अमरकान्त जी पर प्रतुल जोशी का संस्मरण



विगत 17 फरवरी को प्रख्यात कथाकार और हम सब के दादा अमरकान्त जी नहीं रहे. यह हम  सब के लिए एक गहरी क्षति थी. प्रतुल जोशी ने अपने संस्मरण में अमरकान्त जी के साथ बिठाये गए पलों को ताजा किया है. आईए पढ़ते हैं प्रतुल जोशी का यह संस्मरण  


हमारे ताऊ जी "अमरकांत जी": स्मृति शेष  

प्रतुल जोशी 

सोमवार 17 फरवरी की सुबह लगभग 11 बजे, मैं आकाशवाणी शिलांग में आफिस का कुछ काम निपटा रहा था कि मोबाइल पर आये मैसेज पर निगाह पड़ते ही लगा मानो पांवों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी है। इलाहाबाद के एक साथी का मैसेज था “अमरकान्त जी नहीं रहे“। कुछ पलों के लिए मैं संज्ञाशून्य हो गया। समझ में नहीं आया कि शिलांग में अपना दुख किससे साझा करूँ। आकाशवाणी शिलांग में कुछ ही दिन पहले लखनऊ से स्थानान्तरित होकर आया हूँ। अभी कुछ ही लोगों से परिचय हुआ है। यहाँ किसी को बता नहीं सकता था कि यह खबर मुझे कितना दुख देने वाली खबर थी। एक बड़ा दुख यह हो रहा था कि अमरकान्त जी के अन्तिम समय में उनके पास नहीं पहुँच पा रहा हूँ।

अमरकांत जी और पापा (श्री शेखर जोशी) का लगभग 60 वर्षों का साथ था। पचास के दशक में पापा ई0एम0ई0 (भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय का एक प्रतिष्ठान) में नौकरी करने इलाहाबाद आये थे और फिर इलाहाबाद में ही लगभग 56 वर्ष रहे। हमारी माता जी स्वर्गीय चन्द्रकला जोशी के निधन के पश्चात् सन 2012 में इलाहाबाद शहर हमारे परिवार के लिए छूट गया सा है। इलाहाबाद में पापा के सबसे निकटस्थ अमरकांत जी ही थे। सन 1956 से 60 के दौरान पापा और अमरकांत जी एक साथ करेलाबाग लेबर कालोनी में रहे। बाद में पापा, करेलाबाग कॉलोनी छोड़ कर लूकरगंज आ गये थे लेकिन अमरकान्त जी लम्बे समय तक करेलाबाग काॅलोनी में ही रहे। सन् 1965 से अमरकांत जी ने माया प्रेस, इलाहाबाद में नौकरी की और वहां से निकलने वाली पत्रिका “मनोरमा“ में एक लम्बे समय तक सम्पादक रहे। पापा से उम्र में लगभग 7 वर्ष बड़े होने के कारण हम बच्चे अमरकान्त जी को “ताऊ जी“ कह कर बुलाते थे। करेलाबाग कॉलोनी से लूकरगंज की दूरी लगभग 4 किमी0 की होगी। प्रायः अमरकान्त जी हमारे घर आ जाते और जब वह नहीं आते तो हम लोग उनके घर करेलाबाग कॉलोनी पहुँच जाते। यह सिलसिला सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों तक चला। इसके बाद अमरकान्त जी ने बहुत से मकान बदले। कभी करेली तो कभी दरियाबाद फिर महदौरी कॉलोनी। आखिर में अशोक नगर में छोटा सा अपार्टमेन्ट खरीदा। वह जहां भी रहे, हम लोगों का आना-जाना उनके घर नियमित रूप से लगा रहा। 

पचास के दशक में हिन्दी साहित्य में जिस ‘नयी कहानी’ आन्दोलन की शुरूआत हुई, उसके अग्रणी लेखकों में अमरकान्त जी का नाम लिया जाता रहा है। ‘नयी कहानी’ आन्दोलन के अन्य चर्चित लेखक थे राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश, मार्कण्डेय, भीष्म साहनी आदि। उस दौर के बहुत से लेखकों ने जहां अपने को स्थापित करने के लिए काफी मेहनत की और बड़े-बड़े संस्थानों से जुड़े, अमरकान्त जी बिना किसी महत्वाकांक्षा के इलाहाबाद में करेलाबाग कॉलोनी के एक छोटे से मकान में रहते हुए कहानियाँ लिखते रहे। “दोपहर का भोजन“, “जिन्दगी और जोंक“, “डिप्टी कलक्टरी“, “हत्यारे“ जैसी दर्जनों कहानियाँ अमरकान्त जी ने एक बहुत छोटे से मकान में बैठ कर लिखी जो आज हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई हैं।

मैंने अपने जीवन में अमरकान्त जी जैसा विनम्र, प्रतिबद्ध, धैर्यवान और शान्त लेखक कोई दूसरा नहीं देखा। सन् 1984 में अमरकान्त जी को सोवियतलैन्ड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस पुरस्कार के तहत उनको रूस की यात्रा का निमंत्रण मिला था। अमरकान्त जी रूस के कई शहरों की यात्रा कर जब इलाहाबाद लौटे तो हम लोगों के लिए एक सुन्दर घड़ी ले कर आये थे। घड़ी में लकड़ी का छोटा सा पेंडुलम दायें बायें चलता था और एक चिडि़या दो छोटे-छोटे दरवाजे खोलकर हर घण्टे बाहर निकलती थी। कुछ दिन वह चिडि़या बाहर आती रही। बाद में पेंडुलम का चलना बन्द हो गया और चिडि़या का बाहर निकलना भी। लेकिन घड़ी बहुत दिनों तक हमारे घर के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाती रही। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि उनको रूस में क्या अच्छा लगा? अमरकान्त जी ने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया कि रूस में उन्हें सबसे अच्छा लगा कि वहां लेखकों का बड़ा सम्मान है। हर शहर में लेखकों की मूर्तियाँ शहर के कई चौराहों पर लगी दिखती हैं। लेखकों के घरों को उनकी मृत्यु के सौ वर्षों के पश्चात् भी पूरे सम्मान के साथ सुरक्षित रखा गया था। अमरकान्त जी कुछ प्रसिद्ध रूसी लेखकों के घर देख कर भी आये थे। 

अमरकान्त जी जीवन भर प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे। प्रगतिशील लेखक संघ के आयोजनों और बैठकों की तैयारी के समय वह अत्यन्त उत्साह में होते थे। उनके व्यक्तित्व के जिस पक्ष से मैं सबसे ज्यादा प्रभावित था, वह था कि मैंने उनके मुंह से कभी किसी के लिए अपशब्द या बुराई नहीं सुनी। यहाँ तक की जिन व्यक्तियों ने उनको कभी धोखा दिया, उनके बारे में भी वह कटुता नहीं रखते थे। हर एक के बारे में वह बड़े आदर से बात करते। अपने घरेलू जीवन में उन्होंने अत्यन्त आर्थिक दुश्वारियों का सामना किया, किन्तु विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी वह अत्यन्त शांत रहते और अपना धैर्य नहीं खोते थे। कोई भी बड़े से बड़ा सम्मान या प्रसिद्धि, उनके लिए अत्यन्त सामान्य बात थी। सतत् रचनाशील रहना उनकी जीवन शैली बन गया था। 

अमरकान्त जी जब भी हमारे घर आते, तो पापा उन्हें छोड़ने खुल्दाबाद तक जरूर जाते। खुल्दाबाद हमारे घर से लगभग 1 किमी0 दूर है। खुल्दाबाद, एक छोटा सा बाजार है जहां सड़क के दोनों तरफ दुकानें हैं। खुल्दाबाद के मोड़ पर खड़े हो, दोनों काफी लम्बे समय तक बातें किया करते। इस बातचीत में साहित्य की स्थिति, किस लेखक ने क्या नया लिखा, कौन सी नई साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित हुई जैसे साहित्य से जुड़े तमाम विषय शामिल होते। 

सत्तर के दशक में अमरकान्त जी सिगरेट खूब पीते थे। उनका मुंह से धुँए के गोल-गोल छल्ले निकालना मुझे बेहद पसन्द आता था। यद्यपि बाद में उन्होने सिगरेट छोड़ दी थी। अमरकान्त जी शतरंज भी बहुत अच्छा खेलते थे। एक बार हम बच्चों को शतरंज खेलने का जुनून चढ़ा। दिन-रात हम लोग शतरंज में डूबे रहते। उसी दौरान अमरकान्त जी घर आ गये। मैंने उनसे कई बाजि़यां खेलीं और हर बार हारा। वह समझाते की देखो शतरंज में प्रतिद्वंद्वी के मोहरों को तुरत खत्म करने की बजाये, बेहतर है कि एक सुलझी हुई रणनीति से मात दी जाए। औसत कद के, गौरवर्ण अमरकान्त जी हमेशा बहुत शान्ति से बात करते। 

सन 1988 में मैंने इलाहाबाद छोड़ दिया था। आकाशवाणी में अपनी नौकरी के चलते कानपुर, लखनऊ, ईंटानगर रहता रहा। लेकिन जब भी मैं इलाहाबाद जाता, पूरी कोशिश करता की एक बार अमरकान्त जी से मिलूं, उनके दर्शन करूँ। लगभग 6 माह पूर्व, पिछले वर्ष सितम्बर के महीने में आखिरी बार उनसे मुलाकात हुई। उन वक्त मुझे लगा कि शायद उन्हें विस्मृति की बीमारी हो रही है। मुझे पहचानने में उन्हें कुछ दिक्कत हो रही थी। अमरकान्त जी के कनिष्ठ पुत्र अरविन्द बिन्दु ने उन्हें कहा “प्रतुल आये हैं“। सुनकर ताऊ जी थोड़ी देर तक मुझे पहचानने की कोशिश करते रहे। फिर लगा कि उन्होंने मुझे पहचान लिया है। वह हमेशा की तरह गर्मजोशी से बोले “और क्या हाल-चाल हैं? कैसे हो?“ मैं अन्दर ही अन्दर जैसे कराह उठा। मैंने मन ही मन कहा “ओह ताऊ जी, जीवन भी कितना कठोर है। बचपन से मैं आपकी गोद में ही पला-बढ़ा। और आज उम्र के इस पड़ाव पर आ कर आप कितने मजबूर हो गयें हैं। अब मुझको पहचानने में भी आपको इतना वक्त लग रहा है।“

ताऊ जी से मिलने के बाद पहली बार मुझे बेहद अफसोस हो रहा था। उनकी स्मृति के खत्म हो जाने का अंदेशा मुझको भीतर ही भीतर कहीं गहरे तक लग रहा था। यह सोच कर और दुख हो रहा था कि जिस व्यक्ति ने अपनी गम्भीर बीमारी के बावजूद कई कहानियों और उपन्यासों की रचना की थी, वह अंततः अपनी उम्र से हारता सा दिख रहा था। हड्डियों की बीमारी ऑस्टियोपोरोसिस से वह लगभग 17 वर्षों तक जूझते रहे। अपनी इस गम्भीर बीमारी के बावजूद उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास "इन्हीं हथियारों से" लिखा। इस उपन्यास के लिए उन्हें साहित्य अकादमी और व्यास सम्मान भी प्राप्त हुये। 

अमरकान्त जी से मिलने के बाद लगातार मैं उनके हालचाल अपने मित्रों, परिचितों से लेता रहा। जिससे भी बात करता, वह कहता कि वह बिल्कुल ठीक हैं। जानकर बेहद खुशी होती। लेकिन अचानक 17 फरवरी की सुबह जब अमरकान्त जी के निधन की खबर मिली तो लगा कि यह क्या हो गया। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके घर फोन कर बात की तो पता चला कि एक दिन पहले तक वह पूर्णतया स्वस्थ थे। चार-पांच लोगों की एक टीम उनके यहां आयी थी और उन्होंने एक इण्टरव्यू भी दिया था। लेकिन दूसरे ही दिन हृदय गति रूकने से उनका देहावसान हो गया। अमरकान्त जी पर एक फिल्म मेरे छोटे भाई और फिल्मकार संजय जोशी ने साहित्य अकादमी के सहयोग से बनाई है।

अब अमरकान्त जी हम लोगों के बीच नहीं हैं लेकिन उनकी रचनायें अभी कई पीढि़यों को सुसंस्कारित करती रहेंगी। निम्न मध्यम वर्ग की पीड़ा को उन्होंने जिस कलात्मकता के साथ अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है, वैसा हिन्दी साहित्य में कम ही लेखकों ने लिखा है। उनका इस दुनिया से जाना, एक विलक्षण प्रतिभा का संसार से चले जाना है। न केवल उनकी रचनाओं वरन् उनके जीवन से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। अमरकान्त जी अपनी रचनाओं के माध्यम से अमर रहेंगे।   






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टिप्पणियाँ

  1. Poora sansmaran ek sans me padh gye. Bahut marmik, karuna se othproth he. Smarti khone ki dasha me jb lekhak ka Amarkant ji se milna . Padh ka aasu he aa gye. Padhwane ke liye dhanyevad. Manisha jain

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  2. बहुत ही अच्छा संस्मरण साझा किया है प्रतुल जोशी जी ने. एक जगह असावधानीवश एक बात गलत लिख गई है, े। “दोपहर का भोजन“, “जिन्दगी और जोंक“, “डिप्टी कलक्टरी“, “हत्यारे“ जैसी दर्जनों कहानियाँ अमरकान्त जी ने एक बहुत छोटे से मकान में बैठ कर लिखी जो आज हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई हैं। यहाँ मैं ''कुछ यादें,कुछ बातें'' के पृष्ठ संख्या ९७ के हवाले से यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि “जिन्दगी और जोंक“, “डिप्टी कलक्टरी“ कहानियाँ बलिया मे लिखी गईं.

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    1. Yeh ek asaavdhaanee ho saktee hai.Thanx for bringing to notice.Pratul

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  3. Aapkae sansmarn ne Amarkant ji ki yaadan taaja kar di. Nam suna tha par aapke itne ghanisth the pata nahi tha.

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