पंखुरी सिन्हा की कविताएँ


पंखुरी सिन्हा 

वैसे तो मनुष्य की जरूरतें अन्तहीन होती हैं लेकिन तीन जरूरतें आधारभूत होती हैं जिन्हें हम इन्हें रोटी, कपड़ा और मकान के नाम से जानते हैं। हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से चाहता है कि उसका अपना एक घर हो जहां वह सुकून से अपनी निजता के साथ रह सके। जहां वह चैन से रात की नींद ले सके। लेकिन घर सबको कहां मयस्सर हो पाता है। वैसे भी घर बनाना आसान नहीं होता। मशहूर गजलकार बशीर बद्र साहब की पंक्तियाँ याद आती हैं 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।' ये पंक्तियाँ किसी व्यक्ति की घर के प्रति उस लगाव और दर्द को बयां करती हैं जो संवेदनात्मक स्तर पर उससे गहरे तौर पर जुड़ी होती हैं। यह संवेदना इतनी घनीभूत होती है कि व्यक्ति अपनी अंतिम साँस अपने घर में ही लेने की हसरत रखता है। लेकिन स्त्रियों के सन्दर्भ में बातें अलग हो जाती हैं। स्त्रियों को घर में रहते हुए ही उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से संघर्ष करना होता है जो उनके वजूद तक को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं होता। पंखुरी सिन्हा ने भी घर को केन्द्रित कर कुछ महत्वपूर्ण कविताएं लिखी हैं। वे सवाल पूछती हैं कि 'आखिर घर में कितनी महफूज होती हैं स्त्रियाँ'। हाल ही में प्रकाशित एक रपट के अनुसार अपने निकट के संबंधियों, रिश्तेदारों और मित्रों की बदसलूकी का शिकार बनती हैं लड़कियाँ और स्त्रियाँ। इस आलोक में पंखुरी की इन कविताओं को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंखुरी सिन्हा की कविताएं।


पंखुरी सिन्हा की कविताएँ 


हमारा एक घर होगा

‘हमारा एक घर होगा'

यही कहा था उसने 

मेरे बहुत कहने पर कि 

वह हर कदम मेरे साथ है 

कुछ तो ज़रूर बात है 

क्या जो अमूमन ऐसी बातों में 

समझ ली जा सकने वाली बात है

वही बात है? मेरे बहुत पूछने पर

'हमारा एक घर होगा' 

यही कहा था उसने! कमाल की 

बात, सारे सुन्दर भावों को परे हटाकर

एक ठोस पुख्ता बात!

कुछ ईंट, बालू सी रुखडी बात! 

पर बात पत्थर की लकीर सी!

सुनने में अच्छी लगी पर सख्त भी! 

मीठी भी, खट्टी भी! बी ए 

फ़र्स्ट इयर में 

कितनी आगे की बात! 


काश, वह घर उसके सब कहे 

की गवाही दे पाता! दे देता! 

क्या कुछ कहा उसने जो सब 

मेरे साथ सुना उस घर ने! 

ओह! ये सब भी सुनना होगा 

सोचा न था कभी, क्या मेरे साथ 

सोचा होगा घर ने? घर जिसे

बड़े प्यार, बड़े जतन से सजाया मैने! 

कहते हैं, दीवारों के भी कान होते हैं

मैं पूछती हूँ ज़बानें 

क्यों नहीं होती उनकी कि 

उनकी हो सकती बाकायदा पेशी! 


हम उस घर में नहीं है 

घर तो लेकिन फिर भी है!

हो सकता है, किसी दिन 

किसी रात, वह सचमुच बोले! 


कहानी घर घर की 

कहानी घर घर की 

कहने का मतलब यही 

नहीं होता कि एक ही 

कहानी होती है हर घर की! 

बल्कि मतलब सिर्फ इतना होता है कि

एक कहानी होती है हर घर की! 

अमूमन घर में कोई एक बोलने वाला

कोई और सुनने वाला होता है! 

कोई चलाने वाला, कोई चलने वाला! 

बहुत से लोग होते हैं प्यार में 

गुत्थमगुत्था, आलिंगन बद्ध 

किन्तु, कब और कितनी फैलानी हैं बाहें

तय करने वाला! सब जानते हैं घर 

किसके इशारे पर चलता है 

और कौन उसे चलाता है!! 


घरों को होते हैं तोड़ने वाले 

जोड़ने वाले और होते हैं बचाने वाले 

और ऐसे सब मौकों पर 

घर स्वतः पर्याय हो जाता है 

परिवार का--घर परिवार 

एक जुमला नहीं, सच है!


वे जो अपने कांधों पर 

ढ़ोते हैं परिवार का ढांचा 

साँचा, जोड़ने का सारा लोहा 

लक्कर, ईंट , गिट्टी गाड़ा, सीमेंट

वो बता सकते हैं घर का असल पता!



चुन्नू के लिए घर बनाम अन्तिम परिभाषा में घर

चुन्नू के लिए घर

माँ के बनाए भोजन की 

सुगंध रहा सबसे ज्यादा 

मुन्नू के लिए गिल्ली डंडा 

छिपाने की जगह, चुन्नी के 

लिये घर हुआ चुन्नी उतार 

देने की आफियत! मुन्नी के 

लिये घर सारी ज़िद मनवाने 

का ठिकाना, माँ बाप रहे सदा 

घर के आसपास, बाज़ार, सौदा  

काम में, बच्चों के आते जाते 

उन्होँने कभी न सोचा 

घर के बारे में अलग से

किन्तु एक दिन, जब एक 

अनौपचारिक विदेशी साक्षात्कार 

में उनमें से एक बच्चे से पूछा गया

'ए बाबू, घर कहाँ है?'

तो उसका अर्थ हुआ जहाँ से 

वो आते थे, या फिर जहाँ वो 

रहते थे! और इस तरह, अपनी 

अन्तिम परिभाषा में घर देश का 

नाम हो गया! 


‘चुप्पी में रहने की तरह’

चुप्पी में रहने की तरह

ढ़ेर सारी चुप्पी 

और आवाज़ में रहने की तरह 

ढ़ेर सारी आवाज़ 

एक घर में रहते हैं ढ़ेर 

सारे घर, कई कई घर 

सबके अपने अपने घर

बनते बिगड़ते सपनों

नाकाम हसरतों 

अधूरी इच्छाओं के घर 

जिन सब के होते हैं 

अपने अपने खुफिया 

कोने! ये कोने भी न मिलें 

तो नाकाबिले बर्दाश्त हो 

जाये घर! 'अ रूम ऑफ 

वंस ओन'--अरसा पहले 

कह दिया था वर्जिनिया 

वुल्फ ने, "और राम, मेरा कमरा?"--पूछती है 

अनामिका दी की कविता, पर कितनी 

स्त्रियों को मयस्सर है 

घर में अपना कमरा?

कोई एक महफ़ूज कोना!

ज़रा भी स्पेस न हो तो 

नाकाबिले बर्दाश्त हो जाए 

घर! घर अपना कैसे होता है?

प्यार मुहब्बत दूर की बातें हैं 

अपने ही घर में अभी अभी 

सजी धजी ट्विंकल शर्मा की 

हुई है दहेज़ सम्बंधी ह्त्या! 


लाँघना घर की देहरी 

'चाहे जो भी हो, उस घर की देहरी लाँघना मत!'

'इस घर से उठी है तुम्हारी डोली, उस घर 

से तुम्हारी अर्थी ही निकले'--इस 

किस्म के आशीर्वचनों, ऐसी नसीहतों से

चूम, परीछ कर, आज भी विदा की जाती हैं 

लड़कियाँ, पढ़ी लिखी लड़कियाँ! इस और उस घर 

की मर्यादा की भारी भरकम 

पगड़ी और तगडी के बीच कहाँ 

होता है स्त्री का अपना घर?

कोई नहीं पूछता! कोई नहीं पूछता, उस हक की बात!

घर की देहरी लाँघ जाने वाली 

स्त्री से बस पूछी जाती है 

मर्यादा ही की बात! मर्यादा 

पुरुषोत्तम राम वो हैं जो फकत 

एक धोबी की बकवास पर देते हैं 

सीता को वनवास! पवित्रता की कसौटी 

पर नापी और मापी जाती है स्त्री! 

कभी नहीं तोला, आंका जाता है पुरुष उस तरह!

घर तो घर, प्यार भी जान 

देने की चीज़ नहीं होती!

हम कब सिखाएंगे अपनी 

लड़कियों को खुल्लम-खुल्ला?!



घर का इस्तेमाल

अव्वल तो यह कि घर में 

केवल दफ्तर की बात!

इस तरह नहीं दफ्तर की बात 

कि है दफ्तर, दिलचस्प है और यह हो तुम! 

ये रहे हम और तुम, एक अदद ज़िन्दगी हमारी 

हम बनाएं आगे की खूबसूरत योजनाएं!

पर ये एक अदद ज़िन्दगी हमारी 

तय हो वाया मार्फत लोगों के! है मंज़ूर?

जो मैं कह रही थी 

मुझे चुप कर के, अब केवल 

दफ्तर की बात, लोग या निमंत्रण!

 मैं दफ्तर की किसी न किसी 

बात का जवाब देती हुई! मैं 

लगातार गुम की जाती हुई, 

मेरे अपने घर में! और मेरे 

आगे बस अजीब अजीब से 

सवाल! उसके! क्या दफ्तर के 

भी? या शहर के? वह शहर जो 

दफ्तर की बदौलत था? 

क्या राजनीति थी? जाने 

किसकी व्यवस्था? क्या मैंने 

बहुत देर से समझा है, क्या 

चीज़ है इमिग्रेशन? खेल खत्म होने के बाद 

समझा है क्या चीज़ है इमिग्रेशन?! बहुत 

मुमकिन है दफ्तर में सब अच्छा हो! 

बस अपना सिक्का, अपना आदमी खोटा 

लेकिन ये सब कुछ, ये सवाल ये जवाब 

ये आना, जाना, बुलाना, सब हुआ घर में! 

या घर से निकलते! कहीं 

न कहीं घर का इस्तेमाल! 

जिसे उसे करने का हक नहीं!

कोई तो होगा ये सवाल करने 

वाला कि इन सवालों का उसे 

हक नहीं! कमाल कि जो अपने यहाँ आए 

सवालों की वैसी ही पहेली लाए?! 

कोई तो होगा इस सब पर सवाल 

करने वाला!


घर यानी मिलना मिलाना 

घर यानी मिलना मिलाना 

यार, दोस्त, महफिल! 

किसे नहीं सुहाता?

लेकिन महफिल का हो जाना

आपकी शिनाख्त की महफिल

किसी को न सुहाएगा!

आपके क्या करने से लेकर 

आप के हर पिछले किये का हिसाब?

वह भी आप ही के घर में?

अब तो, आप ही की जुटाई महफिल में! 

तो बनता है एक बेहतर महफिल 

जुटाने का प्रयास! अब तो दोस्त ही 

बचे! सवाल ये नहीं कि क्या कुछ 

बचा, सवाल ये कि बिखरने में पहले 

घर के, क्या कुछ की शिनाख्त का हाथ था!? 

हम कितने हम थे, मैं और वह!

कितने साथ थे, कितने अलग? 

महफिल उसकी थी, सजाने वाला वह !

दरअसल, उनके सवाल कभी इस तरह 

दोस्ताने न थे कि मैं बता पाती अपना कोई हाल! 

जरूरी भी न था, हाल बदल 

सकते थे बिना उन्हें बताए भी! हाल बदलने 

के लिए बतानी थी उन्हें ये बात 

समझ आई घर बिखरने के बाद! 

या शायद घर को जितना बिखेरा गया

और फिर बसने से रोका गया उसके बाद! 

फिलहाल, अब घर कहाँ कितना, किसके साथ? 

मैं इन सबके खुद कुछ 

कुछ ढूँढ रही हूँ जवाब! 


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


सम्पर्क 


ई मेल : nilirag18@gmail.com

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मां की मृत्यु पर कविताएं

हरिवंशराय बच्चन की नव वर्ष पर कविताएँ

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'