वसुंधरा पाण्डेय की कविताएँ
![]() |
| वसुन्धरा पाण्डेय |
यह अजीब विडम्बना है कि हरेक व्यक्ति जीवन भर अपने लिए संपूर्णता की कामना करता है। लेकिन यह संपूर्णता अन्ततः एक मृगमरीचिका ही साबित होती है। तमाम प्रयास जो इस संपूर्णता के लिए किए जाते हैं, वही दरअसल वास्तविकता होते हैं। ये छोटे छोटे प्रयास ही अन्ततः उस संपूर्णता को सिरजते हैं जो उस आसमान जैसा होता है जिसका कहीं अस्तित्व ही नहीं। हकीकत यही है कि हर अधूरापन अपने आप में तमाम संभावनाएं लिए होता है जबकि संपूर्णता सारी संभावनाओं का समापन कर देती है। मनुष्य जीवन के इस अधूरेपन की कवयित्री हैं वसुन्धरा पाण्डेय। इसी दृष्टि के चलते वसुन्धरा उस गरीबी को देख पाती हैं जो उस बहुमूल्य रत्न निकालने में पूरी जिन्दगी लगे रहते हैं, लेकिन वह बहुमूल्यता उनके किसी काम की नहीं होती। दरअसल यही दृष्टि किसी भी कवि का प्राप्य होती है। आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं वसुन्धरा पाण्डेय की कविताएँ।
वसुंधरा पाण्डेय की कविताएँ
नन्हे हीरों का अंधकार
उन नन्हें हीरे बच्चों का भविष्य
कोयलों से भी काला है
जिनकी सुबह
स्कूल की घंटियों से नहीं
फैक्ट्रियों की कर्कश आवाज़ों से खुलती है
और जिनकी रात
कहानियों की गोद में नहीं
थकान की धूल में ढह जाती है
उनके छोटे-छोटे हाथों में
अब भी खिलौनों की जगह
ईंटों का बोझ
कूड़े की बोरियाँ
और अधपके सपनों की किरचें हैं
वे बच्चे
जो अभी ठीक से
माँ की उँगली पकड़ कर चलना भी नहीं सीखे
समय ने उन्हें
रोज़ी-रोटी की अंधेरी सुरंगों में उतार दिया
उनकी हथेलियों पर
रेखाएँ नहीं
छाले उग आए हैं
उनकी आँखों में
शरारत की चमक नहीं
एक अकाल-बूढ़ी चुप्पी उतर आई है
वे भी रंग भरना चाहते थे
आसमान
नदियों
तितलियों
और पेड़ों में
वे भी दौड़ना चाहते थे
बरसात की भीगी गलियों में
मिट्टी से सने पैरों के साथ
वे भी सुनना चाहते थे
सोने से पहले
दादी की अधूरी कहानियाँ
पर जीवन ने
उनके हिस्से में
सिर्फ धुआँ
कालिख
और बुझते हुए चूल्हे लिखे
उनकी साँसों में
बारूद और धूल भर दी
उनके बचपन पर
भट्टियों की राख बिछा दी
फिर भी
उनकी आँखों के किसी कोने में
एक छोटी-सी रोशनी अब भी बची है
जो हर रात
अंधेरे से लड़ते हुए कहती है
कि शायद कभी कोई सुबह
उनके हिस्से भी आएगी
जिनकी हथेलियों में
अब भी किताबों की जगह
धूल राख और छाले हैं
वे उम्र से पहले
भट्टियों की आग समझ लेते हैं
पर अक्षरों की रोशनी
उन तक पहुँच ही नहीं पाती
जिस देश में
एक ओर
लोग अपनी उँगलियों में जड़े हीरों को
प्रतिष्ठा वैभव और भाग्य का प्रतीक मान कर
गर्व से प्रदर्शित करते हैं
उसी देश की धरती के नीचे
अनगिनत ऐसे जीवन दबे पड़े हैं
जो उन हीरों की चमक पैदा करते करते
स्वयं अंधेरों में खो गए
यह कितना विचित्र और क्रूर सत्य है
कि जो मनुष्य
धरती की कोख से
दुनिया के सबसे बहुमूल्य रत्न निकालता है
उसके घर की दीवारों पर
बरसों से गरीबी की दरारें पड़ी रहती हैं
खदानों में उतरने वाले वे मजदूर
सिर्फ पत्थर नहीं तोड़ते
वे अपनी साँसें
अपनी उम्र
अपनी हड्डियाँ
और अपने सपने भी
धीरे-धीरे तोड़ते चलते हैं
उनकी पीठ पर
सिर्फ श्रम का बोझ नहीं होता
पूरे परिवार की भूख
उनके कंधों पर रखी होती है
सुबह का सूरज
उनके लिए नई उम्मीद ले कर नहीं आता
बल्कि एक और कठिन दिन का बोझ ले कर आता है
उनकी हथेलियाँ
इतनी कठोर हो चुकी होती हैं
कि उनमें बचपन
कोमलता
और विश्राम
धीरे-धीरे मरने लगते हैं
और सबसे बड़ा दुख यह है
कि यह अंधकार
सिर्फ एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता
वह पीढ़ियों में फैलता है
पिता की थकान
बेटे की नियति बन जाती है
माँ की विवशता
बेटी के भविष्य में उतर जाती है
उन मजदूरों के बच्चे
हीरों की चमक नहीं देखते
वे सिर्फ धूल देखते हैं
कालिख देखते हैं
भूख से बुझती आँखें देखते हैं
उनके लिए
स्कूल कोई अधिकार नहीं
एक दूर का सपना होता है
जहाँ शिक्षा की ज्योति नहीं जलती
वहाँ जीवन
धीरे-धीरे अंधे कुएँ में बदल जाता है
अज्ञान केवल अक्षरों का अभाव नहीं होता
वह मनुष्य से
उसका आत्मविश्वास
उसकी आवाज़
और उसके सपने छीन लेता है
जो बच्चा
किताबों के पन्ने पलट सकता था
वह मजबूरी में
पत्थरों के ढेर उलटता है
जो हाथ
कलम पकड़ सकते थे
वे समय से पहले
औज़ार पकड़ने को विवश हो जाते हैं
समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है
कि वह हीरों की चमक पर मोहित है
पर उन्हें खोजने वाले चेहरों की कालिमा से
अपनी आँखें फेर लेता है
बाज़ार में पहुँच कर
हीरा रोशनी बन जाता है
पर खदानों में
उसी रोशनी की कीमत
किसी मजदूर की बुझती साँसों से चुकाई जाती है
चमक बाज़ारों तक पहुँचती है
पर उसका अंधेरा
मज़दूरों की झोपड़ियों में रह जाता है
जो हाथ
धरती की छाती चीर कर
दुनिया को अनमोल रत्न देते हैं
उन्हीं हाथों में
अक्सर दो वक्त की रोटी भी नहीं होती
और शायद इसीलिए
उन नन्हें बच्चों का भविष्य
कोयलों से भी अधिक काला दिखाई देता है
क्योंकि उनके जीवन में
सिर्फ गरीबी ही नहीं
अवसरों का अभाव भी है
जब तक
उन बस्तियों में
शिक्षा का दीपक नहीं जलेगा
जब तक
उन हाथों को
सिर्फ श्रम नहीं
सम्मान भी नहीं मिलेगा
तब तक
धरती से निकलने वाले हीरे
दुनिया को भले ही चमक दें
पर उन्हें खोजने वालों की जिंदगी
अंधेरे में ही डूबी रहेगी।
सभ्यता का प्रश्न
मासूमों की मौत
सिर्फ धड़कनों का थम जाना नहीं होती
वह समय के चेहरे पर उभर आई
एक ऐसी दरार होती है
जिससे सभ्यता का सारा गर्व रिसने लगता है
जब कोई मासूम मरता है
तो पृथ्वी अपने अक्ष पर
थोड़ी देर के लिए और भारी हो जाती है
आकाश का नीला रंग
कुछ फीका पड़ जाता है
और मनुष्य होने का अर्थ
अचानक कठघरे में खड़ा दिखाई देता है
क्योंकि बच्चे
ईश्वर की सबसे निर्दोष भाषा होते हैं
वे संसार में
विश्वास की अंतिम बची हुई रोशनी ले कर आते हैं
उनकी आँखों में
भविष्य अपनी सबसे सुंदर संभावना लिखता है
और जब वही आँखें
समय से पहले बुझा दी जाती हैं
तो मरता केवल एक शरीर नहीं
मर जाती है
मानवता की वह संभावना
जो अभी पूरी तरह जन्म भी नहीं ले पाई थी
मासूमों की मौत
दरअसल किसी एक दुर्घटना
युद्ध
भूख
हिंसा
या उपेक्षा की घटना भर नहीं होती
वह उन सभी मौनों का परिणाम होती है
जो समाज ने सुविधानुसार ओढ़ रखे थे
हर वह चुप्पी
जो अन्याय देख कर भी शांत रही
हर वह व्यवस्था
जिसने लाभ को जीवन से बड़ा माना
हर वह मनुष्य
जिसने करुणा को कमजोरी समझा
उन सबकी छाया
इन छोटी कब्रों पर पड़ी होती है
सभ्यताएँ
अपने स्मारकों से नहीं
अपने बच्चों की हँसी से जीवित रहती हैं
जिस दिन किसी समाज में
मासूमों की चीखें
सामान्य समाचार की तरह सुनी जाने लगें
समझ लेना चाहिए
कि वहाँ पतन शुरू हो चुका है
भले ही बाज़ार चमक रहे हों
भाषण गूँज रहे हों
और विकास के झंडे आकाश छू रहे हों
क्योंकि किसी भी युग की सबसे बड़ी विफलता
यह नहीं कि उसने कितनी लड़ाइयाँ हारी
बल्कि यह है
कि वह अपने सबसे कोमल जीवनों को
बचा नहीं सका
मासूमों की मौत
धरती पर ईश्वर के विश्वास का टूटना है
और हर टूटा हुआ बचपन
मनुष्यता के माथे पर लिखा
वह प्रश्न है
जिसका उत्तर
कोई इतिहास कभी पूरी तरह नहीं दे पाएगा।
चींटी और आटे का गीत
एक कण आटे का ले कर
चलती है छोटी-सी चींटी
न कोई शोर न कोई दावा
बस श्रम की अपनी विनती
धूप तपे तो रुकती कब है
बारिश आए मुड़ती कब है
पगडंडी के तीखे पत्थर
उसकी गति को तोड़ें कब हैं
देखो उसकी लंबी पंक्ति
मानो जीवन का अनुशासन
हर दाना भविष्य की खातिर
हर कदम में मौन साधन
चींटियों की छोटी मांदें
महलों से कम कहाँ होतीं
मिट्टी-मिट्टी जोड़-जोड़ कर
वे श्रम की गाथाएँ बोतीं
कोई राजा नहीं वहाँ पर
न कोई ऊँचा न छोटा
जिसको जितना काम मिला है
उतना ही सबने है ढोया
एक अकेली चींटी शायद
दाने भर से हार भी जाए
पर मिल कर जब हाथ बढ़ें तो
पर्वत भी रस्ता बन जाए
मनुष्य बड़ा हो कर भी अक्सर
मेहनत से कतराता है
और नन्हीं-सी चींटी प्रतिदिन
जीवन का पाठ पढ़ाती है
संचय केवल पेट न भरता
संकट में साहस बनता है
परिश्रम की सूखी रोटी भी
सम्मान का स्वाद रखता है
इसलिए जब भी थक जाओ
मन में अंधियारा छा जाए
चींटी की मांदों को देखो
श्रम ही जीवन का घर है।
ककनूस
उसने कहा था
तुम दुनियावी चीज़ों से बहुत लगाव नहीं रखतीं
पर तुम्हें नहीं पता
तुम अपने भीतर की जीवन्तता
उस स्वर्णिम आभा से
जो तुम्हारे होने मात्र से आस-पास फूट पड़ती है
एकदम अनजान हो
तुम आत्मकेंद्रित भी नहीं हो
तुम अपने आस-पास से उदासीन भी नहीं हो
किसी अलौकिक दुनिया की परिंदा-सी
तुम किसी अतिसूक्ष्म ध्वनि को भी अहमियत दे कर
उसे अपने अंतस तक निर्बाध उतर जाने देती हो
पर तुम उस अलौकिक लोक की वह परिंदा हो
जिसे पकड़ कर किसी पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकता
यदि कोई पिंजरा है भी
तो उसमें जाना या न जाना
यह परिंदा स्वयं तय करेगी
यह परिंदा
रसीदी टिकट के उस ककनूस की मानिंद है
जिसके पंख “किरमिची, सुनहरे और चमकीले"
जो पाँच सौ बरस की असामान्य आयु ले कर जन्मती है
और एक दिन स्वयं उड़ कर
सूरज के घर पहुँच जाती है
मैं देख पा रहा हूँ
वह परिंदा जिस राह से भी गुजरती है
एक सुगंध बिखेरती चलती है
और उस सुगंध के सच्चे अहसास के लिए
किसी दिल को स्वयं सूरज बनना पड़ता है।
अविरल अडिग
दो किनारों में बाँधी गई हूँ
रिश्तों की रस्सियों से साधी गई हूँ
पर ये मत समझो कि थम जाऊँगी
मैं नदी हूँ… मैं नदी हूँ
चुप रही तो कमज़ोर कही गई
बही तो बेकाबू ठहराई गई
पत्थरों ने राहें रोकीं तो क्या
ज़ंजीरों ने बाँहें टोकीं तो क्या
मैंने अपनी ही धार से काटे बंधन
मैंने खुद ही अपना मार्ग गढ़ा
मैं नदी हूँ… मैं नदी हूँ
मैं ही जीवन, मैं ही विनाश भी
मैं ही करुणा, मैं ही आघात भी
जब सहती हूँ तो धरती सी गहरी
जब उठती हूँ तो प्रलय सी ठहरी
मैं नदी हूँ… मैं नदी हूँ
मत बाँधो मुझे परिभाषाओं में
मत तौलो मुझे अपेक्षाओं में
मैं अपने अस्तित्व की आवाज़ हूँ
हर स्त्री के भीतर की आग हूँ
मैं नदी हूँ… मैं नदी हूँ
एक दिन सागर से मिल जाऊँगी
पर खो कर भी नहीं मिट पाऊँगी
मेरी हर लहर में इतिहास लिखेगा
कि मैं झुकी नहीं, बस बहती रही
मैं नदी हूँ… मैं नदी हूँ।
सीप
मेरे ही गर्भ में छिपा था
मेरा एक अनमोल अंश
अनभिज्ञ भटकती रही विशाल समंदर में
मछलियों के नित नए सौंदर्य पर मुग्ध
पर भीतर ही भीतर जलन और डाह करती रही
एक दिन अचानक
किसी ने मेरी कठोर बाहों को खोला
और गर्भ में पल रहे उस मोती को
मेरा ही हिस्सा चुरा ले गया
आश्चर्य से भरी मैं ठहर गई
यह अद्भुत मोती तो मेरे भीतर ही था
मैंने कभी खुद को पहचाना ही नहीं।
प्रेम का बनफूल
प्रेम वर्जनाओं के बीहड़ों के बीच
एक बनफूल है
जो चुपचाप बिना किसी शोर के
अपनी जड़ों में अंकुरित होता है
वो वर्जनाओं की कठोर दीवारों को चीर कर
अपने नर्म पत्तों से एक नई राह बनाता है
हर पंखुड़ी में एक मौन प्रार्थना है
हर सुवास में एक अनकहा संकल्प
वो प्रेम है जो बिना किसी परिभाषा के
अपने होने का एहसास कराता है
जब दुनिया डराती है
बाँधती है, रोकती है
तब भी वो बनफूल
अपनी कोमलता में
एक उम्मीद का दीप जलाता है
प्रेम वर्जनाओं के उस बीहड़ में भी
अपनी राह ढूँढ ही लेता है
जैसे एक बनफूल
अपनी सुगंध के साथ
खिल उठता है
और छोड़ जाता है
अपना अमिट निशान।
हिमखंडों का जल
ऊँचे पर्वतों के बीच
हिमखंडों का जल
चुपचाप बहता है
जैसे कोई प्रेम
बिना आवाज़ के जीता हो
ऊपर से ठोस
भीतर से पिघलता हुआ
ठीक मेरे दिल की तरह
जिसे तुमने
धीरे-धीरे छुआ था
पहले धूप बनी मैं
फिर वही धूप
मेरे अस्तित्व को
बूँद-बूँद गलाती रही
मैं समझती रही
यह पिघलना ही प्रेम है
यह बहना ही समर्पण
पर जब दरारें पड़ीं
तब जाना
हर पिघलना सृजन नहीं होता
कुछ टूटनें
सिर्फ खो जाने के लिए होती हैं
अब जो जल हूँ मैं
न निर्मल
न स्थिर
बस बहती हुई एक सच्चाई
कि पर्वतों के बीच
जितना सुंदर दिखता है सब
उतना ही गहरा होता है
उसका अकेलापन
और हर हिमखंड
जो पिघलता है
वो सिर्फ जल नहीं बनता
कभी-कभी
अपनी पहचान भी खो देता है।
सागर तक का सफ़र
एक बूंद
बहका और चल पड़ा
अपनी मंज़िल की ओर
अनजाने सपनों की राह पर
रास्तों ने समझाया
कठिनाइयों का स्वाद चखाया
पर जब मन ने ठान लिया
हर बाधा को पार किया
फूलों ने बहकाया
सपनों ने बुलाया
काँटों ने जगाया
बारिश ने तपाया
कुछ कतरे साथ आए
और देखते-देखते
एक दरिया बना
ताक़त का अनोखा एहसास लिए
वह अदना-सा बूंद
अब सीने में ज्वालामुखी सा जोश लिए
विराट स्वरूप धारण कर चुका था
अब कोई भय नहीं था
बस एक अंतहीन जुनून
समुद्र को छू लेने का
हर लहर से लड़ कर
गिर कर, फिर उठ कर
वह बहता चला गया
और अंततः स्वयं समुद्र बन गया
पीछे छोड़ गया
कुछ गहरे निशान
जिन्हें समय भी
मिटा नहीं सकता
जो आने वाली हर बूंद को याद दिलाएंगे
कि हर सपना हर सफ़र
समुद्र बनने की राह पर है
जहाँ हर निशान एक नई शुरुआत है
और हर बूंद अपने भीतर छिपे समुद्र को खोजती है।
अधूरेपन की पूर्णता
अधूरेपन का भी एक पूरा दर्शन है
यह कोई कमी नहीं
एक अलग ही जीवन-रस है
जो पूरा हो गया
वह ठहर गया
जो अधूरा है
वही अब भी चल रहा है
साँस ले रहा है
भीतर कहीं पल रहा है
गहरे भाव से जीने वाले
डूब कर काम करने वाले
बहुत निश्चिंत जीने वाले
बहुत सुस्त
बहुत बेफिक्र लोग
इन सबकी ज़िंदगियाँ दरअसल
अधूरी दास्तानों की ही लंबी श्रृंखला हैं
जो हर बात को अंत तक पहुँचा देते हैं
शायद वे कुछ खो देते हैं
वह मीठी-सी कचोट
वह “काश” की धीमी टीस
जो जीवन को बार-बार छू कर जगाती है
मेरे कमरे में भी
सब अधूरा अधूरा है
दीवारों पर टंगे सपने
आधे रंगे हुए
मेज़ पर रखी किताबें
आधी पढ़ी हुई
खिड़की से आती धूप भी
जैसे आधे रास्ते में ही ठहर जाती है
अधूरे लिखे उपन्यास हैं
जिनमें पात्र अब भी इंतज़ार कर रहे हैं
अपने अंत का नहीं
अपने अगले पन्ने का
अधूरी कविताएँ हैं
जिनकी आख़िरी पंक्तियाँ
अब भी मेरे भीतर
जन्म लेने को तैयार हैं
अधूरी योजनाएँ हैं
जो हर रात नए रूप में आती हैं
और हर सुबह कुछ और बिखर जाती हैं
अधूरे प्रयास हैं
जिनमें थकान भी है
पर हार मानने की आदत नहीं
तह न हो पाए कपड़ों की तरह
जीवन भी कहीं बिखरा पड़ा है
अधूरे लिखे खत हैं
जिनमें शब्द रुक गए
शायद भाव बहुत आगे निकल गए थे
अधूरी डायरी है
जिसमें तारीख़ें तो पूरी हैं
पर हर दिन की कहानी
आधी ही दर्ज है
और इन सबके बीच
मैं भी थोड़ी-सी अधूरी हूँ
थोड़ी सी लिखी हुई
थोड़ी सी अनकही
थोड़ी सी समझी हुई
और बहुत कुछ बाकी
शायद पूरा होना ही अंत है
और अधूरा रह जाना
एक संभावना
एक ही चीज़ पूरी है
कि अधूरापन पूरा है
और यही पूर्णता मुझे
हर दिन फिर से शुरू होने का साहस देती है।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



बहुत-बहुत आभार भाई जी
जवाब देंहटाएंआपने मेरी कविताओं के भीतर छिपे उस अधूरेपन, संघर्ष और मानवीय संवेदना को जिस गहराई से पढ़ा और समझा, वह मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान है। सच यही है कि कविता अक्सर उन्हीं दरारों से जन्म लेती है जहाँ जीवन अपनी सबसे सच्ची आकृति में दिखाई देता है।
आपका यह आत्मीय और विचारपूर्ण लेखन, तथा आपके ब्लॉग पर मेरी कविताओं को स्थान देना, मेरे लिए प्रोत्साहन भी है और एक जिम्मेदारी भी। हृदय से धन्यवाद।
— वसुन्धरा पाण्डेय
A rare and deeply insightful reflection on incompleteness, human struggle, and the quiet truths of life.
जवाब देंहटाएंVasundhara Pandey’s poetry carries the sensitivity to see beauty even within deprivation and longing.
Her words remind us that imperfections are not flaws, but endless possibilities waiting to unfold.
Truly proud to see such profound thoughts and poems reaching readers through this beautiful platform.
पाण्डेय जी हार्दिक आभार
हटाएंशानदार और मानीखेज कविताएं
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार
हटाएं
जवाब देंहटाएंपहली कविता थोड़ी लम्बी हो गयी है परन्तु मार्मिक है.एनी कविताएँ भी प्रभावित करती हैं. बधाई देने योग्य.
जी, पहली कविता एक सतत कविता न होकर छोटे-छोटे भावखंडों में है ,भेजने में मुझसे गलती हुई थी
हटाएंअन्य कविताएँ पढ़ा जाए.
जवाब देंहटाएंआपकी आत्मीय प्रतिक्रिया के लिए दिल से आभार
हटाएंवसुन्धरा पाण्डेय जी की बहुत अच्छी कवितायेँ पढ़वाने हेतु धन्यवाद,,,
जवाब देंहटाएंकविता जी आपकी संवेदना को हृदय से नमन
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंकविताओं संग शानदार पेंटिग के लिए हृदय से आभार
जवाब देंहटाएं