राजेन्द्र कुमार का आलेख 'गोदान की रचना-दृष्टि'
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| राजेन्द्र कुमार |
प्रेमचंद गहन संवेदना के रचनाकार थे। उन्होंने निरन्तर अपने लेखन को बदलते समय के साथ परिमार्जित किया। वे जानते थे कि केवल अतीत पर गर्व करने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है। प्रेमचंद स्पष्ट कहते हैं कि 'भूत हमारे भविष्य का रहबर नहीं बन सकता।' प्रेमचंद की सूक्ष्म संवेदना उन छल छद्मों को बेहतर तरीके से पहचानती थी जो महज दिखावे के लिए आंदोलनधर्मी हो रहे थे। राजेन्द्र कुमार अपने एक आलेख में इसे रेखांकित करते हुए लिखते हैं 'राजनीतिक दृष्टिकोण के तहत प्रेमचंद को यह बहुत साफ दिखने लगा था कि तत्कालीन भारत के ताल्लुकेदार और सामन्त राष्ट्र हित के नाम पर अंग्रेजी हुकूमत के प्रति जिस आक्रोश की मुद्रा अपना रहे थे, उसकी असली प्रकृति साम्राज्यवाद विरोधी होने से कहीं ज्यादा जन-विरोधी थी। क्योंकि उसका हर कदम बड़े पूंजीपतियों में सांठ-गाँठ करके दरअसल अँग्रेजों से सत्ता खुद हथिया लेने की तैयारी मात्र था।' प्रेमचंद हमेशा बदलाव के पक्षधर रहे। 'गोदान' के प्रकाशन से लगभग सात वर्ष पूर्व, जब हिन्दी के कई लेखकों की औपन्यासिक कृतियाँ ('परख', 'गढ़-कुंडार', 'कंकाल' तथा 'शराबी' आदि) छप कर आई तो प्रेमचंद ने जैनेन्द्र को अपने एक पत्र में लिखा था- 'हिन्दी उपन्यास अब चेतेगा, इसमें संदेह नहीं।' आज 24 जुलाई को राजेन्द्र कुमार का जन्मदिन है। हम उनकी स्मृति को नमन करते हुए पहली बार पर उनका एक महत्त्वपूर्ण आलेख प्रकाशित कर रहे हैं। राजेन्द्र कुमार के इस आलेख को सतीश जमाली ने अपनी पत्रिका 'नई कहानी' में 1991 में प्रकाशित किया था। यह आलेख पत्रिका के पृष्ठ 112 से 117 पर छपा था। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजेन्द्र कुमार का आलेख 'गोदान की रचना-दृष्टि'।
आलेख
'गोदान की रचना-दृष्टि'
राजेन्द्र कुमार
'गोदान' में प्रेमचंद की विकासमान रचना-दृष्टि का परिपक्वतम रूप देखने को मिलता है। 'गोदान' के प्रकाशन से लगभग सात वर्ष पूर्व, जब हिन्दी के कई लेखकों की औपन्यासिक कृतियाँ ('परख', 'गढ़-कुंडार', 'कंकाल' तथा 'शराबी' आदि) छप कर आई तो प्रेमचंद ने जैनेन्द्र को अपने एक पत्र में लिखा था- 'हिन्दी उपन्यास अब चेतेगा, इसमें संदेह नहीं।' इस कथन में आश्वस्ति ही नहीं, असन्तोष की भी ध्वनि-चाहें वह कितनी ही महीन हो- सुनी जा सकती है। असन्तोष, जिसके केन्द्र में प्रेमचंद स्वयं अपनी रचना-दृष्टि की सीमाएँ भी दर्ज होते देख रहे थे। हिन्दी में उपन्यास-विधा द्वारा यद्यपि अपना एक पुष्टतर व्यक्तित्व अर्जित कर लिया गया था (और कहने की आवश्यकता नहीं कि इस सन्दर्भ में प्रेमचंद का तब तक का योगदान कितना असंदिग्ध महत्व का सिद्ध हो चुका था) किन्तु फिर भी, तब तक की (सन् 1929-30 से पहले तक की) औपन्यासिक उपलब्धियों में चेतना के स्तर पर कहीं कोई कमी प्रेमचंद को भी खटकती रही थी। प्रेमचंद स्वयं भी अब अपनी रचना-यात्रा के एक ऐसे पड़ाव पर थे, जहाँ रचनागत संवेदना और जीवनगत यथार्थ के रिश्तों को ले कर आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया से गुजरना उनके लिए जरूरी हो गया था। गहन आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया से गुजर रहे प्रेमचंद की जीवन-दृष्टि में जिन नये अनुभवों और यथार्थवादी तत्वों का समावेश हो रहा था, उन्हीं का अन्तिम और अन्यतम सृजनात्मक प्रतिफल 'गोदान' के रूप में सामने आया।
यों तो 'सेवासदन' से शुरू कर के आगे बढ़ने वाले प्रेमचंद का हर अगला उपन्यास उनके द्वारा मानो अपनी ही रचना-दृष्टि की बार-बार पड़ताल करते चलने की कोशिश का ही अगला चरण बन कर रूप ग्रहण करता है, लेकिन यदि हम 'रंगभूमि' के बाद के उपन्यासों ('कायाकल्प', 'निर्मला', 'गबन' और 'कर्मभूमि') को खासतौर से देखें तो पायेंगे कि प्रेमचंद स्वयं अपनी रचना-दृष्टि के अंतर्विरोधों के प्रति कितनी तेजी से अधिकाधिक जागरूक होते जा रहे हैं। सामाजिक विसंगतियों को उनके बुनियादी कारणों के परिप्रेक्ष्य में देख पाने के लिये उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' के नाम पर जिन हृदय-परिवर्तनवादी और सुधारवादी आग्रहों के प्रति प्रेमचंद का मोह शुरू में देखा गया था, उनसे अब वे मुक्त हो रहे हैं और सचमुच एक महान यथार्थवादी लेखक होने की ज्यादा बड़ी सम्भावनाओं की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
जार्ज लुकाच के मतानुसार 'एक महान यथार्थवादी लेखक की खासियत यह होती है कि वह अपने उन प्रबल से प्रबल पूर्वग्रहों और पवित्र से पवित्र प्रतीत होने वाली मान्यताओं से बड़ी निर्ममतापूर्वक छुट्टी पा लेने की कोशिश करता है जो स्वयं उसकी कृतियों में चित्रित परिस्थितियों और चरित्रों के स्वाभाविक कलात्मक विकास में बाधक बनती हैं।' ('स्टडीज इन यूरोपियन लिटरेचर', पृ. 99) । जार्ज लुकाच के इस पर्यवेक्षण की कसोटी पर भारतीय उपन्यासकारों में जितने खरे प्रेमचंद उतरते हैं, उतना खरा दूसरा कोई उपन्यासकार नहीं उतरता। प्रेमचंद अपनी जीवन-दृष्टि की सहवर्तिता में अपनी रचना-दृष्टि को सामाजिक समझदारी और आत्म-विश्लेषण के वस्तुगत आधारों पर सतत् जाँचते-परखते और समंजित करते चलते हैं। इस क्रम में उनकी यथार्थवादिता आदर्शोन्मुखता के बजाय सामाजिक-आर्थिक शक्तियों के द्वन्द्वात्मक अन्तःसम्बन्धों को समझने की ओर अपनी उन्मुखता पर ज्यादा भरोसा करने लगती है। यही भरोसा 'गोदान' जैसे उपन्यास की आधार भित्ति बनता है। इसी भरोसे के बूते प्रेमचंद एक ऐसी कोशिश कर पाते हैं जिसके बारे में विजय-देव नारायण साही ने कहा कि 'गोदान' में प्रेमचंद की प्रकाश-अभ्यस्त आँखें हिम्मत कर के अन्धकार को देखने की कोशिश कर रही हैं।
'गोदान' में अपनी विषय-वस्तु के प्रति प्रेमचंद का लेखकीय सलूक एक ओर अपने समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता का प्रमाण देता है और दूसरी ओर इतिहास के प्रति उनके खरे विश्लेषणात्मक रुख का। इन्हीं दो तत्त्वों के बल पर वे अपने समय की औपनिवेशिक और आर्थिक शोषण पर आधारित व्यवस्था के चक्र में फंसी ग्रामीण जिन्दगी का त्रासद यथार्थ पूरी विश्वसनीयता में उघाड़ कर रख देते है-इस केन्द्रीभूत चिन्ता में -
'हमारा जन्म इसीलिए हुआ है कि अपना रक्त बहायें और बड़ों का घर भरें!'
'बड़ों का घर भरने' में खुद खाली होता हुआ किसान जिन बिचौलियों के पंजों से नुचता है, उनका जिक्र भी दृष्टव्य है: 'जमीदार तो एक ही है, मगर महाजन तीन-तीन हैं, सहुआइन अलग और मंगरू अलग और दातादीन पंडित अलग। किसी का ब्याज भी पूरा न चुका। जमीदार के भी आधे रुपये बाकी पड़ गये। सहुआइन से फिर रुपये उधार लिए तो काम चला। सब तरह किफायत कर के देख लिया भइया, कुछ नहीं होता !'
'कुछ नहीं होता' - इस अहसास में किसान की जिस लाचारी को प्रेमचंद संघनित होते दिखाते हैं, वह 'गोदान' से पहले के उनके किसी भी उपन्यास में उनकी संवेदना का इतना तीखा साक्ष्य नहीं पा सकी थो। 'गोदान' के होरी को हमारे परिचय के दायरे में लाने वाला यह रचनाकार क्या वही प्रेमचंद है जिसने 'प्रेमाश्रम' में जमीदार का हृदय-परिवर्तन होते देखा था और लखनपुर गाँव को आदर्श गाँव में रूपांतरित होते हुए दिखा कर सन् 1921 के आस-पास, अपने एक किसान पात्र से यह कहलवाया था कि 'अब आपकी दया से गाँव में राम-राज्य है!!'
दरअसल होरी की यह लाचारी कि 'कुछ नहीं होता' केवल होरी का ही जीवन-सत्य नहीं है बल्कि लेखक के रूप में प्रेमचंद की स्वयं की, बुनियादी तौर पर रूपांतरित होती हुई रचना-दृष्टि का ऐतिहासिक अनुभव से अर्जित सत्य भी है। इतना ही नहीं, 'कुछ नहीं होता' का दर्द कहीं करुणा का अमूर्त स्रोत बन कर उपन्यास के पाठक की चेतना को आंदोलित किये बिना न रह जाए, इस खतरे से भी प्रेमचंद बहुत सावधान रहते हैं। इसीलिए वे अपने होरी को केवल उसकी लाचारी के हवाले कर के ही नहीं रह जाते बल्कि चालाक व्यवस्था को पोषित करने वाले आदर्श-कथनों की बिडम्बना का साक्षात्कार भी उसे कराते हैं- 'लोग कहते हैं, सरदी-गरमी में, तीरथ-बरत में हाथ बाँध कर खरच करो। मुदा रास्ता कोई नहीं दिखाता। राय साहब ने बेटे के ब्याह में बीस हजार लुटा दिये। उनसे कोई कुछ नहीं कहता। मंगरू ने अपने बाप के क्रिया-करम में पाँच हजार लगाये। उनसे कोई कुछ नहीं पूछता। वैसी ही मरजाद तो सबकी है।'
उपर्युक्त व्याख्या के परिवृत्त में होरी की बेचैनी का जो स्वरूप उभरता है, उसके तीन स्तर सहज ही पहचान में आ जाते हैं-
(1) 'कुछ नहीं होता' किसान की अपनी लाचारी के बोध का स्तर।
(2) 'मुदा रास्ता कोई नहीं दिखाता' सामाजिक और व्यवस्थागत परजीवी प्रवृत्ति के चलते किसान के जीवन पर थोपी गई दिशाहीनता के बोध का स्तर।
(3) 'वैसी ही मरजाद तो सबकी है' किसान को इंसान होने के नाते एक बराबर की सामाजिक गरिमा में अपनी उचित हिस्सेदारी से वंचित कर दिये जाने के बोध का स्तर।
'गोदान' के होरी के चरित्र में बेचैनी का यह तिहरा स्वरूप अन्तर्ग्रथित कर के प्रेमचंद ने अपने समय के सामाजिक सत्य को जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव के अनेक छोरों से ग्रहण करके एक घनीभूत औपन्यासिक अनुभव में ढल जाने दिया। सामाजिक संरचना के मूल में कार्यरत ऐतिहासिक विकास के सूत्रों पर रचनाकार प्रेमचंद की पकड़ 'गोदान' में इतनी मजबूत साबित होती है कि 'गोदान' अपने समय के इतिहास को पृष्ठ-दर-पृष्ठ आइना दिखाता चलता है। ऐसा इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि प्रेमचंद ने अपने इतिहास-बोध से पुनरुत्थानवादी अवबोध को लगभग एकदम से ही खारिज कर दिया था।
प्रेमचंद की इतिहास-दृष्टि का मर्म उनके इस विचार के आलोक में भली-भांति समझा जा सकता है-
'हमें तारीख से यह सबक न लेना चाहिए कि हम क्या थे, हमें यह भी देखना भाहिए कि हम क्या हो सकते थे। भूत हमारे भविष्य का रहबर नहीं बन सकता।'
प्रेमचंद की यह चिन्ता मैथिली शरण गुप्त की उस भाव-विगलित चिन्ता से कितनी भिन्न है जिसमें यह कहा गया 'हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी।' गुप्त जी की चिन्ता में वर्तमान और भविष्य, दोनों की भयावहता को समझने के लिए अतीत के गौरव का स्मरण किये बिना एक पग भी काम ही नहीं चल सकता। जबकि प्रेमचंद स्पष्ट कह देते हैं कि 'भूत हमारे भविष्य का रहबर नहीं बन सकता।'
प्रेमचंद ने सन् 1930 से ही वर्ग-शक्तियों के संतुलन में घटित हो रहे बदलावों को लक्षित करना शुरू कर दिया था। अपेक्षाकृत अधिक सही राजनीतिक दृष्टिकोण के तहत प्रेमचंद को यह बहुत साफ दिखने लगा था कि तत्कालीन भारत के ताल्लुकेदार और सामन्त राष्ट्र हित के नाम पर अंग्रेजी हुकूमत के प्रति जिस आक्रोश की मुद्रा अपना रहे थे, उसकी असली प्रकृति साम्राज्यवाद विरोधी होने से कहीं ज्यादा जन-विरोधी थी। क्योंकि उसका हर कदम बड़े पूंजीपतियों में सांठ-गाँठ करके दरअसल अँग्रेजों से सत्ता खुद हथिया लेने की तैयारी मात्र था। 'गोदान' में मिस्टर तन्खा और रायसाहब सरीखे पात्रों को हम इसी असलियत के अगल-बगल उपस्थित पाते हैं। मिस्टर तन्खा को देखिए- 'ताल्लुकेदारों से कर्ज दिलाना, नई कम्पनियां खोलना, चुनाव के अवसर पर उम्मीदवार खड़े करना, यही उनका व्यवसाय था। खासकर चुनाव के समय उनकी तकदीर चमकती थी। किसी पौढे उम्मीदवार को खड़ा करते, दिलोजान से उसका काम करते और दस-बीस हजार बना लेते। जब कांग्रेस का जोर था तो कांग्रेस के उम्मीदवारों के सहायक थे। जब सांप्रदायिक दल का जोर हुआ तो हिन्दू सभा की ओर से काम करने लगे। शहर के सभी रईस, सभी हुक्काम, सभी अमीरों से उनका याराना था। दिल में लोग चाहे उनकी नीति पसंद न करें, पर वह स्वभाव से इतने नम्र थे कि कोई मुंह पर कुछ न कह सकता था।'
इसी प्रकार रायसाहब का हाल यह है कि 'कॉसिल को मेंबरी छोड़ कर जेल चले गये थे। तब से उनके इलाके के असामियों को उनसे बड़ी श्रद्धा हो गई थी। यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो, या डाँड या बेगार की कड़ाई कुछ काम हो; मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जानी थी। रायसाहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था। यह बेचारे भी तो उसी व्यवस्था के गुलाम थे।'
'होरी' जैसे किसान की बेचैनी में लाचारी का स्तर जिस बिन्दु पर हम पहचान चुके हैं, उसके पार्श्व में रायसाहब जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति की बेचारगी के इस बिन्दु को रख कर, यदि इन दोनों बिन्दुओं को मिलाने की कोशिश की जाए तो वर्ग-शक्तियों की द्वन्द्वात्मकता का पूरा का पूरा ग्राफ खिंच जाता है। रायसाहब की यह स्वीकारोक्ति इस ग्राफ की रेखाओं को और भी प्रगाढ़ कर देती है '... मैं खुद सद्भावना करते हुए भी स्वार्थ नहीं छोड़ सकता और चाहता हूं कि हमारे वर्ग को शासन और नीति के बल से अपना स्वार्थ छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाय। इसे आप कायरता कहेंगे, मैं इसे विवशता कहता हूं।'
व्यवस्थाजन्य विवशता के अक्ष पर एक तरफ होरी और दूसरी तरफ राय-साहब जैसे चरित्रों को रेखांकित करके प्रेमचंद मानो अपने पाठकों को यह बता देना चाहते हैं कि अब किसी भी सद्भावनापरक अथवा तथाकथित सुधारवादी आस्था में अपने औपन्यासिक चरित्रों के निस्तार की गुंजाइश देखना उन्हें एकदम बेमानी लगने लगा है। स्वातन्त्र्योत्तर भारत के जिस यथार्थ को मुक्तिबोध सदृश प्रखर वर्ग-चेतस कवि की रचना 'अँधेरे में' के काव्य-नायक ने यह कह कर लक्ष्य किया कि 'पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता', उसे प्रेमचंद ने अपने समय की स्थितियों में बहुत पहले ही 'गोदान' में चित्रित वास्तविकता के रूप में लक्ष्य कर लिया था। 'गोदान' के रायसाहब की इस आत्मस्वीकृति में उसी की झलक है- 'मैं खुद सद्भावना कर के भी स्वार्थ नहीं छोड़ सकता!'
'गोदान' की औपन्यासिक संरचना पर बेशक एक प्रकार के विषाद की छाया है लेकिन उसमें निराशा का रंग चाहे कितना ही गहरा क्यों न हो, अपने संवेदनात्मक प्रभाव में उसके नितान्त आशाहीन होने की शिकायत नहीं की जा सकती। निराशा की गहरी खरोंचे किसानो की 'मरजाद' के लिए निरन्तर संघर्षरत होरी को उसकी जिन्दगी का जो आत्म-विच्छिन्न लहूलुहान चेहरा सौंपती हैं, प्रेमचंद 'गोदान' के अन्तिम पृष्ठों पर उसका चित्र इन शब्दों में अंकित करते हैं- 'आज तीस साल तक लड़ते रहने के बाद वह ऐसा परास्त हुआ है, मानो उसको नगर के द्वार पर खड़ा कर दिया गया है और जो आता है, उसके मुंह पर थूक देता है।'
लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि प्रेमचंद अपने इस उपन्यास में हताशा के निष्क्रिय दर्शन का प्रतिपादन मात्र कर के रह गये हैं। यद्यपि यह सही है, जैसा कि निर्मल वर्मा ने एक प्रसंग में कहा है कि 'गोदान' में 'भारतीय किसान का वह अन्धकारमय-मार्क्स के शब्दों में कहे, तो मैलनकोलिक भविष्य' चित्रित हुआ है, जहाँ भूमि से उन्मूलित हो कर भारतीय किसान का वर्ग-संस्कार- उसका 'किसानत्व' ही संकट में पड़ गया है। यह भी सही है कि 'प्रेमचंद ने अपने अन्तिम उपन्यास और कहानियों में किसान की 'मैलनकोली-औपनिवेशिक विषाद को व्यक्त किया था' किन्तु निर्मल वर्मा का यह कहना कि 'आज की स्थिति में इस विषाद के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं बची रही है', संगत नहीं प्रतीत होता है। यह 'विवाद' होरी की हारों का आख्यान मात्र मान लिया तब तो निश्चय ही वह, निराशा ही नहीं, आशाहीनता में भी पर्यवसित हो कर चुक गया प्रतीत होगा। जबकि 'गोदान' में प्रेमचंद की रचना-दृष्टि इस भीतरी माँग से संयोजित है कि होरी की पराजय को उसकी अंतिमता और आशाहीनता में ग्रहण न किया जाए। प्रेमचंद होरी का अन्तिम दर्शन कराते हुए कहते हैं- 'होरी प्रसन्न था। जीवन के सारे संकट, सारी निराशाएँ मानो उसके चरणों पर लोट रही थीं। यह उल्लास, यह गर्व, यह पुलक क्या हार के लक्षण हैं? इन्हीं हारों में उसकी विजय है। उसके टूटे-फूटे अस्त्र उसकी विजय-पताकाएँ हैं।'
वस्तुतः 'गोदान' के नायक की असफलताएँ मात्र एक किसान की निराशा का नहीं, बल्कि अपने व्यापक रूप में सुधारवादी तरीकों से व्यवस्था के सर्वग्रासी चरित्र को बदलने में विश्वास रखने वाले मानवतावादियों की निराशा का भी कारण बनती हैं। निराशा एक ठोस अनुभव के रूप में होरी के सामने इस तरह उपस्थित होती है-
'कानून कहता है कि हम-तुम आदमी हैं। हममें आदमियत कहाँ? आदमी वह है जिसके पास धन है, अख्तियार है, इलम है। हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं।'
यह निराशा अपनी प्राभाविकता में नितांत निष्क्रियता पैदा करने वाली संवेदना बन कर न रह जाये, इस आशंका को ध्यान में रख कर प्रेमचंद अपनी सधी हुई कलात्मक सादगी के सहारे होरी के जीवन पर छाये अँधेरे को इस सांकेतिक कौंध से क्षण भर के लिए उजागर कर देते हैं- 'कौन कहता है, जीवन-संग्राम में वह हारा है... इन्हीं हारों में उसकी विजय है उसके टूटे-फूटे अस्त्र उसकी विजय-पताकाएँ हैं।'
होरी का अन्त अपने सांकेतिक रूप में उस जड़ीभूत समाज और सर्वग्रासी व्यवस्था के अन्त की अनिवार्यता की घोषणा करता है जिसमें मध्ययुगीन सामाजिक अंतर्विरोधों के अवशेषों के तौर पर धार्मिक विश्वासों की जकड़बन्दी तथा जाति-प्रथागत भेदभाव से पैदा हुई संकीर्णता भी विद्यमान है तथा साथ ही आधुनिक युगीन विकास की देन के रूप में पैदा होने वाले सामाजिक अंतर्विरोधों के तौर पर गाँव और शहर का सांस्कृतिक-आर्थिक द्वन्द्व एवं किसानों, और सूदखोर महाजनों व व्यापारियों के निजी हितों की टकराहट भी विद्यमान है।


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