प्रतुल जोशी का संस्मरण 'मेरे हिस्से का बंगाल'


प्रतुल जोशी 


आज का पश्चिम बंगाल वामपन्थ बाया तृणमूल होते हुए भाजपा के शासन तक का सफ़र तय कर चुका है। एक समय में वामपन्थ का गढ़ रहे बंगाल के इस मुकाम तक पहुंचने के तमाम कारण रहे हैं। बाद के दिनों के वामपंथी शासन में जो अराजक स्थितियाँ उत्पन्न हुईं उसने उसकी कब्र तैयार कर दी जिसका फायदा तृणमूल ने उठाया। वैसे यह बंगाल भारत का सबसे जागरूक प्रान्त माना जाता है जहाँ साहित्य, संगीत और संस्कृति की जड़ें आम जनता तक में समाहित हैं। रबींद्र संगीत की अनुगूंज हर जगह महसूस की जा सकती है। कोलकाता आज भी सांस्कृतिक गतिविधियों का गढ़ है। एक कहावत है कि 'बंगाल जो आज सोचता है वह पूरा भारत वही सौ साल बाद सोचता है।' बंगाल की यह पहचान उसके बुद्धिजीवियों के कारण ही है। राजा राम मोहन रॉय से शुरू हुई प्रतिवाद की परम्परा वहाँ आज भी कायम है। भारत को साहित्य में जो एकमात्र नोबेल मिला उसे पाने का श्रेय रबींद्र नाथ ठाकुर को ही है। भारत का राष्ट्र गान हो या राष्ट्र गीत उसे बंगाली रचनाकारों ने ही रचा है। वामपंथी शासन में भी वहां दुर्गापूजा का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता था। आकाशवाणी से बीरेन्द्र कृष्ण भट्ट की आवाज में महालया के प्रसारण का इंतजार आज भी प्रायः हर बंगाली बेसब्री से करता है। बंगाली भद्रलोक में आभिजात्यपने की बनक होती है जिसे वे आजीवन भूल नहीं पाते। इलाहाबाद में बंगालियों का एक बड़ा समुदाय रहता है कहा जा सकता है कि यह समुदाय यहाँ छोटा सा बंगाल बनाता है। जॉर्ज टाउन, टैगोर टाउन, बाई का बाग, लूकरगंज जैसे अनेक मुहल्ले हैं जहां बंगाली समुदाय की बहुतायत आज भी सहज ही देखी जा सकती है। प्रतुल जोशी लूकरगंज के रहवासी रह चुके हैं जहां उनके पड़ोसी बंगाली परिवार ही थे। उन्होंने लूकरगंज में उस बंगाल को महसूस किया। बाद में कोलकाता जाने पर उस वामपंथी शासन को देखा जिसके सादगी के चर्चे आज मिथक जैसे लगते हैं। अपने एक संस्मरण में प्रतुल ने बंगाल के इस सफर को शब्दबद्ध किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रतुल जोशी का संस्मरण 'मेरे हिस्से का बंगाल'।


'मेरे हिस्से का बंगाल'


प्रतुल जोशी


हाल में विधानसभा चुनावों के पश्चात पश्चिम बंगाल में जो स्थिति बनी हुई है उसे देखना ही एक गहरे संताप से गुजरने जैसा है। कहीं तृणमूल के पदाधिकारियों का अण्डों से अभिषेक, तो कहीं महिलाओं को सरेराह पीटा जाना। कहीं भूतपूर्व विधायकों एवं मंत्रियों को चोर-चोर कह कर दौड़ाना तो कहीं अर्धरात्रि में बुल्डोजर से रेलवे स्टेशनों के आस-पास के हाकर्स की दुकानों को तोड़ना। ओह! इस बंगाल की तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मेरे द्वारा जिया हुआ बंगाल तो बिल्कुल दूसरा था। 'भद्र लोक का बंगाल'। ऐसा बंगाल जिसमें उच्च सांस्कृतिक परम्पराएं थीं। जहाँ साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी बहती थी। ऐसा बंगाल जहाँ फुटबॉल के लिए पागलपन था। जहाँ अदभुत शारीरिक सौन्दर्य था। जहाँ हर अन्याय के खिलाफ प्रतिवाद था, जुलूस थे, नारे थे। सामूहिक स्पन्दन था। मैं इस 'नए बंगाल' से बिल्कुल अपरिचित था जिसकी नींव हिंसा, प्रतिहिंसा, घृणा और अपराध की बुनियाद पर रखी हुई है। मेरा बचपन इलाहाबाद के लूकरगंज मुहल्ले में 20-22 छोटे बड़े मकानों वाले एक अहाते में बीता, जिसे 'टंडन जी का हाता' कहते थे क्योंकि मालिक मकान टंडन जी थे। वैसे यह अहाता हिन्दी के साहित्यकारों के मध्य बेहद चर्चित था अपने नम्बर की वजह से। 100, लूकरगंज। यह पता एक दौर में हिन्दी के प्रायः सभी युवा एवं बुजुर्ग साहित्यकारों के दरम्यान समान रूप से लोकप्रिय था। कारण एक ही, पिता स्व. शेखर जोशी जी की साहित्यिक लोकप्रियता। हमारे 20-22 परिवारों के मुहल्ले मे 6 परिवार बांग्ला भाषी थे। उन में से 4 परिवारों से हमारे परिवार की घनिष्ठता थी। घर के ठीक सामने हमारी हमउम्र रूमा-झूमा का परिवार, उनके साथ वाला मकान दत्ता परिवार का जिसमें ज्येष्ठ पुत्र टुटुुन दादा हम लोगों के अग्रज और कनिष्ठ पुत्र टिंकू मेरा सहपाठी। इसी तरह घर से सटा हुआ मकान सिन्हा परिवार का जहाँ बप्पा (यानी सौमित्र सिन्हा) मेरा हमउम्र और उसकी बड़ी बहन बुला दीदी, हम लोगों की बड़ी बहन। फिर हमारे घर की पंक्ति में एक और परिवार एस. सी. दास जी का। जहाँ सभी लोग मुझसे उम्र मे बड़े। हम बच्चों के दादा और दीदी। प्रणव दादा, असीम दादा, दीप्ति दीदी और सुचित्रा दीदी। इनमें से  कितनों की गोदी में खेल कर मैं बड़ा हुआ। हमारा मुहल्ला लूकरगंज यानी सिन्धियों और बंगालियों की आबादी से आच्छादित। जहाँ अधिकतर सिन्धी भाषा-भाषी व्यवसाय के कामों से जुड़े थे (खासकर ईट भट्टा के व्यवसाय से), बांग्ला भाषी लोग विभिन्न सेवा क्षेत्रों में थे। तत्कालीन इलाहाबाद में बांग्ला भाषियों के स्वामित्व वाले तीन प्रतिष्ठान प्रमुख थे। पहला माया प्रकाशन, दूसरा व्हीलर्स एवं तीसरा Symonds कम्पनी जो क्रिकेट के बल्ले वगैरह बनाती थी। इसके अलावा इलाहाबाद से निकलने वाला एक मात्र अंग्रेजी अखबार Northern India Patrika (NIP) भी बांग्लाभाषियों के स्वामित्व में था। इस तरह लूकरगंज में रहने वाले बहुत से बांग्लाभाषी ना सिर्फ सरकारी सेवाओं मे थे वरन बांग्लाभाषी स्वामित्व वाले (उपरोक्त वर्णित) निजी संस्थानों में भी थे। 




इलाहाबाद के लूकरगंज वाले बांग्लाभाषी अत्यन्त संगठित भी थे। आज भी लूकरगंज में बंगाली क्लब का अस्तित्व है। एक लम्बे चौड़े खेल के मैदान के कोने में लूकरगंज क्लब का कई कमरों वाला भवन है। यही शाम को बहुत से 'भद्र लोक' बैठ कर ब्रिज (ताश का एक खेल) खेलते दिख जाते थे। लूकरगंज क्लब, लूकरगंज के बांग्ला भाषियों का एक सम्मिलन केन्द्र था। हम जैसे अबांग्लाभाषियों के लिए वहाँ सामान्य परिस्थितियों में प्रवेश असामान्य माना जाता था। लेकिन इस लूकरगंज क्लब में कुछ अवसर ऐसे होते थे जहाँ हम जैसे लोगों को प्रवेश का अवसर मिल जाता था। दो अवसर थे। पहला, सरस्वती पूजा के अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के आयोजन में भागीदारी और दूसरा लूकरगंज बंगाली क्लब द्वारा 'अखिल भारतीय बांग्ला लघु नाट्य प्रतियोगिता' में दर्शक की हैसियत से प्रतिभाग (यह नाट्य प्रतियोगिता नवाब युसूफ रोड स्थित कोरल क्लब में एक महीने लगातार सम्पन्न होती एवं इसमें एक दिन में चार-चार लघु नाटक होते थे)। मुझे याद है कि अपने बचपन में लूकरगंज बंगाली क्लब के सरस्वती पूजा में आयोजित एक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में जब मैंने प्रतिभाग किया था तो बाद में मुहल्ले के लड़के मुझे पकड़ लेते और कहते कि तुमने जो प्रदर्शन वहाँ किया था, उसे फिर से हमें कर के दिखाओ। बड़ी मुसीबत थी। एक अन्य वर्ष मैंने सरस्वती पूजा के अवसर पर ही एक कविता प्रतियोगिता में भी काजी नजरूल इस्लाम की कविता 'विद्रोही' का हिन्दी में वाचन किया था। लघु नाट्य प्रतियोगिता में वर्षो तक मैंने बांग्ला नाटक नियमित तौर पर देखे। इसी नाट्य प्रतियोगिता के चलते आज तक मैने बांग्ला के तकरीबन दो सौ नाटक देखे होंगे। बचपन के उन ढेर सारे नाटकों मे अधिकांश की तो याद नहीं लेकिन एक नाटक की दो पंक्तियों की याद है। 1977 मे बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन आने के बाद, बंगाल की जनता के दिलो दिमाग पर साम्यवाद का जो असर था, उसकी अभिव्यक्ति उस नाटक में थी। नाटक के पात्र एक गोल घेरा बना कर गाना गा रहे थे, 'आमि कौम्युनिस्ट, आमि कौम्युनिस्ट, आमि कौम्युनिस्ट'। आज के बंगाल के सन्दर्भ में जब उस नाटक की याद आती है तो बेहद हँसी आती है। और पिछली सदी के सत्तर और अस्सी के दशक का वह बंगाल याद आता है जब वामपन्थी विचारधारा लोगों के सर पर चढ़ कर बोल रही थी। इस लघु नाट्य प्रतियोगिता मे बंगाल के छोटे-छोटे जिलों से नाट्य दल प्रतिभाग करने आते थे। मालदा, बांकुड़ा, वीरभूमि नामक कस्बों से पहले पहल परिचय इन्ही नाट्य दलों के माध्यम से हुआ था। पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य राज्यों से भी बहुत सारे नाट्य दल, महीने भर चलने वाली प्रतियोगिता में आते थे। हमारे मुहल्ले में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत सारी नाट्य प्रस्तुतियाँ भी हुआ करती थीं।




वर्षों दुर्गा पूजा का आयोजन लूकरगंज के भीतरी इलाके में गुहा परिवार के एक लम्बे चौड़े आवास परिसर में हुआ करता था। दुर्गा पूजा के अवसर पर प्रतिवर्ष षष्ठी से ले कर नवमी तक बांग्ला नाटकों का मंचन पूजा पंडाल में होता। 'हराधना दष्टि छेले', 'ऐकटा मरे जाए' या फिर 'जदि आमि, तुमि आमि' जैसे दर्जनो नाटक इन पंडालो के भीतर मैंने देखे हैं। दुर्गा पूजा के पंडालों और 'अखिल भारतीय लघु नाट्य प्रतियोगिता' में बांग्ला नाटकों को देखने का जो बीज बचपन मे पड़ा, वह आज भी जीवित है। वर्षों पहले दिल्ली के इण्डिया हैबिटेट सेंटर मे रूद्र प्रसाद सेनगुप्ता द्वारा निर्देशित एवं उनके भूतपूर्व दामाद गौतम हालदार एवं पुत्री सोहिनी सेन गुप्ता द्वारा अभिनीत नाटक 'फुटबॉल' देखा था। नाटक में गौतम हालदार ने गजब का अभिनय किया था। इलाहाबाद के बाद जब 1992 में लखनऊ स्थानान्तरित हो कर आया तो यहां के 'बंगाली क्लब एवं नवयुवक समिति' के द्वारा प्रति वर्ष दिसंबर महीने में आयोजित किये जाने वाले नाट्य उत्सव में भी खूब शिरकत की। यहां प्रतिदिन केवल एक नाटक का मंचन किया जाता रहा है। लगभग दो घंटे की अवधि का कोई भी नाटक पूर्णांग (Full Length Play) के रूप में ही प्रविष्टि पा सकता है। वर्ष 1997 में लखनऊ से प्रकाशित होने वाले अखबार 'स्वतंत्र भारत' के लिए मैंने इस आयोजन के लगभग सभी नाटकों की समीक्षा भी लिखी थी। बांग्ला नाटकों को बचपन से देखने की मेरी पृष्ठभूमि और बांग्ला ज्ञान के चलते मेरी समीक्षाएं पाठकों एवं लखनऊ के विभिन्न दैनिकों के सांस्कृतिक संवाददाताओं के मध्य काफी सराही गई थीं। लूकरगंज क्लब के पास एक बड़ा खेल मैदान भी है। अपने बचपन में इस मैदान पर मैंने बड़े-बड़े फुटबॉल टूर्नामेन्ट का आयोजन भी देखा है, जहां फुटबाल का खेल देखने के लिए बड़ी तादाद में दर्शक भी आते थे। कुछ दिन अपन ने भी फुटबॉल खेली। लेकिन जब खेल के मैदान में सबसे फिसड्डी नजर आये तो समझ आ गया कि फुटबॉल खेलना अपन के बस का नहीं। अपने अहाते यानी सौ लूकरगंज के चार बांग्लाभाषी परिवारों के अलावा लूकरगंज के अन्य बांग्लाभाषियों के साथ हम लोगो का घुलना-मिलना लगभग नहीं के बराबर था। उसकी वजह थी बड़ी उम्र के बांग्लाभाषी, गैर बांग्लाभाषियों से एक तरह की दूरी बनाए रखते थे। इस वर्ग ने अपने भीतर बांग्ला सांस्कृति को जीवित रखा था। एवं अपनी संस्कृति के बाहर के लोगों से घुलने मिलने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। दुर्गा पूजा के समय पुरूष सफेद कलफदार धोती एवं कुर्ते में दृष्टिगोचर आते तो महिलाएं अपनी पारम्परिक वेशभूषा में। हाथोें में सफेद कड़े, बंगाली स्टाइल मे साड़ी। लड़कियाँ फैशन के नवीनतम स्टाइल के साथ।

वीरेन्द्र कृष्ण भट्ट और दुर्गा पूजा की छवि


दुर्गा पूजा एक ऐसा त्यौहार था जिसका हमारे परिवार को वर्ष भर इंतजार रहता। आकाशवाणी से 'महालया' नियमित रूप से प्रतिवर्ष हमारे घर में सुना जाता (और यह परम्परा आज तक बनी हुई है। सुबह 4ः30 बजे जब आकाशवाणी से वीरेन्द्र कृष्ण भट्ट की आवाज में 'या देवी सर्व भूतेषू, शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः' का स्वर सुनाई पड़ता तो एक सुखद अहसास पूरे परिवार में तारी हो जाता कि अब वातारण में उत्सव का रंग घुलने लगा है। हल्की ठंडक की उपस्थिति मौसम परिवर्तन की सूचना भी देती। फिर षष्ठी से ले कर नवमी तक पूजा पंडालों में हम लोगो का दिन गुजरता। सुबह पूजा पंडाल में पुजारी द्वारा नमोः के उच्चारण के साथ देवी की पूजा। फिर प्रसाद वितरण। दोपहर में भोग में खिचड़ी का प्रसाद और शाम को बांग्ला नाटक। अपने पड़ोसियों के साथ हम भाई बहन इन सब आयोजनों में शामिल रहते। दशमी के दिन विसर्जन के जुलूस में तो मैं कभी नहीं गया लेकिन पूजा पंडाल तक जाता रहा हूँ। पूजा पंडाल में हमारे हम उम्र तो हम लोगों से घुलमिल जाते, लेकिन बुजुर्गों से हमे ज्यादा लिफ्ट न मिलती। उनमें से कई, इलाहाबाद में दो-तीन पीढ़ियां गुजारने के बाद भी 'आमरा तो प्रवाशी बांगाली' कहते मिल जाते।' दरअसल बुजुर्गों के पास बंगाल वापस लौटने का एक स्वप्न था,  'आमार शोनार बांगला' जिसे वह भीतर ही भीतर पाल-पोस रहे थे, लूकरगंज में कई पीढ़ियों से निवास कर रहे, इन बंगाली परिवारों के पास रहने के लिए बड़े-बड़े बंगलानुमा मकान थे। इन्ही बांग्लाभाषी परिवारों में कई लोग बड़ी रोचक शख्सियत के मालिक थे। उनमें से एक थे 'लाऊ दा'। 'लाऊ दा' को मैं अगर सुबह-सुबह लूकरगंज के किसी इलाके में दौड़ भाग करते देख लेता तो समझ जाता कि उस दिन मुहल्ले के किसी बांग्लाभाषी परिवार का कोई सदस्य अल्ला मियां को प्यारा हो गया है। 'लाऊ दा' बड़े दर्जे के सामाजिक प्राणी थे। हर एक की मुसीबत में खड़ा होना उनका धर्म था। सम्भवतः वह देब परिवार से थे। ऐसे ही एक अन्य सज्जन थे। वह लूकरगंज के एक छोर पर बसे डॉ. बनर्जी के छोटे भाई थे। डॉ. बनर्जी की चिकित्सकीय प्रैक्टिस सत्तर के दशक में भी काफी अच्छी थी। अभी भी उनका नर्सिंग होम खूब चलता है जिसे उनकी मृत्यु के पश्चात उनका बेटा चला रहा है। डॉ. बनर्जी के छोटे भाई साहब का नाम तो हम बच्चों को नहीं पता था, लेकिन वह हमेशा साईकिल पर चलते थे। और बच्चों को देखते ही एक नारा उछाल देते थे, 'हेला-हेला हेई लाला, वीर बनो तुम हेई लाला'। हम बच्चे जब भी उनको देखते तो बोलते, 'हेला-हेला हेई लाला' बनर्जी साहब जवाब देते, 'वीर बनो तुम हेई लाला'। प्रायः अधिकांश बंगाली परिवारों के यहां एक बांग्ला अखबार भी जरूर आता था। हमारे पड़ोस में किसी के घर 'आनन्द बाजार पत्रिका' तो किसी के घर 'युगांतर'। अपनी युवावस्था में जब मुझे लगा कि मुझे बांग्ला भाषा को सीखना चाहिए, मैने भी घर पर 'आनन्द बाजार पत्रिका' लगा कर बांग्ला भाषा सीखने की कोशिश की थी। यहां एक रोचक तथ्य यह भी साझा करना चाहूंगा कि हमारे घर में हमारी माताश्री के अलावा सभी बांग्ला भाषा से परिचित थे। बोलने में भी और पढ़ने में भी। पिता जी ने तो बहुत से बांग्ला साहित्य का हिन्दी में अनुवाद किया था जो विभिन्न पत्रिकाओं में छपा था। अनुज संजय की भी बांग्ला भाषा में प्रवीणता है। लेकिन छोटी बहन कृष्णा तो बांग्ला ऐसे बोलती है जैसे बंगाल में पली बढ़ी हो। मुझे एक दिन का किस्सा याद है जब हमारे पड़ोस में दो बच्चे (भाई-बहन) कहीं बाहर से आये थे और वह बहन की बांग्ला सुन कर असमंजस में थे। उसमें से एक कह रहा था 'आमि तो बूझते पारछी न कि शे मेय बांगाली या हिन्दुस्तानी' (मुझे तो यह समझ में नहीं आ रहा कि यह लड़की बंगाली है या गै़र बंगाली)। हमारे आस-पास के बंगाली परिवारों के घरों में दो-तीन चीजें अवश्य देखने को मिल जाती थी। घर में राम कृष्ण परमहंस या विवेकानन्द की फोटो होगी, एक कोने में काली माँ की भी होगी और कई कई घरों में सितार भी मिल जाता था। लेकिन हमारे मुहल्ले के बंगाली परिवारों में उस प्रखर राजनैतिक चेतना के दर्शन न के बराबर होते थे जिसका उद्भव पश्चिम बंगाल में वर्ष 1967 से हो गया था। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ज्यादातर बंगाली परिवार अराजनैतिक थे या फिर कांग्रेस के समर्थक। इलाहाबाद के कुछ बंगभाषी परिवारों में वाम राजनैतिक चेतना का प्रस्फुटन था। इसमें एक परिवार था गांगुली परिवार। इलाहाबाद के नवाब युसूफ रोड पर रेलवे कॉलोनी में रहने वाले गांगुली परिवार से मेरा परिचय वर्ष 1980 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के पश्चात हुआ था। यहां पुत्र-पुत्री (गौतम एवं गायत्री) इलाहाबाद विश्वविद्यालय में SFI Students Federation of India CPI(M) के छात्र विंग में सक्रिय थे। प्रसिद्ध साहित्यकार (और मेरे पिता तुल्य) भैरव प्रसाद गुप्त जी का बचपन से सान्निध्य प्राप्त करने के कारण मेरी जानकारी मार्क्सवाद के बारे में इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने तक अच्छी हो गयी थी। इसलिये जब मै विश्वविद्यालय में पहुंचा तो मेरी मुलाकात गांगुली परिवार से हो गई। यह वर्ष 1980 की बात है। मैंने भी SFI ज्वाइन कर ली। उस दौर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में SFI की स्थिति बहुत अच्छी थी क्योंकि वर्ष 1979 में SFI के बैनर पर अनुग्रह नारायण सिंह विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष बने थे।


अनुग्रह नारायण सिंह 


कहा जा सकता है कि विश्वविद्यालय में SFI की हवा बह रही थी। दादा गौतम गांगुली और उनकी बहन गायत्री गांगुली विश्वविद्यालय में SFI की राजनीति करने में तन-मन से लगे थे। जब मैंने विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, उसी वर्ष गायत्री जी ने विश्वविद्यालय छात्रसंघ में उपाध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ा था। वह जीत तो नहीं पाई लेकिन द्वितीय स्थाान पर थी। इसी दौर में SFI की सदस्य संख्या बढ़ाने के लिहाज से गायत्री जी ने लूकरगंज के एक बंगाली परिवार मे SFI की मीटिंग की थी। उस परिवार की जिस युवती ने वह मीटिंग अपने घर पर रखी थी, उनकी चचेरी बहन बचपन में मेरे साथ लूकरगंज स्थित प्रयाग बालिका विद्यालय में (बाद में जिस स्कूल का नाम बदल कर विद्यावती बालिका रख दिया गया था) कक्षा 03,04,05 में पढ़ी थी। मेरी सहपाठिनी काफी आकर्षक व्यक्तित्व की युवती थी। स्कूल की पढ़ाई छूटने के बाद उससे कभी बातचीत नहीं हुई थी। उस घर में जाने का हम लोग सपना ही देखा करते थे। SFI की मीटिंग के बहाने मुझे उस घर में पहली बार प्रवेश मिला था। मैं बड़ा उत्साहित था कि अब उस घर में मेरा आना-जाना नियमित होगा। लेकिन हमारी मीटिंग के तत्काल बाद गृहस्वामी प्रकट हो गये। जब उन्हें पता चला कि हम लोग वामपन्थी छात्र संगठन के सदस्य हैं तो वह बेहद नाराज हुए। दरअसल वह खांटी कांगेसी थे और पश्चिम बंगाल में वामपन्थी उभार से बेहद आहत थे। यद्यपि पश्चिम बंगाल में (और पूरे देश में) उस दौर में वामपन्थ का जोर था लेकिन हमारे मुहल्ले के बांग्लाभाषी परिवार इससे अछूते थे। अपने मुहल्ले में चार बंगाली परिवारों से बेहद घनिष्ठता होने के चलते बांग्ला संस्कृति के दो अवयवों से मैं परिचित हुआ। एक तो कलकत्ता वाले बांग्ला कैसे बोलते हैं, उसके Phonetics को मैंने बचपन से सीख लिया था। दूसरे मछली खाने का शौक। बांग्ला भाषा के ज्ञान ने कई बार मेरी मुश्किलों को आसान किया। जैसे वर्ष 2004 में जब मेरी पोस्टिंग आकाशवाणी ईटानगर में हुई तो हमारी एक घरेलू सहायक कूचबिहार की विशुद्ध बांग्लाभाषी थी। उसका और मेरा सम्वाद बांग्ला भाषा में ही चलता। मेरा मानना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में किसी भी भारतीय को हिन्दी, अंग्रेजी अलावा एक अन्य क्षेत्रीय भाषा की समझ होनी चाहिए। मैं इस मामले में खुशकिस्मत था कि अड़ोस-पड़ोस की वजह से बचपन से ही बांग्ला भाषा का ज्ञान हो गया था। और बांग्ला नाटकों के देखने से इस ज्ञान में वृद्धि ही हुई। जहां तक मछली खाने की बात है तो इसमें हमारी पड़ोस की चाची जी का सहयोग बराबर मिलता रहा। हमारे घर के ठीक सामने जो दास जी का परिवार था, वहां चाची जी को साधिकार हमारी माता जी कहती, 'रूमा की अम्मा, आज पुतुल मछली ले कर आयेगा'। चाची जी खुशी-खुशी कभी सरसों वाली तो कभी बिना सरसों वाली मछली हम बच्चों के लिए बना देतीं। 'पुतुल' नाम से याद आया कि शायद मेरा घरेलू नाम भी मुझे अड़ोस-पड़ोस के बंगाली परिवारों से ही मिला होगा। यद्यपि इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी मैंने कभी अपने माता-पिता से नहीं प्राप्त की। चूंकि 'पुतुल' बांग्ला में गुड़िया को कहते हैं तो हो सकता है कि हमारे बांग्लाभाषी पड़ोसियों ने ही यह नामकरण किया हो। हां, 'पुतुल' से 'प्रतुल' का परिवर्तन वरिष्ठ कवि बाबा नागार्जुन की देन है। बहुत समय तक मैं यह सोचता था कि बाबा की कृपा केवल मुझ पर ही हुई होगी। किन्तु बाद में पता चला कि बाबा को बच्चों का नामकरण करने का शौक था। मेरे जैसे कितने ही नौनिहालों को उन्होनें विभिन्न नामों से नवाजा था।


वर्ष 1984 का कलकत्ता 


वर्ष 1984 तक मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में परास्नातक (M. A.) के द्वितीय वर्ष में आ गया था। तब तक मैं SFI (Student's Federation of India-student wing of CPM) का एक सक्रिय कार्यकर्ता भी बन गया था। विश्वविद्यालय में SFI के कई साथी भी बन गये थे। उसमें एक नाम बद्रीनारायण का था। बद्रीनारायण मुझसे दो वर्ष जूनियर थे। जब मैं M. A. द्वितीय वर्ष में था तो बद्री BA द्वितीय वर्ष में थे। संभवतः वह इलाहाबाद में इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के लिये ही आ गये थे। मेरी मित्रता इनसे काफ़ी पहले हो गयी थी। बद्रीनारायण उन दिनों हिन्दी कविता में युवा कवि के रूप में उभर रहे थे। 'प्रेमपत्र' नाम की इनकी कविता ने हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकारों का ध्यान खींचा था। कविता में ग्रामीण लोक के बिम्बों के इस्तेमाल ने भी बद्री की पहचान, उस समय के युवा कवियों में अलग बना दी थी। वर्तमान के हिन्दुत्व के चैंपियन, प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण तिवारी, पिछली सदी के आठवें दशक के प्रारंभिक वर्षों में SFI के एक सक्रिय कार्यकर्ता थे। मैं बद्रीनारायण के गॉंव इनके चाचा के लड़‌के प्रमोद (जो कि इन्हीं के साथ न्यू कटरा, इलाहाबाद के एक लॉज में रहते थे) की शादी में जा चुका था। इनका गॉंव, उस समय आरा ज़िले में था। बद्रीनारायण से मेरी अच्छी पटती थी। एक दिन हम लोगों ने तय किया कि कलकत्ता चला जाय। कलकत्ता के बारे में कोई आइडिया न होने के बावजूद मैं और बद्री निकल पड़े कलकत्ता। 

हम दोनों कलकता के बारे में कुछ नहीं जानते थे। एक पता था कामरेड इसरायल का। इसराइल जी ने कलकत्ता के मज़दूरों के जीवन पर कुछ सशक्त कहानियाँ लिखी हैं। वह उस समय CPM के एक अख़बार में काम कर रहे थे। कलकत्ता के अलीमुद्‌दीन स्ट्रीट स्थित मुज़फ़्फ़र अली भवन (जो कि CPM का राज्य मुख्यालय है) में बैठते थे। यह अख़बार 'स्वाधीनता' के नाम से हिन्दी में निकलता था और कलकत्ता के हिन्दी भाषियों पर केन्द्रित था।


कथाकार इजराइल


मुझे आज 42 वर्षों बाद यह याद नहीं कि कैसे हम लोग हावड़ा स्टेशन पर उतरे थे? क्या साधन लिये थे? और कैसे एक फ़्लैट की घंटी दबाई थी। याद है तो केवल इतना कि जब फ़्लैट का दरवाज़ा खुला तो एक औसत क़द वाला शख़्स सामने खड़‌ा था। हम लोगों ने बताया कि हम लोग इलाहाबाद से कलकत्ता घूमने आये थे और एस एफ आई के कार्यकर्ता हैं। कामरेड इसराइल का पता ढूंढ़ रहे हैं। उन सज्जन ने हम लोगों से ज़्यादा बात नहीं की। केवल यह कहा कि आप एस एफ आई के कार्यालय में चले जाइये। वह आप के कलकत्ता में रहने का इंतज़ाम कर देंगे। साथ ही उन्होंने किन्हीं रामकृपाल पांडेय जी का ज़िक्र किया। मैं रामकृपाल पांडेय जी को नहीं जानता था। बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि वह एस एफ आई उ. प्र. के अध्यक्ष रह चुके थे और बाद में उ. प्र. के किसी डिग्री कॉलेज में हिन्दी के व्याख्याता के तौर पर उन्होंने कार्य किया था। जिस औसत क़द के व्यक्ति से हम लोगों की कलकत्ता में सर्वप्रथम भेंट हुई थी, वह और कोई नहीं वरन् विमान बसु थे। उस वक़्त उनकी उम्र लगभग 42-43 वर्ष रही होगी। वह लम्बे समय तक पश्चिम बंगाल वाममोर्चा के संयोजक रहे थे। और पिछले दिनों 86 वर्ष की उम्र में भी विधानसभा चुनावों में पूरी सक्रियता के साथ वाम मोर्चा के उम्मीदवारों के प्रचार में जुटे थे। एस एफ आई पश्चिम बंगाल की राज्य कमेटी ने हम दोनों के रहने की व्यवस्था सियालदह स्थित यूथ सेंटर में कर दी थी जहां एक डॉरमेट्री में बहुत सारे तख़्त लाइन से लगे थे और प्रत्येक तख़्त का किराया मात्र दो रुपये था। हमें उस डॉरमेट्री में दस दिन रहना था और हमारे रहने का ख़र्चा एस एफ आई की राज्य कमेटी ने ही वहन किया था।


विमान वसु 


सियालदह में जो यूथ सेंटर है, उसकी ऊपरी मंज़िलों में सड़क का शोर वर्ष 1984 में भी इतना ज़्यादा था कि लगता था हमारे कानों के पर्दे फट जायेंगे। कार, बस, ट्राम, हाथ रिक्शा और सड़क पर मौजूद हज़ारों नागरिकों के शोर का जो धुआं सड़क से यूथ सेन्टर की पांचवीं, छठी या सातवी-आठवीं मंज़िल तक पहुंचता था, यह हम दोनों के लिये किसी महानगरीय जीवन की पहली झलक थी। महानगर के तौर पर कलकत्ता का अनुभव मेरे लिये अपूर्व था। मनुष्यों की आबादी का ऐसा घनत्व मैंने अपने जीवन में पहले किसी शहर में नहीं देखा था। हज़ारों-हज़ार लोग एक छोटी सी जगह पर।सड़क पर टुन टुन की घंटी बजाती ट्रामें और उन ट्राम में भी प्रथम श्रेणी और सामान्य श्रेणी के दो अलग-अलग कंपार्टमेंट। बांग्ला फ़िल्मों या गुरुदत्त की 'दो बीघा ज़मीन' में देखे हुए हाथरिक्शा जिसमें एक मनुष्य, दूसरे मनुष्य को रिक्शे में बैठा कर खींचते हुये।

दस दिन के अपने अल्प अवधि प्रवास में भी हम दोनों को बड़े रोचक अनुभव हुए थे। रोचक क़िस्सा यह था कि कलकत्ता की भीड़ भरी बसों में यात्रा करने का मेरा कोई पूर्व अनुभव था नहीं। अपने कलकत्ता प्रवास के पहले या दूसरे दिन मैं एक बस के अगले गेट के पास खड़ा हो गया। अब हर व्यक्ति जिसे अगले स्टॉप पर उतरना होता, वह मुझसे पूछता "नांभेन की?" शुरू में मुझे समझ नहीं आया कि हर यात्री मुझसे यह प्रश्न क्यूं पूछ रहा है? बाद में समझ में आया कि वह पूछ रहे थे कि "क्या आप उतरेंगे?" थोड़े समय पश्चात् मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ कि अगर किसी यात्री का गंतव्य तीन-चार स्टॉप बाद है तो उसे बस के अगले दरवाजे के पास बहुत पहले से नहीं खड़ा होना चाहिये। साथ ही मेरे शब्द कोष में एक शब्द जुड़ गया 'नांभेन' यानी उतरना। उस दस दिनी प्रवास में ऐसे कितने बांग्ला शब्द, मेरे शब्दकोष में जुड़ गये थे।

एक दिन सुबह-सुबह एक छोटे से रेस्तरां में हम लोगों ने नाश्ता करने के लिये प्रवेश किया। मैंने रेस्तरां मालिक से बांग्ला में पूछा "की आछे?" उसने कहा "डीम पांच टाका प्लेट, खस्सी दस टाका प्लेट, गोरु बीस टाका प्लेट" मैंने कहा "आमरा डीम खाबो।" छोटी-छोटी पूड़ियों के साथ हम लोगों ने अंडे की करी का नाश्ता किया। रेस्तरां से थोड़ा आगे निकलने के पश्चात मैंने बद्रीनारायण से कहा "जानते हो रेस्तरां वाला क्या कह रहा था?" बद्रीनारायण ने बांग्ला भाषा से अनभिज्ञता जताते हुए कहा "मुझे नहीं समझ में आया।" मैंने कहा "वह कह रहा था, अंडा पांच रुपये प्लेट, मटन दस रुपये और गाय बीस रुपये प्लेट।" बद्री के लिये यह व्याख्या अपच थी। वह कहने लगे "लग रहा है, मुझे उल्टी हो जायेगी।" मैने हंसते हुए कहा "परेशान होने की ज़रूरत नहीं। तुमने और मैंने तो अंडा ही खाया था।"

कलकत्ता में हम लोगों के दादा गौतम गांगुली, थोड़े समय पहले एक्साइज़ इंस्पेक्टर की नौकरी पाने के साथ इलाहाबाद छोड़ कर कलकत्ता आ गये थे। उस दौर में उनकी माता जी उनके साथ बेलघोरिया में रहती थीं। दादा गौतम गांगुली की शादी नहीं हुई थी। गौतम दादा की वजह से हम लोगों को बड़ी सुविधा प्राप्त हुई थी। एक दिन हम लोग प्रख्यात् लेखक एवं सी पी एम के पूर्णकालिक कार्यकर्ता कामरेड इसराइल को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उनके फ़्लैट पर पहुंचे। इसराइल जी, कलकत्ता में अकेले रहते थे। उनके परिवार के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। बस इतना ज्ञात था कि आप बिहार के किसी इलाक़े से कलकत्ता नौकरी करने आये थे और कलकत्ता में कई वर्ष किसी मिल में काम किया। लिखने-पढ़ने में रुचि रही होगी, इमलिये नौकरी के साथ-साथ साहित्यिक लेखन भी प्रारंभ किया। मज़दूरों के जीवन पर आपने कहानियाँ भी लिखीं। और एक कहानी 'फ़र्क़' काफ़ी चर्चित हुई। एक बार चंडीगढ़ से किसी प्रकाशक ने एक किताब हमारे यहां भेजी थी जिसमें औद्योगिक जीवन से जुड़ी हिन्दी कहानियों का पंजाबी भाषा में अनुवाद था। उसमें पापा (शेखर जोशी) की 'बदबू' थी तो इसराइल जी की 'फ़र्क़' थी। उस पुस्तक का नाम ही था 'फ़र्क़ और अन्य कहानियां'। इसराइल जी का इलाहाबाद में हमारे घर काफ़ी आना-जाना भी रहा था। वर्ष 1982 में 'जनवादी लेखक संघ' (जलेस) की स्थापना से पहले, जब जलेस के निर्माण प्रक्रिया से जुड़ी कई बैठकें भैरव प्रसाद गुप्त जी के यहाँ हुई थीं तो इसराइल जी उसमें नियमित रूप से प्रतिभाग करते थे। इस तरह कमरेड इसराइल जी से मेरा पूर्व परिचय था।

एक लम्बे चौड़े अपार्टमेन्ट की तीसरी या चौथी मंज़िल पर एक फ़्लैट में जब हम दोनों ने प्रवेश किया था तो दरवाजे के निकट ही एक कमरे में इसरायल जी एक कुर्सी और मेज़ पर लुंगी और बनियान में लिखते-पढ़ते दिखे। औसत से भी कम क़द वाले, दुबले पतले श्याम वर्ण इसरायल जी की मेज़ पर लाल चाय का एक बड़ा ग्लास था और एक बीड़ी का बंडल। उनके कमरे से बैठ कर सामने के कमरे में एक मच्छरदानी के भीतर एक छोटे से बच्चे के साथ खेलते हुये नौजवान दंपत्ति दिख रहे थे। इसराइल जी से भेंट करने के पश्चात् हम दोनों, कलकत्ता घूमने निकल गये। एक दो दिन पश्चात् हम लोगों की मुलाक़ात, दादा गौतम गांगुली से हुई। उन को हम लोगों ने बड़े उत्साहपूर्वक बताया कि हम लोग इसराइल जी से उनके फ़्लैट पर मिलने गये थे। फ़्लैट के दरवाजे पर डा. प्रशांत मंडी लिखा था (जहां तक मुझे याद आ रहा है)। हमने कहा "ऐसा लगता है कामरेड इसराइल किसी युवा दंपत्ति के साथ फ़्लैट शेयर कर रहे हैं।" गौतम दादा ने कहा - "अरे वह प्रशांत मंडी, बंगाल के आदिवासी कल्याण मंत्री हैं"। गौतम दादा की बातें सुन कर हम दोनों के पांवों के नीचे जैसे ज़मीन खिसक गई थी। राज्य कैबिनेट का कोई मंत्री इतनी सहजता से रह रहा था, यह केवल किसी वामपंथी पार्टी के राज में ही संभव था। मैं यह पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन के शुरुआती वर्षों में सार्वजनिक जीवन में आदर्शवाद अपनी पराकाष्ठा पर था। दस दिनों के अल्प प्रवास में ही हम लोगों को कलकत्ता के विभिन्न राजनीतिक गलियारों में आदर्श और सादगी का जो रूप दिखा, उसने वामपंथ के भीतर मेरी आस्था को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण योग‌दान दिया। जैसे कॉलेज स्ट्रीट का अनुभव।


सर आशुतोष मुखर्जी


कलकत्ता का कॉलेज स्ट्रीट इलाक़ा, वह इलाक़ा है जहां ढेर सारे कॉलेज स्थित हैं। चूंकि बद्रीनारायण और मैं दोनों ही, एस एफ़ आई के कार्यकर्ता भी थे, और कलकत्ता में एस एफ़ आई के मेहमान, इसलिये कॉलेज स्ट्रीट जा कर देखना था कि वहाँ का माहौल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किस तरह भिन्न है एवं एस एफ़ आई का क्या असर है? हम लोगों ने कॉलेज स्ट्रीट में लॉ कॉलेज का रुख किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय का लॉ कॉलेज, प्रख्यात शिक्षाविद, गणितज्ञ, क़ानूनविद सर आशुतोष मुखर्जी के सद्‌प्रयत्नों से वर्ष 1909 में स्थापित किया गया था। आशुतोष मुखर्जी, भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता भी थे। लॉ कॉलेज में प्रवेश करने से पूर्व मैं सर आशुतोष मुखर्जी के बारे में कुछ नहीं जानता था। कॉलेज परिसर में आशुतोष मुखर्जी की आवक्ष मूर्ति (Bust) ने मेरा ध्यान इसलिए खींचा कि मूर्ति में जो घनी, टेलीफ़ोन टाईप मूंछें दृष्टिगोचर हो रही थीं, वह हिन्दी के प्रकांड विद्वान एवं आलोचक डा० रामचन्द्र शुक्ल से बहुत कुछ मिलती जुलती थीं। बद्री और मैं, लॉ कॉलेज में दाख़िल हुए। लॉ कॉलेज में जिस तरह से छात्र-छात्राओं के मध्य बेहद उन्मुक्त माहौल था, खूब हंसी मज़ाक, बहसें हो रही थीं, उसने मुझे भीतर ही भीतर उदास कर दिया था। एक तरफ कलकत्ता विश्वविद्यालय का वह उन्मुक्त माहौल था, दूसरी तरफ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं के दरम्यान इतनी दूरी थी कि एम ए में अपनी सहपाठिनों से बात करने के लिये भी हम लोगों को न जाने कितने दंड पेलने पड़ते थे। हम दोनों कैंटीन में चाय पी रहे थे कि एस एफ़ आई के एक साथी ने बांग्ला में कहा, "दादा, आशुन मिछिल ते चली (आइये जुलूस में चलते हैं)" जुलूस? किस बात का जुलूस? मेरे दिमाग़ में प्रश्न उठा। लेकिन सोचने का समय नहीं था। चाय समाप्त करते ही हम लोग एक लम्बे चौड़े जुलूस का हिस्सा बन चुके थे। वह जुलूस दरअसल 16 अगस्त 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा असंवैधानिक तरीके़ से एन टी रामाराव की चुनी हुई सरकार को बर्ख़ास्त करने के ख़िलाफ़ था। कहां बंगाल, कहाँ आंध्र प्रदेश। लेकिन उस दौर में बंगाल में राजनैतिक चेतना इतनी प्रबल थी कि देश के किसी भी हिस्से में यदि कोई अन्याय होता तो उसके विरोध में बंगाल के विभिन्न तबक़ों के लोग जुलूस और नारों के साथ मैदान में उतर जाते। बंगाल में नारे भी बड़े रोचक होते थे। नारे की प्रथम पंक्ति में घटना का विस्तृत वर्णन होता और अंत में ज़िदाबाद या मुर्दाबाद का एक शब्द। उस दिन जुलूस में नारा था (बांग्ला में) "आंध्र प्रदेश की NTR की सरकार को असंवैधानिक तरीक़े से बर्ख़ास्त करने के विरुद्ध, हम कहेंगे मुर्दाबाद"। नारा लगाने वाले व्यक्ति द्वारा इतना लंबा नारा लगाने के बाद, जवाब में जुलूस में शामिल प्रतिभागियों द्वारा नारा लगाया जाता "मुर्दाबाद, मुर्दाबाद"। 

जुलूस के रूप में परिसर की परिक्रमा के पश्चात् हम लोगों ने कैंटीन का रुख किया। हमारे साथ लॉ कॉलेज छात्रसंघ के महासचिव महोदय भी थे। जिस राजनैतिक सादगी की चर्चा मैं पहले कर चुका था, उसका एक अन्य उत्कृष्ट रूप उन महासचिव महोदय के रूप में दिखाई दिया।कैन्टीन की तरफ बढ़ते हुये, महासचिव महोदय ने कहा कि उनकी जेब में पैसे नहीं थे। इसलिये वह चाय पिलाने में असमर्थ थे। मुझे उन छात्र नेता महोदय की बात सुन कर बड़ी हँसी आयी और आश्चर्य भी हुआ। कलकत्ता विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज छात्रसंघ का महासचिव, इस कदर विनम्रता से आर्थिक रूप से अपने कमज़ोर होने का, दो बिल्कुल अनजान लोगों के समक्ष वर्णन कर रहा था, यह मुझे चौंकाने वाला था। लेकिन सर्वहारा की पार्टी के शासन में, सर्वहारा का चरित्र तमाम स्तरों पर दिख रहा था तो कोई आश्चर्य की बात भी नहीं थी।

अस्सी के दशक का बंगाल क्रांतिकारी भावों से भरा बंगाल था।

पश्चिम बंगाल के अलावा केरल और त्रिपुरा में वामपंथी सरकारें अस्तित्व में आ चुकी थीं। देश में वामपंथ की तरफ़ लोग बड़ी आशा और उत्साह से देख रहे थे। विश्वविद्यालयों, डिग्री कॉलेजों और इंटर कॉलेजों तक में वामपंथी छात्र संगठन अपनी पताका फहरा रहे थे। "मांग रहा मज़दूर किसान, लाल क़िले पर लाल निशान" के नारों से आकाश गुंजायमान हो जाता, जब सड़‌कों पर वामपंथी पार्टियों के जुलू‌स निकलते।

तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में मैंने वहां के बहुत से नवयुवक-नवयुवतियों से पूछा कि भविष्य में वह क्या करना चाहेंगे? एक ही जवाब मिलता। "पार्टी करबो"। अधिकांश नौजवान युवक-युवतियाँ कम्युनिस्ट पार्टियों के पूर्णकालिक सदस्य बन कर देश को वामपंथ की तर‌फ़ ले जाना चाहते थे। यदि कोई SFI की राज्य कमिटी का सदस्य होता तो यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उसका परिचय बड़े ही सम्मानपूर्वक तरीक़े से करवाया जाता।



अपने दस दिनी कलकत्ता प्रवास में हम लोग तीन चार दफ़े CPM के राज्य मुख्यालय मुज़फ़्फ़र अली भवन भी गये जो कलकत्ता के मौलाली इलाक़े में अलीमुद्‌दीन स्ट्रीट में है। यह हमारे ठहरने के स्थान 'यूथ सेन्टर' (जो कि सियालदह रेलवे स्टेशन के क़रीब है) से बहुत ज़्यादा दूर नहीं है। उन दिनों मुज़फ़्फ़र अली भवन बहुत गुलज़ार रहा करता था। हमारे परिचित इसरायल जी के अतिरिक्त वहाँ अयोध्या सिंह जी भी थे, जिन्होंने 'फ़ासीवाद' जैसी चर्चित पुस्तक लिखी थी। आप दोनों ही 'स्वाधीनता' अख़बार में कार्यरत थे। अयोध्या सिंह जी सम्पादक थे और इसरायल जी संपादकीय विभाग में। मुज़फ़्फ़र अली भवन में एक दंपत्ति के भी दर्शन हुए थे जो बड़े ही अनौपचारिक तरीक़े से वहां नज़र आये थे। यह थे अरुण माहेश्वरी जी और सरला माहेश्वरी जी। सरला जी दो दफ़े CPM की तरफ़ से राज्यसभा की सदस्य भी बनी थीं।


अरुण माहेश्वरी और सरला माहेश्वरी


बचपन से बांग्ला नाटकों के शौक़ के चलते कलकत्ता जा कर मेरी इच्छा हुई थी कि कोई बांग्ला नाटक देखा जाए। पता चला कि अरुण मुखर्जी का चर्चित नाटक 'मारीच संवाद' का प्रदर्शन 'एकेडमी' में हो रहा है।

'एकेडमी' यानी 'एकेडमी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स' यानी कलकत्ता का सांस्कृतिक ह्रदय। विक्टोरिया मेमोरियल से बस कुछ क़दम दूर यह पूरा परिसर कलकत्ता के संस्कृतिकर्मियों का जुटान स्थल है। यहां अगर एक नाट्‌य प्रेक्षागृह है तो बग़ल में 'नंदन' नामक परिसर है जहां बहुत सारे प्रेक्षागार हैं जिसमें फ़िल्म शो होते रहते हैं। इसी स्थान पर प्रतिवर्ष Kolkata Internation Film Festival का आयोजन होता है। इस जगह से पश्चिम बंगाल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य जी के बड़े प्रगाढ़ रिश्ते रहे थे। वर्ष 1980 में उन्होंने यहाँ एक थियेटर की आधारशिला रखी थी। वह इस स्थान पर नियमित रूप से आते थे। वर्ष 2001 में मुख्यमंत्री बनने के बाद तो उनका यहां आना और ज़्यादा हो गया था। बांग्ला के प्रसिद्ध कवि सुकांत भट्टाचार्य, बुद्धदेव जी के पिता जी के चचेरे भाई थे। बुद्धदेव भट्टाचार्य स्वयं भी एक अच्छे अनुवादक और नाटककार थे। बुद्धदेव जी ने कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय से बांग्ला साहित्य में एम. ए. किया था। 

बंगाल की यह ख़ूबी रही है कि यहां बड़े-बड़े शिक्षाविद्, साहित्यकार, चिकित्सक सक्रिय राजनीति से समय-समय पर जुड़े रहे हैं। पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री विधान चन्द्र राय पेशे से चिकित्सक थे।



बद्रीनारायण और मैंने अरुण मुखर्जी लिखित एवं निर्देशित नाटक 'मारीच संवाद' का लुत्फ़ उठाया। हम लोगों के टिकट की व्यवस्था इसरायल जी ने कर दी थी। उन्होंने दूरभाष से अरुण मुखर्जी महोदय को सूचित कर दिया था कि हम लोग नाटक देखने आयेंगे। 'मारीच संवाद' पिछली शताब्दी के सातवें और आठवें दशक का एक बहुचर्चित नाटक है जिसमें मारीच के मिथकीय चरित्र के माध्यम से वर्तमान दौर में किसानों और मज़दूरों के ऊपर जिस तरह का शोषण और अत्याचार हो रहा था उस का वर्णन किया गया था। उस दौर में 'मारीच संवाद' की इतनी लोकप्रियता थी कि वर्ष 1984 के अगस्त महीने में जब हम लोग कलकत्ता में इस नाटक को देखने गए, उससे 11 वर्ष पूर्व यानी 1973 से ही इसका मंचन कोलकाता में लगातार हो रहा था। इस नाटक के हिन्दी नाट्य रूपांतरण का मंचन कई वर्षों बाद (वर्ष 1992 के आस-पास) मैंने लखनऊ में भी देखा था, जिसमें आतमजीत सिंह, मधु गर्ग, बंदना राय, के. के. चतुर्वेदी, सुधीर कुमार श्रीवास्तव, बी. आर. बलूनी ने अभिनय किया था। इस नाटक का निर्देशन सर्वश्री आतमजीत सिह ने किया था एवं आयोजन 'क़लम नाट्‌य मंच' संस्था के द्वारा किया गया था। 

कलकत्ता (या वर्तमान का कोलकाता) अपनी बहुत सारी ख़ूबियों के चलते देश का एक अनूठा और विशिष्ट शहर है। अभी तक अवर्णित एक अन्य चीज़ है, बंगाली जन का मिष्टि प्रेम। मेरा मानना है कि हमारे देश में छेने की मिठाई सबसे अच्छी तरह अगर कोई बनाता है तो वह बंगाली पाकशास्त्री ही हैं। बचपन से बंगाली मिठाईयों की दीवानगी मेरे भीतर रही है और आज भी कायम है। सफेद रसगुल्ला, खीरकदम, चमचम, विभिन्न क़िस्म के संदेश और मिष्टि दोई (मीठा दही)। अपने कलकत्ता प्रवास में एक चीज़ मैने महसूस की कि मिठाई, बंगाली जन के दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा है। वहां मिठाई की दुकानों में बाकायदा कुर्सी, मेज़ लगी होती थी। पता चला एक परिवार (पति, पत्नी एवं दो बच्चे) मिठाई की दुकान में कुर्सी, मेज़ पर बैठ कर मिठाई का ऑर्डर देते दिख जाते। और वहीं उस मिठाई का सेवन करते। बचपन में इलाहाबाद और गृहस्थ आश्रम में आने के बाद लखनऊ में क्रमशः लोकनाथ और नरही में दुकान के सामने सुबह-सुबह अकेले दही जलेबी का आनंद तो मैंने ख़ूब लिया है, लेकिन पूरे परिवार के साथ कुर्सी मेज़ पर बैठ कर विभिन्न प्रकार की मिठाईयों का स्वाद लेते परिवार रूपी इकाई के दर्शन मुझको पूरे देश में कलकत्ता में ही हुए थे।

अगर उस दौर में बंगाली परिवारी जन के मध्य मिठाईयाँ बहुत प्रिय थीं तो पुरुषों के मध्य 'चारमीनार' सिगरेट। कलकत्ता में उमस और क्रांतिकारी तेवरों के चलते उस दौर में सिगरेट पीने का चलन भी अन्य राज्यों के मुक़ाबले ज़्यादा था।

कलकत्ते की अड्डेबाज़ी का ज़िक्र न हो तो कलकत्ता को अधूरा ही जाना जायेगा। 'अड्डेबाज़ी' यानी चाय की दुकानों, काॅफ़ी हाऊसों पर युवक युवतियों का जमावड़ा और लम्बे समय तक विभिन्न विषयों पर बहस- मुबाहिसा । यह चर्चा किसी तात्कालिक भारतीय राजनीतिक घटना से होती हुई अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों को छूती हुई मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के किसी मैच पर टिक सकती थी। कलकत्ता की 'अड्डेबाज़ी' के विषय पर मैंने सुना तो बहुत था लेकिन अवसर एक दिन मिला जब गौतम दादा के ऑफिस हम दोनों पहुंचे और पाया कि ऑफिस समय समाप्त होने के बाद भी ढेर सारे युवक युवतियाँ ऑफिस कैंटीन में बैठे विभिन्न विषयों पर देर शाम तक चर्चा में मशगूल थे।

कलकत्ता में दस दिन कैसे बीत गये थे, पता ही नहीं चला। लेकिन आख़िरी दिन हम लोगों के साथ एक घटना घट गयी। बद्रीनारायण और मैं एक बस से उतरे ही थे कि बद्री ने कहा कि उस की जेब कट गयी थी। ज़्यादा पैसे तो नहीं थे लेकिन वह घटना हम दोनों के लिये ग़रीबी में आटा गीला करने जैसी थी। ख़ैरियत थी कि मेरी जेब नहीं कटी थी और मेरे पास इतने पैसे थे कि हम लोग सकुशल यूथ सेंटर पहुंच सकते थे। पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक में कलकत्ता की भीड़ भरी बसों में पॉकेटमार बड़ी तादाद में पाये जाते थे और बड़े पैमाने पर दैनिक यात्रियों की जेबें कटा करती थीं। इस संदर्भ में एक मजे़दार क़िस्सा आकाशवाणी में मेरे सीनियर और दूरदर्शन महानिदेशालय में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए सोमनाथ सान्याल जी ने सुनाया था (आप अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में कलकत्ता में पदस्थ थे)। धर्मतल्ला (कलकत्ता का मुख्य केन्द्रीय इलाक़ा) में ऑफिस जाते समय एक व्यक्ति की जेब कट गयी। उन सज्जन ने ज़ोर-ज़ोर से चीख़ना शुरु कर दिया "भाइयों, सावधान हो जाइये। यहाँ बस में कोई पाकेटमार है। मेरी जेब कट गई है। आप लोगों की भी कट सकती है। सावधान हो जाइये। यहां कोई पाकेटमार है।" उन सज्जन के इस कारुणिक प्रलाप को देख-सुन एक व्यक्ति उनके पास आया। उसने कहा "दादा, आप इतना क्यूं शोर मचा रहे हैं? किनारे आइये।" वह व्यक्ति, जिसकी पॉकेट कटी थी उन सज्जन को किनारे ले गया और अपने पास से दसेक पर्स निकाल कर बोला, "इनमें से जो आपका हो, ले लीजिए।" अब भौचक्का होने की बारी उन सज्जन की थी जो उस समय तक चीख़ चीख़ कर सबको आगाह कर रहे थे। उन शिष्ट पॉकेटमार महोदय ने धीरे से कहा "दादा, यह हमारे धंधे का पीक पीरियड है। आप क्यूं हमारे पेट पर लात मारने में लगे हैं।" ख़ैर! हम लोगों की मुलाक़ात किसी पॉकेटमार से न हुई।

वर्ष 1988 में मैं आकाशवाणी की नौकरी के चलते इलाहाबाद छोड़ कानपुर आ गया था। वर्ष 1992 से वर्तमान तक लखनऊ में हूँ। यहां हीवेट रोड पर बंगाली जन की एक बेहद पुरानी संस्था 'बंगाली क्लब एवं नवयुवक समिति' है। इस संस्था के द्वारा एक Full Length (पूर्णांग) नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन प्रतिवर्ष दिसम्बर के चौथे सप्ताह से प्रारंभ होता है (इस का ज़िक्र मैने पूर्व में भी किया है)। यहीं मैंने रवींद्रनाथ टैगोर, मनोज मित्रा, उत्पल दत्त, मति नंदी, बादल सरकार जैसे कितने ख़्यातिनाम बांग्ला लेखकों के नाटकों का मंचन देखा। 

पत्नी लक्ष्मी लखनऊ में ही पली-बढ़ीं है। बचपन से कुमाऊंनी रामलीलाओं को देखने का शौक़ रहा है। इलाहाबाद में दशहरे के दौरान मैंने बहुत कम दफ़े रामलीलाएँ देखीं। मेरा अधिकतर वक़्त पूजा पांडालों में ही गुज़रता था। इसलिये शादी के बाद लखनऊ में जब भी दशहरे का त्यौहार आता, पत्नी रामलीला के मैदान की तरफ़ दौड़ लगाती लेकिन मैं कहता कि नहीं मुझे तो पहले पूजा पांडाल में जा कर उस बांग्ला संस्कृति को महसूस करना है, जिस की सौंधी ख़ुशबू आज भी मेरी सांसों में बसी है। वक़्त बदलने के साथ, अब वह पूजा पांडाल अतीत की वस्तु बन कर रह गये हैं जहां प्रतिदिन एक नाटक देखने का सुख मिलता था। आज की पीढ़ी के प्रतिनिधियों का सारा ज़ोर पूजा पांडालों को भव्य रूप देने में ही लगा रहता है। कुछ पूजा पांडालों को छोड़ दें तो बाक़ी में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर डी जे का शोर रहता है। हां, लेकिन बंगाल के कोने-कोने से आये हुये कांधे पर बड़ा सा ढोल लटकाए ढाकिये और उनके ढोल की मधुर स्वर लहरियों पर हाथों में और मुंह में ढुनुची का संतुलन बना कर नृत्य करते बांग्लाभाषी युवक युवतियों के समूह ने आज भी बंगला संस्कृति की सुगन्ध को दुर्गा पूजा के दौरान पूरे देश में जीवित रखा है।




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