प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'लेडी विद अ लैपटॉप'
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| प्रचण्ड प्रवीर |
जिन्दगी प्रायः बहुरंगी होती है। सुख दुःख इसके हिस्से होते हैं। सबके अपने अपने सुख, सबकी अपनी अपनी दिक्कतें, दुःख और तकलीफें होती हैं। हम सबको अपनी जिंदगी में इन सब का सामना खुद करना पड़ता है और खुद ही इनसे निबटना पड़ता है। एक कहावत है डूबते को तिनके का सहारा। सफर करते हुए कभी कभी पास बैठे सहयात्री की आंखों में ही तमाम उम्मीदें दिखाई पड़ने लगती हैं। अपनी कहानी ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ में प्रचण्ड प्रवीर लिखते हैं "मैँने देखा महिलाओँ के डिब्बे के पास बनी बेंच पर कत्थई ड्रेस पहनी मास्क लगाये ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ अपने लैपटॉप को खोले बैठे मेरी तरफ एकटक देख रही है। शायद वह रुक कर कहीँ और जाने वाली थी। शायद किसी की प्रतीक्षा कर रही थी। शायद वह मुझसे कुछ पूछना चाहती थी पर संकोच और अपरिचित होने के नाते भी पूछ नहीँ पा रही थी। और उसकी गहरी आँखोँ से ऐसा लग रहा था मानो कुछ ही समय मेँ समाधान मिल जायेगा, और फिर एक नवीन और भव्य जीवन प्रारम्भ होगा। और यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि अभी उसके सामने एक बहुत लम्बा रास्ता है, और उसका सबसे जटिल और कठिन हिस्सा तो अभी बस आरम्भ ही हो रहा था।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी ‘लेडी विद अ लैपटॉप’।
कल की बात – २९२
'लेडी विद अ लैपटॉप'
प्रचण्ड प्रवीर
कल की बात है। जैसे ही मैँने मेट्रो मेँ कदम रखा, मेरी नजर बायीँ तरफ की खाली सीट पर नीली सर्जिकल मास्क लगाये बैठी आकर्षक युवती पर गयी। भले ही उसकी उम्र सत्ताईस-अट्ठाईस होगी जो कि यह कहती हो कि यौवन का चाँद अभी पूनम को लगने ही वाला है, पर आकर्षण का मुख्य कारण उसका सफेद लैपटॉप था। स्मार्टफोन के दौर मेँ मेट्रो मेँ महँगा लैपटॉप खोल कर कौन बैठता है? कनखियोँ से ऐसा लगा कि कत्थई ड्रेस पहनी युवती नये डिजाइन के कपड़े तलाश करने मेँ जुटी थी। कोरोना काल बीत जाने के इतने दिनोँ बाद भी कुछ लड़कियाँ मास्क लगाती हैँ। इसके दो कारण प्रतीत होते हैँ। पहला कि अपनी सूरत छुपाने मेँ आसानी होती है और दूसरा दिखावटी कारण कि ‘हाइजिन’ के लिये कुछ लड़कियाँ बड़ी जिद्दी होती हैँ। उसके ठीक सामने खाली सीट पर बैठते हुए मैँने विचारा कि मास्क लगाने के बाद भी उसकी पतली और खड़ी नाक, कटावदार भौँहेँ, और सुनहले रङ्ग से कमर तक खुले लम्बे घने रङ्गे केश उस रूपसी के गर्व को दिखला ही रहे थे। उसकी दुबली-पतली कलाइयाँ और नुकीले लम्बे नाखून पर नजर गुजरी तो सही पर नजर रुकी देवनागरी मेँ लिखे टैटू पर। चूँकि उसने लैपटॉप खोल रखा था, उसकी कलाइयोँ पर लिखा टैटू मेरी नजरोँ से ओझल ही था।
आजकल कोई युवती साड़ी मेँ नज़र आ जाय तो बड़े आश्चर्य की बात है। वहीँ कोई हिन्दी मेँ टैटू लिखवाये, यह तो संसार का आठवाँ आश्चर्य था। उसकी बड़ी-बड़ी पनीली आँखे चौकन्नी हो कर सबको देखती वापस लैपटॉप मेँ चली जाती। थोड़ी देर के बाद उसने अपना लैपटॉप बन्द किया और बायीँ ओर देखा। अब मैँ ठीक से देख पा रहा था कि उसके दायेँ कान से ले कर सुराहीदार गर्दन पर देवनागरी मेँ गुदने से लिखा था – “मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेँगे।” क्या रूपसी ने स्वयं ऐसा टैटू बनाने का आग्रह किया होगा? क्या ऐसा हुआ होगा कि उसके प्रेमी ने उसकी गर्दन पर यह टैटू गुदवाने की जिद की होगी कि जब उसके कानोँ को चूमना हो प्रेमप्रतिज्ञा का स्मरण होता रहे? लेकिन प्रतिज्ञा का सदैव स्मरण करना उसे पुष्टि प्रदान करता है या वितृष्णा पैदा करता है?
‘लेडी विद अ लैपटॉप’ ने जैसे ही अपना लैपटॉप बन्द कर के अपने बेहद मँहगे ब्राण्ड के बैग मेँ रख कर जाने के लिये खड़ी हुई, बारी-बारी से मेरी नजर उसकी दोनो कलाइयोँ पर जा पड़ी। बायीँ कलाई पर लिखा था – “कहूँ क्या मेरे दिल का अरमान क्या है” और दायीँ कलाई पर लम्बी पंक्ति अंकित थी – “तुम्हेँ हर घड़ी चूमना चाहता है।” यह देख कर मेरा दिल भर आया। इतना प्यार करने और दिखाने की जिद मेँ खो कर उसे ये लड़की कहीँ ग़म से मर न जाय। मेरा भी स्टेशन आने वाला था और मैँ चुपचाप उतर गया।
बाहर निकल कर मैँने चारो ओर देखा कि कहीँ वह अगले गेट से तो नहीँ निकली। तभी बगल से ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ सरसराती आगे निकली। वह ठीक मेरे पीछे मेरे ही गेट से उतरी होगी। उसकी कत्थई ड्रेस से लम्बी फिसलती टाँगेँ देख कर फ्राँसीसी वाक्य याद आ गया कि स्त्रियोँ की टाँगेँ ज्यामितीय प्रकार (कम्पास) की सुइयोँ की तरह होती हैँ, जो पूरी दुनिया का चक्कर लगाती हैं और इसमें संतुलन और सामंजस्य लाती हैँ। मेट्रो इन्टरचेंज स्टेशन पर वह जिस सन्तुलन से सीढ़ियाँ जा रही थी, ऐसा जान पड़ता था कि वह नृत्यांगना रही होगी।
मुझे शुबहा हुआ कि उसने मुझे कनखियोँ से देखा और वह घबराहट मेँ मुझसे दूरी बनाना चाहती है। मुझे शक हुआ कि हो ना हो ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ मेरी परिचिता हैँ, जिनका नाम मैँ अब ले नहीँ सकता। उसकी घबराहट से मैँ परेशान हो कर उसके पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। साथ मेँ दस-पन्द्रह लोग की भीड़ रही होगी पर मैँने जल्दी दूरी कम कर ली और चलते-चलते मैँ उसकी दाहिनी तरफ आ कर उसकी सुनहरी सुराहीदार गर्दन को देखा। “मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेँगे।” क्या यह वही है? ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ शायद असहज हो रही थी। यह देख कर मैँने अपनी रफ्तार धीमी कर दी। वह आगे चली गयी। अपना उसूल है कि लड़की का पीछा तभी तक करो जब तक तुम्हारी और उसकी राह मिलती हो। यदि राह अलग हो जाय तो समझ लेना कि ऊपर वाले ने मंजिलेँ भी अलग ही लिखीँ हैँ। इसलिये उसूल के मुताबिक मैँने दूसरा रास्ता लिया और इन्टरचेन्ज स्टेशन पर दूसरी मेट्रो की ओर बढ़ गया। थोड़ी दूर बाद समझ आया कि नहीँ, ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ केवल मुझसे दूर जाना चाहती थी लेकिन उसकी और मेरी राहेँ जुदा नहीँ है। वह भी मेरे साथ अपने बेहद मँहगे बैग को लैपटॉप समेत जाँच मशीन मेँ रखती दिखीँ। इस बार मेरी और उसकी निगाहेँ दो क्षण के लिये मिली। मैँने निगाहेँ हटा ली और आगे बढ़ गया।
मैँने कनखियोँ से देखा कि वह मुझसे दस कदम की दूरी से पीछे चली आ रही है। दूसरी मेट्रो के लिये भीड़ थी। ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ के पास विकल्प खुला था कि वह महिलाओँ के लिये आरक्षित डिब्बे मेँ चली जाय। हमारी राहेँ मिलती हैँ लेकिन मंजिल नहीँ मिलती, मैँने सोचा और मेट्रो के आते ही सामने पड़ने वाले डिब्बे मेँ चला गया। डिब्बे मेँ बहुत भीड़ नहीँ थी। तभी मेरे पीछे से ताजा हवा के झोँके के साथ ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ आयी और महिलाओँ के लिये आरक्षित सीट पर बैठे लड़के को उठने का इशारा किया।
किसी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा। मैँने चौँक कर देखा कि मोटे-थुलथुल शत्रुघ्न बाबू खड़े मुस्कुरा रहे थे। सालोँ बाद उनके चेहरे पर वही जिन्दादिली और वही गर्मजोशी थी। उन्होँने कहा, “कविराज, इतने दिनोँ बाद मिले आप। हाल-चाल बाद मेँ, पहले इसी मौके पर कोई शेर-कविता कहिये।“ मुझे अहसास हुआ कि ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ की तेज निगाहेँ मेरी पीठ पर गड़ी हैँ, जो दुनिया के लिये अपना लैपटॉप चालू कर के काम करने का ढोंग कर रही है। मैँने कहा,
“नज़र ढूँढती थी जिसे पा लिया है, उम्मीदों के फूलों से दामन भरा है,
ये दिन हमको सब दिन से प्यारे रहेँगे, न ये चाँद होगा, न तारे रहेँगे। मगर हम हमेशा..।“१
शत्रुघ्न बाबू ने आगे की पंक्ति पूरी की, “मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेँगे। भाई, क्या खूब। कहाँ थे इतने दिन?” मैँने कहा,
“बिछड़ कर चले जाएँ, तुमसे कहीँ, तो ये ना समझना
मुहब्बत नहीँ, जहाँ भी रहे हम तुम्हारे रहेँगे।”
शत्रुघ्न बाबू वाह-वाह करने लगे। बताने लगे कि बेटा दसवीँ देने वाला है। बहुत दिनोँ तक गोरखपुर मेँ रहना पड़ा। वापस आ कर अपना धन्धा जमाने मेँ लगे हुए हैँ। शत्रुघ्न बाबू की बातोँ का मजमून यही था
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।
शत्रुघ्न बाबू कहते रहे, ‘आपकी सलाह और नसीहत बड़ी काम आती है। आपको हाथ देखना भी आता है और कुण्डली भी। आपकी कही हर बात सच निकलती है। अब हमारे लिये कोई उपाय बताइए।‘ लेकिन हमेँ उनकी तारीफोँ से क्या लेना-देना था। मेरे ग़मज़दा चेहरे को देख कर उन्होँने पूछा, “क्या हुआ आपकी महबूबा का? उसी से शादी की आपने?” मैँने फीकी हँसी मेँ हँस कर कहा, “आपको बताया था ना? हमारे सितारे गर्दिश मेँ थे और गर्दिश मेँ ही रहेँगे। वो बेवफा निकली! वैसे भी हर मोहब्बत का अंजाम यही होता है। ये होगा सितम हमने पहले न जाना, बना भी न था, जल गया आशियाना, कहाँ अब मोहब्बत के मारे रहेँगे?” शायद यह सुन कर ही ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ ने अपना लैपटॉप बन्द करते हुए बैग मेँ रखा और खड़ी हो कर महिलाओँ के आरक्षित डिब्बे की ओर बढ़ चली।
जब मैँ दूसरे इंटरचेन्ज स्टेशन पर उतरा तब शत्रुघ्न भाई ने हाथ हिला कर विदा ली। मेट्रो के खुलने और यात्रियोँ की भीड़ छँट जाने के बाद, मैँने देखा महिलाओँ के डिब्बे के पास बनी बेंच पर कत्थई ड्रेस पहनी मास्क लगाये ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ अपने लैपटॉप को खोले बैठे मेरी तरफ एकटक देख रही है। शायद वह रुक कर कहीँ और जाने वाली थी। शायद किसी की प्रतीक्षा कर रही थी। शायद वह मुझसे कुछ पूछना चाहती थी पर संकोच और अपरिचित होने के नाते भी पूछ नहीँ पा रही थी। और उसकी गहरी आँखोँ से ऐसा लग रहा था मानो कुछ ही समय मेँ समाधान मिल जायेगा, और फिर एक नवीन और भव्य जीवन प्रारम्भ होगा। और यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि अभी उसके सामने एक बहुत लम्बा रास्ता है, और उसका सबसे जटिल और कठिन हिस्सा तो अभी बस आरम्भ ही हो रहा था।
इस बार नजर मिलते ही मुझे याद आया कि हमारी राहेँ भले ही मिलती होँ पर हमारी मंजिल कभी नहीँ मिल सकती। मैँ बिना एक पल गँवाये मुड़ कर तेज कदमोँ से बाहर की ओर जाती सीढ़ियोँ की तरफ बढ़ गया।
ज़माना अगर कुछ कहेगा तो क्या,
मगर तुम न कहना हमें बेवफ़ा,
तुम्हारे लिए हैँ तुम्हारे रहेँगे
न ये चाँद होगा न तारे रहेँगे,
मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेँगे,
न ये चाँद होगा...
ये थी कल की बात!
दिनाङ्क: २१/०७/२०२६
सन्दर्भ: १. गीतकार – शमशुल हुदा बिहार, चित्रपट- शर्त (१९५४)

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