अमरकान्त जी पर प्रतुल जोशी का संस्मरण
विगत 17 फरवरी को प्रख्यात कथाकार और हम सब के दादा अमरकान्त जी नहीं रहे. यह हम सब के लिए एक गहरी क्षति थी. प्रतुल जोशी ने अपने संस्मरण में अमरकान्त जी के साथ बिठाये गए पलों को ताजा किया है. आईए पढ़ते हैं प्रतुल जोशी का यह संस्मरण। हमारे ताऊ "अमरकांत जी": स्मृति शेष प्रतुल जोशी सोमवार 17 फरवरी की सुबह लगभग 11 बजे, मैं आकाशवाणी शिलांग में आफिस का कुछ काम निपटा रहा था कि मोबाइल पर आये मैसेज पर निगाह पड़ते ही लगा मानो पांवों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी है। इलाहाबाद के एक साथी का मैसेज था “अमरकान्त जी नहीं रहे“। कुछ पलों के लिए मैं संज्ञाशून्य हो गया। समझ में नहीं आया कि शिलांग में अपना दुख किससे साझा करूँ। आकाशवाणी शिलांग में कुछ ही दिन पहले लखनऊ से स्थानान्तरित होकर आया हूँ। अभी कुछ ही लोगों से परिचय हुआ है। यहाँ किसी को बता नहीं सकता था कि यह खबर मुझे कितना दुख देने वाली खबर थी। एक बड़ा दुख यह हो रहा था कि अमरकान्त जी के अन्तिम समय में उनके पास नहीं पहुँच पा रहा हूँ। अमरकांत जी और पापा (श्री शेखर जोशी) का लगभग 60 वर्षों का साथ था। पचास के दशक में पापा ई...