दे ही दिया तो फिर बाकी ही क्या रह जायेगा? इस बार तो ये साले बडी चालाकी से मूड़ देना चाहते हैं। नहीं, किसी को वोट नहीं देने दिया जायेगा। अपनी आवाज में अतिरिक्त गरज पैदा करते हुए आदित्य सिंह कहते हैं किसी को वोट देने की जरूरत नहीं है। वैसे ही ठीक है।
सबको लगता है, जैसे वे किसी व्यूह में घिर गये हों। इस व्यूह को तोड़ने की कोशिश करता है चन्दर - हरखू का बेटा। निश्चयात्मक स्वर में कहता है- कुछ भी हो, मैं तो अब वोट जरूर दूंगा।
मैं भी दूंगा-ऐसा कई लोग कहते हैं। इन स्वरों में दृढ़ता है। इस दृढ़ता को झुठलाना चाहते हैं जीत्तन सिंह - कैसे दोगे? हम कहते हैं, बोट नहीं देना है किसी को।
आपके कहने से क्या होता है? मेरी उमर इक्कीस बरस से ज्यादा की है, इसलिए वोट देना मेरा अधिकार है। जा कर देख लो, संविधान में साफ यह बात लिखी है। जगदीश मास्टर से मिली जानकारी का उपयोग करता है चन्दर।
संविधान! इस कहार के छोकरे के मुंह में संविधान कहाँ से आ गया! बेड़ा गर्क। बाप-रे-बाप! सोचता है अखिलेश- यह जगदीश मास्टर तो बड़ा खतरनाक आदमी है साहब!
लेकिन आदित्य सिंह इन बेकार की बातों को सोचने में वक्त जाया नहीं करते। अखिलेश की सलाह का अक्षरशः पालन करते हुए कहते हैं -अच्छा ससुर, वोट दोगे न! दो, लेकिन उसके पहले जिस-जिसने हम लोगों का एक पैसा भी लिया है, उसे लौटाना होगा। जल्द-से-जल्द!
लेकिन आपके पैसों का तो हम ब्याज देते हैं। - चन्दर अब भी तर्क करता है।
लेकिन आदित्य सिंह तर्कों की लड़ाई में उसे उखाड़ फेंकते हैं- नहीं चाहिए हमें तुम्हारा ब्याज। सोमवार को पहले हमें मूल ही वापिस कर दो और उसके बाद दो अपनी मर्जी से वोट। वोट देना तुम्हारा अधिकार है न? मगर इतना और सुन लो - हमारे भी कुछ अधिकार हैं और उनके अनुसार वोट के बाद से हमारी जमीनों में तुम लोगों का हँगना-मूतना सब बन्द।
अरे बाप! ऐसा! तब फिर हम लोग जीयेंगे कैसे? आदित्य सिंह की बात से सबको सिहरन-सी होने लगती है। जहन्नुम में जाये वह वोट। अब हँगना-मूतना कौन बन्द करवाये इस वोट के लिए। नहीं देंगे हम लोग बोट।
सभी लोग उठ खड़े होते हैं। उनकी सोच को व्यक्त करता है चन्दर-छोड़ो मालिक, हम लोग वोट नहीं देंगे। तुम लोगों से अधिक शक्तिशाली थोड़े ही है यह वोट। तुम सलामत रहो। चन्दर के स्वर में अनचाहे ही पीड़ा-भाव उभर आता है।
शाम को शहर से लौटने पर भिखारी को पूरा वाक़या मालूम होता है। वह सन्न रह जाता है यह सब जान कर। क्या हो गया यह सब? केवल कुछ ही घण्टों में? सुबह तक जो लोग सभी तरह से साथ होने की बात करते थे, वे इस समय अपनी मजबूरी जाहिर कर रहे हैं। बगल में बैठे जगदीश मास्टर से वह पूछता है - यह सब क्या हो रहा है मास्टर?
होने को तो यह सरासर अन्याय हो रहा है भिखारी सिंह । बिल्कुल सोलह आने जबरदस्ती! अपने संविधान में तो लिखा है कि...
लेकिन मास्टर की यह बात पूरी नहीं होने देता भिखारी सिंह। चीख उठता है-ठेंगा लिखा है तुम्हारे संविधान में। गोली मारो इस संविधान को मास्टर..। यह संविधान हिजड़ा है, नपुंसक संविधान है। आज ही गये थे न हम लोग बी० डी० ओ० के पास यह कहने कि वोट के दिन जबरदस्ती की जायेगी बाबुओं द्वारा। जवाब तो तुमने सुना था न बी० डी० ओ० का कि वह कुछ नहीं कर सकता। अगर वोट के दिन मारपीट होती है तो उसकी रोकथाम पुलिस करेगी। लेकिन अब तो मारपीट होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। अब तो पैसे की मार से ही तुम्हारे लोग अधमरे हो गये हैं मास्टर। अब उनमें उठने की शक्ति ही कहां है? कहते हो कि देश में कोई कमजोर नहीं, सब बराबर हैं। यह है प्रजातन्त्र? अगर सचमुच यही है तब तो यह सौ बार थूकने की चीज है।
भिखारी इतना ही कह कर चुप नहीं रहता। वह झटके से एक ओर बढ़ जाता है। जगदीश जानता है कि भिखारी इस समय कहां जायेगा। कुछ बुरा होने की आशंका से वह भी उसके पीछे चल पड़ता है।
बाबुओं की चौपाल में पहुंच कर भिखारी दूने आवेश से दहाड़ने लगता है- तुम लोग ठहाके लगा रहे हो यह सोच कर कि अब तुम लोगों ने मैदान मार लिया है। मुखिया का चुनाव जीत गए हो। लेकिन इतना जान लो कि इस तरह की जीत को मैं कुछ भी महत्त्व नहीं देता। ..इस तरह से जीत कर तुम कुछ भी क्यों न हो जाओ, मेरे लिए कुछ भी नहीं हो..... मुखिया चाहे प्रधान मंत्री अथवा राष्ट्रपति कुछ भी। ..अब सबको मैं अपने 'उस' पर चढ़ाऊंगा।'
जगदीश मास्टर को यह देख कर आश्चर्य होता है कि चौपाल की छत से लटक रही लालटेन की कालिमायुक्त पीली रोशनी धीरे-धीरे बाबुओं के चेहरे पर फैलने लगती है।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
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