गोविन्द निषाद का संस्मरण 'पिता के कंधे पर'
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| श्री मंता उर्फ साधु |
पिता पुत्र का रिश्ता दुनिया में सबसे न्यारा होता है। यह ऐसा जुड़ाव होता है जो आजीवन बिना किसी राग द्वेष के बना रहता है। पुत्र में ही पिता अक्सर अपना भविष्य देखता है। जबकि पुत्र अपने पिता में ही आदर्शों की तलाश करता है। पिता का हाथ जब तक पुत्र की पीठ पर रहता है वह खुद को मजबूत महसूस करता है। पिता की कमी को अन्य कोई भी भर नहीं पाता। एक ग्रन्थ में कहा भी गया है "सर्वतो जयमिच्छेत। पुत्राच्छिष्यात्पराजयम्।" यानी पुत्र या शिष्य की श्रेष्ठता गुरु और पिता की अपनी हार नहीं, बल्कि उनकी "परम विजय" मानी जाती है। गोविन्द निषाद ने अपने पिता की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए एक अत्यन्त आत्मीय संस्मरण लिखा है। पिता पर लिख पाना आसान नहीं होता। इसमें गोविन्द ने अपने पिता के उन कठिन संघर्षों को याद किया है जो वे अपने घर परिवार को संभालने के लिए लगातार कर रहे थे। यह सामान्य जीवन जीने वाले हर भारतीय की त्रासदी की गाथा है। गोविन्द ने तटस्थ हो कर यह संस्मरण लिखा है इसलिए उन्होंने उन पक्षों पर भी खुल कर बात की है जो उन्हें अप्रिय लगा करते थे। पुण्यतिथि पर पिता जी की स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं गोविन्द निषाद का संस्मरण 'पिता के कंधे पर'।
'पिता के कंधे पर'
गोविन्द निषाद
यात्रा करते हुए हम कभी यह नहीं सोचते हैं कि हमारी कौन सी यात्रा किसके लिए अंतिम हो जाएगी। दिल्ली की वह सुबह भी बहुत ही खुशनुमा थी। बसंत की हवा उस दिन भी मद्धिम-मद्धिम बह रही थी। तभी मेरा फोन बजा। जब मैंने कॉल उठाई तो उधर से आवाज आई कि साधु की तबीयत ठीक नहीं है। और इसके बाद मुझे निकल ही जाना था एक यात्रा पर। मैं राजधानी एक्सप्रेस से इलाहाबाद होते हुए घर आ गया। जब पहुंचा तो पिता जी की हालत ठीक हो चुकी थी और वह मुस्कुरा रहे थे। मैं उनके गोढ़वारी बैठा और फोटो क्लिक की। मुझे लगता है कि अभी तक मैंने जितनी फोटो क्लिक की है उसमें सबसे सुंदर मेरी यही फोटो है। पिता जी को ऐसे हंसते हुए अंतिम बार देखा था। तब नहीं पता था कि मेरी यह यात्रा पिता जी के लिए अंतिम यात्रा जैसी हो जाएगी। अब पिता जी ठीक थे और मैं अगले ही दिन फिर से दिल्ली के लिए रवाना हो गया।
उस दिन थोड़ी बारिश हुई थी। कल होली का त्यौहार था। सब लोग रंगों में सराबोर थे। मैं सुबह उठा और नहाने के लिए चला गया। सोचा था कि आज नेशनल आर्काइव न जा कर इंडिया गेट के पास घूम लूंगा लेकिन कहां पता था कि यह सोचना सिर्फ सोचना बन कर रह जाएगा। मैं जब नहा कर वापस आया तो मेरी नजर मोबाइल पर गई। मैंने देखा कि कई सारे मिस्ड कॉल पड़े हुए हैं। मुझे एक धक्का सा लगा। हमेशा जब भी घर से कई कॉल अचानक आने लगते हैं तो मैं डर सा जाता हूं। उस दिन तो मैं भयानक रूप से डर गया था और मेरा डर सही साबित हुआ, जब फोन पर मेरे भतीजे ने कहा साधु नहीं रहे। मैं अवाक रह गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? उस दिन ट्रैफिक इतना था कि मैं गांव भी नहीं जा सकता था किसी भी तरह। होली का दिन, इतनी भीड़ में कैसे जाऊं। मैंने मां को फोन किया। मां ने मुझसे कहा कि, "क्या करें साधु को ले जाएं कि आओगे देखने?" मैं बोला कि, "जब तक आऊंगा रात हो जाएगी और उन्हें ऐसे ही रखना ठीक नहीं होगा। आप उन्हें ले जाएं।"
बार-बार पिता जी का पिछली यात्रा में देखा हुआ चेहरा सामने आ रहा था। मैंने अपने मन से कहा कि, "अभी तो कुछ दिन पहले ही देखा था। मैं आ तो रहा हूं लेकिन मुझे पता था कि मुझे पहुंचने में रात के दो-तीन तक बज सकते हैं।" यह मेरी एक अनहोनी सी यात्रा थी जिसे एक शून्य में ताकते हुए मैंने तय किया।
मुझे पिता जी के साथ होशोहवास में की गई पहली यात्रा की याद ज्यादा आती है। यह मेरी स्मृतियों में सबसे गहरी धंसी हुई है। अगर मैं उसकी कोई पेंटिंग बनाऊं तो मुझे लगता है कि वह मेरे लिए दुनिया की सबसे सुंदर पेंटिंग हो सकती है। अगर मैं चित्रकार होता तो शायद उस विजुअल की सबसे सुंदर तस्वीर बनाता। वह यात्रा थी मेरे ननिहाल जाने की। पिता जी ने मुझे रिक्शे पर बैठाया। तब मेरी उम्र कोई छ:-सात साल रही होगी। रास्ते भर वह मुझे बताते रहे कि देखो वह जो गांव दिख रहा है, वहां पर जो है फलाने का ननिहाल है। फिर थोड़ी दूर आगे बढ़ते और बताते देखो वह गांव है, वहां पर फलाने की जो ससुराल है। और आगे बढ़ते फिर बताते देखो वह जो है फलाने का नैहर है। इस तरह वह मुझे बताते हुए ले जा रहे थे पूरा भूगोल समझाते हुए।
एक लंबा सफर तय करने के बाद पिता जी ने अपना रिक्शा एक कच्ची सड़क पर उतार दिया। वह सड़क खेतों के बीच से हो कर गुजरती थी। हम एक गांव से हो कर गुजरे। फिर एक और कच्ची सड़क हमें मिली और वह कच्ची सड़क एक बड़ी सी झील के किनारे हो कर गुजरती थी। अपनी यादों में जब मैं उस दृश्य का कोलाज बनाता हूं तो एरियल व्यू से जो मुझे नजर आता है वह यह होता है कि एक बड़ी सी झील है, उसमें कई सारी भैंस नहा रही हैं, मछुआरे मछलियां मार रहे हैं और मेरे पिता जी मुझे रिक्शे पर बिठा कर खूब मस्ती से पैडल मारते हुए चले जा रहे हैं। रास्ते में खूब सारे पेड़ हैं। मुझे किसी और पेड़ की याद तो नहीं है लेकिन पिता जी ने झील के किनारे महुआ के पेड़ के नीचे अपना रिक्शा थोड़ी देर के लिए रोका था। मुझे आज भी वह याद आते हैं, जब मैं अपने ननिहाल गया था, आज से कोई 10 साल पहले—तब मैंने देखा था कि वह महुएं अभी भी उसी तरह अभी खड़े हैं। अभी हैं कि नहीं, मुझे नहीं पता लेकिन मुझे उन्हें देखने की बहुत लालसा होती है।
पिता जी वहां पर बैठे हुए सुस्ता रहे थे. उन्होंने मुझे पेड़ के नीचे बैठा दिया। मुझे ठीक से याद आता है कि पहली बार मैं अपने ननिहाल को झील के इस पार से देख रहा था। मेरा ननिहाल झील के उस पार था और बीच में जो पानी था, वह एक अनुपम सौंदर्य का सृजन कर रहा था। अगर मैं कहूं तो उस तरह का सौंदर्य अभी तक मैंने कहीं देखा नहीं। मेरे ऊपर बालू के टीले थे जिनमें मीठे आलू के फल के पौधे फैले हुए थे। उसके नीचे कच्ची सड़क पर लीक से हट कर दोनों तरफ मुलायम नरम घास थी। मैं जहां बैठा था वहां पर बलुई मिट्टी थी। पानी के कटाव से महुआ की कुछ जड़ें उभर आई थीं। उन्हीं जड़ों पर मैं बैठा उस झील को निहार रहा था। पिता जी ने मुझे बताया अंगुली से इशारा करते हुए कि वह देखो तुम्हारा ननिहाल दिख रहा है। मैं पहली बार देख कर उसे बहुत खुश था। वह झील देखकर मैं बहुत खुश था। फिर पिता जी ने मुझे रिक्शे को पैदल चलाते हुए ननिहाल तक पहुंचाया।
पिता जी ननिहाल में बहुत कम रुकते थे और रात हो इससे पहले वह घर चले आते थे। तब मेरे नाना-नानी जिंदा थे। मेरी स्मृतियों में मेरे नाना की जो तस्वीर है, अभी भी जिंदा है। मैंने उन्हें देखा जब वह झुक कर चलते थे। वह यात्रा मेरे नाना जी के लिए मेरी अंतिम यात्रा थी। उसके बाद मेरे नाना जी अपनी अंतिम यात्रा पर चले गए। मेरे नाना जी गांव के भगत थे। मेरे घर के बगल में एक मंदिर हुआ करता था और उसके ठीक सामने एक नीम का पेड़ था। उस मंदिर की इतनी आभा मेरे नाना ने बनाई थी कि उसके आस-पास भी कोई नहीं फटकता था। मैं खुद डरता था कि कैसे उस मंदिर के पास नहीं जाया जाए। मेरे नाना सुबह उठ कर उस मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे और भगत होने के नाते साल भर में एक खास दिन देवी जी को बलि दी जाती। वह उस पूरे कर्मकांड की अगवाई करते थे। वह मंदिर आज भी अपनी बदहाली के साथ मौजूद है जिसमें से नाना झांकते रहते हैं।
उन्हें यह करते हुए मैं नहीं याद कर पाता कि मेरी नानी कैसी थीं। वह पहले ही चली गई। उनकी कोई तस्वीर मेरी स्मृतियों में उभर नहीं पाती। मेरे नाना बिना बेटे के बाप थे। उनके सिर्फ दो बेटियां थी। एक मेरी मां दूसरी मेरी मौसी। मेरे नाना-नानी की देखभाल के लिए मेरे बड़े भैया और मेरे मौसी के बड़े बेटे मेरे ननिहाल में रहा करते थे। मेरे नाना जी ने एक का नाम रखा था गोली और दूसरे का बारूद। यह नाम सुनने में कितना रोमांचक लगता है। जब मेरी दीदी बड़ी हुई तो वह भी ननिहाल में ही रहने लगीं। मुझे पहली बार मेला जाने की जो स्मृति है वह मेरे ननिहाल की है। मुझे ठीक से याद है कि उस दिन घाघरा नदी के पास मनटोलवा गांव का मेला लगा हुआ था, जहां मेरे भैया की ससुराल हुआ करती थी। उस दिन मैं अपने ननिहाल में ही था। मैं अपनी दीदी से बोला कि मुझे मेला जाना है क्योंकि गांव के सभी बच्चे जा रहे हैं। मुझे ठीक से याद है कि मेरी दीदी ने मुझे ₹20 दिए थे और मैं गांव के बच्चों के साथ मेला पैदल गया था। मेरी दीदी कहती थी कि वहीं पर तुम्हारे भैया की ससुराल है। बाद में उनकी वह ससुराल नहीं रह गई क्योंकि मेरी भाभी असमय जो चली गईं। मैं उनकी गोदी में खेला हूं जब मैं ठीक से चल भी नहीं पाता था। वह मुझे बहुत दुलारती थीं। उनका चेहरा मेरी स्मृतियों में दर्ज़ सबसे पहला चेहरा है। मुझे ठीक से याद है वह चेहरा जब वह मुझे आंगन में गोद में लेकर खिला रहीं थीं।
Meree दीदी का गौना ननिहाल से हुआ। मुझे याद है कि मेरी दीदी के गौने में नौटंकी नाच आई थी। उसमें जो नाच रहे थे वह मेरे परिवार यानी मेरे पिता जी के बड़े भाई की बड़ी बेटी के पति थें जो लौंडा बन कर नाच रहे थे। वह बहुत अच्छा गाते थे, मतलब अभी गाते हैं। अभी भी वह आते हैं। गाते हैं। मेरे घर पर कोई फंक्शन होता है तो नाचते हैं। वहां से मेरी दीदी जो है अपने ससुराल गई।
ननिहाल में रहते हुए ही मैंने मछलियां पहचानी। उन्हें दुलारा भी और मारा भी। पानी, भैंसे, गन्ना की खेती, मीठे आलू की खेती जिसको हम लोग गंजी कहते हैं और न जाने कितने चीज वहां पर मैंने सीखी और देखी। वह गांव जो है दो तरफ झील से घिरा हुआ और दो तरफ बहुत लंबा मैदान या सिवान से घिरा हुआ है। रात जब होती तो सिर्फ वहां पर सियारों की आवाज आती। गांव में दो घर छोड़ कर एक भी पक्का घर नहीं था। सारे लोग कच्चे घरों में रहते थे। सबके घरों पर जाल होते थे और शाम को पूरा गांव जो है मछलियों की सुगंध से महकने लगता था। मैं अक्सर खाने की समस्या से वहां जूझता था। मुझे छोटी मछलियां पसंद नहीं थी खाने में। मैं उन्हें निगल ही नहीं पाता था। शाम को जब खाने का समय होता था तो मुझे खाना में सहरी परोसी जाती थी। पूरा गांव सहरी मछली ही खाता था तो मुझे कोई हलुआ तो नहीं ही मिलता। मैं खा नहीं पाता था तो मेरे नाना के खानदान के मेरे मामा हैं, वह मुझे कहते थे कि तुम कौन से केवट हो तुमसे मछली नहीं खाई जा रही है और मैं रो-रो कर खाता था। फिर कहते थे जाओ देख आओ कि गांव में किसके घर जो है सब्जी बनी है, वहीं खा लेना। मुझे पता होता था कि किसी के घर नहीं बनी होगी। पूरा गांव मुझे अपने भांजे की तरह ही मानता था। मैं किसी के घर भी खा लेता था. मुझे ठीक से वह भैंस याद आती है जिनको मैं उस झील में नहलाने ले जाता था और उनको नहलाने के लिए मैं दो-तीन घंटे इस झील में तैरता रहता था। शाम को भैया को मछली बेचने के लिए मछलियां पकड़नी होती थी तो वह मुझे अपनी सहायता के लिए ले जाते थे। मैं जाल पकड़ता था. मैंने वहीं पर तैरना सीखा। पानी से मैंने दोस्ती की और यह दोस्ती अभी भी अटूट है। आज भी मेरी दोस्ती उस पानी से बनी हुई है। जब भी मैं पानी देखता हूं तो उससे एक बार हाथ मिलाने का जी चाहता है।
इस तरह से पिता जी का जो पूरा संसार बना, उसमें उनकी बहुत कम भूमिका थी। वह कभी अपने जीवन को लेकर सीरियस नहीं रहे। हमेशा घर को मेरी मां ने संभाला। बस उनको अपने रिक्शे और अपनी सवारी से मतलब हुआ करता था। उन सवारी से जो भी मिल जाया करता था, उसका एक हिस्सा मेरी मां को मिल जाया करता था। इस हिस्से से हमारे लिए कुछ कपड़े और किताबें आ जाती थी लेकिन जरूरतें सिर्फ इतने से पूरी नहीं होती। किताबें खरीदने के लिए रिक्शा का किराया पर्याप्त नहीं होता था। मां ने एक भैंस रखी और वह भैंस जब दूध देती थी तो उसे मैं मार्केट में बेचने के लिए ले जाता था। उससे जो रुपए मिलते थे उससे मेरी मां के लिए बहुत ही मदद हो जाती थी। मुझे याद है अगर वह भैंसें नहीं होती मेरे जीवन में या मेरे घर के जीवन में तो अभी जो मैं कर पा रहा हूं या मैं जो पढ़ पाया—वह मैं नहीं कर पाता। पिता जी हमेशा कहते रहे कि पढ़-लिख कर क्या करोगे। कौन सा कलेक्टर बन जाओगे। अरे शहर में कमाओ। सब लोग जा कर कमा रहे हैं, तुमको पढ़ने का शौक काहे का चर्रा रहा है। उनकी चलती तो शायद मैं कभी पढ़ता नहीं लेकिन मां कुछ और ही सोचती रहीं। उनको पता नहीं क्यों लगता रहा कि मैं पढ़ कर कलेक्टर हो ही जाऊंगा और मेरे पढ़ाई छोड़ देने के बाद भी मेरी मां मुझे पढ़ने के लिए लड़ती रहीं। इसके लिए जब वह मुझे मना कर हार गई और मैं स्कूल नहीं गया तब उसके बाद उन्होंने मेरे गांव मोहल्ले के लोगों के सामने रो-रो कर कहना शुरू किया कि गोविंद किसी भी तरह से स्कूल चला जाए, मैं बस इतना चाहती हूं। जब उन्होंने यह बात मेरे सबसे प्यारे दोस्त को बताई और उसने मुझे डांटते हुए कहा कि, "साले, अगर स्कूल नहीं जाओगे तो पटक-पटक के मारूंगा।" उसके बाद मैंने उससे कहा कि ठीक है, मैं नाम लिखवा ले रहा हूं लेकिन स्कूल नहीं जाऊंगा। मैं फिर से कमाने के लिए दिल्ली जाऊंगा। मेरी मां को यह भी कबूल था कि मैं नाम लिखवा कर दिल्ली कमाने चला जाऊं लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। मेरे जीवन की यात्रा को यहां से मुड़ जाना था शायद इसलिए मैं स्कूल में सिर्फ नाम लिखवाने चला गया। फिर वह जो नाम लिखा गया तो फिर चलता ही गया।
इस बीच पिता जी का रिक्शा धीरे-धीरे थमने लगा। गांव में अब धीरे-धीरे ऑटो की संख्या बढ़ने लगी। यह बढ़ते हुए ऑटो पिता जी की कमाई को धीरे-धीरे कम करते जा रहे थे। जैसे कोई दीमक लकड़ी को धीरे-धीरे खा कर खोखला कर देता है। पिता जी के रिक्शे को ऑटो रूपी दीमक खा रहे थे। जब उन्हें लगा कि गांव में अब दुल्हन की विदाई और सवारियां मिलना मुश्किल हो रही है तब वह आजमगढ़ शहर चले गए, जहां वह दिन भर रिक्शा चलाते। रात में किसी फुटपाथ पर सो जाते और खाना खाते या नहीं खाते, हमें कभी पता नहीं चला। हफ्ते के अंतिम दिन वह घर वापस लौटते। कभी-कभी तो ऐसा होता कि उनके पास पैसे नहीं होते और कभी-कभी कुछ पैसे वह मां के हाथ में थमा देते। मां उन्हें बहुत सारी खरी-खोटी सुनाती कि, "शहर जा कर रिक्शा चलाने की क्या जरूरत है, यही कुछ काम-धाम करिए न। भट्टे पर काम कर लीजिए। ईट बनाइए।
पिता जी इस मामले में थोड़े कामचोर थे। वह मेहनत करने से भागते थे। हां, रिक्शा मेहनत से चला लेते थे लेकिन रिक्शे से उनका दोस्ताना हो गया था इसलिए रिक्शा वह अपनी दोस्ती निभाने के लिए चलाते थे लेकिन और कामों से उनकी कोई दोस्ती नहीं हो पाई। खेत से तो बिल्कुल नहीं। मम्मी उन्हें हमेशा कहती कि, "जिंदगी में कभी आप जो है किसी खेत की आर-कोन भी बनाए हैं, कभी झांकने भी जाते हैं खेत में। उसे पानी की जरूरत है भी कि नहीं है, उसे खाद चाहिए कि नहीं चाहिए।" पिता जी झल्ला जाते और कहते कि, "नहीं जाऊंगा। मेरा खेत है। कल से मत जाना, छोड़ देना, बंजर रहेगा। मेरी मां उन्हें फिर और खरी-खोटी सुनाती। उस दिन हमारी नींद हराम हो जाती। दोनों लोग देर रात तक लड़ते रहते और यह लड़ाई कब गाली-गलौज में बदल जाए, हमें पता नहीं होता। पिता जी मुंहफट गालियां देते थे। जब वह मां को गालियां देते थे तो मन करता था कि उन्हें जा कर चुप करा दूं कि अगर आप अब चुप नहीं हुए तो मैं आपको चुप करा दूंगा। एक दो बार जब मैं बड़ा हो गया था तो उन्हें टोका भी कि अब आपने अगर मम्मी को मेरी गाली दी तो फिर मैं आपको जो है चुप करा दूंगा। इस पर वह भड़क जाते और कहते कि हमारा घर छोड़ कर भाग जाओ। हमारा घर है। लेकिन पिता जी जब शांत हो जाते तो बहुत प्यार से फिर बात करते। मेरी मां का गुस्सा भी शाम होते-होते ठंडा हो जाता और शाम को जब दोनों चूल्हे के पास बैठते तो सब कुछ सामान्य सा हो जाता और वह हमारे भविष्य के बारे में चिंता करने लगते।
इसी चिंता में पिता जी ने एक दिन तय किया कि अब वह अपने रिक्शा को ठेले में बदल देंगे। उन्होंने उसे ठेले के रूप में बदल दिया। अब वह भट्टे के लिए कच्ची ईंट बनाने लगे। सुबह ही निकल जाते। गांजा का दम लगाने के कारण उनके पास अब दमखम बहुत कम बचा था। जब वह मिट्टी पर फावड़ा चलाते तो हांफने लगते। शाम को हम स्कूल से आने के बाद पथेरी पर चले जाते। पथेरी उस जगह को कहते हैं, जहां पर कच्ची ईंट बनाई जाती है। शाम के समय मिट्टी को पानी से भिगोया जाता। इसमें हम अपने पिता की मदद करते। टंकी से पानी चलाना एक मेहनत का काम होता था जिसे मैं या मेरा छोटा भाई अक्सर किया करते थे। जब पथेरी पर ईंट पाथने का काम खत्म हो जाता और अप्रैल और मई का महीना आ जाता। भट्ठे में आग लग जाती। तब हमारा काम और पिता जी का काम बदल जाता। अब पिता जी ईंट को ठेले पर लाद कर भट्ठे पर लाते। जब यह खत्म हो जाता तब वह भट्टे पर आ जाते और वहां पर कोयले को ढोते, जिसे वह कंधे पर टांग कर वहां ले जाते, जहां पर कोयले को भट्टे के भीतर झोंका जाता था। हमारा काम भी अब बदल जाता। हम अब कोयले के बड़े-बड़े टुकड़ों को हथौड़े से तोड़ कर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलते। इसमें मदद कभी-कभी पिताजी भी कर देते।
मानसून आने के बाद हमारे काम की प्रकृति फिर बदल जाती। अब भट्ठे से हम जले हुए कोयले निकालते, जिसका एक बड़ा हिस्सा भट्टा के मालिक के पास चला जाता, हमें मिलता एक छोटा सा हिस्सा। उस छोटे से हिस्से को इकट्ठा करते-करते हमने एक टीले जैसी आकृति खड़ी कर दी कोयले की। पिता जी को एक दिन पता नहीं कहां से सूझा कि अब भट्टे पर काम नहीं करेंगे और मिठाई की दुकान खोलेंगे क्योंकि जले हुए कोयला का एक भरा-पूरा टीला हमारे घर जमा हो गया था। पिता जी ने हलवाई की दुकान खोली और चाय-मिठाई बनाने लगे। उनके काम के साथ हमारे भी काम की प्रकृति फिर से बदल गई। अब मैं चाय, मिठाई, समोसे, टिकिया आदि बनाने लगा। पिता जी इसमें मुझे सबसे ज्यादा सिखाते क्योंकि मैं ही उनके साथ हमेशा रहता। उन्होंने मुझे चाय बनानी सिखाई। समोसे का आलू भूनना सिखाया। मिठाई बनानी सिखाई।नफिर एक दिन ऐसा आया जब मैं इन कामों में सिद्धहस्त हो गया।
अब मैं पिता जी को थोड़ी राहत दे देता लेकिन जैसे ही घर पर रखा कोयला खत्म हुआ। पिता जी की दुकान में भट्ठी की आग ठंडी पड़ने लगी। धीरे-धीरे यह आंख ठंडी होती हुई बुझ गई। पिता जी अब बिल्कुल काम करने के लिए असह्य होते जा रहे थे। ऐसे में उन्होंने कुछ दिन सब्जी बेची लेकिन अब उनमें ठेला खींचने की भी ताकत नहीं बची थी और इस तरह से वह घर पर ही रहने लगे थे।
पिता जी को कई तरह की लत थी। बचपन से ही गांजा पीने की लत लगी। वह तब तक नहीं छूटी जब तक कि उनके गले की नसें दर्द नहीं करने लगी और शराब तो उन्होंने हालांकि आज से भी बीस साल पहले छोड़ दी थी लेकिन गांजा उन्होंने कभी नहीं छोड़ा और यही गांजा जो है उन्हें अपने धुएं में उड़ा ले गया। पिता जी की दोस्त की मंडली बहुत बड़ी थी जिसमें सभी गांजा पीते थे। उस मंडली के अब सिर्फ दो लोग बचे हैं। मैं अक्सर घर जाता हूं तो उनसे मिलता हूं ताकि पिता को इस बहाने याद कर पाऊं।
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| गोविन्द निषाद |
सम्पर्क
मोबाइल : 9140730916


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