कँवल भारती का आलेख 'भारतीय चिंतन परम्परा में निर्गुणवाद : बौद्ध क्रान्ति के बाद की सबसे बड़ी क्रांति'
कबीर जयंती पर विशेष 'भारतीय चिंतन परम्परा में निर्गुणवाद : बौद्ध क्रान्ति के बाद की सबसे बड़ी क्रांति' कँवल भारती निर्गुणवाद न वेदों से आया और न वेदान्त से। वेदों में बहुदेववाद है और वेदांत में ब्रह्मवाद; और दोनों का कोई सम्बन्ध निर्गुणवाद से नहीं है। वेदान्त में एक ईश्वर की धारणा हो सकती है, पर उसका सम्बन्ध भी ब्राह्मण-भक्ति से होने के कारण उसे ब्रह्म माना गया है। वेदान्त का ब्रह्मवाद शास्त्रवाद में विश्वास करता है और जगत को मिथ्या मानता है। ‘ब्रह्म सत्यम जगन्मिथ्या’ शंकराचार्य ने भी कहा है और उनके दादा गुरु गौडपाद ने भी। ईशावास्योपनिषद कहता है, यह जगत ब्रह्म से बना है और वही इस जगत का पोषक है। (1,15) श्वेताश्वर उपनिषद में एक वाक्य है—‘तमेवं विदित्वाति मृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाम’ (3/18), अर्थात, परमेश्वर को जानकार लोग मृत्यु के बंधन से छूट जाते हैं। किन्तु ऐसी कोई अवधारणा निर्गुणवाद में नहीं है। हालाँकि वेदान्त वेदों के ज्ञान के विरुद्ध और ब्राह्मण-दर्शन के खंडन में क्षत्रियों का दर्शन था। लेकिन बाद में ब्राह्मणों ने इसमें घुसकर उसे भी अपने दर्शन के ...