हेमन्त शर्मा का आलेख 'कहूं अब नामवर किसको…?'

 

'कहूं अब नामवर किसको…?'


हेमन्त शर्मा 

 

जीवन की क्षुधा का जल भरी गगरियों से मिलना सामान्य बात है। गगरियां अधभरी हो कर भी छलकती हुई। किनारों पर इकट्ठा पानी में डूबती-उतराती हुई। समाज ऐसी गगरियों का मोहल्ला है। परस्पर ज्ञान, अनुभव और बोध की प्यास साझा करता, बुझाता, तत्काल उत्तर खोजता, लेकिन गगरी की भी अपनी सीमा है, वृत्ति है। उसका दायरा और संभावना भी सीमित है। वो तात्क्षणिक तो है, प्रबंधित और अवलंबनीय नहीं। इसलिए जब गहराई खोजनी हो तो सामने चाहिए होता है एक ज्ञानवापी व्यक्तित्व। कूप सी गहराई वाला। नदी जैसा प्रवाहमान, सरोवर जैसा गठन वाला जिसमें चारों ओर से संभावनाओं की सीढ़ियां उतरती हों, समुद्र जैसा गंभीर और झरने जैसी ताज़गी से भरा। हिंदी के साहित्य मंडल में मैंने जिन लोगों को देखा, जाना, पढ़ा और सीखा, उनमें मेरी इस अपेक्षा का एक ही नाम है- नामवर सिंह।

एक सजीव पुस्तकालय, एक संदर्भ ग्रंथ, एक आलोचक, एक चिर-पाठक चरित्र वाला साहित्य प्रवर, एक छह फ़ीट का आदमी जिसकी देह से ले कर वाणी और आचरण तक पूरी भाषा और संस्कृति समाई हुई। आलोचना के तो वे शिखर पुरुष थे ही। नामवर जी मेरे लिए क्या थे, यह कथा अविभाज्य स्मृतियों का एक सतत क्रम है। ये यादें आज भी मेरे अंदर एक अडिग पर्वत की तरह रखी हुई हैं। मुझे आशीष और आत्मबल देती। वो मेरे गुरु थे। मैं उनका स्नेह पात्र। यह स्नेह चार दशक की लंबी यात्रा तक मुसलसल बना रहा। नामवर जी को जिज्ञासा से देखना और फिर नामवर जी का हो जाना…। उनके जाने के बाद भी उनको अपने अंदर पाना। इन चार दशकों की यह पूंजी मेरे जीवन की सबसे बहुमूल्य उपलब्धियों में से एक है।

बात 1981 की है. जुलाई की कोई तारीख़ होगी। पता था 109, उत्तराखंड, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का नया परिसर। जाते ही लगा कि इस बंगले से साहित्य की तरंगें प्रक्षेपित हो रही हैं। समय दोपहर का था। मैंने डरते-डरते कॉल बेल बजाई। दरवाजा खुला। दूसरी तरफ हिंदी के शिखर आलोचक खुद नामवर सिंह थे। आप कौन? जी, हेमन्त. बनारस से आया हूँ। चश्मे के भीतर से झांकती उनकी गम्भीर आँखें मुझसे कुछ और पूछती इससे पहले मैंने उन्हें एक चिट्ठी थमा दी। पढ़ कर बोले, तो आप शर्मा जी के बेटे हैं, आइए। कैसे दिल्ली आना हुआ? टेस्ट देने आया था। लौट रहा था। सोचा आपके दर्शन कर लूँ। कौन सा टेस्ट? एम. ए. में दाख़िले के लिए। इतना बताते-बताते मैं उनकी बैठक में दाखिल हो चुका था। नामवर जी ने मुझे बैठने को कहा और खुद उस कुर्सी पर बैठे जिसके पीछे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक दिव्य छाया चित्र लगा था।

टेस्ट किसने लिया? जी, प्रो. केदार नाथ सिंह, प्रो. मैनेजर पाण्डेय और चिंतामणि मलेरिया जी थे। कैसा रहा टेस्ट? जी अच्छा रहा। पिता जी कैसे है? एकदम ठीक. ‘रहते तो कबीरचौरा में ही हो?’’ मैंने कहा, ‘हाँ वहीं रहता हूँ। उनका अगला सवाल था- ‘कबीर को पढ़ा है?’’ ‘‘जी पढ़ा है’’ ‘‘कबीर को समझने के लिए किसे पढ़ा है?’’ नामवर जी ने अगला सवाल दागा। उन्होंने सोचा होगा कि मैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम लूँगा, क्योंकि हिंदी में कबीर पर सबसे प्रामाणिक किताब उन्हीं की थी और नामवर जी आचार्य द्विवेदी के प्रिय शिष्य थे। लेकिन मैंने कहा, ‘‘जी मैंने कबीर पर आचार्य रजनीश को पढ़ा है’’। रजनीश उस वक्त तक ‘ओशो’ नहीं थे। मेरे इस जवाब पर वे भेद भरी मुस्कान के साथ अपने चिरपरिचित अंदाज में बोले, ‘‘आप तो बड़े विद्वान् आदमी मालूम पड़ते हैं”। मैं इस व्यंग्योक्ति को समझा नहीं। बाद में पता चला कि नामवर जी अपना यह जुमला तब ही उछालते थे, जब आप निरर्थक बोल रहे हों या उनके सामने अपनी ‘ज्ञान-संपदा’ को बड़ी आतुरता के साथ प्रदर्शित कर रहे हों। तब भी वे यही कहेगें, ’‘आप तो बड़े विद्वान् आदमी हैं’’। हिन्दी के इस शिखर आलोचक से यही मेरी पहली मुलाकात थी। पहली बार उनसे विधिवत मिला था। मैं बीएचयू से जेएनयू में पढ़ने आया था। दाखिला कराने जब बनारस से दिल्ली आ रहा था तब मेरे पिता मनु शर्मा ने कहा था कि नामवर जी से जरूर मिलना। मेरे भीतर भी बड़ी उत्सुकता थी नामवर सिंह से मिलने की। देखने की कि आख़िर वह कौन है? जो पिछले तीस बरस से हिन्दी आलोचना के सारे सूत्र ख़ुद ही पकड़े हुए हैं।

हालांकि बाद में मैं कतिपय कारणों से जेएनयू में चयनित हो कर भी दिल्ली नहीं आ पाया। आगे की बाकी बची पढ़ाई बीएचयू में ही हुई। लेकिन नामवर जी से एक रिश्ता बन चुका था। कितने ही अवसर, परिस्थिति, आयोजन, असमंजस और अवस्थाओं में वो मेरे पिता की तरह तो कभी पिता के सापेक्ष मेरे मार्गदर्शक बने रहे। बातें, मुलाकातें, चुहलें, चुटकियां, आमोद-प्रमोद में वो कभी मित्र, कभी सखा, कभी स्वजन, कभी अग्रज, कभी अभिभावक, कभी संकटमोचक बन कर अपनी छत्रछाया देते रहे। पहली मुलाक़ात के कोई 28 बरस बाद नामवर जी नोएडा में मेरे घर आए। सायंकालीन जमावड़ा। केदारनाथ सिंह, ओम थानवी, रामबहादुर राय, पत्रकार साथी अजय उपाध्याय, कवि आलोक श्रीवास्तव के साथ ही राजनेता व संविधानविद देवेंद्र द्विवेदी जी भी मौजूद थे। गुरुवर प्रभाष जोशी को भी आना था। गोष्ठी जम चुकी थी, पर प्रभाष जी नहीं पहुंचे थे। पूछा तो पता चला, वे घर से चल दिए हैं। मुझे बेचैन देख नामवर जी बोले, ‘‘हेमंत, परेशान न हो, प्रभाष जी समझदार हैं, हम लोगों को मौका दे रहे हैं, ताकि हम उनके आने तक अपना तरल कार्यक्रम समाप्त कर लें’’। मैंने चुहल की और कहा- जोशी जी इसका बुरा क्यों मानेंगे। गोस्वामी तुलसी दास ने भी इस तरल की महत्ता बताई है. नामवर जी चौंके "क्या कहा, तुलसी दास….” मैंने कहा, जी तुलसीदास ने लिखा है- “तरल पदारथ यहि जग माही, कर्महीन नर पावत नाहीं’’। वह तो प्रूफ की गलती से 'तरल' की जगह 'सकल' छप गया। मेरे उवाच पर बाकी लोग ठहाका लगाते इससे पहले ही नामवर सिंह बोल चुके थे, ‘‘वाह! वाह! बहुत विद्वान् आदमी हो’’।

नामवर जी की हँसी-ठिठोली का भी एक विशिष्ट अंदाज था। एक बार बनारस में आलोचक डॉ. बच्चन सिंह के यहाँ नामवर सिंह, प्रो. विजयशंकर मल्ल, डॉ. केदार नाथ सिंह आदि ‘संध्या वंदन’ के लिए बैठे थे। नामवर जी शाम के बैठने-बिठाने के कार्यक्रम को ‘संध्या वंदन’ कहते थे। डॉ. बच्चन सिंह जी के यहाँ सम्पन्न उस ‘संध्या वंदन’ में विजयशंकर मल्ल जी भी थे। वे कुछ इधर-उधर की बात ले आए। मल्ल जी विद्वान् अध्यापक थे। उनकी विद्वत्ता का हम पर आतंक था। संवेदनशील इतने कि कोई बड़ी ट्रेन दुर्घटना और सड़क पर साइकिल से किसी का गिरना उन्हें समान कष्ट पहुँचाते थे। बात हिंदी अखबार और उसकी बदलती भाषा की हो रही थी। मल्ल जी कहने लगे, “भाई, पटना से एक अखबार निकलता था, शायद नाम था- प्रदीप..।” यह कहते हुए वे नामवर जी की ओर मुखातिब हुए और थोड़े टेढ़े हो कर वायु मुक्त की। नामवर जी ने तुरंत कहा- हाँ, हाँ निकलता था, अभी-अभी निकला है, और फिर निकलेगा। बाकी लोग आनंद की मुद्रा में थे। पर नामवर जी धीर गंभीर। वे हरदम गंभीर रह कर ही आनंद लेते थे।

ऐसा ही एक और मजेदार वाकया है। हिंदी भाषा के सरलीकरण व मानकीकरण को ले कर कुछ विद्वानों में बहस चल रही थी। राम विलास शर्मा जी बोले, निरंतर काल में हिंदी के कुछ शब्दों के अंतिम अक्षर हटा कर उसे कम व सरल किया जा सकता है। जैसे कीचड़ की जगह लखनऊ में कीच कहते हैं, दवाई की जगह दवा, उसी तरह भलाई को अगर भल, छपाई को छप, दिखाई को दिख, सिलाई को सिल आदि कहा जाए तो क्या दिक़्क़त होगी? जैसे- वे सिलाई कर रहे हैं की जगह वे सिल रहे हैं, ऐसा लिखना मानक होगा। कई लोगों ने सहमति जतायी और तभी नामवर जी बोले- “यही नियम बुराई व मलाई पर लागू करना नुक़सानदेह हो सकता है।” रामविलास जी भी बहुत देर तक निरुत्तर रहे। गुरुदेव ऐसी टिप्पणियां कर गम्भीरतापूर्वक आगे बढ जाते थे।

एक बार कोई सज्जन नामवर जी के पास अपना कविता संग्रह ‘क्षितिज के उस पार’ लाए। वे अपनी किताब पर नामवर जी से टिप्पणी चाहते थे. गुरुदेव काफ़ी टालमटोल करते रहे फिर मज़े लेते हुए बोले-

एक झोला हाथ में हो,

एक चेला साथ में हो,

फिर दिल्ली, बंबई, मद्रास क्या है,

क्षितिज के इस पार क्या है,

क्षितिज के उस पार क्या है.

गुरूदेव होते तो आज सौ बरस के हो जाते। हम सुबह सुबह उनके घर पहुंचते। जमावड़ा होता। वे किचन से कुछ मिठाई लाते। उत्सव होता। वे उत्सव प्रिय थे। मेरी दो किताबों की उन्होंने भूमिका लिखी। एक की समीक्षा की। जबकि लिखने में वे आलसी थे। लेकिन भाषण के चैम्पियन। इसके बाबजूद उन्होंने मेरी किताब ‘तमाशा मेरे आगे’ की सात पेज की भूमिका लिखी। इससे आप मेरे प्रति उनके स्नेह को समझ सकते है। गुरुदेव ने मुझे भाषा के संस्कार दिए, दबाव डाल लगातार लिखवाया। कहा, जो देखते हो वही लिखो। जैसा बोलते हो वैसा लिखो। वह भी क्या दौर था। उस कालखंड में नामवर जी का कहा एक एक शब्द हिन्दी आलोचना का बीज शब्द बनता था। मैंने उन नामवर सिंह की तेजस्विता का सूर्य देखा था. फ़िराक़ को बदलते हुए, आने वाली नस्लें हम पर रश्क भी कर सकती हैं कि मैं गुरुदेव के प्रिय शिष्यों में रहा हूँ।

 

प्रो. मैनेजर पांडेय कहते थे कि नामवर सिंह के संसार में भांति-भांति के लोग हैं, जो उन्हें तो परेशान नहीं करते, पर दूसरों को काट भी सकते हैं। ऐसा क्यों न हो, वे शिव की नगरी के थे। तो उनके साथ भोला-भंगड़ के बाराती भी होंगे ही. उनका परिचय देना मुश्किल काम था। हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष, आलोचना की धार, आलोचना की संस्कृति, तर्क के डिक्टेटर, आलोचना की कसौटी उन्हें न जाने कितने नाम दिए गए। मेरा मानना है कि आलोचक और अध्यापक होने के साथ ही वे अपने युग के सबसे बड़े वक्ता भी थे। अपने भाषण से वे सबको मंत्रमुग्ध करते थे। कभी-कभी तो मुझे समझ नहीं पड़ता था कि वे आलोचना के नामवर थे या फिर नामवर की आलोचना।

 

उनका नाम ही नहीं, दिल भी बड़ा था। नब्बे के नामवर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक संवाद रखा गया। राम बहादुर राय आयोजक थे। गृहमंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि। दोनो ही दक्षिणपंथी। उस आयोजन में नामवर सिंह के होने से वामपंथी ख़ेमे में तूफान मच गया। नामवर वहां कैसे? उन पर वहाँ न जाने का दबाव पड़ा। उन्हें उनके फैसले से डिगाने की कोशिशें हुईं। सोशल मीडिया पर नामवर जी के सठियाने जैसी टिप्पणियां हुईं। पर वे अविचलित रहे, अडिग रहे। वे समारोह में आए और सौ साल तक जीने की इच्छा प्रकट की। ऐसे थे नामवर सिंह। एक वाक़या और है. मेरी किताब ‘द्वितीयोनास्ति’ का लोकार्पण था। कार्यक्रम में मुरारी बापू और स्वामी रामदेव थे। मंच पर दूसरे अतिथियों में तब के भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और मुरली मनोहर जोशी भी थे। मुझसे किसी ने कहा कि इस मंच पर नामवर जी नहीं आएंगे। मुझे शंका हुई। मैं उनके पास गया। मैंने कहा समारोह में और कौन कौन लोग हैं आपको मालूम है न। आपको किसी नाम पर एतराज तो नहीं हैं। उम्मीद से उलट उन्होंने कहा, मैं तो आपके लिए आ रहा हूँ। और बाकी कौन-कौन है इससे मुझे क्या मतलब। यह उनका बड़प्पन था।

बनारस और पान दोनों उनकी कमज़ोरी थे। पान के लिए उनसे कुछ भी छूट सकता था। बहुत समय तक वे जेएनयू परिसर में रहने महज इसलिए नहीं गए कि वहाँ पान की दुकान नहीं थी। वे पास ही सर्वोदय एनक्लेव में रहते थे जहाँ उनका पान वाला था। नामवर जी जब जेएनयू रहने गए। तो जेएनयू परिसर में बनारस से पान वाला बुलवाया गया। उसे उन्होंने जेएनयू के अपने घर के गैराज में रखा। बाद में उसे एक खोखा दिला कर उसकी बाक़ायदा वहीं दुकान खुलवाई जो फ़र्राटे से चल निकली। बनारस में पान के पत्ते को पकाना, कत्थे का संस्कार, चूना बनाना और सादी पत्ती (सुर्ती) का फ़ार्मूला ही बनारसी पान का पेटेंट है, जो पान के पत्ते महोबा, कलकत्ता और उड़ीसा से आते हैं, उसे यहाँ आठ से दस रोज़ तक कपड़ों में लपेट कर पानी का छींटा दे एक विशेष प्रक्रिया से गुज़ार कर पकाते और मुलायम बनाते है। इसे ‘कमाना’ कहते हैं यह कला सिर्फ बनारस में है। जहाँ हर रोज़ पान पलटते है। ख़राब या गलने वाले पान को छांट कर अलग करते हैं। नामवर जी ऐसे ही पान के मुरीद थे। उनका कहना था कि दिल्ली वाले क्या पान खाना जाने। बाद में तो वे इन झंझटों से मुक्ति के लिए एक पनडब्बा ही रखने लगे थे। नामवर जी क्लास लेते समय पान खाते हुए पढ़ाते थे। खाते क्या थे, बनारसी अंदाज में घुलाते या जमाते थे। एक बार वे पढ़ाने के दौरान कहीं किसी काम से कुछ देर के लिए बाहर गए तो किसी छात्र ने उनके बीड़े से निकाल एक पान जमा लिया। जब क्लास फिर से प्रारंभ हुई तो उस छात्र को हिचकी आने लगी क्योंकि तंबाकू भरपूर था। नामवर जी भाँप गए, बोले, जाईए कुल्ला कर के आइए। तंबाकू कड़ा है। पूरी क्लास हँस पड़ी।

उन्हें दिल्ली का पान बिल्कुल नहीं भाता था, क्योंकि पान का मुख्य अवयव कत्था होता था। कत्था बनाने की ख़ास प्रक्रिया बनारस की होती है। पहले कत्थे को पानी में भिगो कर वे उसे दूध में उबालते थे। पकने के बाद उसे एक कपड़े में बांध किसी पत्थर के नीचे दबा कर रखते हैं ताकि पानी के साथ उसका कसैलापन और गर्मी बाहर निकल जाए। इसके बाद कत्थे को पानी में घोंटते थे गुलाब के इत्र और पिपरमिंट के साथ। बनारस में सुर्ती की जगह सादी पत्ती खाई जाती है। सादी पत्ती हर पान वाले की अपनी ख़ासियत होती है क्योंकि सबका फ़ार्मूला अलग होता है। इस प्रक्रिया में सादी तम्बाकू की पत्ती को कई बार पानी से धो कर उसका अधिकतर निकोटीन निकाल दिया जाता है और फिर उसमें बराश, इलायची, लौंग, पिपरमिंट और इत्र मिला कर उसे तब तक रगड़ते है जब तक वह मुलायम न हो जाए। चूने को भी बनारसी ख़ास तरह से संस्कारित करते हैं। ताज़ा चूना कभी इस्तेमाल में नहीं लाते। पहले चूने को पानी से बुझाते थे, फिर छने हुए चूने में दही का पानी मिला कर उसकी गर्मी निकाली जाती है।

नामवर सिंह की अकादमिक प्रतिबद्धता ही उन्हें ‘नामवर सिंह’ बनाती है। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तब वे चाहते थे कि उनकी एक कविता पुस्तक ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ के लोकार्पण कार्यक्रम में नामवर सिंह आएँ। उन्होंने विष्णुकांत शास्त्री के ज़रिए यह संदेश भिजवाया। शास्त्री जी नामवर जी के सहपाठी होने के कारण नामवर सिंह के व्यक्तिगत मित्र थे। विष्णुकांत जी उन दिनों उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। उन्होंने नामवर सिंह से आग्रह किया और नामवर जी ने विनम्रतापूर्वक अटल जी की तारीफ़ करते हुए वहाँ जाने से मना कर दिया कि कवि के तौर पर मैं उन्हें जानता नहीं। सिर्फ प्रधानमंत्री के नाते उनकी कविताओं पर क्या बोलूँगा। जाना ठीक नहीं होगा। गुरुदेव (अटलजी से) से मिलूँगा फिर कभी।

मैं जब जनसत्ता में आया तो जब मेरी कोई रिपोर्ट उन्हें अच्छी लगती, वे फौरन मुझे फ़ोन करते। वे जनसत्ता के नियमित पाठक थे। बाद के दिनों में वे हमारे कॉलम "तमाशा मेरे आगे" पर मुझे हर इतवार फ़ोन करते। “वाह! पंडित जी अईसन कौनौ बनारसिए लिख सकअला”। नामवर सिंह जी की याददाश्त बहुत तेज़ थी। गुरुदेव जब कभी मेरे लिखे हुए किसी लेख की चर्चा करते तो हर बार कुछ नया लिखने के लिए भी प्रेरित करते। मेरी अयोध्या वाली किताब तो हर इतवार तगादा करके उन्होंने लिखवाई। उसके कवर पर भी उन्होंने टिप्पणी लिखी।

एक बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से किसी ने पूछा कि गुरुवर आपकी सर्वश्रेष्ठ कृति कौन सी है। आचार्य हजारी प्रसाद जी के मुँह से निकला- "नामवर सिंह"। नामवर सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी समग्रता थी और उसी समग्रता की जड़ों में घुली हुई उनकी अनोखी विशिष्टता रही। इसी ख़ूबी ने उन्हें बड़ी-से-बड़ी परम्परा को खारिज करने, अपना झंडा गाड़ने और हिन्दी आलोचना में सबसे ऊँचा, आला और अलहदा स्थान बनाने में मदद की। हर ख़ूबी के कुछ फ़ायदे होते हैं तो कुछ नुक़सान भी। नामवर जी ने अपनी इसी ख़ूबी के लिए नुक़सान भी उठाया। बनारस में उन्हें काफ़ी विरोध झेलना पड़ा, हालाँकि बनारस में ऐसा विरोध तुलसी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को भी झेलना पड़ा था। नामवर जी बनारस के जिस मोहल्ले लोलार्क कुण्ड में रहते थे, वह भदैनी इलाके में पड़ता है। यहाँ से काशी के पुराण पण्डितों ने तुलसीदास को भगा दिया था। स्थानीय पंडित उनके द्वारा रचित ‘रामचरित मानस’ को गंगा में फेंक दिया करते थे, क्योंकि तुलसी लोकभाषा में रघुनाथ गाथा लिख रहे थे। पुराण पण्डितों के केंद्र अस्सी से भाग कर ही तुलसी ने इस मोहल्ले का नाम ‘भयदायिनी’ रख दिया था। जो बाद में  बिगड़ कर ‘भदैनी’ बना। कवि केदारनाथ सिंह कहते थे कि ‘‘भदैनी में ‘सरवाइव’ करना आसान नहीं है। नामवर सिंह सरवाइव कर गए, शायद इसलिए वे नामवर सिंह बन गए”।

नामवर सिंह तीन दशकों तक हिन्दी साहित्य के केंद्र में थे। वे आलोचना को उसकी बन्द गली से आगे ले गए। उसको गंभीरता से मुक्त कर आसान, सरस और पठनीय बनाया इसलिए वह रचना का आनन्द देने लगी। लिखने से ज़्यादा महत्व बोले जाने को दिया जाने लगा। किताबों की तुलना में संगोष्ठियों का महत्त्व बढ़ा और इस पूरी परम्परा के अलमबरदार बने नामवर जी। क्योंकि नामवर सिंह कलम के सिपाही नहीं, बातों के जादूगर भी थे। बातूनी नामवर सिंह को दिल्ली में सब जानते थे। लेकिन इस बातूनीपन के पीछे वे एक गंभीर अध्येता था। नामवर जी बेहद अध्ययनशील थे। वे मिर्ज़ा ग़ालिब से ले कर वर्तमान तक, कहीं से भी शुरू कर, कहीं भी ख़त्म कर सकते थे। जितना अधिकार उनका कालिदास और भवभूति पर था, उतनी ही सहजता से वे ब्रेख़्त और लु शुन को भी समझाते थे। नामवर जी अपनी धीर-गंभीर आवाज़, असाधारण स्मरण-शक्ति, ‘सहज प्रत्युत्पन्न मति’ आदि की बदौलत आधी सदी तक न सिर्फ़ साहित्यिक संगोष्ठियों को लूटते रहे, बल्कि अपने साहित्यिक रण कौशल से अपनी विचारधारा के विरोध में खड़े विद्वानों को भी गिराते, पछाड़ते और उखाड़ते रहे। वे भाषा के बेजोड़ खिलाड़ी थे। उनकी भाषा मुहावरे भी गढ़ती है और यही मुहावरे साहित्य की चौहद्दी बनाते हैं। नामवर जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। आलोचना ही नहीं कविता की परम्परा से भी उनका उतना ही गहरा संबंध था।

नामवर सिंह ‘पुनीत’ को बहुत कम लोग जानते हैं। वे इस नाम से अपने लेखक जीवन की शुरुआत में कविताएँ लिखते थे। अध्यापक नामवर, चंदौली से चुनाव लड़ने वाले राजनेता नामवर और अब किंवदंती बन चुके नामवर एक बहुपठित, विलक्षण याददाश्त और बेजोड़ ‘विट्’ के संवादी आलोचक थे। उन्होंने आलोचना की वाचिक परम्परा को जीवित रखा। वे गुरुकुल परम्परा के अध्यापक थे। कक्षा में या निजी तौर पर प्रवचन नहीं संवाद करते थे। बहुत कठिन और गूढ़ विषय को भी वे संवादी शैली में सरल और बोधगम्य बना देते। नामवर सिंह हिन्दी आलोचना की तीसरी परम्परा थे। पहली परम्परा आचार्य रामचंद्र शुक्ल, दूसरी आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और तीसरी खुद उनसे निकली है। शुक्ल जी हिन्दी आलोचना के जनक हैं। आचार्य द्विवेदी उसे विस्तार देते हैं। नामवर सिंह उसे धार देते हैं। नामवर जी अपने आप में जीवन की प्रयोगशाला थे। मानवीय भावनाओं के संवेदनशील चितेरे थे। साहित्य के कैनवास पर उनका जितना बड़ा कद था, उससे भी लंबी लकीर वे मानवता के कैनवास पर खींचते थे।

और गुरुदेव के कैनवास का ये विस्तार ही उनको अद्वितीय बनाता है। वो समालोचना को साहित्य की सीमा तक समेट कर रखने वाले व्यक्ति नहीं थे. घर के वरिष्ठ की तरह उनकी दृष्टि जीवन के हर आयाम में अपना एक अनुभवी दखल रखती थी। हंसी हो, ठिठोली हो, बैठकबाजी हो, राजनीतिक या सामाजिक घटनाएं और गतिविधियां हों, साहित्य-भाषा-सृजन हो, कला संस्कृतिकी बात हो… नामवर जी बरगद की तरह हर जगह छाया देते थे। उनके व्यक्तित्व में एक सहज और सरल विशिष्टता थी। वो सामान्य सी दिखने वाली चीजों  में भी गांभीर्य और मायने खोज लेते थे, वो गंभीर बातों में भी प्रमोद खोज लाते थे। मेरा भाव उनके प्रति गुरु का भी रहा और गोविंद का भी। और उन्होंने मुझे वैसे ही देखा, गुरु बन कर भी और गोविंद बन कर भी। अपने लेखन, विचारों और नए कामों के लिए मुझे जिस एक व्यक्ति के सत्यापन की हमेशा ललक रहती थी, वो नामवर जी ही थे।

नामवर सिंह एक ‘फ़ेनोमिना’ थे। उन्होंने अपनी ज़ुबान से कलम का काम लिया। कबीर अनल पक्षी (फ़ीनिक्स) के मुरीद थे क्योंकि वह अपनी राख से दुबारा पैदा हो जाता है। पक्षी तो और भी हैं। चातक है, चकोर है, मोर है, पक्षीराज गरुड़ है। फिर अनल ही क्यों? सन् 1950 में आलोचना पत्रिका छपनी शुरू हुई। लेकिन थोड़े समय में बंद हो गयी और फिर बंद होती, शुरू होती रही। 1967 में ये फिर छपनी शुरू हुई तो नामवर जी इसके संपादक बने। तब नामवर जी ने अपने सम्पादकीय में लिखा आलोचना ‘अग्निप़क्षी’ है। अपनी ही राख से फिर पैदा हो जाती है। जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आयीं जब नामवर सिंह को भी शून्य यानी राख से शुरू करना पड़ा। शायद इसीलिए नामवर जी को ‘अग्निपक्षी’ प्रिय था। तभी तो वे राख से प्रतिभाएँ गढ़ देते थे।

उद्भट और मुँहफट प्रतिभा के धनी नामवर सिंह की 'नामवरियत’ बनारस में ही जन्म ले सकती थी.वे खाँटी बनारसी थे। बनारसीपन एक अति आधुनिक सांस्कृतिक दृष्टि है। उसमें जन्मे, पगे, बढ़े नामवर जी पांडित्य से भरे विविध रंगों वाले बिंदास बनारसी थे। जमाने को ठेंगे पर रख अपनी बात को पूरी ताकत के साथ रखने का अंदाज इसी दृष्टि की उपज थी क्योंकि जाति, वर्ग, संप्रदाय और धर्म से आगे की चीज है बनारसीपन। नामवर सिंह का कर्मक्षेत्र भले ही दिल्ली रहा हो, पर उनका भाव क्षेत्र हमेशा बनारस रहा। जिस बनारसी मिट्टी ने नामवर को बनाया, वह सृजन के अक्षुण्ण प्राणतत्व से भरी-पूरी थी। उसमें कबीर का साहस, तुलसी का लोकतत्त्व, प्रेमचंद का समाजशास्त्र और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का पांडित्य था। जब ये सारे तत्त्व एक साथ मिलते हैं तब एक नामवर सिंह बनते हैं। उनकी यही पहचान उनके जीवन भर साथ रही।

अन्तिम समय जब नामवर जी बीमार हुए तो मैं उन्हें देखने एम्स गया था, उस समय उनकी तबीयत में सुधार हो रहा था। वेन्टिलेटर हट गया था। रक्तचाप और ह्रदयगति सामान्य थी। चेतना लौट आई थी। हल्की-फु्ल्की बात भी कर रहे थे। दिमाग़ में चोट थी इसलिए थोड़ी गफ़लत महसूस कर रहे थे। बातचीत भटक रही थी। फेफड़ों में संक्रमण बना हुआ था। डॉक्टरों का कहना था कि स्थिति में सुधार है, पर उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें ख़तरे से बाहर नहीं कहा जा सकता था। मैं उनसे आईसीयू में मिला। मुझे देखते ही वे पहचान गए। हालाँकि मैं आईसीयू की वर्दी में था, सिर पर टोपी, चेहरे पर मास्क। सामान्य आदमी को पहचानने में वक़्त लगता। वे तो गम्भीर बीमारी के सदमे में थे। मुझे सिर्फ़ अपना नाम बताना पड़ा और वे हमेशा की तरह मुस्करा दिए। उनके भीतर का ज़िन्दादिल शख़्स इस अवस्था में भी बोल पड़ा, “आ गइला। अब सब ठीक हो जाई। हमार पट्टी हटवावा”। उनके दोनो हाथों में पट्टियाँ बँधी थीं ताकि वे तन्द्रा में अपनी जीवन रक्षक प्रणाली न हटा दें। मैंने कहा, डॉक्टर से बात हो गई है, वो एक दिन बाद खोल देंगे। वे इस बात पर अड़े रहे कि तुम कहो... आज ही खोलो, तुम्हारे कहने से खोल देंगे। फिर इधर-उधर की बात करने लगे। जो ज़्यादा समझ में नहीं आ रही थी. फिर बोले, अभी मुझे तुम्हारी किताब की समीक्षा करनी है। मैंने उनसे बताया कि आप ही ने उसकी भूमिका लिखी है। वे बोलते रहे- मुझे दूरदर्शन पर समीक्षा करनी है। मैं उनकी गफ़लत समझ गया था। इसलिए मैं उनके कहे में ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाने लगा। तब तक डॉक्टर आ गए। उन्होंने बताया गुरु जी पहले से ठीक हैं। इतनी जल्दी ऐसी ‘रिकवरी’ की उन्हें उम्मीद नहीं थी। डॉक्टर की उम्मीद मेरे जेहन की तमाम आशंकाओं को परास्त कर गई। मैं व्यग्र हो कर अस्पताल गया था, पर उम्मीद ले कर वापस लौटा।

हालाँकि बिस्तर पर नामवर जी को लाचार देख मन उद्विग्न हो गया। जिस आदमी को आपने पूरे ताप के साथ देखा हो, जम्मू से लेकर त्रिवेन्द्रम तक जिस व्यक्ति की तेजस्विता के सामने तमाम हिन्दी विभाग काँपते हों, जिसकी मर्ज़ी तीस बरस तक हिन्दी आलोचना की धारा तय करती रही, जिसका कहा एक-एक शब्द हिन्दी आलोचना का बीज शब्द बनता हो... मैंने उन नामवर की तेजस्विता का सूर्य देखा था। उनको बंधे हाथ और लाचार देखना अंदर तक झकझोरने वाला था। लेकिन नियति ऐसी ही होती है। समय सबका आता है। झरने भी सूखते हैं। गोबर्धन की तरह छाये रहने वाले वट भी समय की आंधी में धूल होते हैं। ऐसे ही महाप्राण निराला गए और ऐसे ही गए मेरे पिता। हजारी प्रसाद जी, शुक्ल जी,  जाना तो सबको पड़ा। मैं अस्पताल से लौटते वक्त बाबा विश्वनाथ का ध्यान कर रहा था।  बनारस के इस मानस पुत्र का जीवन अब बाबा के हाथ और इच्छा पर निर्भर था।

काशी का यह मानस पुत्र कबीर की तरह मगहर-मुखी हो चला था. ऐसा पहले भी उन्होंने किया था. नामवर जी लम्बे समय तक बीएचयू में आते नहीं थे. एक लोकसभा का चुनाव लड़ने के कारण गुरुदेव को दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में बीएचयू छुड़वाया गया. फिर उन्होंने आना-जाना बन्द कर दिया. पर जब उनके व्यक्तित्व का सूर्य पूरी प्रखरता पर था, उस दौरान एक कुलपति के निवेदन पर वे विश्वविद्यालयीय संगोष्ठियों में आने लगे थे. यह भी उतना ही सच है कि वे दिल्ली में बनारस को ‘मिस’ करते थे. वह दिल्ली में हमेशा बनारस ढूँढ़ते रहे. अपने आस-पास, मित्रों में, खान-पान में, पहनावे में और अपनी भाषा में. उन्होंने ग़ुस्से में बनारस छोड़ा. लोकसभा का चुनाव लड़ा. नौकरी गई. बेरोज़गारी देखी. उनके समकालीन साहित्यकारों ने काम भी लगाया. मगर जब बनारस छोड़ा तो पलट कर नहीं देखा. उनके भीतर का जो बनारसी था, उसी ने उनके भीतर यह दृढ़ता और ज़िद पैदा की. आख़िरी दिनों में वे मुझसे कहा करते थे कि उन्होंने अब क्षेत्र संन्यास ले लिया है. अब वे इस क्षेत्र के बाहर नहीं जाना चाहते हैं पर एक बार बनारस जाने का मन है. “देखल जाय कइसन हौअ बनारस, कइसन हउअन बाबा विश्वनाथ’’. पर जहाज़ से यात्रा की उन्हें इजाज़त नहीं थी. सो अपने मूल पर लौटने की उनकी इच्छा धरी रह गई. गुरुदेव की बनारस जाने की इच्छा इतनी बलवती थी कि वे बार-बार कहते एक बार फिर बनारस जाने का मन है, अब जीवन का क्या ठिकाना. वामपंथी होते हुए भी बार-बार बाबा विश्वनाथ के दर्शन का आग्रह उनके संस्कारों का असर था. उनका शरीर भर बनारस से दूर रहा मगर आत्मा बनारस की मिट्टी में ही पगी-बसी रही.

रिश्ते-नाते उन्हें ज़्यादा प्रभावित नहीं करते थे. घटना, मनुष्य और विचार इन तीनों में वे विचार को अधिक महत्त्व देते थे. वे विद्यार्थियों को आलोचना पढ़ाते ही नहीं, आलोचना सिखाते भी रहे. वे सामने वाले की बात को सिरे से ख़ारिज करने का दम रखते थे पर साथ ही सामने वाले की बहस और असहमति के अधिकार की हिफ़ाजत करने के लिए भी उतने ही दमख़म से खड़े होते थे. यही वजह है कि नामवर सिंह जिन्हें ख़ारिज करते थे, उन्हें ज़्यादा पढ़ते थे. बिना पढ़े विरोध, केवल लोकतंत्र में विपक्ष की औपचारिक भूमिका भर है, मगर नामवर सिंह खाँटी विपक्ष की नहीं, बल्कि विद्वत और संवेदनशील प्रतिपक्ष की भूमिका अदा करते थे. नामवर हिन्दी आलोचना का अकेला ऐसा नाम था जो हिन्दी साहित्य  के आदिकाल से लेकर उत्तर आधुनिक युग तक किसी भी कालखंड पर अधिकार से अपनी बात रखते थे. कवि केदारनाथ सिंह कहते थे, ’‘यह कोई साधारण बात नहीं है कि तीन दशक के इतने बडे़ कालखंड में समकालीन हिन्दी साहित्य के केंद्र में कोई रचना नहीं, एक आलोचक है, इस गुत्थी को समझना होगा”.

नामवर सिंह के नाम में वर जुड़ा है. ये यश का वर है. जिजीविषा का वर है. लोकप्रियता का वर है. ये नाम की शाश्वतता का वर है. उनके जाने से हिन्दी आलोचना की सबसे सजग, सतर्क, बहुपठित और संवादी परम्परा का अवसान हुआ है. लगभग चार दशक तक मैं नामवर के होने का मतलब ढूँढ़ रहा था और अब उनके न होने के मायने ढूँढ़ रहा हूं. एक बड़ा शून्य है. और एक खोया हुआ क्षितिज. हम सब नामवर जी के जन्म शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं. इस समय-द्वार पर नामवर सिंह की उपलब्धियों, व्यक्तित्व और कृतित्व का तोरण बँधा है. उनकी विद्वता का मंगलाचार हो रहा है. उनके ज्ञान का स्वस्तिवाचन हो रहा है. उनके कहे-बताए का विश्लेषण यज्ञ चल रहा है. लेकिन इस सारे शामियाने के ऊपर रिक्तता का घटाटोप है. एक शून्य जिसके चारों ओर घिरते मेघ कभी रामचंद्र शुक्ल, कभी हजारी प्रसाद द्विवेदी तो कभी नामवर जी की छवियां बनाते-तैराते रहते हैं. चौथी परंपरा, चौथा चेहरा, चौथा स्तंभ, चौथा कोण कहीं दिखता नहीं. संकेत नहीं देता. इशारा नहीं करता. मैं हिंदी के इस अभाव को धूप में दौड़ते एक अनाथ बालक की तरह देखता हूं. सचमुच, बड़ी मुद्दत में होता है, कहीं कोई नामवर पैदा…।

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