पंकज मोहन का आलेख 'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'
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| प्रेमचंद |
स्वाधीनता आन्दोलन केवल राजनीति के मोर्चे पर ही नहीं लड़ा गया। यह लड़ाई लेखन के जरिए भी लड़ी गई। प्रेमचंद ने लेखन के जरिए अपना काम किया। वे गांधी जी से प्रभावित थे। अपने आलेख में पंकज मोहन प्रेमचंद के उस कथन का जिक्र करते हैं जो राष्ट्रवाद की अवधारणा के बारे में है। अपने एक लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगें या सभी हरिजन होंगे।” आगे उन्होने यह भी जोड़ दिया कि “हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक जुए से भी, उस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।" प्रेमचंद ने अपने लेखन के जरिए वह प्रतिमान स्थापित किया जो अन्य लेखकों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। आज प्रेमचंद जयंती पर उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर हम पढ़ते हैं पंकज मोहन का आलेख 'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'।
'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हों'
पंकज मोहन
लु शून जिन्हे आधुनिक चीनी साहित्य का महानतम साहित्यकार माना जाता है, ने अपनी कहानी "मेरा गांव" में एक महत्वपूर्ण बात कही है: "जिसे हम आशा कहते हैं, का अपना अस्तित्व नहीं है, लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि दुनिया में आशा नाम की चीज है ही नहीं। आशा ठीक रास्ता की तरह है जो सृष्टि के आरम्भ में पृथ्वी पर लेशमात्र भी अस्तित्व नहीं था। पहले कोई एक व्यक्ति किसी दिशा में आगे बढ़ा, और फिर दूसरे लोग उसके पीछे पीछे चले। कारवां बढता गया और कुंवारी जमीन पर रास्ता बनता गया।"
प्रेमचन्द और लु शून ने अपने अपने देशों में प्रगतिशील साहित्य का रास्ता बनाया। इन दोनो युगप्रवर्तक साहित्यकारों ने स्वतंत्रता की उस आग से जिसे प्रोमिथियस ने मानवता के कल्याण के लिये स्वर्ग से चुरायी थी, अपने हाड-मांस को जलाया - "जला अस्थियां बारी बारी, छिटकायी जिनने चिंगारी"। इसी चिंगारी से सामन्तवादी व्यवस्था और उपनिवेशवाद के अंधकार में डूबे हुये देश में जनजागरण की मशाल का निर्माण हुआ और साथ ही निराश देशवासियों के दिल में उम्मीद के दीप जले।
प्रेमचन्द बीमारी से जूझते हुये अपने कालजयी उपन्यास 'गोदान', जो भारत का राष्ट्रीय आख्यान है, को पूरा किया। 1921 के असहयोग आन्दोलन के बाद उन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र के प्रति समर्पित कर दिया, और उसी तरह का सादगी भरा जीवन जिया जैसा गांधी जी जीते थे।
अपनी मृत्यु से एक साल पहले 1935 में जब वे वर्धा में गांधी जी से मिल कर घर लौटे और गांधी जी की प्रशंसा का पुल बाँधना शुरू किया, शिवरानी जी ने कहा, "तुम गांधी जी का चेला बन कर लौटे हो?" "नहीं इसमें चेला होने की क्या बात है? गांधी जी जो काम आन्दोलन के द्वारा कर रहे हैं, वही काम मैं कलम के द्वारा कर रहा हूँ।" गांधी जी देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे और प्रेमचंद भी महाजनी सभ्यता की बेड़ियों में जकड़े भारतीय समाज की मुक्ति के लिए और एक शोषणहीन समाज के निर्माण के लिए अपने ढंग से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। दोनो एक पथ के पथिक थे, वैचारिक सहचर थे। दोनो समान रूप से शोषणहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। प्रेमचंद ने लिखा “किसी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान वस्तु या सम्पत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं- जो दलित है, पीड़ित है, चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, उसकी हिमायत या वकालत करना साहित्यकार का फर्ज है। उसकी अदालत समाज है।" जिस किसी ने प्रेमचंद की कृतियों को मनोयोगपूर्वक पढा है, वह इसे स्वीकार करता है कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में भारत के मूक किसानों और मजदूरों को स्वर दिया, उनके आंसुओं को पिरोया। सचमुच वे शोषित समाज के मसीहा थे।
प्रेमचंद के राष्ट्र की अवधारणा और गांधी की कल्पना में बहुत हद तक समानता है। अपने एक लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगें या सभी हरिजन होंगे।” आगे उन्होने यह भी जोड़ दिया कि “हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक जुए से भी, उस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।"
प्रेमचन्द से मिलने वाला हर व्यक्ति उनकी सादगी और निश्छल हृदय से फूटे ठहाकों से प्रभावित होता था। केशरी किशोर शरण जो चौथे दशक मे मुंगेर के आरडी एंड डीजे कालेज के प्रिंसिपल बने और बाद मे बिहार प्रशासनिक सेवा मे चले गये, के नेतृत्व में 1929 मे पटना के साहित्यिकों ने हिन्दी साहित्य परिषद की स्थापना की। कुछ समय बाद अपनी एक साहित्यिक गोष्ठी मे प्रेमचन्द को आमंत्रित किया। गोष्ठी रविवार के अपराह्न में आयोजित थी और प्रेमचन्द लखनऊ से चल कर शनिवार की शाम को पटना पहुंचने वाले थे। शरण जी पटना जंक्शन आये। उतरने वाले लोगों मे जो भी पचास की उम्र के दिखते थे, सबका मुआयना किया। प्रेमचन्द की अवस्था का एक आदमी उतरा तो था, लेकिन उसकी वेशभूषा को देख कर शरण जी ने समझा, आस पास के गाँव का कोई किसान होगा - "शरीर से दुर्बल, अत्यन्त साधारण वेशभूषा जिसमे उनका संघर्षशील स्वभाव और निराडम्बर व्यक्तित्व झलकता था।"
शरण जी निराश हो कर घर लौट आये। वे रात बारह बजे फिर स्टेशन गये। लखनऊ से ट्रेन आई जरूर, लेकिन उतरने वाले बीस-पच्चीस यात्रियों मे प्रेमचंद जी नहीं दिखे। अब तो सुबह छह बजे की गाडी ही आशा दीप की अन्तिम रोशनी है। सुबह की गाड़ी से उतरने वाले यात्रियों के हुजूम मे भी प्रेमचंद का नामो-निशान नहीं।
इसी बीच शरण जी की नजर मुसाफिरखाने के कोने मे बैठे ठेठ किसान जैसे दिखने वाले उस व्यक्ति पर पड़ी जिसे उन्होंने कल शाम गाड़ी से उतरते देखा था। उन्होंने पूछा, क्या आप प्रेमचन्द जी हैं? उन्होंने उत्तर दिया, मै तो कल शाम की गाड़ी से आ गया था। मैने दोनों तरफ का टिकट ले लिया था, इसलिए देर रात जब लखनऊ जाने वाली गाड़ी प्लैटफार्म पर आई, मेरे मन मे लौट जाने का विचार आया, लेकिन फिर मैने सोचा, लगता है कहीं कुछ कन्फ्यूजन हो गया है या आपके सामने कोई बड़ी समस्या खडी हो गई होगी। मुझे इन्तजार करना चाहिए, नहीं तो आपको तकलीफ होगी। यही सोच कर सारी रात यहीं पड़ा रहा।'
3 जून, 1930 के एक पत्र में प्रेमचन्द ने 'विशाल भारत' के यशस्वी सम्पादक बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखा,
'मेरी आकांक्षाएँ कुछ नहीं हैं। इस समय तो सब से बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज्य-संग्राम में विजयी हों। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खाने भर को मिल जाता है। मोटर और बँगले की मुझे हविस नहीं। हाँ, यह ज़रूर चाहता हूँ कि ऊँची कोटि की दो-चार पुस्तकें लिखूँ। मुझे अपने दोनों लड़कों के विषय में कोई बड़ी लालसा नहीं है। यही चाहता हूँ कि वह ईमानदार और पक्के इरादे के हों। विलासी, धनी, खुशामदी सन्तान से मुझे घृणा है। मैं शान्ति से बैठना भी नहीं चाहता। साहित्य और स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता हूँ। हाँ, रोटी-दाल और तोला भर घी और मामूली कपड़े मयस्सर होते रहें।'
अपनी मृत्यु के एक साल पहले सन् 1935 में उन्होंने इस भाव को थोड़ा विस्तार दिया, 'किसी भी बड़े आदमी का नाम, जो लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो, वह मुझे आकर्षित नहीं करता। बहुत मुमकिन है कि मेरे मन के इन भावों का कारण जीवन में मेरी निजी असफलता ही हो; बैंक में अपने नाम में मोटी रकम जमा देख कर शायद मैं भी वैसा ही होता जैसे दूसरे हैं। मैं भी प्रलोभन का सामना न कर सकता; लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि स्वभाव और किस्मत ने मेरी मदद की है और मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। इससे मुझे आध्यात्मिक सान्त्वना मिलती है।'
कमल किशोर गोयनका ने प्रेमचन्द के अप्राप्य साहित्य को उपलब्ध करा कर प्रेमचंद साहित्य के अध्येता का उपकार किया, लेकिन उन्होंने प्रेमचंद की एक नई छवि गढने की नाकाम कोशिश भी की। उन्होने लिखा कि वर्ष 1900 में उनका वेतन बीस रुपये और 8 मासिक था, जब 4-5 रुपये में लोग परिवार चलाते थे, और फरवरी, 1921 में जब उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया था, उनका वेतन था 150 रुपये मासिक। 1929 में प्रेमचंद ने अपनी एकमात्र पुत्री कमला देवी के विवाह में लगभग 7 हजार रूपये खर्च किये थे और उसी वर्ष लमही गाँव में प्रेमचंद ने 6-7 हजार रुपये लगा कर मकान बनवाया था! बम्बई की फिल्म कम्पनी में नौकरी की वर्ष 1934-35 में, तब वेतन था 800 रुपये मासिक। प्रेमचंद की मृत्यु के 14 दिन पहले उनके दो बैंक खातों में लगभग 4500 रुपये थे।"
गोयनका जी ने प्रेमचन्द के आय-व्यय का पूरा लेखा-जोखा तैयार करने में मिहनत तो काफी की, लेकिन वे यह सिद्ध नही कर पाये कि प्रेमचंद के जीवन का मूलमंत्र त्याग और सादगी नहीं था। वे विलासिता या धन की मृगमरीचिका से वे कोसों दूर रहे। डाक्टर रामविलास शर्मा का यह अभिमत कि "प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए, गरीबी में जिन्दा रहे और गरीबी में ही मर गये" प्रेमचंद की इस नैसर्गिक सादगी, निरभिमान व्यक्तित्व और धन के प्रति मोह के अभाव के पवित्र भाव को अभिव्यक्त करता है। अगर प्रेमचंद के मन मे लेशमात्र भी धनलिप्सा होती तो 1921 में जब गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन का बिगुल बजाया और गोरखपुर की सभा में जनता से अनुरोध किया कि वे सरकारी स्कूल-कालेज और नौकरी के वहिष्कार करें, वे गांधी।जी के आह्वान को अनसुना कर 150 रुपये मासिक तनख्वाह वाली स्कूल-सब इंस्पेक्टर की नौकरी पर टिके रहते। 1935 में भी वे बम्बई फिल्म उद्योग की आठ सौ रुपये मासिक की नौकरी को छोड़ कर बनारस लौट आये।
कुछ लोगों ने प्रेमचन्द के फटे जूते को लेकर उनकी घेराबन्दी की। उन्होंने यह भी दलील दी कि 1936 में जिसके बैंक अकाउंट में साढे चार हजार रुपये जमा हो, उसने समाज में अपनी गरीबी की झूठी छवि प्रस्तुत करने के लिये ही फटे जूते पहने होंगे।
हरिशंकर परसाई ने हास्यव्यंग्य की शैली मे एक लेख लिखा, "प्रेमचंद के फटे हुये जूते": "मेरी आंखें पांवों पर अटक गई - "पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं। दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. सोचता हूं, फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी?"
प्रेमचन्द के पहनने की पोशाक या घर की वेश-भूषा का वर्णन श्री चन्द्रहासन ने अपने संस्मरण मे किया है। वे मुंशी प्रेमचन्द से मिलने उनके घर पहुंचे। दरवाज़ा खुला था। उन्होंने देखा, एक आदमी बनियान और मैली-सी धोती पहने कुछ लिख रहा है। उन्होंने समझा, प्रेमचन्द के कातिब या लिपिक होंगे।
फटे जूते के रहस्य पर प्रेमचंद के अनन्य मित्र दया नारायण निगम ने उर्दू पत्रिका "जमाना" के अक्तूबर 1936 मे प्रकाशित अपने लेख मे किया है - "एक बार प्रेमचंद ने अपने लिए एक नया कोट और एक जोड़ी जूते खरीदे; लेकिन उनके एक गरीब प्रियजन, जो उनके साथ उनके बचपन के दिनों में रहते थे, ने अनजाने में उन दोनों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। प्रेमचंद ने इस पर कुछ नहीं सोचा और खुशी-खुशी उन्हें दोनो सामान दे दिये।" स्पष्ट है, कुछ दिनों तक उन्हे अपने फटे-पुराने कोट और जूते ही पहनने पड़े।
यह सर्वविदित है कि प्रेमचंद को बहुत कम उम्र में ही घोर आर्थिक कठिनाई का सामना करना पडा। उनके पिता मुंशी अजायब लाल की आय बहुत कम थी। जब वे मिडिल स्कूल में थे, तब उनकी माँ का निधन हो गया और बाद में पिता भी चल बसे। घर की जिम्मेदारी और पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। वे रोज सुबह आठ बजे अपने गाँव लमही से बनारस के लिए पैदल निकलते थे। स्कूल के बाद वे 3 किलोमीटर पैदल चल कर बांसफाटक जाते और ट्यूशन पढ़ाते। शाम को ट्यूशन के बाद पैदल गाँव लौटते और रात आठ बजे घर पहुंचते थे। ट्यूशन से उन्हें हर महीने 5 रुपये मिलते थे। इस पैसे में से 3 रुपये वे घर भेजते थे और 2 रुपये से किसी तरह अपना खर्च चलाते थे। इसी अभाव में वे रात को केरोसिन की कुप्पी जलाकर अपना होमवर्क करते थे। भले ही वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, लेकिन बचपन से ही उन्हें उर्दू नॉवल पढ़ने का बहुत शौक था। वे किताबों की दुकान पर जा कर घंटों उपन्यास पढ़ा करते थे।
स्कूल टीचर की नौकरी मिलने पर 1905 तक वे लमही जहां उनकी विमाता और पहली पत्नी रहती थी, पैसे भेजा करते थे। शिवरानी देवी के साथ विवाह के बाद आर्थिक तंगी का दौर खत्म हुआ, लेकिन वे कभी अमीर की तरह न जी पाये। ऐसा जीवन वे चाहते भी न थे। वे प्रगतिकामी थै और जनजागृति का शंखनाद फूंकने के उद्देश्य से उन्होंने "जागरण" साप्ताहिक और "हंस" मासिक का दायित्व कंधे पर लिया। उन्होने 1933 में "जागरण" के प्रकाशन की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन एक वर्ष के भीतर ही उन पर आठ-दस हजार का कर्ज हो गया, जिसके कारण उन्हें इसे बंद करना पड़ा।
इसी बीच कुछ कर्मचारियों ने भी उनके साथ धोखाधड़ी की और उन पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया, जिसे चुकाने के लिए उन्हें बम्बई जाकर फिल्म इन्डस्ट्री मे पटकथा लेखक के रूप में करीब आठ सौ रुपये मासिक वेतन पर काम करना पडा। उनका स्वास्थ्य बिगडता गया, लेकिन उन्हें अपनी पत्नी की चिन्ता थी, अपने छोटे बच्चो की चिन्ता थी और 'हंस' पत्रिका के भविष्य की चिन्ता थी। पत्रिका को चलाने के लिये ब्रिटिश सरकार ने जमाना की राशि जमा करने का जो आदेश दिया था, उसकी चिन्ता थी, लेकिन प्रेमचंद अपनी अन्तरात्मा से समझौता कर पैसे के लोभ के लिये फिल्म की चकाचौंध भरी दुनिया से चिपक न सके। बनारस लौटने पर वे काफी बीमार हो गये, लेकिन जलोदर बीमारी के इलाज पर पैसे खर्च न कर वे अपनी पत्नी, अपने दो छोटे बच्चों, हंस पत्रिका और सरस्वती प्रेस के लिये बैक बैलेंस 4,500 रुपये छोड कर गये जिसका मूल्य आज के हिसाब से करीब तीस लाख बीस हजार (3,019,773) रुपये होगा। [Future Value=4500 (1+0.075 inflation)^90 years]।
यह स्पष्ट है प्रेमचंद के पारिवारिक और व्यावसायिक दायित्व को ध्यान में रखने पर 4500 रुपये का बैंक-बैलेस यह प्रमाणित नही करता कि प्रेमचंद धनी थे। उनकी धर्मपत्नी ने अपने बीस साल के बड़े बेटे श्रीपत राय और जैनेन्द्र के सहयोग से हंस को जिन्दा रखा और प्रेस का काम भी चलता रहा। श्रीपत राय और अमृत राय दोनों में किसी ने किसी कान्वेन्ट या देहरादून, नैनीताल, शिमला (सनावर) जैसे हिल स्टेशन पर स्थित एलीट स्कूल का मुंह नहीं देखा। दोनो ने कायस्थ पाठशाला, इलाहाबाद में स्कूल शिक्षा प्राप्त की। अमृत राय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढे। डाक्टर अमरनाथ झा को इस बात का क्षोभ था कि अमृत राय के मन में उनसे मेलजोल बढाने की इच्छा कभी न जगी। छात्र जीवन में अमृत राय अगर पढाई-लिखाई के अलावा दूसरा कोई काम करते थे, तो वह था देशसेवा का काम और कम्युनिस्ट पार्टी का राजनैतिक काम। उन्होने बंगाल के भयंकर दुर्भिक्ष के समय महादेवी वर्मा और अन्य साहित्यिकों के सहयोग से बंगाल के अकाल पीड़ित लोगों के लिए पैसे जमा किये।
जब उन्हें सुधा चौहान से प्रेम हुआ, महादेवी ने अपनी सहेली सुभद्रा कुमारी चौहान को तो मना लिया, अमृत राय को स्वयं अपने भावी ससुर लक्ष्मण सिह से मिल कर उनकी सहमति प्राप्त करनी थी। दोनों लोग मिले। "भारत छोडो आन्दोलन" में सहभागिता के कारण ठाकुर लक्ष्मण सिह जेल की सजा भुगत रहे थे, लेकिन सहयोग से वे पैरोल पर छूट कर कुछ दिनों के लिये घर आये हुये थे और वह उनके पैरोल का आखिरी दिन था। उनके कमरे में सुभाष बोस की तस्वीर दीवार पर लगी हुई थी और उसको देख कर कम्युनिस्ट अमृत राय ने कहा कि आपने इस आदमी की तस्वीर क्यों लगा रखी है? बहुत ही आक्रामक ढंग से। और सुभाष बोस उनके दोस्त आदमी थे। उनके साथ जेल में रह चुके थे। सो अब उनको बुरा लगा। फिर उनकी आवाज़ चढ़ने लगी। फिर मेरी आवाज़ चढ़ने लगी और हम दोनों में बड़ी-बड़ी बहसें हुईं और वे बहसें चलती रहीं और कोई बात नहीं हुई। शादी के बारे में कि तुम्हारा क्या सोचना है... क्या करोगे, क्या नहीं करोगे?... हुआ ये कि हमारे झगड़ने से उल्टे सुधा और सुभद्रा जी चौके में काँप रही थीं कि ये क्या हो गया बाबा? ...किस बात को ले कर दोनों में झड़प ऐसी हो गई।... लेकिन मेरी उनसे सिवाय इस राजनीतिक बहस को ले के, और कोई भी बातचीत नहीं हुई। लेकिन जब वो जाने लगे और जब माँ ने पूछा कि तुम क्या सोचते हो? गो कि हमारी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई थी शादी के सम्बंध में, लेकिन शायद उन्होंने अपने ढंग से मेरा मूल्यांकन कर लिया था। देख लिया कि लौंडा साला कुछ हो-न-हो, मगर जुझारू ज़रूर है और डरता-वरता नहीं। तो ये बात काका को बहुत पसंद आई। काका ने पूछा, लड़का बहुत ठीक है। तुम इससे शादी कर दो और इतना कह कर वे चले गए...।"
1942 अंग्रेजी एमए में उन्हें बीए के रिजल्ट की तरह फर्स्ट क्लास मिला। अपनी पढाई पूरी कर उन्होने 'हंस' पत्रिका के सम्पादन और प्रकाशन का दायित्व संभाला और साथ ही वे साहित्यिक गतिविधियों में भी संलग्न हो गये। 1950 में जब कांग्रेस ने कम्युनिस्ट आन्दोलन को कुचलने की योजना बनाई, अमृत राय को 'भारत रक्षा क़ानून' (डिफेंस ऑफ़ इण्डिया रूल्स) की धारा के अंतर्गत जेल भेज दिया गया। चार महीने की सजा भुगत कर वे जमानत पर रिहा हुए।। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक "अमृत राय" (लेखक रणजीत साहा) में अमृत राय के कैशौर्य तथा यौवन काल के बारे में लिखी अधोलिखित पंक्तियों पर ध्यान देने की जरूरत है : "आर्थिक संकट और संघर्ष के वावजूद अपनी पढ़ाई तथा कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रिय गतिविधियों के साथ उन्होंने दस वर्षों तक विशिष्ट साहित्य-पत्रिका हंस” का प्रकाशन एवं संपादन किया। वर्ष 1945 में श्रीमती सुधा चौहान से विवाह, प्रगतिशील लेखक संघ और मज़दूर आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी और प्रकाशन संबंधी दायित्व का निर्वाह करते हुए वे निरंतर लेखन कार्य करते रहे।" नुरूल हसन जो 1970 के दशक में भारत के शिक्षामंत्री बने, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनके सहपाठी और मित्र थे, लेकिन अमृत राय को न तो अपने पिता की शोहरत का और न ही अपने किसी दोस्त के पावर का फायदा मिला।
कुछ दिन पहले प्रेमचंद को नये तरीके से घेरने की कोशिश हुई। यह सवाल उछाला गया कि प्रेमचंद के representation के लिए, उन्हें सही और संतुलित ढंग से प्रस्तुत करने के लिये उनकी भावी पीढी (पुत्र अमृत राय और पौत्र आलोक राय) की सफलता को भी जगह मिलने की जरूरत है। क्या प्रगतिशील नैरेटिव (narrative) ने उनके परिवार की चर्चा न कर किसी प्रकार का छल किया, प्रेमचंद की एकांगी छवि गढी?
जो हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक पूंजी (Cultural Capital), प्रतिनिधित्व (Representation) और आलोचना के मानदंडों से जुड़े ऐसे मुद्दे उठाते है, उन्हें समझना चाहिए कि किसी भी लेखक की साहित्यिक महानता उनकी कृतियों से तय होती है, उनकी संतानों के करियर से नहीं। रचना को समझने के लिए जीवनी की मदद ली जा सकती है, लेकिन पोते-परपोतों की जीवनी अप्रासंगिक है। अगर कोई यह दिखा रहा है कि प्रेमचंद की हिंदी की विरासत ने उनके परिवार को जो 'सांस्कृतिक पूंजी' दी, उसने उनकी मृत्यु के तीस साल बाद अगली पीढ़ियों को अंग्रेजी के वैश्विक एलीट वर्ग में स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त किया, तो यह भ्रामक निष्कर्ष है। अगर प्रेमचंद की 'सांस्कृतिक पूंजी' से उनके पोते को आक्सफर्ड विश्वविद्यालय से डी फिल की डिग्री लेने और दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्रोफेसर बनने का अवसर मिला, तो भारतेन्दु, जयशंकर प्रसाद, निराला, दिनकर, रेणु जैसे हिन्दी के महानतम साहित्यकारों की संतति को यह लाभ क्यों नही मिला? मै इस स्थापना से भी सहमत नहीं हूँ कि हिंदी का लेखक चाहे कितना भी महान हो, भारतीय समाज में 'अल्टीमेट स्टेटस' अंग्रेजी के माध्यम से ही मिलता रहा है और प्रेमचंद के स्टेटस को भी उनके पोते के इंग्लैंड-रिटर्न करियर के लेंस से देखा जाना चाहिए।
क्या वामपंथी आलोचकों ने प्रेमचंद की 'झूठी' या 'एकांकी' छवि गढ़ी? प्रगतिशील (वामपंथी) आलोचना ने अपनी खास वैचारिकी के तहत प्रेमचंद की छवि को 'सरल, अभावग्रस्त, फटे जूते पहनने वाले, शोषितों के मसीहा' के रूप में प्रक्षेपित कर कुछ छुपाया? प्रगतिशील आलोचकों ने अगर प्रेमचंद को सामंती-औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले जनवादी लेखक के रूप में स्थापित किया और उनकी रचनाओं को स्वाधीनता आंदोलन, किसान-मजदूर संघर्ष और वर्ग-चेतना के संदर्भ में पढ़ा, तो यह उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का सही विश्लेषण था, सही पाठ था।

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