जावेद आलम खान की कविताएं




परिचय

नाम - जावेद आलम खान

जन्म - 15 मार्च 1980

जन्मस्थान -  जलालाबाद, जनपद- शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा - एम. ए. हिंदी , एम. एड, नेट (हिंदी)

सम्प्रति - शिक्षा निदेशालय दिल्ली के अधीन टी जी टी हिंदी


प्रकाशन -

कविता संग्रह - स्याह वक़्त की इबारतें (2023),  सलीब पर नागरिकता  (2026)


बार बार एक सवाल मन में आता है कि सभ्य होने का पैमाना क्या है? आज के समय में यह सवाल कुछ और ही परेशान करता है। मुश्किल यह है कि हम खुद ही सभ्यता का यह पैमाना बना लेते हैं और खुद को ही सभ्य घोषित कर लेते हैं। दरअसल सभ्य होना उस संवेदनशीलता से जुड़ना होता है जिसमें मनुष्यता सर्वोपरि हो जाती है। स्वाभाविक तौर पर बुद्धिजीवियों से तो हम कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं पाल लेते हैं अलग बात है कि बुद्धिजीवी बड़े महीन तरीके से सभ्यता की चादर ओढ कर अपने कारनामे करते हैं और छद्म को आजीवन निभाते रहते हैं। जावेद आलम खान की 'बस इतना ही' कविता पढ़ते हुए न जाने क्यों मुझे कबीर की पंक्तियां याद आईं 'साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥' जिस समय लोगों में दुनिया को मुट्ठी में कर लेने की हवस चरम पर हो ऐसे समय में अगर कोई कवि ईमानदारी से यह लिखे तो उसकी तरफ ध्यान जाना स्वाभाविक है  'इतना विस्तार चाहता हूं अपने भीतर/ कि मेट्रो या बस में बैठते वक्त/ बगल में बैठी लड़की अपने में सिमटने लगे/ तो उठ कर किसी दूसरी जगह पर बैठ जाऊं/ ...इतनी गुंजाइश रखना चाहता हूं खुद में/ कि हार जाने पर जीतने वाले को बधाई दे सकूं l/ किसी की खुशी में शामिल हो जाऊं और दुख में रो पड़ूं/ दोस्तों की तरक्की हो तो जल भुन न जाऊं।' सेतु प्रकाशन से जावेद का हाल ही में एक उम्दा कविता संग्रह आया है 'सलीब पर नागरिकता'। यह संग्रह हमें इस बात के लिए आश्वस्त करता है कि आज भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है और एक उम्मीद जगाता है कि फासिस्ट चाहें जितना हुंकार भर लें, जीत तो मनुष्यता और मुहब्बत की ही होगी। जंग हमेशा की तरह खत्म होंगे और अमन की बात करनी ही होगी। कवि के इस संग्रह को आवश्यक रूप से पढ़ा जाना चाहिए। संग्रह के प्रकाशन पर कवि को बधाई देते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं जावेद आलम खान की कुछ कविताएं जो हमने इसी संग्रह से साभार लिया है।



जावेद आलम खान की कविताएं 



अनागरिकता 


दुनिया के संविधान में अनागरिकों की

एक लिखित नियमावली होनी चाहिए

अनुपयोगिता की भी होनी चाहिए एक संहिता

फ़लसफ़ों से बाहर लिखी जानी चाहिए

बरहना जिस्म पर ताज-सी सजी

लामकाँ हो जाने की अनकही पीड़ा


तुम्हारा शग़ल है तो छीन लो हमारी नागरिकता

लेकिन तहजीब में रची-बसी

और हमारे रोम-रोम से फूटती भाषा से

कैसे छीनोगे उसका हिंदुस्तानी तार्रूफ़

कैसे छीनोगे हमारी नस्ल जो तुम्हारी भी नस्ल है

अगरचे हमारी पहचान को दफ़न करना तुम्हारी सनक है

तो आओ हमारी देह के साथ

अपनी सनक को भी दफ़न कर दो

लेकिन मिट्टी को मिट्टी से

अलग कैसे करोगे सरकार


बेइंतिहा चाबुक बरसाओ हमारे ईमान पर

और गर्व से फूल जाओ

लहूलुहान कर दो समूचे वजूद को

और अट्टहास करो

कुर्क कर दो हमारी संपत्तियाँ और जश्न मनाओ

हत्याओं की कारीगरी राष्ट्र-व्यवसाय घोषित करो

और गूँगे पुरोहितों से राजतिलक करवाओ

बलात्कारियों का स्तुति-गान करो

और राष्ट्रीय कवि कहलाओ

भरोसे को छलनी करो

और साम-दाम-दण्ड-भेद पर मुबाहिसे चलवाओ


चीख़ें कान पकड़ लें तो संगीत सुनो

पेट चीर कर निकाले गए मुर्दा चेहरे दिखाई दें

तो ऑपरेशन वाले डॉक्टर-सी फीलिंग लेते हुए

स्कॉच का घूँट भरो

दयालु दिखने के लिए

बग़ीचे में बैठ कर मोर को दाना खिलाओ

ख़ूँरेजी से उकता जाओ तो

रेडियो पर प्यार भरे नग़में सुनो


लेकिन किसी धोखा खाई सर्द रात में

बड़े से घर में निचाट अकेले पड़े-पड़े

हज़ार काँटों की एक साथ चुभन से

कराह उठे बीमार आत्मा

और कुछ समझ न आए

आँखें बंद करने पर दिखाई दे

दंभ का बुलडोजर

तिनका-तिनका हो कर उड़ता हुआ कोई घर

तब नींद के लिए कौन-सी दवा लीजिएगा सरकार?

तिनकों को चुभने से कैसे रोकिएगा सरकार?



मुसलमान


दाएं गुट की भूख मिटाने को हम नर्म गोश्त थे 

वो हमारी चीख पर शिकारी की तरह मुस्कुराते थे 

आदमखोर सत्ता के लिए हमारी आलोचना 

मर्दाना कमजोरी का इलाज थी

हमारी बेकसी को नेजों की नोक पर गली गली घुमाया गया


हमारे शव समादृत थे बांए गुट की व्यूह रचना में 

उन्हे वक्त ज़रूरत अनुयायियों के बीच 

इंकलाबी नारों के साथ

सलीबों पर टांग कर परचम की तरह लहराया गया 


हमारा इंकलाब छूत का ऐसा रोग था 

जो सिर्फ समुदाय की सीमाओं में फैलता था 

इसीलिए मध्यम मार्ग ने उसे अछूत घोषित किया 

हमारी कराहों पर आंसू बहाने वाले 

हमारी हुंकार पर कान बंद कर लेते हैं 

हमारी शिकायतें अरण्य रूदन बन कर विलीन हो गईं 


वह जो अदब में तरक्कीपसंद का तमगा लिए बैठे हैं 

सहानुभूति के बाजार में स्वानुभूति को 

महदूद रास्ते से दाखिल करना चाहते हैं 

चाहते हैं कि कविता में मुसलमान हो 

कविता का मुसलमान हो 

पर कवियों में मुसलमान? 

हो मगर सॉफ्ट हो, लाउड न हो

उनकी कविताओं में 

प्रेम हो, पीड़ा हो, पुचकार हो 

बस ललकार न हो, यलगार न हो, तकरार न हो 


अदब सेकुलर है यहां मजहब पर विमर्श नही होते 

चाहो तो बात हो सकती है अशराफ और पसमांदा पर 

शिया और सुन्नी के विवाद पर

हिजाब पर 

मगर हिंदू मुसलमान पर बात नही होगी 

क्रिया प्रतिक्रिया सिद्धांत अब खत्म होना ही चाहिए

आखिर मुल्क का अमन अदीब का पहला फर्ज़ है 

देखो न कितने सलीके से इसी फर्ज़ के लिए

इस भरी गर्मी में हमने मौन व्रत धारण किया है 

देवभूमि पवित्रता अभियान पर



लड़का जिसके चेहरे पर मोगरे खिलते थे


चांदनी रात में पुलिया पर बैठ कर 

घंटो तलक अपनी ही परछाईं को देखते रहना 


टूट कर गिरते हुए तारे में ढूंढना अपनी किस्मत 


सैकड़ों दफा पढ़े जा चुके खत को 

चुपके से खोलना और उसमे एक चेहरा ढूंढना 


आईने के सामने खड़े हो कर 

चेहरे पर चेचक के दागों के बीच सौंदर्य खोजना 

जैसे कविता ढूंढी जाती हो दो पंक्तियों के बीच


खुली आंखों से कामयाबी के ख्वाब देखना 

और आत्मविश्वास से भर जाना 


नमाज पढ़ना 

और देर तलक दुआओं में किसी का हाथ मांगना 


किताब में रखे सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को 

आरती के फूलों की तरह मान देना


जीवन के घोर नास्तिक चरण को 

प्रेम आस्तिक बना देता है।




सत्य न परेशान है न पराजित 


तराजू के एक पल्ले में खंजर है एक में मुद्रा 

जिसे धवल हाथों में उठाए देवी मुस्कुरा रही हैं 

अपने ही घर में खुद को ढूंढते हम 

वक्त के संजय की उंगली पकड़े 

लाशों की भीड़ में भटक रहे हैं 

हमारा नाम पूछ कर अभयदान दिया जा रहा

और अशीष में सर पर फिराया जा रहा है 

लहू सना हाथ


हमारा जीवन घात लगाई बिल्ली की आंखों में 

ममता ढूंढते कबूतर के बच्चे की तरह 

सरकार की उलटबांसियों में दुबका है 


वह जो सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं

कहते हुए अदालत को निकले थे घर से 

उन्हे भीड़ आस्था के सम्मान में 

तथ्यों को दी गई सजा ए मौत से पता चला

कि सत्य न तो परेशान है न पराजित 

अलबत्ता तर्क और आस्था की जंग में

जबरन जगाई गई अंतरात्मा की आवाज सुन कर 

उसने खुद को राज्यसभा के हवाले कर दिया है


   

लंबा मारग दूरि घर


स्मृतियां चमगादड़ों सी मंडराती हैं 

प्रेम का प्रेत रास्ता घेरे खड़ा है 

पीछे की आहट सुनता हूं

तो आगे की राह अंधियारी हो जाती है 

आगे बढ़ूं तो पीछा करता है कोई

अलक्षित-अनचीन्हा-अस्पष्ट-असंपृक्त-अदृष्ट


चेतना पर मैली सी चादर बिछ गई है

कुछ धुंधले से चित्र हैं जिनको

गौर से देखूं तो आँखें डूब जाती है 

डूबकर सोचूं तो सांसे उथली हो जाती हैं 


जीने की कशमकश के साथ शुरू होता है दिन 

चिंताएं चढ़ते-चढ़ते सर पर तपने लगती हैं 

मस्तिष्क में बैठा सर्प विष भरता जाता है समूचे गात में 

और एक आदमी खो देता है आदमी होने का अर्थ 


क्या इतना कठिन है आदमी बने रहना 

कि एक भय

एक संशय 

एक विस्मय

उसे मनुष्यतर बना दे

और प्रेम बाँहें पसारे खड़ा रह जाये सामने ही 


     

हाशिए के लोग


हम सूक्तियों में जीवन तलाशने वाले लोग 

कभी व्याख्याओं में व्यक्त नहीं हो सके 

हम तत्सम की गरिमा से निष्कासित 

देशज बस्ती के बदतमीज बाशिंदे कहलाए

हमारा जीवन मुहावरों का कर्जदार है 

मनुष्यता के रजिस्टर से बेदखल हो कर

हमारा नाम जाति के कोष्ठक में दर्ज हुआ


हमने चाक पर घड़े बनाए जिनमे ऋषि जन्मे 

ऋषि ने समुद्र पिया और हम पानी से वंचित हुए 

ऋषि ने व्यवस्था बनाई और हम बहिष्कृत हुए 

हमारे घड़े उनके सर पर रहे और हम पददलित हुए 


हमने गंदगी साफ की और गंदे कहलाए 

हवा में खुशबू बिखेरने के लिए हमने फूल खिलाए 

और खुद अपनी चमड़ी को बच्चों की बिवाईयों पर सिल कर

दुर्गंध को समेटे धरती में खाद बन कर दब गए 


हमें समझाया गया कि दुनिया में सिर्फ हम मुकम्मल ईमान हैं

एक सफ में नमाज पढ़ना हमारी पहचान है 

हमारी उम्मत अशरफुल इंसान है 

हमें ईमान में एक मस्जिद में एक बता कर 

बाहर जुलाहे, दर्ज़ी और कसाइयों में बांटा गया 

हमें रोटी खिला कर बेटी से वंचित किया गया 


हम अलग-अलग अक्षरों की एक ही लिपि थे

असल में हम ही अनेकता में एकता की असली तस्वीर थे 

हद दर्जे की कायरता छिपाए जलसे में उमड़ी धार्मिक भीड़ थे

हमारे सुख अलग-अलग थे मगर दुख एक 

हमारे सपने अलग-अलग थे मगर डर एक 

हमारे दोस्त साधारण थे और दुश्मन अनोखा 

जिसके शरीर अलग अलग थे 

मगर हर शरीर पर एक ही चेहरा था 

उसकी आंखों में खून था रगों में पानी था

विदेशी शराब सा लाल क्रूरता की हद तक खानदानी




    

जीव हत्या


बायोलॉजी के प्रैक्टिकल के लिए

जीव हत्या से पाप लगता है कह कर

मेढक का पेट चीरने से इनकार किया था

वही लड़का

दंगाइयों की भीड़ में सबसे आगे था


   

फासिस्ट


जिसने मुसोलिनी को गोलियां मारी

जिस भीड़ ने लाश को चौराहे पर उल्टा लटकाया 

गले के गोडाउन से बलगम खींच कर

जिस आदमी ने घृणा से उसकी लाश पर थूका 

जिस औरत ने स्कर्ट उठाकर मुंह पर मूता 

वे सबके सब जो गला फाड़ कर चिल्ला रहे थे

फासीवाद मुर्दाबाद 

दरअसल फासिज्म से बदला लेने के लिए 

खुद भी फासिस्ट हो चुके थे 


     

हाथ और साथ का फर्क 


साथ ले कर चलना अलग बात है 

हाथ में हाथ ले कर चलना अलग बात

नदी के दो छोरो पर खड़े 

दो लोगों का हाथ पकड़ कर चलना 

नदी की चौड़ाई से ज्यादा

दिलों के फासले से तय होता है


दिमाग में एक साथ रहने वाले मनु और अंबेडकर 

क्या दिल में रखे जा सकते हैं एक साथ

एक नारी की चेतना में 

द्वंद्व करने वाली परंपराएं और सिमोन की किताब

क्या विचारों से निकल कर 

व्यवहार में निभाई जा सकती हैं एक साथ  


वह कौन सी ज़बान है ज़िल्ले इलाही

जो गांधी का नाम ले कर युद्ध का आह्वान करती है 

वह कौन से हाथ हैं 

जो दंगाइयों के डंडों में तिरंगा बांधते हैं 

वह कौन सी अदमीयत है

जो आदमी को मजहब से पहचानती है

हास्य की वह कौन सी कला है

जो सिर्फ खिल्ली उड़ाना जानती है 


संविधान को बदले बिना कानून कैसे बदल जाते हैं 

समानता के दायरे में कैसे बांधी जाती है स्वतंत्रता 

विषोत्पादन के युग को कैसे साबित किया जाता है अमृतकाल

यह समझने के लिए बंद कमरों की गोष्ठियां नही 

सिर्फ इस प्रक्रिया के महीन तंतुओं की समझ जरूरी है 

कि साथी हाथ बढ़ाना की लोक धुन कैसे बदली

सबका साथ सबका विकास के सरकारी जुमलों में


सियासत के लंबे फलसफे मुझे नहीं मालूम 

लंबी तकरीरों में हाथ तंग है अपना

तुम्हारी वाकपटुता के नकार में जन्मा

इतना सा वाक्य ही मेरा तर्क है

कि संविधान और कानून का फर्क 

दरअसल हाथ और साथ का फर्क है



कविता लिखूं कि नमाज़ पढूं


बादलों ने आसमान के परदे को इतना हिलाया 

कि अब सफेद मटमैली सुरमई धुंध का गुबार 

छोटे-छोटे टुकड़ों में हवा को बोझिल बना रहा है 

यह भारीपन आसमान में भी है जमीन पर भी 


हवा खिड़की से झांकती है 

और फूंक मार कर छिप जाती है 

जमीन गीली है और देह सीली 


कामनाओं की मुंडेर पर अंकुरित 

भीगे हुए सफेद झंडे 

नेह के भार से गंभीर प्रेमी की तरह

अब हिलने से इंकार करते हैं 


इस उदास शाम के सन्नाटे को 

अचानक से  तोड़ती है मग़रिब की अज़ान

और धीरे धीरे चेतना में 

उतरती जाती है संगीत बन कर 


सौन्दर्य ने थाम लिया है आस्था का हाथ

मैं कविता लिखूं कि नमाज़ पढूं 




      

मॉब लिंचिंग 


गोमांस खाते हो पूछने पर लरज़ गई होगी आवाज़ 

स्वाभिमान चोटिल हुआ होगा 

आत्मा डूब गई होगी 

चिल्लाया होगा, झुंझलाया होगा, गिड़गिड़ाया होगा 

अपनी बेगुनाही के लिए कसमें खाई होंगी अल्लाह रसूल की 

जिसे सुनकर शिकारी भाव उद्दीप्त हुआ होगा हत्यारों का 

मां बाप को याद करके तड़पा होगा 

बीवी बच्चों की दुहाई दी होगी 

हाथ जोड़े होंगे, पैर पकड़े होंगे 


मरने से पहले सारे जतन किए होंगे समझाइश के

कि हुजूर हम गोवा या मणिपुर में नहीं रहते 

हम गोबरपट्टी के लोग हैं गाय नहीं खाते 


शरीर पर चलते रहे होंगे असंख्य लात घूंसे 

थप्पड़ लाठी डंडे 

दर्द से तड़पा होगा 

कराहा होगा फिर रोया होगा 

चीख भर कर चिल्लाया होगा

और धीरे धीरे दर्द महसूस होना बंद हो गया होगा 

ठीक वैसे ही जैसे मुर्दा समाज 

मॉब लिंचिग पर कोई थरथराहट महसूस नहीं करता


     

बस इतना ही


इतनी सी शर्म बचा लेना चाहता हूं अपने भीतर 

दूध पिलाती स्त्री को देख कर निगाह नीची कर सकूं 


इतना निश्छल हो जाना चाहता हूं 

कि अगर गलती करूं 

तो माफी मांगने में संकोच न हो


इतना उपलब्ध हो जाना चाहता हूं

कि रोना चाहे कोई तो बेझिझक मुझ तक पहुंच जाए


इतना विस्तार चाहता हूं अपने भीतर

कि मेट्रो या बस में बैठते वक्त 

बगल में बैठी लड़की अपने में सिमटने लगे 

तो उठ कर किसी दूसरी जगह पर बैठ जाऊं


इतनी गुंजाइश रखना चाहता हूं खुद में 

कि हार जाने पर जीतने वाले को बधाई दे सकूं 

किसी की खुशी में शामिल हो जाऊं और दुख में रो पड़ूं 

दोस्तों की तरक्की हो तो जल भुन न जाऊं 


ईमान में चाहता हूं बस इतनी सलाहियत 

कि पार्टी में शराब पीने वाले दोस्तों के साथ बैठा रहूं 

और बिना पिए उनके बहकने में शामिल हो जाऊं 


दरअसल इतना सरल हो जाना चाहता हूं 

कि कोई उतरे मुझमें तो उलझने की चिंता न करे


   

बेसलीका


हम जितने हुनरमंद थे उतने बेसलीका

हमारी कविताएं पाश की घास थी

जिन्हे महफिल के आदाब पर जमने से 

जबरन रोका गया


समुंदर को देखती हमारी पनीली आंखें 

नदी और नालों को साथ ले कर चलती थीं 

हमारे बहते हुए शब्दों को 

नगर और नहर सभ्यता के कोतवालों द्वारा 

कर्मनाशा बता कर टोका गया 


जम्हूरियत बहाल करने की ज़िद पकड़े 

जख्मी हाथों के पागलपन से परेशान 

सरकारी इदारों की मंशा पर

समाजवाद के बैनर ढोते अक्खड़ इरादों को 

अदालत की भट्टी में झोंका गया 


हम बारह इंची रिंच थे 

जो बहुद्देशीय परियोजनाओं में हमेशा काम आए 

धार को रोकना और बिजली पैदा करना 

हमारे बांए हाथ का काम बन गया 

जी हुजूरी के खिलाफ निकले नुकीले शब्दों को 

तानाशाही झंडों के ताबूतों में

कील बना कर ठोका गया 


हम ऐसे अभागे थे कि जिनके

आक्रोश के गर्भ में क्रांति की अग्नि पली 

उच्छवासों की फूंक से जनवाद की मशालें जली

हमारी कविताओं में प्रेम की बेकद्री ऐसी हुई कि उनको

फूलों के सीने पर 

कटार की तरह भोंका गया


और हम देखते रहे खुली सूखी आंखों से 

दरअसल हम सिद्धांत नहीं थे एक तरीका थे 

हम सचमुच हुनरमंद थे मगर बेसलीका थे 



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



जावेद आलम खान 



सम्पर्क


हाउस नंबर 380, थर्ड फ्लोर, 

पॉकेट 9, सेक्टर 21, रोहिणी

दिल्ली 110086


मोबाईल - 9136397400


ई मेल - javedalamkhan1980@gmail.com


टिप्पणियाँ

  1. वेबसाइट पर अपनी टिप्पणी सहित संग्रह की चर्चा करने के लिए धन्यवाद सर।

    जवाब देंहटाएं
  2. उम्दा टिप्पणी के साथ अच्छी कवितायें

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर कविताएं।।।

    जवाब देंहटाएं

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