प्रेमचन्‍द गांधी




तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझती हुई यह 'स्त्री की अदम्य जिजीविषा' ही है जिसने हमारी दुनिया को इस कदर खूबसूरत बनाए रखा है। लेकिन सवाल यह है कि उसकी जिजीविषा की तह में कितने लोग झाँक पाते हैं? यह कवि है जो इस दुनिया में शिद्दत से प्रवेश करता है। और देखता है कि कैंसर के रोग से उबर कर नए जीवन की तलाश में आगे बढ़ती स्त्री है। नकाब के दायरे से बाहर निकल कर सोचती हुई लड़कियाँ है। साथ-साथ जीवन की बलिबेदी पर अपने सारे चाहतों, सारी खुशियों को आहूत करती अखण्ड कुमारियाँ हैं। प्रेमचंद गाँधी हमारे समय के एक सशक्त रचनाकार हैं जिनकी दृष्टि इस दुनिया के उन कोनो-अतरों तक जाती है जो प्रायः उपेक्षित हैं और जिनका एक बड़ा हाथ है इस दुनिया को आभामय बनाने में। पहली बार पर प्रस्तुत है प्रेमचंद गांधी की कुछ इसी रंग की कविताएँ।  
         
सपनों में रोती हुई स्‍त्री


मेरे सपनों में क्‍स
वो आती है रोती हुई
उसकी घुटी-घुटी चीखें
कांपती हुई दीये की लौ जैसी आवाज़
अंधेरों को चीरकर मुझ तक आती है

भूख से बेहाल
पति से परेशान
च्‍चों से उपेक्षित
एक स्‍त्री रोती है चुपचाप
उसकी रुलाई मेरे गले में
उमड़ती-घुमड़ती है
एक आवाज़ ब्‍दों में बदलने को बेताब हो जैसे

सदियों से रोती आई है एक स्‍त्री इसी तरह
कविता में उसकी रुलाई का
कोई अनुवाद संभव नहीं हुआ मुझसे
उसकी कातर आंखों में नहीं तैरते
प्रेम-प्रणय के स्‍वप्‍न भरे दृश्‍य
जाने कितने दरवाज़ों में बंद हैं
उसकी पीड़ा और दुखों की गठरियां बेहिसाब
जाने कितनी दीवारें खड़ी कर दी हैं उसने
अपनी दुनिया के इर्द-गिर्द कि
उसकी रुलाई सिर्फ़ सपनों में ही सुनाई देती है

मैं थाम लेना चाहता हूं उसकी हिचकियां
पोंछ देना चाहता हूं उसके आंसू
दुनिया के सामने उसकी नकली मुस्‍का का परदा
हटा देना चाहता हूं मैं लेकिन
एक हाथ से मुंह ढांप कर
रुलाई को बाहर आने से बचाती हुई वह
दूसरे हाथ से रोक देती है मुझे भी

मेरे सपनों में हाहाकार मचाने वाली
कभी दिन के उजालों में मिले तो
कैसे पहचान पाउंगा मैं
एक रोती हुई स्‍त्री
दिन की रोशनी में सिर्फ़
मृत्‍यु की भ्‍यर्थना करती है

व्रत, उपवास और प्रार्थनाओं से
एक अज्ञात श्‍व को रिझा कर
जीवन बदल देने की प्रार्थना करती स्‍त्री के आंसू
पूजाघरों में स्‍वीकार्य नहीं होते
जिंदगी के दुखों का मैल है आंसू
तमाम धर्मों में वर्जित हैं
स्‍त्री के आंसुओं के नैवेद्य

स्‍वप्‍न के जाने कौन से क्षण में
अदृश्‍य हो जाती है वह स्‍त्री
भूख और पीड़ा कब
च्‍चों की लोरियों की तरह
नींद की चादर तान कर
सुला देती है उसे और मुझे

सुबह की ण्‍डी हवा में
सूख चुके आंसुओं की नमी है
पक्षियों के कलरव में जैसे
उस स्‍त्री की रुलाई के गीत हैं
बादलों की चित्रकारी में उसका चेहरा है
और मैं आकाश की तरह
चुपचाप सुनता हूं जैसे
पृथ्‍वी का हाहाकार... 


छीजते चांद के दिनों में
समय के कृष्‍णपक्ष में
ये चांद के छीजते जाने के दिन थे
बेढ़ब कुतरा हुआ चांद बिसूरता था जब
चुपचाप आसमान में, तभी
अंधकार की ओढ़नी ओढ़े
इतिहास के किसी अज्ञात खंडहर से
सशरीर निकलकर आती है
एक काव्‍य नायिका और
हमारे समय में व्‍याप जाती है
किसी भी गृहस्थिन की तरह चुपचाप
सदियों पुराना एक नाम लिये
पति, परिवार, बच्‍चों और
पीहर-ससुराल के बीच खटती
सदियों से जैसे मरती-जीती
एक पूनम की रात ताकती है चांद
जैसे कवि टकटकी लगाये देखते हैं चांद
असंख्‍य निगाहें जमी हैं चांद पर
जैसे करघे पर कसे हों धागे
सृष्टि की दस्‍तकार जैसी अंगुलियां
उलझा देती हैं कुछ धागों जैसी निगाहों को
जिनमें चांद के लिए उमड़ता प्रेम
बाहर छलक जाता है
कुदरत का करघा मिला देता है
अजनबी निगाहों को
एक नये करघे पर
प्रेम की चदरिया बुनने के लिये
पूनम की वह रात
फिर रात नहीं रहती
एक सदी बन जाती है प्रेम की
जिसे अगले दिन से छीजते जाना है
कृष्‍णपक्ष के चंद्रमा की तरह
जैसे चौके-चूल्‍हे में छीजती है
कवियों की गृहस्‍थ काव्‍य-नायिका
समय तिथियों में नहीं चलता
व्‍यक्‍त होता है बस, और चांद
तिथियों में ही छीजता-बनता है
जैसे गृहस्‍थ नायिका की नींद
घड़ी की सुइयों से नहीं होती तय
घर की भागदौड़ से बंधी होती है
छीजते चांद के दिनों में जब
पति या बच्‍चे की बगल में लेटी नायिका
देख रही होती है कवि का स्‍वप्‍न
चांद भेज देता है उसके स्‍वप्‍न में
एक हाहाकार मचाती हुई उल्‍का
कवि और कविता से डर जाती है नायिका
इतिहास से मिला नाम भी /इस घबराहट में
उसकी कोई मदद नहीं करता
कवि की उदास, लाचारगी जताती कविता
उसे और निराश कर देती है
छीजता हुआ चांद उसे
डांवाडोल गृहस्‍थी के दिनों में
चूहों की कुतरी हुई
रोटी-सा नजर आता है
तेज हवा के झोंकों से जब
बजने लगते हैं खिड़की-दरवाजे
आशंकित हो जाती हैं काव्‍य-नायिकाएं और
एक दिन आ ही जाती है अमावस
एक रात जो सुकून देती है कि
चलो पिंड छूटा चांद से
पूजा के बाद
गाय को रोटी खिलाती हुई
वे बेहद खुश होती हैं
अमावस के दिन
दूज का चांद ललचाता है उन्‍हें
कुदरत का करघा बुलाता है उन्‍हें
कवियों के साथ
वे फिर ताकने लगती हैं

बढ़ते हुए चंद्रमा को
पूर्णिमा की प्रतीक्षा में।
सुंदर स्त्रियों के दु:ख

असुंदर और साधारण स्त्रियों की तरह
सुंदर स्त्रियों के भी होते हैं दु:ख
विश्‍वास न हो तो विश्‍व-सुंदरी से पूछ लें

उन्‍हें सिनेमा में ब्रेक न मिलने से लेकर
अखबार में तस्‍वीर न छपने तक के दु:ख
व्‍यापते रहते हैं अहर्निश

पति और प्रेमी द्वारा
लगातार प्रशंसा न करने का भी दु:ख
सालता रहता है उन्‍हें
किसी के द्वारा प्रशंसा-भाव से न देखना भी
उन्‍हें उपेक्षा लगता है

रखरखाव को लेकर बेहद चिंतित रहती हैं वे
नख से लेकर शिखा तक की चिंता में
दौड़ती रहती हैं पार्लर दर पार्लर
सिंथेटिक और हर्बल के घालमेल में
शरीर को बना डालती हैं प्रयोगशाला

अपने बच्‍चों के चेहरे
पिता या बुजुर्गों पर जाने से
परेशान रहती हैं वे
बच्‍चों को रगड़-रगड़ कर नहलाते हुए
भविष्‍य की चिंता में खो जाती हैं वे
हाय राम! ऐसी सुंदर मां की इतनी साधारण संतान

उम्रदार और समझदार बच्‍चों द्वारा
मेहंदी या डाई न लगाने की सलाह देने पर भी
दु:खी हो जाती हैं वे

बहू और दामाद के चयन में
अंतत: उनकी सलाह न मानने की फिक्र में
घुली जाती हैं वे

असुरक्षा का भय
हरदम सताता रहता है उन्‍हें
बच्‍चे तक की अंगुली पकड़कर
निकल जाती हैं वे
कहीं भी सुरक्षित पहुंच जाने के लिए

वे जब भी देखती हैं दूसरी सुंदरी को
कोई कमी निकालने की चिंता लग जाती है उन्‍हें

वृद्धावस्‍था में भी दिखना चाहती हैं युवती जैसी
समय के साथ बूढ़ी और लाचार होने पर
गुजरे जमाने को याद करते हुए एक दिन
इस सुरम्‍य-सुंदर पृथ्‍वी में
अपने तमाम दु:खों और सौंदर्य के साथ
विलीन हो जाती हैं सभी सुंदरियां। 


अखण्‍ड कुमारियां

यूं कहने के लिए
उनके जीवन में नहीं होता कोई दु:ख
सामान्‍य स्त्रियों जैसी ही दिखती हैं वे
जीवन से भरपूर
परिवार और दुनिया-जहान की चिंताओं में मसरूफ


दुनिया की नज़रों में वे
अविवाहित कुंवारियां हैं या कि
असमय हो गई विधवाएं
जिन्‍होंने जीवन में कभी
प्रवेश नहीं करने दिया किसी पुरुष को
और काट दिया जिंदगी का लंबा सफ़र
बिल्‍कुल तन्‍हा

इन दोशीजा औरतों की अपनी कहानियां हैं
शायद ही किसी ने चुना हो
ऐसा जीवन अपनी मर्जी से

किशोरावस्‍था में हर लड़की की तरह
अपनी दैहिक-जैविक ऋतुओं का
कष्‍ट भोगा होगा इन्‍होंने और
स्‍त्री की नियति की तरह
स्‍वीकार कर लिया होगा

खिले होंगे एक दौर में
इनके जीवन आंगन में भी
कामनाओं के कुसुम
लेकिन संस्‍कारों और नैतिक बंधनों में इन्‍होंने
यूं ही चुपचाप झर जाने दिया होगा उन फूलों को

शिक्षा और कैरियर की चिंता में
घुलती रही होंगी बरसों-बरस
परिवार के लिए खटती रही होंगी
खुद से पहले देखा होगा इन्‍होंने
भाई-बहन-परिवार का भविष्‍य

समझे होंगे चाहत के तमाम इशारे
दबी हुई मुस्‍कान को पीते हुए
चेहरे पर ओढ़ ली होगी कठोरता
कितने चाहने वालों की नजरों में
बनी होंगी निष्‍ठुर-पत्‍थरदिल

परिवार ने देखे होंगे बहुतेरे लड़के
सभी में कमियां निकाली होंगी इन्‍होंने
सर्वगुण संपन्‍न साथी की प्रतीक्षा में
छूटते ही गए होंगे
संभावित गुणवान वर
अपनी ही जिद और आकांक्षा की मारी
इन कुंवारियों को नहीं समझ में आई होगी
बुजुर्गों की सीख कि
बेटा असली सोने से तो गहने भी नहीं बनते
खोट तो मिलाना ही पड़ता है

लंबी प्रतीक्षा के बाद
लोगों ने ही छोड़ दी होगी उम्‍मीदें
फिर तो भूले-बिसरे ही आते होंगे पाहुन
इंतजार की गुजरती रेल
रुकती होगी साल में एकाध बार
लाती होगी किसी विधुर या
प्रौढावस्‍था को अग्रसर वर

निर्जन रेगिस्‍तान में खड़ी खेजड़ी की तरह
रेत के बनते बिगड़ते टीलों को देखती
इनकी आंखों ने कहा होगा इन्‍हें ही कि
जब कोई पथिक ही नहीं राह में तो
क्‍यों उगाती हो सजावट के फूल और
धीरे-धीरे इन्‍होंने छोड़ दिया होगा
सजना-संवरना

जैन साध्वियों की तरह
कम करती गई होंगी अपनी जरूरतें
सादगी को बनाया होगा जीवन का मूलमंत्र
और छोड़ दिए होंगे तमाम आकर्षण

जिस दुनिया में लोग
हमेशा लगे रहते हैं इसी उधेड़बुन में कि
लोग किसी तरह तो उन पर ध्‍यान दें
इन स्त्रियों ने कैसे तैयार किया होगा खुद को कि
लोग उनकी तरफ न देखें
न सोचें उनके बारे में

अपने निविड़ एकांत में भी
नहीं खोले होंगे इन्‍होंने वो दरवाजे
जिनसे दाखिल होते हैं पुरुष
स्त्रियों की चेतना में

जैविक ऋतुओं से लड़ते-लड़ते वे एक दिन
सब औरतों की तरह निवृत हो जाती हैं
कुदरत के इस चक्र से

उनकी चेतना में गहराने लगती है
पहली बार अपने भविष्‍य की भयावहता
जिनके लिए देखती आईं वे
उम्र भर स्‍वप्‍न
उनके पास था अपना ही भविष्‍य
जिसमें कहीं नहीं समाती थीं
ये अखण्‍ड कुमारियां

ये न काशी जाएंगी न वृंदावन
अपने ही घर में रहेंगी
बुढ़ापे की लाठी टेकती एक दिन
परिजनों के कंधों पर
अंतिम यात्रा के लिए निकल जाएंगी।


कैंसर से लड़ती एक स्‍त्री

वह किसी अज्ञातलोक से
उसकी छातियों में उतर आया था
एक मामूली फुंसी से
देहनाशी दैत्‍य में बदलता हुआ

ना जाने पीड़ा के कितने पर्वतों को पार कर
स्‍वीकार किया होगा उसने
ह्रदय के सबसे निकट रहे
उन्‍नत और पुष्‍ट उरोजों में से
रोगग्रस्‍त एक को समूचा निकाल देना

कीमोथैरेपी ने गायब कर दी है
उसकी लहराती जुल्‍फें
धनुषाकार भौंहें
लेकिन चेहरे पर मौजूद हैं
एक लंबी लड़ाई में जीतने के निशान

अस्‍पताल से अकेली घर लौट रही है वह
आदतन उसका हाथ जाता है
पैसा रखने-निकालने के लिए
छातियों के बीच पुरानी जगह
और लौट आता है
उफ्फ !
कितना दर्दनाक होता है
एक अंग का चले जाना

साड़ी और शॉल से
गंजे सिर और एकमात्र स्‍तन को ढकते हुए
मुस्‍कुराकर चल देती है घर के लिए
जैसे कैंसर को अस्‍पताल में छोड़ आई हो
किसी अनजान सहयात्री की तरह
जो मिल गया था जीवन की लंबी यात्रा में अचानक
और अब जिसके बचने की
कोई उम्‍मीद नहीं बची हो।

अगर हर्फों में ही है खुदा

वे घर से निकलती हैं
स्‍कूल-कॉलेज के लिए
रंगीन स्‍कार्फ या बुरके में
मोहल्‍ले से बाहर आते ही
बस या ऑटो रिक्‍शा में बैठते ही
हिदायतों को तह करते हुए
उतार देती हैं जकड़न भरे सारे नकाब

वे जिन किताबों को पढ़कर बड़ी होती हैं
उनमें कहीं जिक्र नहीं होता नकाबों का
इतने बेनकाब होते हैं उनकी किताबों के शब्‍द कि
अक्‍सर उन्‍हें रुलाई आती है
परदों में बंद
अपने परिवार की स्त्रियों के लिए
उनकी खामोश सुबकियों और सिसकियों में
आंसुओं का कलमा है
ला इलाह इलिल्‍लाह

कहां हो पैगंबर हज़रत मोहम्‍मद साहेब
ये पढ़ने जाती मुसलमान लड़कियां
आप ही को पुकारती हैं चुपचाप

आप आयें तो इन्‍हें निजात मिले जकड़न से
अर्थ मिले उन शब्‍दों को  जो नाजि़ल हुए थे आप पर

अगर हर्फों में ही है खुदा तो 
वो जाहिर क्‍यों नहीं होता रोशनाई में।


संपर्क : 
प्रेमचन्‍द गांधी
220, रामा हैरिटेज, सेंट्रल स्‍पाइन, 
विद्याधर नगर, जयपुर 302 023 
मोबाइल- 09829190626


टिप्पणियाँ

  1. अगर हर्फों में ही है खुदा
    बेहतरीन रचना , बधाई प्रेमचंद भाई

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  2. सभी रचनाएं एक से बढकर एक
    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहद ही मार्मिक और संवदेनशील रचनाएँ . बेहतरीन प्रस्तुति . 'सुंदर स्त्रियों के दुःख ' ने बहुत प्रभावित किया . पहलीबार का आभार -नित्यानन्द गायेन
    सादर

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  4. प्रेमचंद जी की सभी कविताएँ बहुत अच्छी हैं। स्त्रीमन और यथार्थ का ऐसा संश्लिष्ट चित्र प्रेमचंद जी के समकालीनों में कम दिखता है। बहुत बधाई प्रेमचंद जी।

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  5. प्रेम अपनी कविताओं के माध्यम से ;लगातार यह बता रहे हैं स्त्री प्रकृति का सबसे सुंदर रूप है और समाज के सकारात्मक निर्माण में उसका संघर्ष भी सबसे बड़ा संघर्ष हैं. स्त्री मन , यौनिक आकांक्षाओं , उसके संसारी क्रियाकलाप की सक्रियता , जीवन विडंबना के न वाकिफ रूपों की करुण क्षणों में तिल-तिल छीजता स्त्री स्वरूप और उसका महा संघर्ष से कवि का भावबोध' किसी अनजान सहयात्री न रहकर एक भावुक साथी बनने की चाह में ' कुदरत का करघा बुलाता है उन्हें\ कविओं के साथ वे फिर ताकने लगती हैं ' जूझ रहा है. अपने मन संसार में स्त्री के मन संसार को रचने वाले कुशल द्रष्टिवान कवि को इन कविताओं के लिए बहुत बहुत बधाई और पहली बार का इन अर्थगर्भित कवितायों को हमारे लिए प्रस्तुत करने का धन्यवाद

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  6. keshav tiwari

    Premchand gahri jeevan drasti wale kawi han. Kawita unke yahan kuchh kahne ki kosis nahi.jeevan k kone antre tahlne use manveeya bodh se dekhne ka upkram ha. Pahli kawita adhik achchi lagi. In kawiton se gujrana ak bahut gahre santap aur karuda se gujrna ha. Idher nari ko leker aisi doob ker likhi kawitayen nahi padhi.

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  7. shambhu yadav

    प्रेम अपनी कविताओं के माध्यम से; लगातार यह बता रहे हैं स्त्री प्रकृति का सबसे सुंदर रूप है और समाज के सकारात्मक निर्माण में उसका संघर्ष भी सबसे बड़ा संघर्ष हैं. स्त्री मन, यौनिक आकांक्षाओं, उसके संसारी क्रियाकलाप की सक्रियता, जीवन विडंबना के न वाकिफ रूपों की करुण क्षणों में तिल-तिल छीजता स्त्री स्वरूप और उसका महा संघर्ष से कवि का भावबोध' किसी अनजान सहयात्री न रहकर एक भावुक साथी बनने की चाह में' कुदरत का करघा बुलाता है उन्हें\ कविओं के साथ वे फिर ताकने लगती हैं' जूझ रहा है. अपने मन संसार में स्त्री के मन संसार को रचने वाले कुशल द्रष्टिवान कवि को इन कविताओं के लिए बहुत बहुत बधाई और पहली बार का इन अर्थगर्भित कवितायों को हमारे लिए प्रस्तुत करने का धन्यवाद

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  8. Shailendra jai

    badi marmik aur achchi kavita hai, premchandra ji ko badhayi

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. प्रथम दो कवितायें बेहद प्रभावित करती हैं पाठक को साथ बहाती हुई बहुत सही निभी ..बाकी सुंदर स्त्रियों के दुःख , अखंड कुमारियाँ और कैसर से लड़ती स्त्री कविताओं में कई जगह असहमतियाँ आपत्तियां हैं, माने अंतिम तीन विवादास्पद जरुर हैं.. स्त्री संवेदनाओं को आवश्यक गौर ,नाजुक और मानवीयता से हैंडिल करने की जरूरत अधूरी लगती रही ..खैर प्रेम भाई को हार्दिक बधाई पहली बार का शुक्रिया

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  11. सपनों में रोती हुई स्त्री, छीजते चाँद के दिनो में अच्छी कवितायें लगी, अगर हर्फों में ही है खुदा इस पोस्ट की सबसे शानदार कविता लगी, सुंदर स्त्रियॉं के दुख कविता पर कई बार अटकी हूँ, कहीं कुछ खटक रहा है, स्त्री संवेदनाओं की पड़ताल की कोशिश के लिए प्रेम जी को शुभकामनायें, पहली बार का शुक्रिया........

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  12. सभी कवितायें अच्छी है | भीतर कहीं दिल को छूती हुयी | बधाई भाई प्रेम को |

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  13. अर्चना पंत22 जुलाई 2013 को 2:27 pm

    "तमाम धर्मों में वर्जित हैं, स्त्री के आँसुओं के नैवेद्य..."
    जो कवि नारी की इस गहनतम पीड़ा को स्वर दे सकता है, उसकी क्षमताएं कितनी असीमित होंगी हम स्वयं अनुमान लगा सकते हैं ! ...प्रेम चंद गांधी सचमुच आज के एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में दिखाई देने लगे हैं !.... उनकी हर कविता उनकी सोच के एक नये आयाम का परिचय देती है ! ... उनकी कविताओं से झांकती, उनकी सहज कोमलता, स्वतः स्फूर्त करुणा , नारी के अंतर्मन को इतनी सूक्ष्मता और गूढ़ता से पढ़ पाने की उनकी वो अद्भुत दृष्टि सचमुच अवाक कर जाती है !

    बहुत, बहुत बधाई .... और अनंत शुभकामनाएँ !

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