परांस-15 : अशोक कुमार की कविताएँ
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| कमल जीत चौधरी |
जीवन की अन्तिम कड़ी मृत्यु है। भारतीय परम्परा में हर पिता यह चाहता है कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी सन्तान मुखाग्नि दे। सामान्य तौर पर इस जिम्मेदारी का निर्वहन पुत्र करता है। लेकिन बदलते समय के साथ बेटियां भी आगे बढ़ कर यह दायित्व निभा रही है। अशोक कुमार की एक उम्दा कविता है 'बेटी से'। कविता की पंक्तियाँ हैं : 'मेरी चिता में उसी तरह अग्नि धर देना/ जैसे रोज़ सुबह-शाम थाली में/ चपाती धर जाती हो,/ जो प्यार दिया, तुमसे लिया/ उसका अंत अग्नि ही तो है'। अग्नि सब कुछ का अन्त कर डालती है। पार्थिव देह भी अग्नि में जल कर राख बन जाती है और इस तरह मिट्टी अपनी मूल मिट्टी में मिल जाती है। कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हैं 'बाप मरण तो कह पाया/ पर अपना जीना न कह सका/ जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त/ बहुत लम्बी होती है।' मृत्यु आसान है। जीना बहुत कठिन। जीवन में किसिम किसिम किसिम की जरूरतें पड़ती हैं। यानी जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त बहुत लम्बी होती है। कवि अशोक कुमार जीवन की जरूरतों से वाकिफ हैं। हमारे इस बार के परांस के कवि अशोक कुमार हैं।
अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को पहले हम हर महीने के तीसरे रविवार को प्रस्तुत करते थे। अपरिहार्य कारणों से दिसम्बर महीने से यह कॉलम चौथे रविवार को प्रस्तुत किया जाने लगा है। इस कॉलम के अन्तर्गत अभी तक हम अमिता मेहता, कुमार कृष्ण शर्मा, विकास डोगरा, अदिति शर्मा, सुधीर महाजन, दीपक, शाश्विता, महाराज कृष्ण संतोषी, मनोज शर्मा, कुंवर शक्ति सिंह, शेख मोहम्मद कल्याण, निदा नवाज़, अरविन्द शर्मा और नरेश कुमार खजूरिया की कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस क्रम में आज हम पन्द्रहवें कवि अशोक कुमार की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अन्तर्गत कवि की कविताओं पर कमल जीत चौधरी ने एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अशोक कुमार की कविताएँ।
परांस-15:
सारी तैयारी तो समर्पण की है
कमल जीत चौधरी
जम्मू-कश्मीर को देश-दुनिया भर में देखा-सुना और कहा जाता है। मगर यहाँ लिखी जा रही हिन्दी कविता पर एक चुपी रही है। 'परांस' इसे सामने लाने, रेखांकित करने की प्रतिबद्धता है। 'परांस' की पढ़त यह प्रमाणित करती है कि यह प्रयास सफल हुआ है। अब यहाँ की कविताई की ओर बड़े पाठक वर्ग का ध्यान आकृष्ट हुआ है। 'परांस' सिर्फ़ कवियों द्वारा भेजी उनकी चुनिंदा कविताओं पर काम-चलाऊ टिप्पणियों की पेशकारी नहीं है। बल्कि यह कवि के समग्र को पढ़कर लिखा जाने वाला एक साहित्यिक उपक्रम है। यहाँ कवि की सभी काव्यगत प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली दस-पन्द्रह कविताओं का चुनाव किया जाता है, फिर उनके पूरे लेखन का मूल्यांकन किया जाता है। उसकी दशा-दिशा परखी जाती है।
जम्मू-कश्मीर की अधिकतर कविताई; घर-सुख से ग्रस्त है। इसके कवियों को कवि-रूप में लखनपुर के पार जाना अच्छा नहीं लगता। इसके लिए इनके पास कुछ बहाने हैं, मसलन यह शिकायत कि तथाकथित मुख्यधारा; हिन्दीतर भाषी राज्यों के कवियों को प्रकाश में नहीं लाती। यह शिकायत 'परांस-15' के कवि अशोक कुमार को भी रही है। वे पत्र-पत्रिकाओं में लगभग नहीं छपे हैं। इन्होंने शायद अपनी कविताएँ कहीं भेजी ही नहीं। जबकि इनके पास दर्जनों ऐसी कविताएँ हैं, जो इनके पाँच संग्रहों में संकलित होने से पहले और बाद में प्रकाश में आ सकती थीं। ख़ैर, इनके पास सिर्फ़ शिकायत ही नहीं, बल्कि हिन्दी कविता को ले कर एक समझ भी है। इनका मानना है कि 'वादों और गुटों के कारण हिन्दी-कविता परिदृश्य में नकली कवियों की भरमार रही, और हर तरह के कम और झूठ के बल पर अधिक प्राप्त करने की आकांक्षा बलवती हुई.... नारे, आदेश और उपदेश कविता नहीं हो सकती। अच्छी कविता; सहजता से समस्याओं और संवेदनाओं से पहचान करवाती है। इसमें विचार, शब्द-चयन और मितव्ययिता का भी विशेष महत्व रहता है।' आलोच्य कवि जम्मू-विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आचार्य रहे हैं, और मेरे गुरु भी। इन्होंने हमें परास्नातक में भारतीय काव्यशास्त्र और हिन्दी पत्रकारिता कोर्स पढ़ाए हैं। इस नाते इनसे मेरा संवाद रहा। लेकिन कवि-लेखक के तौर पर इनसे एक सम्मानजनक दूरी रही। अपने-अपने रास्तों पर चलते हुए; हमने एक दूसरे की भूमिकाओं पर स्पष्ट बात कर सकने जितनी पात्रता अर्जित की है। यह कम बात नहीं है:
'जिसे आपने मेरा सब कुछ समझ लिया
वह फूला हुआ खाली लिफाफा था,
जिसे आपने मेरा रास्ता समझ लिया
वह यूँ ही बच्चे ने कापी पर लकीर खींच दी थी,
जिसे आपने मेरी प्रिया समझ लिया
वह खेत में खड़ा बिजूका था,
मैं कुछ और था
आप कुछ और समझते रहे,
सच यह कि
मेरा कुल जोड़
टूटा हुआ शून्य है
आप किसी संख्या के साथ रखकर मुझे मत देखें।'
(भ्रम)
1980 में 'युवा हिन्दी लेखक संघ' द्वारा इनका पहला कविता संग्रह 'डूबे हुए सूरज की तलाश' प्रकाश में आया। यह संकलन वह दस्तक थी, जिसने आलोच्य कवि को हिन्दी के संभावना-घर की नागरिकता प्रदान की। एक लम्बे अंतराल के बाद 2014 में इस संभावना को इनके दूसरे कविता संग्रह 'कस्स गुम्मां' से बल मिला। 2026 तक आते-आते इनके पाँचवें कविता संग्रह 'इस तरह दुनिया' ने इन्हें एक नियमित कवि होने का प्रमाणपत्र दे दिया। इसका स्वर; इनके पिछले संग्रहों की तुलना में अलग है। इस बीच आए इनके अन्य दो कविता संग्रह, 'श्यामली' और 'विराट तो है' शीर्षक से प्रकाशित हुए। इनमें 'श्यामली' की कविताएँ सामाजिक न्याय की करुण पुकार की, शक्ति के प्रति दुर्लभ श्रद्धा और अनहद श्रुत की कविताएँ हैं। 'कस्स गुम्मां' के बाद 'विराट तो है' संग्रह भी इनके कवित्व की उपलब्धि माना जा सकता है।
'डूबे हुए सूरज की तलाश', 'कस्स गुम्मां और 'इस तरह दुनिया' कविता संग्रह इन्हें बाहर का और अन्य दो कविता संग्रह इन्हें अन्दर का शायर साबित करते हैं। इन्हें पढ़ कर; इनके पाँचों संग्रहों से पचास कविताएँ अलग कीं, फिर उनमें से पन्द्रह कविताएँ 'परांस' के लिए चुनी। यह चयन इस दृष्टि से किया, जिससे कवि का सही प्रतिनिधित्व और मूल्यांकन हो सके। मेरी नज़र जो देख सकी, वह यहाँ रख रहा हूँ:
● अशोक कुमार किसी एक विशेष परम्परा, वाद या आन्दोलन के कवि नहीं हैं। इन्हें किसी पक्ष-प्रतिपक्ष में भी सूचीबद्ध करना ठीक नहीं है।
● इनकी कविताओं को एक विशेष क्रम में रखने से इनकी कविताई अधिक प्रभावशाली लगती है। इन संग्रहों की तरतीब; बेतरतीब है। कविताओं का ढंग से क्रमिक होना कवि-व्यक्तित्व को परिलक्षित करता है। संग्रह सिर्फ़ कविताएँ संकलित करने का कार्य ही नहीं है। यह अपनी बात और नज़र रखने का सलीका भी होता है। इस कसौटी पर 'परांस' में चयनित कविताओं की तरतीबों को भी परखा जाना चाहिए।
● इस कविताई का बड़ा हिस्सा भारतीय कविता का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीयता की अवधारणा के कुछ ज़रूरी तत्व जैसे कि प्रकृति-प्रेम, समन्वय, लोक, देस-भाषा, श्रद्धा, प्रश्न, मृत्यु-पर्व, परिवार, रिश्ते और समाज-समुदाय इन्हें खालिस हिन्ददेश का कवि सिद्ध करते हैं।
●
'सोचा था साथ-साथ चलना
संघर्ष का पगडण्डी-पगडण्डी कम होना
पर, ऐसा न हुआ
हर तरफ क्षितिज था
और क्षितिज तक फैला सफ़र
टिकी रह गई
एक साइकिल
ठूँठ की पीठ के सहारे।
(ऐसा न हुआ)
इनकी अधिकतर कविताएँ; अंदरूनी उदास यात्रा की पदचाप और बाहर के चुप की उत्सव-नाद हैं। जहाँ भी यह स्थिति भंग हुई है, वहाँ इनकी कविताएँ कमज़ोर हुई हैं।
● इनकी हस्ताक्षर कविताओं का अनुवाद करना एक चुनौती है। अनूदित होने के बाद भी इनकी कविताओं का मूल बचा रहता है। दरअसल यहाँ भाव अभिव्यक्त हुए हैं, भाषा या अन्य टोटकों से चमत्कार पैदा नहीं किया गया। यह आलोच्य कवि की ताकत है।
● यह कविताई; सबसे अधिक 'तुम' को, उससे कम 'किसी' को और उससे कम 'श्यामली' को सम्बोधित है। यह इन तीनों की क़ासिद है, जो इनके ख़त कवि के पते पर पोस्ट करती रहती है। तीनों में कवि का स्व अभिव्यक्त हुआ है। यहाँ किसी देव-अलौकिक-ईश्वरीय सत्ता से साक्षात्कार न हो कर; मानवीय यथार्थ-मनोस्थितियों से आत्मीय परिचय होता है।
●
'सूखे पत्ते को
अनचाही दिशाएँ धूल आकाश सब स्वीकार है
मैं अपने आप से पूछ रहा हूँ -
'सूखा पत्ता कब होऊँगा
समर्पण और स्वीकार के साथ'।'
(स्वीकार-1)
इनकी अधिकतर कविताएँ प्रकृति अनुसार बहने, और इसी के वशीभूत हो जाने के भाव से सृजित हुई हैं। यह प्रकृति के अँधेरे में मिलने, विगलने, अंकुरने और समर्पित होने की उत्कंठा की पर्याय हैं। यह कविताई उस आने का पाठ भी है, जो जाने में भी आने का रस देती है।
● यह कविताई; विशेष दृष्टि-अभाव के कारण ज़रूरी दुनियावी सरोकारों मसलन; जनपक्षधरता, राजनीतिक प्रतिरोध व सामूहिक सपनों से तनिक दूर है। लेकिन इनकी व्यष्टिपरक चेतना उस समष्टि का प्रतिनिधित्व करती है, जिसके मन पर कोई भी मानव-तंत्र; अपना ध्वज नहीं फहरा सकता। उसे ग़ुलाम नहीं बना सकता।
● यह कविताई; पाठ दोहराने, संशय और मासूम सवाल करने की प्रेरणा से भरी है। मगर यह सवाल व्यवस्था अथवा तंत्र से नहीं है। अपने अस्तित्व से हैं। आलोच्य कवि निर्णायक शैली में भविष्यवक्ता की तरह भी लिखते हैं, परंतु फिर भी इनका निर्णायक निर्णय; अनिर्णीत रह जाने का ही है। यहाँ किसी एक अंतिम सच का दावा नहीं है।
● आलोच्य कवि ने दर्जन से अधिक विषयों पर श्रृंखला में कविताएँ लिखी हैं। इन्हें सख़्ती से संपादित किए जाने की ज़रूरत है। यह इस मायने में कह रहा हूँ कि इनका अलग से एक छोटा-सा संग्रह लाया जा सकता है। 'तुम्हारा आना', 'दोस्त', श्यामली और 'दुःख' शीर्षक कड़ियों को एक साथ रखने से नए गवाक्ष खुलते हैं।
● आलोच्य कवि उस प्यार का कवि है, जिसका प्रेमपात्र कोई देह नहीं बल्कि समर्पण है। यह भी कहा जा सकता है कि स्त्री-पुरुष से परे; अमूर्त ही इनका प्रेमपात्र है।
● यह कविताई उन लोक-दृश्यों और मानस-बिंबों की अभिव्यक्ति है, जिसका मन; निम्नमध्यवर्गीय है। इनकी कविताएँ; कस्बों, छोटे शहरों में बची रह गई देस-भाषा की कच्ची छत संभालने वाली; मज़बूत शहतीर है। यहाँ जो दृश्य पूरे हो रहे हैं, वे अनुपम हैं:
'सड़क पर
आगे-आगे चल रही
भैंसा-गाड़ी, पीछे दौड़ते हुए बच्चों में शामिल हूँ मैं
किसी मोड़ पर
मैं छूट गया
बढ़ गई आगे
भैंसा-गाड़ी,
एक लकीर लंबी-सी बनी रह गई
रह गई परछाइयाँ गुज़रे वक्तों की, चरमराती आहटें
बुन रहीं सन्नाटा
दृश्य पूरा हो गया।'
(दृश्य का पूरा होना)
'परांस' का यह कवि, कलावाद और जीवन के हक़ में खड़ी कविता-परम्परा के मध्य आदिम चाल से नंगे पैर चल रहा हैं। अशोक कुमार भले किसी काव्य-आन्दोलन को श्रेयस्कर नहीं मानते, परंतु इनके लेखन का एक हिस्सा हिन्दी की प्रगतिशील काव्यधारा की नरम शाखा-परम्परा में रखा जा सकता है। इनमें प्रयोगवाद और समकालीन कविता की छवियां भी कौंधती हैं:
'वह उड़ता रहा ...
आकाश कभी खत्म नहीं हुआ....
बरसात में गीले पंख लिए
वह देख रहा था -
नीचे घुले हुए नीड़ को
धरती छूने की इच्छा नहीं थी उसे
वह थक कर कहीं
आकाश में ही गिर जाना चाहता था।'
(वैराग्य)
'दाने की तलाश में
थकी हुई चिड़िया लगा आई थी
कई गोदामों के चक्कर
बस
गोदाम भरे जा रहे थे
चिड़िया ने तलाश की थी
जंगली घास में
रंध्रों में
पत्थरों के बीच
सजे हुए गमलों में
कहीं अनाज नहीं बँट रहा था
कहीं नहीं था
दाना
इन दिनों,
क्या घोंसला बिकता है
इन दिनों।'
(दाने की तलाश)
उपरोक्त दोनों कविताएँ; कवि-प्रवृत्तियों का सूत्र थमा देती हैं। यहाँ निरर्थकता, अस्तित्व, मूलभूत ज़रूरत और भाषा साबित करती है कि कवि किसी एक बैनर या दृष्टि का कवि नहीं है। यह कविताई उस सुरक्षित घेरे में चलती है, जो जनविरोधी नहीं है, स्वयं सत्ता नहीं है, और अन्य किसी सत्ता का गला नहीं पकड़ती। यह कविताई शिनाख़्त करने, परतें उघाड़ने, मुखौटे उतारने के शिल्प को आत्मसात नहीं करती। 'ज़रूरत' शीर्षक कड़ी की कविताएँ श्यामली को सम्बोधित हैं। यह शक्ति का वह स्वरूप प्रतीत होता है, जो बुराई, दरिद्रता, अन्याय और हर तरह के शोषण का नाश करता है, और मेधा, ज्ञान और प्रकाश का विस्तार चाहता है। कवि यहाँ सबकुछ श्यामली के हवाले कर देने की श्रद्धा से भरे हैं। 'परांस' कवि-इच्छा और उसके चुने मार्ग या विचार का सम्मान करता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरवी करते हुए हर अलगपन का स्वागत करता है। बशर्ते इस अलगपन में घृणा, साम्प्रदायिकता और मीडियोकर कवि होना शामिल न हो। कविता; क्रांति भले नहीं ला सकती हो, मगर वह इंक़लाब का हेतु किसी अमूर्तता, ईश्वर, स्तुति और प्रार्थनाओं को कतई नहीं मानती। इसके लिए जनपक्षधर वैचारिकता और प्रतिरोध की संस्कृति अनिवार्य है। इस सन्दर्भ में कवियों से कुछ जोख़िम भरे पक्ष लेने की अपेक्षा की जाती है। विचार का महत्व स्वीकारते हुए भी आलोच्य कवि; प्रखर राजनीतिक स्टैंड्स से बचते हैं, और विचारधारा से विमुख हैं। लेकिन कविता के ज़रूरी तत्वों विचार-भाव को ले कर व्यापक हैं:
'कल रात चाँद,
चाँद न लगा
वह ईश्वर ही मालूम हुआ
ऐसा तो
जिस धर्म से बँधा हूँ
उसकी वजह से नहीं हुआ
एक व्यक्ति से पूछा :
चाँद को अरबी में क्या कहते हैं
दूसरे से पूछा :
अँग्रेज़ी में क्या कहते हैं
तीसरे से पूछा :
संस्कृत में क्या कहते हैं
शब्द अलग थे
चाँद वही था
अब चाँद में मैंने तुम्हें देख लिया है
मेरे भीतर के जिस धर्म से ऐसा हुआ
उसका कोई नाम नहीं है।'
(धर्म का नाम)
कवि का सम्बन्ध जम्मू-कश्मीर के जम्मू संभाग से है। इन्होंने जम्मू को बदलते हुए देखा है, यह बदलना इनकी कविताओं में नहीं दिखता। 'तवी', 'मानसर झील', 'पत्नीटॉप', 'सरहद पर गोलीबारी' जैसी कविताओं से कवि के डाक-पते का पता चलता है। जम्मू-कश्मीर में व्याप्त समस्याओं, चालाकियों, भेदभाव, शोषण और लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास की कोई प्रामाणिक ख़बर नहीं मिलती। यह कविताई; टी.वी. चैनल्स के प्राइम टाइम की तरह सत्ता के पक्ष में कोई नैरेटिव तो नहीं बनाती, मगर इसके संवाददाता अपेक्षित हाशियों तक जाने की तरह नहीं जा पाते। कवि का सम्बन्ध पत्रकारिता और शिक्षण से रहा है। यह अचरज है कि अपने कार्यक्षेत्र पर इनके पास कविताएँ नहीं हैं। फील्ड में न जाकर न्यूज़ डेस्क से ही जब कवि कहता है: 'ऐसा भी क्या जीवन!' तो वह थमा दिए गए टेबल (जीवन) से इतर कुछ और भी माँग रहा है। मगर इनकी मुट्ठी बंद नहीं है, हवा में नहीं लहरा रही। वह क्या माँग रहा है? यह पाठकीय वृत्ति अथवा विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए:
ऐसा भी क्या जीवन!
जैसे कोई पहिया ढलान से ढुलक गया हो
जैसे पढ़ते-पढ़ते पता चले
आगे के पृष्ठ किताब में बँधने से छूट गए हैं
जैसे तवे पर पड़ी रोटी
न पलटने पर कच्ची-सी फूलने से रह जाए,
जैसे तेज़ आँधी में किसी पक्षी को टेक पाने के लिए
कोई झाड़ी भी न मिले
ऐसा भी क्या जीवन !
दरअसल यह कविताई जीवन के स्वयंमेव ढुलकने, ज़रूरी पन्नों के जिल्द से बाहर रह जाने, उसके कच्चे रह जाने और उसमें टेक के न होने की पक्षधर तो कदापि नहीं है। मगर 'ऐसा भी क्या जीवन!' जैसा काव्य-कथन आक्रोश में नहीं, सयंत रहकर कहा जा रहा है। यहाँ सत्ताजनित नहीं, प्रारब्ध द्वारा दिया गया दुःख प्रकट हो रहा है। क्या विस्मयबोधक की जगह प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता था?'
'निर्वासन', 'शरणार्थी कैम्प', 'कर्फ्यू में कश्मीरी बच्ची', 'रेड अलर्ट', 'आदिवासी बच्चों का सपना', 'सरहद पर गुड़िया' जैसी कविताओं में अनुभव की प्रमाणिकता प्रतीत नहीं होती है। ऐसी कविताओं के सृजित होने के पीछे राजनीतिक कारण होते हैं। बिना राजनीतिक स्वर और दृष्टि के, ऐसी कविताएँ लिखी अपेक्षित ताप से विहीन रहती हैं। इसी तरह इनकी 'खरबूजे पर राजनीति', 'बच्चे और राजनीति', 'भूगोल में बंधी प्रजा राष्ट्र है', 'नेता जी आए हैं', 'सल्तनत' जैसी कविताएँ भी प्रभाव नहीं छोड़ पातीं।
हमारा यह कवि जब नियति-भाल पर विस्मयबोधक लगाता है, तो उसकी मनोस्थिति; एक विशेष स्थिति को प्राप्त होती है। वह 'समूचेपन में पहाड़ देखता है। उड़ गई छत पर (छत की जगह) एक तिनका लौट आता है।' इस देखने और लौटने में विराट और लघु का पाठ है। अपने विराट से विलग होकर ही हम लघु की ओर लौट सकते हैं। और लघु से दूर हो कर ही हम विराट को पा सकते हैं। आने-जाने और लौटकर आने-न आने पर इनकी अनेक कविताएँ हैं। इस यात्रा में पहले दुर्लभ, फिर दुर्गम, फिर सार्थक और अंततः दृश्यों का साफ़ हो जाना इन कविताओं का कथ्य है:
'तुम्हारा आना सचमुच
किसी साध की ओर चुपके से बढ़ जाना है।'
××
'तुम्हारा आना सच में
एक संतुष्टि के साथ दृश्य का साफ हो जाना है।'
(तुम्हारा आना)
इससे अलग; आने-जाने और रह जाने में एकाध जगह द्वंद भी है, और एक जगह जीवन चक्र के विरुद्ध भी कह जाते हैं। कवि-इच्छा के विपरीत दरिया को भी किसी न किसी रूप में समुद्र से वापस लौटना ही होता है। कोई अनंत भी लघु का अंत नहीं कर सकता।
इन्होंने दुःख, मृत्यु, प्रलय, तवी नदी और स्त्री पर कविताएँ लिखी हैं। यह शाश्वत प्रकृति के नज़दीक हैं। इन कविताओं में क्रमशः आत्म, जीवन, सृजन, सानिध्य और प्रकृति के दिग्दर्शन होते हैं। यह कविताएँ महसूस होती हैं। उद्धरण देखें:
'सभी गलियाँ लाँघ कर आ जाता है दु:ख,
नहीं भूलता रास्ता
सिरहाने की ओर आ बैठता है
जैसे बीमारी में कोई प्रिय साथ-साथ होता है
कोई नहीं सिखाता
स्वयं आ जाती हैं प्रार्थनाएँ दु:ख के दिनों में
धैर्य को जगाती, कौंधती
जैसे चमक जाते हो जुगनू अँधेरी रात में।'
(दुःख-1)
'आँसू का अर्थ
स्वयं का विसर्जन भी है
इसी राह पर चल कर
तुम भीग-भीग गए।'
(मिट्टी आर्द्र हो आई)
'दोस्त', 'तुम्हारा आना', 'ज़रूरत', 'दुःख', 'तवी', 'प्रलय' जैसी कड़ियों की; और 'नहीं बताएगा, 'शटापू' जैसी कविताएँ इनकी हस्ताक्षर कविताएँ कही जा सकती हैं। यहाँ शब्दों की मितव्ययिता और भाषा की गरिमा देखते ही बनती है। इनकी भाषा; पत्रकारिता, शिक्षण और कवि-लेखक की भाषा का सुन्दर मिश्रण है। मर्मस्पर्शी बिम्ब, सीधे कथन, देशज और ग्रामीण लोक के शब्द; इनके मुहावरे अथवा कहन को ताकत देते हैं।
यह अच्छी बात है कि इन्होंने त्वरित स्थितियों या घटनाओं पर कम लिखा है। प्रतिक्रियों से बचे हैं। लेकिन इनके 'श्यामली' शीर्षक संग्रह में 'लॉकडाउन' शीर्षक कड़ी की कविताएँ इस श्रेणी में आती हैं। यह संग्रह 2022 में छपा था। उस समय लॉकडाउन विषय पर बाढ़ की तरह कविताएँ आईं थीं, और अधिकतर कवियों की कोरी भावुकता में बह गईं। जबकि 'परांस' के इस कवि की कविताएँ सघन हैं। एक उदाहरण:
'उठी हुई भीत के पार
कभी लैंपपोस्ट जलने तक, कभी पहले
दिखता है गली का कोना,
मास्क पहने लड़की कोने तक आती है, लौट जाती है आती है लौट जाती है
वह अवश्य गली के मुहाने से अंत तक
जाती होगी अकेले,
अकेले का सफर कितनी जल्दी सीख लिया है उसने
इन दिनों।
(लॉकडाउन में-1)
इन्होंने रिश्तों-नातों को आत्मीयता से अभिव्यक्त किया है। पिता, माँ, बेटी, मामी, बुआ, चाची, सासू माँ, दोस्तों आदि पर कविताएँ लिखी हैं। इन अधिकतर में प्रशस्ति और आदर्श भाव निहित हैं। कई जगह कुछ अलग स्वर भी हैं। पिता की यह इच्छा देखें:
'बाप ने बेटी से कहा था-
'मेरी चिता में उसी तरह अग्नि धर देना
जैसे रोज़ सुबह-शाम थाली में
चपाती धर जाती हो,
जो प्यार दिया, तुमसे लिया
उसका अंत अग्नि ही तो है'
(बेटी से)
इनकी 'शटापू' शीर्षक कविता पर भी बात होनी चाहिए। यह निहायत ही अच्छी और सच्ची कविता है। इस कविता में 'लड़कियों का एक पाँव पर लंगड़ाते-उछते हुए चलने, छलांग मारकर पंडाव पार करने, लकीरों रूपी बाधाओं से बचने, वापस आने की विवशता से बंधे होने, समुद्र न हो पाने, विश्राम न मिलने और जीवन में दुःखों के अनगिनत शटापू आते रहने' में पीड़ा का एक महा आख्यान रच दिया गया है। लोक में लड़कियों के जो खेल हैं, उन्हें ध्यान से समझने पर मालूम होता है कि यह लोकगीतों की तरह मार्मिक हैं। इनमें स्त्री-संघर्ष, पीड़ा, त्याग और त्रासदी को बहुअर्थ में अभिव्यक्ति मिली है। इस तरह कवि ने लोक से सुन्दर और ज़रूरी विषय अर्जित किए हैं।
'परांस-15' की शब्द सीमा ख़त्म होते-होते, इस कविताई पर ज़रूरी बात भी पूरी हो गई है। एकदम पूरी। अंत में इतना ही कहूँगा कि जैसे इस कविताई में स्मृतिलोप नहीं है। वैसे ही दुनिया के हृदय-झूले पर बैठ कर 'स्मृतियाँ कई-कई आकाश पार करती रहें।' और 'चिड़िया की तरह हमारे घर-घोंसले में बार-बार आती रहें।' और हम प्यार में डूबे हुए इस पाठ को दोहराते रहें:
'मेरी ओर
तुम्हारा ताप न भी आए
तो भी पिघलता रहूँगा
और हर बार
तुम्हारी ओर ही बहूँगा
पिघलते हुए...
सारी तैयारी तो समर्पण की है'
(समर्पण की तैयारी)
यह कविताई समर्पण की तैयारी करने वालों के सामने आरसी बन कर खड़ी है। इसके सामने खड़े होकर; चेहरा ही नहीं रूह की भाव-भंगिमाएँ भी देखी जा सकती हैं। आलोच्य कवि को पढ़ते हुए, और 'परांस' लिखते हुए, इस कविताई के सामने खड़ा रहकर आश्वस्त रहा। सुन्दर सिद्ध हुआ। कवि-अग्रज को साधुवाद! खूब शुभकामनाएँ! वे स्वस्थ व प्रसन्न रहें। धन्यवाद!
सम्पर्क
कमल जीत चौधरी
ई मेल : jottra13@gmail.com
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| अशोक कुमार |
अशोक कुमार की कविताएँ
ऐसा भी क्या जीवन
ऐसा भी क्या जीवन!
जैसे कोई पहिया ढलान से ढुलक गया हो
जैसे पढ़ते-पढ़ते पता चले
आगे के पृष्ठ किताब में बँधने से छूट गए हैं
जैसे तवे पर पड़ी रोटी
न पलटने पर कच्ची-सी फूलने से रह जाए,
जैसे तेज़ आँधी में किसी पक्षी को टेक पाने के लिए
कोई झाड़ी भी न मिले
ऐसा भी क्या जीवन!
एक स्थिति
तुम्हें क्या देखा!
समूचेपन में पहाड़ देख लिया
ऊँचाई में विराट
रंग में बर्फ़
लिबास में मटमैला कुछ-कुछ हरा
हुआ मेरा अवाक होना
सदियों का लोकगान भीतरी सन्नाटा तोड़ गया
दृश्य ऐसा भी हो सकता है क्या!
कि उड़ी हुई छत पर तिनका लौट आए।
अस्वीकार
तुम्हें सामने पा कर
वैसा ही हो जाना हुआ
जैसे मिट्टी के नीचे बीज गल कर
अंकुरित हो जाता है
इस विगलन के बिना
तुम तक पहुँचना नहीं होता,
भीतर 'मैं' का रह जाना
तुम्हें उसी तरह स्वीकार नहीं
जैसे नदी अपने सामने
पहाड़ स्वीकार नहीं करती,
पेड़ सागर का जल स्वीकार नहीं करता
आदमी का स्पर्श हो जाने पर
चिड़िया अपने नए जन्मे बच्चे को स्वीकार नहीं करती।
तुम आए
तुम आए हो
कि शिलाओं की दरारों में भी फूल खिल आए
खुशबुओं को हवाएँ रेगिस्तान में ले गईं
कब से अटकी बूँद पत्ती पर जा गिरी
नहीं रहेंगे फूल बूँद और खुशबुएँ
बची रहेगी तुम्हारी गंध
बूंद-बूंद देह की मिठास,
जो बार-बार भरती रहेगी
प्यासे सागरों में शहदीली लहरें
बचा रहेगा तुम्हारा कंठ,
मेरे भीतर के छतनार वृक्ष पर अकेला पक्षी गाता रहेगा।
झूला
तुम चले गए
भीतर रह गया
आगे-पीछे डोलता हुआ एक झूला
जिस पर कोई दूसरा बैठा नहीं है
घोंसले में अंडे की तरह रखा हुआ
यह आश्वासन भी नहीं है
कि तुम पंछी की तरह आओगे
तुम वह पक्षी भी नहीं थे
जो एक ऋतु में दूर देस चला जाए
फिर दूसरी में लौट आए
कितने आकाश हैं!
एक-दूसरे से मिले हुए
जहाँ आँख क्षितिज बनती है
वहाँ से दूर बहुत दूर
कोई क्यों चला जाता है
जहाँ से आना होकर भी आना नहीं होता
भीतर का झूला उड़नखटोला नहीं है
जो आकाश की दूरी पार कर
तुम्हें ले कर लौट आए
भीतर के खाली झूले पर
स्मृतियाँ बैठी हुईं रह जाती हैं
जो कई आकाश पार करती रहती हैं
वह आएगा
हाथ में लहराती खुखरी या पिस्तौल लिए
किसी गुंडे की तरह
देवदूत आ कर बलात् ले जाएगा।
या वह आएगा
निर्दोष के घर पुलिस की तरह
डंडों की मार से आत्मा भगाता ले जाएगा।
वह आएगा
किसी साधु का भेष धारण कर
बच्चों को उठाने वालों की तरह पुचकार कर
स्वर्ग का लालच दे कर ले जाएगा।
शायद वह इस तरह नहीं आएगा
हो सकता है हम जाने का कोई सपना देख रहे हों
वह उधर से ही ले जाए
घर वालों को कभी पता ही न चले
सपने के भीतर के दृश्य के सच होने का।
दुख-1
किस आले में दुख दीपक की तरह रखें
कि वहाँ जलता रहे
कौन सा जंगल है जहाँ रहे अज्ञातवास में
किस गुफा में रख कर उसे
बाहर भारी पत्थर का किवाड़ दे आएँ
दुख में आदमी स्वयं दीपक की तरह जलता है
नहीं समाप्त होती जंगली बाट
आदमी चल-चल कर थक जाता है,
पर दुख उंगली छोड़ कर कहीं गुम नहीं होता
दुख से हारा हुआ आदमी
भीतर की गुफा में छिपता है,
किसी भी कोने में दे लें दस्तक
दुख वहीं हवा की तरह मौजूद होता है
पर, जीवन दुख ही तो नहीं है
वह उसी तरह का उल्लास भी है
जैसे पत्तियों के लिए
उन पर टिकी बारिश की चमकती बूँदें उल्लास हैं।
दोस्त-2
अपने जैसे दोस्त
पौधों और झाड़ियों की तरह हैं
जो चिलकती धूप में
एक-दूसरे का झुलसना सिर से पाँव तक देखते हैं
और जड़ों तक महसूस करते हैं
पास-पास उगे आंधी में
एक दूसरे पर गिरे दोस्त
दोस्तों का भार संभालने की कोशिश करते हुए
उठ खड़े होते हैं,
जैसे बाहों में बाहें डाले
बच्चों की एक कतार गिर पड़े,
फिर बांहों को बांहों का दे सहारा उठ जाएँ
और हँसते हुए पोंछें एक-दूसरे के धूल सने चेहरे।
शटापु
एक पाँव पर चलते हुए
लड़कियां रोज़ खेलती हैं शटापु
क्या जीवन-भर एक ही पाँव पर चल कर
लड़कियों को खेलना होता है शटापु।
पार करने होते हैं कई पड़ाव,
हर पड़ाव एक टाँग के बल पर
छलांग लगाते हुए
पहुँचना है शटापु के अन्त तक
जिसे 'समुन्दर' कहा जाता है
समुन्दर तक पहुँच कर
अपनी अस्मिता को समुन्दर होने देना
खेल का अन्त नहीं है,
उसे फिर लौटना है संघर्ष में
एक पाँव के सहारे छलांग लगाते हुए
बिन देखे पीछे फेंकना है शटापु
पड़ जाए किसी पड़ाव पर
जहाँ दोनों पाँवों पर लड़की खड़ी हो सके
कैसा है! यह लड़कियों का खेल
दोनों पाँवों पर खड़े होने के लिए
लंगड़ाते हुए जाना और लौटना जरूरी है
एक लड़की झुंझला कर रुआंसी हो आई है
कभी नहीं पड़ता शटापु सही पड़ाव पर
कभी पाँव लकीर पर पड़ जाता है
कभी नहीं हो पाता पूरा
एक पाँव पर चलने का नियम
वह नहीं हो पाती समुन्दर
रह जाती है एक शटापु-एक कंकड़ पत्थर
लड़कियां बार-बार खेलती हैं यह खेल
बार-बार गिनती हैं कितने पड़ाव हैं उनके पास
दोनों पाँवों पर खड़े होने के लिए।
लड़कियों के जीवन में दुखों के
कितने शटापु हैं
कोई लड़की यह गिनती नहीं जानती।
दाने की तलाश में
दाने की तलाश में
थकी हुई चिड़िया लगा आई थी
कई गोदामों के चक्कर
बस
गोदाम भरे जा रहे थे
चिड़िया ने तलाश की थी
जंगली घास में
रंध्रों में
पत्थरों के बीच
सजे हुए गमलों में
कहीं अनाज नहीं बँट रहा था
कहीं नहीं था
दाना
इन दिनों,
क्या घोंसला बिकता है
इन दिनों।
दृश्य का पूरा होना
कच्ची सड़क पर
आगे-आगे चल रही
भैंसा-गाड़ी, पीछे दौड़ते हुए बच्चों में शामिल हूँ मैं
किसी मोड़ पर
मैं छूट गया
बढ़ गई आगे
भैंसा-गाड़ी,
एक लकीर लंबी-सी बनी रह गई
रह गई परछाइयाँ गुज़रे वक्तों की, चरमराती आहटें
बुन रहीं सन्नाटा
दृश्य पूरा हो गया।
बेटी से
बाप ने बेटी से कहा था-
'मेरी चिता में उसी तरह अग्नि धर देना
जैसे रोज़ सुबह-शाम थाली में
चपाती धर जाती हो,
जो प्यार दिया, तुमसे लिया
उसका अंत अग्नि ही तो है'
बाप मरण तो कह पाया
पर अपना जीना न कह सका
जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त
बहुत लम्बी होती है।
धर्म का नाम
कल रात चाँद,
चाँद न लगा
वह ईश्वर ही मालूम हुआ
ऐसा तो
जिस धर्म से बँधा हूँ
उसकी वजह से नहीं हुआ
एक व्यक्ति से पूछा :
चाँद को अरबी में क्या कहते हैं
दूसरे से पूछा :
अँग्रेज़ी में क्या कहते हैं
तीसरे से पूछा :
संस्कृत में क्या कहते हैं
शब्द अलग थे
चाँद वही था
अब चाँद में मैंने तुम्हें देख लिया है
मेरे भीतर के जिस धर्म से ऐसा हुआ
उसका कोई नाम नहीं है।
वैराग्य
वह उड़ता रहा ...
आकाश कभी खत्म नहीं हुआ....
बरसात में गीले पंख लिए
वह देख रहा था -
नीचे घुले हुए नीड़ को
धरती छूने की इच्छा नहीं थी उसे
वह थक कर कहीं
आकाश में ही गिर जाना चाहता था।
कवि परिचय :
कवि-आलोचक व फ़ोटोग्राफ़र अशोक कुमार का जन्म 1950 ई. में हुआ। वे सन् 1975 से 'युवा हिन्दी लेखक संघ- जम्मू' से जुड़े हैं। इन्होंने जम्मू-कश्मीर के हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 'डूबे हुए सूरज की तलाश', 'कस्स गुम्माँ', 'श्यामली', 'विराट तो है', 'इस तरह दुनिया' शीर्षक से इनके कविता संग्रह प्रकाशित हैं। 'इन दिनों सतसई' शीर्षक से एक सतसई भी शाया है। इसके अलावा इन्होंने 'जम्मू की हिन्दी कविता: सामयिक परिदृश्य', 'जम्मू-कश्मीर की हिन्दी कविता: भाग-1, 2, 3 और 4', 'स्वातंत्र्योत्तर काव्य-नाटक' शीर्षक से शोध, समीक्षा व आलोचनापरक किताबें भी लिखी हैं। 'साथ चलने का संगीत', 'रावी के इधर-उधर', 'तवी जहाँ से गुज़रती है' और 'समकालीन कविता' शीर्षक से इन्होंने चार कविता संकलन संपादित किए हैं। इन्होंने 'कश्मीर टाइम्ज़' और 'डेली एक्सेलसियर' में पत्रकारिता भी की है। जम्मू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से सेवानिवृत्त हो कर भाषा, साहित्य, व्याकरण और फ़ोटोग्राफ़ी क्षेत्र में सक्रिय हैं।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क:
दूरभाष- 09419117569
ई मेल - ashokg043@gmail.com





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