सुनील कुमार पाठक का आलेख
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| सुनील कुमार पाठक |
समकालीन भोजपुरी कविता
सुनील कुमार पाठक
लोकभाषा भोजपुरी में लोकगीतों तथा पर्व-त्यौहार व संस्कार गीतों के अलावे शिष्ट काव्य साहित्य की भी समृद्ध परम्परा रही है। गुरु गोरख नाथ, कबीर, धरम दास, पलटू साहेब, लछिमी सखी और टेकमन राम आदि की निर्गुण भाव-धारा की रचनाओं के अलावे भोजपुरी में हिन्दी कविता के समानान्तर आधुनिक भाव-बोध की कविताएँ भी रची गयी हैं।
अधिकतर भोजपुरी कवि हिन्दी कविता की परम्परा और प्रगति से न केवल परिचित रहे हैं बल्कि यथावसर हिन्दी कविता की दुनियाँ में भी उन्होंने भी हाथ-आजमाइश की है। परन्तु, यहाँ यह बात रेखांकित करने योग्य है कि बावजूद इन सबके, आधुनिक भोजपुरी कविता का काल-खंडवार प्रवृतिगत अध्ययन करना एक अत्यंत असुविधाजनक और अतार्किक प्रयास होगा।आधुनिक भोजपुरी कविता हिन्दी कविता के प्रभाव में लिखी जा कर भी इस अर्थ में उससे भिन्न रही है कि यहाँ हिन्दी कविता की भाँति विभिन्न 'वादों' का कोई दौर नहीं रहा है। भोजपुरी कविता में हिन्दी के छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता या समकालीन कविता आदि सबका प्रवृत्तिगत प्रभाव देखने को मिलता है अवश्य, मगर 'वादों' का प्रमाद यहाँ ढूँढ़ पाना कठिन होगा। बावजूद इसके यह भी नहीं समझा जाना चाहिए कि भोजपुरी कवि इतर भारतीय भाषाओं की कविता के पारस्परिक परिसंवादों या सामाजिक-राजनीतिक विचार-दर्शनों से प्रेरित-प्रभावित नहीं हो रहे थे। भोजपुरी की समकालीन कविता या नवगीत/ गजल सब पर यह प्रभाव प्रच्छन्न रूप में देखा जा सकता है।
भोजपुरी समकालीन कविता की पृष्ठभूमि तैयार करने में भोजपुरी की प्रगतिशील धारा की कविताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन कविताओं ने समकालीन कविता के लिए एक ऐसा वैचारिक धरातल तैयार कर दिया जहाँ उसे समय-सापेक्ष, कालजीवी और जनचरित्री होना ही था।
'भोजपुरी के शेक्सपीयर' कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के नाटकों में आये उनके गीत और पद उनकी कवित्व क्षमता को भी प्रकट करते हैं।भोजपुरी का स्त्री-विमर्श हो या दलित विमर्श या फिर वृद्ध विमर्श-सब पर भिखारी के गीतों की स्पष्ट वैचारिक छाप है। सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर सलीके से व्यंग्य करने की कला समकालीन भोजपुरी कविता ने भिखारी से ही सीखी है। भिखारी ठाकुर के अलावे समकालीन भोजपुरी कविता को महेन्द्र शास्त्री, रामदेव द्विवेदी 'अलमस्त', जगदीश ओझा 'सुन्दर', सिपाही सिंह 'श्रीमंत' गोरख पांडेय, महेन्द्र गोस्वामी, परमेश्वर दूबे शाहाबादी, आदि प्रगतिशील विचारधारा के कवियों ने भी अपनी जनवादी वैचारिकता से काफी प्रभावित किया।फलत: समकालीन कविता के कवि जनपक्षधरता की राह से नहीं डिगे। इन कवियों ने अपनी जनोन्मुखता की बदौलत भोजपुरी समकालीन कविता को एक ऐसा ठोस आधार प्रदान कर दिया था जिसके कारण वह जन-समस्याओं की अनदेखी कर ही नहीं सकती थी।इन कवियों की कविताओं के कुछ उद्धरण देखे जा सकते हैं-
[1]
"कमइया हमार चाट जाता इहे बाबू भइया
जेकरा आगे जोंको फींका, अइसन ई कसइया
××××
दूहल जाता खून जेकर अइसन हमनीं गइया
एकरा बाटे गद्दा-गद्दी हमनीं का चटइया
एकरा बाटे कोठा-कोठीहमनीं का मड़इया।"
('इहे बाबू भइया' - महेन्द्र शास्त्री)
[2]
"जनमे के सूतल जिनिगिया के रूठल, टूटलि ना निनिया तोहार
बतावऽ भइया जगबऽ तऽ कहिया ले जगबऽ
भइया बिलइलऽ तू अपने करनवा, तहरे में देसवा के बाटे परनवा
तहरे से जगमग बा कोठवा-अटरिया, काहे मड़इया अन्हार?"
('सुराज-2 - जगदीश ओझा 'सुन्दर')
[3]
"बिलाई भइली भगतिन आसन जमाके
उज्जर चदरिया के ओढ़ रामनामी
माथा पर मछरी के भसम रमा के
घोंघन के चुनि-चुनि माला बनवली
गँवे-गँवे फेर लगली दुम सुटुकावे।"
('बिलाई भइली भगतिन' - रामदेव द्विवेदी 'अलमस्त')
[4]
"शुरू बा किसान के लड़इया, चलऽ तूहूँ लड़े बदे भइया!
कब तक सूतबऽ मूँदि के नयनवाँ, कब तक ढोअबऽ सुख के सपनवा
फूटलि ललकी किरिनिया, चलऽ तूहूँ लड़े बदे भइया!"
('गोहार' - गोरख पांडेय)
उपर्युक्त भाव-बोध से रचित कतिपय कविताओं ने ऐसा वैचारिक आग्रह और नवोन्मेष पैदा कर दिया कि भोजपुरी कविता को आम जन का पक्षधर हो कर अपना मौलिक-स्वाभाविक जनतांत्रिक आचरण प्रस्तुत करना ही था।भोजपुरी समकालीन कविता को समझने-परखने के लिए भोजपुरी कवियों की इस प्रगतिशील चेतना को दृष्टिपथ में बनाये रखना बेहतर होगा।
[दो]
भोजपुरी एक लोकभाषा है। लोक भाषा की कविताओं में गेयता, लय या तुक का होना उसकी श्रव्यता या पठनीयता को बढ़ाता है।आज भी भोजपुरी में जितने गीत, नवगीत, गजलें, दोहे, सवैया या अन्य छंदबद्ध रचनाएँ उपलब्ध हैं, तुलनात्मक रूप से छंदमुक्त रचनाएँ एक सीमा तक ही सामने आ पाती हैं। आधुनिक भाव-बोध से जुड़ी कविताएँ यद्यपि साठ के दशक के बाद से ही भोजपुरी में भी शुरु हो गई थीं, मगर उनका वास्तविक विकास हमें सन 1970 के बाद तब देखने को मिलता है, जब प्रयोगवाद, नयी कविता आदि के समेकित प्रभाव ग्रहण किए हुए लगातार कई संग्रह भोजपुरी में प्रकाशित हुए।
'चारो ओर अम्हरिया' (1971, डाॅ. स्वर्ण किरण), 'क्ष त्र ज्ञ' (1972, परमेश्वर दूबे शाहाबादी) 'ले के ई लुकार हाथन में' (1975, डाॅ. स्वर्णकिरण), 'ई हरनाकुस मन' (1975, पांडेय सुरेन्द्र), 'जोत कुहासा के' (1976, प्रो. ब्रजकिशोर), 'बात-बहुबात' (1978, शिवशंकर मिश्र), 'बाकिर' (1978, शारदा नंद प्रसाद), 'सँझवत' (1981, डाॅ. स्वर्ण किरण), 'एगो मेहरारु' (1981, महेन्द्र गोस्वामी),' टटात परछाईं' (1982, विश्व रंजन), 'कुछ खास किसिम के आवाज' (1983, शशि भूषण लाल), 'बूंद भर सावन' (1988, प्रो. ब्रज किशोर), 'आगे-आगे' (1988, संपादक-रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव), 'औरत जात' (2008, मलयार्जुन), 'जौ-जौ आगर' (2009, भगवती प्रसाद द्विवेदी), 'अनसोहातो' (2011, तैयब हुसैन 'पीड़ित'), 'मोथा अउर माटी' (1982), 'फुन्सियात सहर', 'अखबारी कविता' (2012, तीनों के कवि- रवीन्द्र श्रीवास्तव 'जुगानी'), 'खरकत जमीन बजरत आसमान' (2015, ब्रजभूषण मिश्र), 'माटी क बरतन' (2023, चंद्रदेव यादव), 'अनबोलता' (2025, संतोष पटेल) आदि कुछ ऐसे कविता संग्रह हैं, जिनके माध्यम से वर्तमान समय और समाज के ज्वलंत मुद्दों के साथ-साथ व्यक्ति की पीड़ा, घुटन, संत्रास और उसके संघर्षों को भी अभिव्यक्ति मिली। इन संग्रहों के अधिकतर कवियों ने यह स्वीकार भी किया है कि हिन्दी की समकालीन कविता की प्रवृत्तियों के अनुरूप ही उन्होंने जीवन, समय और समाज को तर्क और संवेदना की सम्मिलित भाव-भूमि पर आकलित किया है। यहाँ भोजपुरी जन-जीवन के स्पन्दनों और उल्लास के साथ-साथ, उसकी मुश्किलों और मुसीबतों से भी एक मुठभेड़ देखने को मिलती है।
'बात-बहुबात' में शिवशंकर मिश्र लिखते हैं -
"बात ऊ दोसर ह
ई बात ना ह
बात जे देस के, समाज के
बात जे आपन ह, आज के
देस के तरक्की के
उन्नति-उत्थान के
बात जे जिनिगी का भीतर के
दुनिया का बीच के
बात समाधान के
नमहर के, नीच के
दुखी के, गरीब के
बात जे सबका समस्या के
जथारथ-परतीत के
बात एगो उहे ह
बात उहे साँच ह।"
इन पंक्तियों से यह स्पष्ट है कि भोजपुरी कवि यथार्थ बातों की प्रतीति और देश-समाज-व्यक्ति की समस्याओं को ही अपनी कविता का प्रतिपाद्य मानता है।
'ई हरनाकुस मन' में पांडेय सुरेन्द्र व्यक्ति-मन के संताप और संत्रास को वाणी देने के क्रम में नये देशज बिम्बों का सहारा लेते हैं-
"अपना चूर-चूर भइला के
हो रहल बा अपने एहसास
केरा के पतई अस
चित्ती-चित्ती फाट के
फड़फड़ा रहल
भीतर फेफड़ा में
जमकल जा रहल बा
अइसन तहलका
जेसे
बिसवास के हवा में साँस ना खिंचा सके।"
(काल्ह)
प्रो. ब्रजकिशोर अपने दो कविता संग्रहों- 'जोत कुहासा के' और 'बूँद भर सावन' में मानवीय मनोभावों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के साथ-साथ कहीं-कहीं दार्शनिक मनोभूमि पर भी उतरते दिखते हैं। कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं-
[1]
"माथा पर दुपहरिया के सुरुज
तर-तर पसेना
पिआसल तरास
गाछो तर ना डोले बतास
बेराह भटकल फुँफकारत
फन मारत लक्ष-लक्ष
अन्हियारी के नागरिक!
हम डूब रहल बानींनिराश।"
(अन्हियारी के नाग- 'जोत कुहासा के')
[2]
"फाटल बिवाय जनु
परती धरती के दरकल
लरिकाई के सपना
पानी कँदोर बन दरकल
खरकल अपने रँव में
लहर असरा के सरकल
बाँचल
सईंचल ढेर रेत के
सासत साँस पवन में।"
('बूँद भर सावन')
समकालीन भोजपुरी कविता के एक अन्य प्रबुद्ध स्वर शारदा नंद प्रसाद अपने तीनों कविता संग्रह- 'पुरइन', 'बाकिर' और 'का कहीं' में भोजपुरी समकालीन कविता को एक ऐसी ऊँचाई पर ले जा कर पहुँचा देते हैं जहाँ वह किसी भी भाषा की समकालीन कविताओं से किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं प्रतीत होती। कुछ उदाहरण देखने लायक हैं-
[क]
"लीप पोत के हर कोना
अँगना के ओरी तर
ढरक गइल पोतनहार
भुक-भुक जोन्ही लउके लागल
छान्ही के छेद से
अँखिया में
अभागा बिछलहर रतिया के
का कहीं जे जागले रहल भोर ले
अब गुजरी में तोप के सभकर नजर बचावत/हमरा से
सितुही में मोती ना पोसा सकी।"
('बाकिर')
[ख]
"अनादर के
एक टुकी
झुराइल बसिया रोटी
तनी/ताना के साग ध के
मालम्मा कइल
खरकटल
पितरिया छीपा में
परोसा गइल!
ओपर से
दू गो मीठ ठोनहच
तियना-जस दिया गइल !
आ
घीव से आँवासल
सेनुर से टीकल कलसी
ओही हाथे घँघोरा गइल। "('बाकिर')
'बाकिर' की दूसरी कविता में 'झुराइल बसिया रोटी', 'ताना के साग','खरकटल पितरिया छीपा', और 'सेनुर से टीकल कलसी' आदि ऐसे लोकगंधी बिम्बों का विधान संभव हो सका है जिससे व्यक्ति परेशानी, अपमान और 'ठोनहच' (उलाहना) सहने वाली उसकी पीड़ादायी विवशता और इन सबसे अलग 'सेनुर से टीकल कलसी' जैसी सारी सांस्कृतिक पहचान के घँघोरा जाने (मलिन हो जाने) की वेदना इतनी गज्झिन रूप में संयोजित हुई है कि भोजपुरी समकालीन कविता की ताकत समझते देर नहीं लगती।
शारदा नंद जी के एक अन्य संकलन 'का कहीं' की एक कविता की कुछ पंक्तियों में सभ्यता-विमर्श की दृष्टि से भी भोजपुरी कविता की सोच सामने आयी है-
"हमरा जूता के एगो काँटी
खिया गइल बिया
चलत-चलत बेचारी
कबो-कबो सुगबुगाले
त चमकेले
× × ×
ओह घड़ी
ऊ छोट काँटी सुकपुका जाले
आ धरा ना पावे
त हम जोर से ओकरा के
ठोकर देहीले
बाकिर ऊ मानेले का?
फेर सुगबुगाले
आ फेर सुगबुगाले।"
'काँटी की सुगबुगाहट' आखिर नयी सभ्यता की सुगबुगाहट ही तो है जिसके साथ व्यक्ति को 'एडजस्ट' होते अपनी पहचान भी जुगाये रखनी पड़ती है।
भोजपुरी समकालीन कविता को मजबूती प्रदान करने में शशि भूषण लाल के कविता-संग्रह 'कुछ खास किसिम के आवाज' की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है। इस संग्रह में 'झलफलाह' शीर्षक 227 पंक्तियों की एक लम्बी कविता है तो 'फूल तलमखान के' शीर्षक से 8 शब्दों की 6 पंक्तियों वाली भी एक मुकम्मल कविता है-
"मुसकाइल
फूल
तलमखान के
फेरो
आज
सुबह
भइल।"
भोजपुरी समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवियों में जितराम पाठक, तैयब हुसैन 'पीड़ित', रिपुसूदन श्रीवास्तव, अशोक द्विवेदी, ब्रजभूषण मिश्र, भगवती प्रसाद द्विवेदी, मलयार्जुन, चंद्रदेव यादव, विश्वरंजन, रवीन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव 'जुगानी भाई', मोती बी. ए., परमेश्वर दूबे शाहाबादी, हरिकिशोर पांडेय,पांडेय सुरेन्द्र, शारदा नंद प्रसाद, आनंद संधिदूत, पी. चंद्रविनोद, शशिभूषण लाल, बलभद्र, प्रकाश उदय, जितेन्द्र कुमार, सदानंद शाही, चंद्रेश्वर, परिचय दास, लक्ष्मीकांत 'मुकुल' आदि के नाम चर्चित रहे हैं। साथ ही, भोजपुरी समकालीन कविता को अपनी रचनाओं से बहुआयामी और व्यापक संदर्भ प्रदान करने वाले कवियों में सदानंद शाही, जितेन्द्र श्रीवास्तव, निलय उपाध्याय, प्रमोद कुमार तिवारी, सुरेश काँटक, ध्रुव गुप्त, परिचय दास, सुमन सिंह, संध्या सिन्हा, संतोष पटेल, हरे प्रकाश उपाध्याय, संतोष पटेल, अंचित, गुलरेज शहजाद, नुरैन अंसारी, सुनील कुमार पाठक, विष्णुदेव तिवारी, संध्या सिन्हा, सुमन सिंह, कनक किशोर, जे. पी. द्विवेदी, अंचित, गुलरेज शहजाद, केशव मोहन पांडेय, आकृति विज्ञा 'अर्पण' आदि की भूमिका मानीखेज रही है जिनसे समकालीन भोजपुरी कविता में एक खास तरह की धार आई है।
जितराम पाठक भोजपुरी समकालीन कविता के शुरुआती दौर के महत्वपूर्ण कवि रहे हैं। इनकी स्पष्ट मान्यता है कि आधुनिकता-बोध के बगैर भोजपुरी कविता निस्पंद हो जायेगी। उनकी काव्य पंक्तियाँ देखने लायक हैं-
"अरुआइल बा बात तहार हटावऽ फरका
ले अइबऽ एने अब तऽ पटरी ना खाई
चूड़ी टिकुली के हम सुनलीं गीत
अनेकन अरुआइल
पाकि गइल बा कान कपार बथत बा फरके
लागल हरके
तू बाड़ऽ अइसन उजियावन
दुपहरिया में गीत भोर के गावत बाड़ऽ
मारि फसकड़ा बइठल बाड़ऽ महकल अइसन
पगुरइबऽ एनें अब तऽ पटरी ना खाई
× × ×
आँचर तर घुसिअइल
भइलऽ तू घरघुसना
चूमा-चाटी में कब से अझुराइल बाड़ऽ
नाग-फाँस में कब से तूही धराइल बाड़ऽ
नवकी बात बोलावति बाटे कब से देखऽ
ढेर चोन्हइबऽ अबकी तऽ पटरी ना खाई।"
('भोजपुरी साहित्य', दिसम्बर, 1966)
डॉ. जितराम जी ने प्रेम और श्रृंगार जो कि भोजपुरी कविता का बड़ा प्रिय विषय रहा है, उसपर भी अपनी मुक्तछंदी कविताएँ लिखी हैं मगर उनका अन्दाज और तेवर यहाँ बिल्कुल अलग है। बतौर उदाहरण इन पंक्तियों को देखा जा सकता है-
"रूप गाँजा ह
हीक भर पीयऽ लोग
आँखि के चिलम लहकावऽ
नीसा में गोता
आ जीयऽ लोग।
×××
रूप पियाज हऽ
छीलीं सभे
घीव के लोना हऽ
लीलीं सभे
रूप मथुरा के पेड़ा हऽ
खाईं बाकिर पछताये के पड़ी
×××
रूप रेंगनी के काँट हऽ
चभ दे कहाँ दो गाड़ी गइल।
निकलत नइखे हरकत बा
रसे-रसे दरकत बा।
रूप आँख के लोर हऽ
टघरते रही
रूप काजर के डोर हऽ
पसरत रही
रूप गोरिया के गहना हऽ
रूप साहू जी के लहना हऽ
रूप रूपया के भाई हऽ
रूप बबुआ के माई हऽ।"
(भोजपुरी साहित्य, 1968)
जितराम जी के एक नवगीत में भी उनके देसज अनूठे बिम्बों और प्रतीकों की छटा निराली, अनोखी और विस्मयकारी है-
"पीर पँजरिया सिरजे
सरगे
टँगल अधरसा चान
फुफुती फाँड़
फुरहुरी जागे
थथमल गरब गुमान।
आम सेनुरिया
मऊर मुरेठा
ठूँठी पाकुड़ गमके
नीम
मोतिया झार झुलावे
लाजे-लाजे झमके
सहजन ठहरना भर
रस आँटे
बाँटे रस-पहचान!
×××
साँस पहरुआ आ ठनके
खनके काजर के रस-डोरी
साँवरिया के गाल सेनुरी
भइल गाँव के गोरी
बिथकल साध
पिरीत बोथाइल
थाती परल उतान।"
(भोजपुरी लोक, जुलाई 1990)
रवीन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव 'जुगानी भाई' भी समकालीन भोजपुरी कविता को समृद्ध करने वाले एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। इनकी आधुनिक भाव-बोध की कविताओं का फलक बहुत विस्तीर्ण है। इसमें गाँव-जवार-पथार की बातों के अलावे शहरी जीवन के एकाकीपन, पृथक सौन्दर्य-बोध, मानवीय संबंधों के स्वार्थ परक निर्वहन, अपसंस्कृति और बाजारवादी सोच के फैलाव आदि की जमकर खबर ली गयी है।उनकी एक कविता है- 'फुन्सियात शहर।' इसकी पंक्तियाँ गौरतलब हैं-
"नीचे बा तोल-मोल, छते लोग रहत बा
सम्बन्ध कऽ दिवार इहाँ रोज ढहत बा
परिवार कऽ अब व्याकरण बदले लगलि इहाँ
बुढ़वा कपार पीट के चुपचाप सहत बा
सोना मढ़ल चाकू इहाँ
सीना के हनि गइल!"
('फुन्सियात सहर')
एक जगह और वे शहरी जिन्दगी की रोज-रोज की भाग-दौड़, आपाधापी की ओर अपनी नजर दौड़ाते लिखते हैं-
"झन-झन-झन कइके झनक गइल
ई सहर बेचारा सनक गइल!
दू गोड़वा भूले का डेरा, भागत जिनिगी हेरी-हेरा
कवनों डाकिन के करनी से घर ही में घर तेरा मेरा
पतई से फूल कऽ तनातनी भर गमला रोपल नागफनी
जब साँस-साँस से बाजत हो जिनगी कऽ कइसे बात बनी
ई उपरे उपरे गपक गइल!"
('फुन्सियात सहर' - जुगानी भाई)
भोजपुरी समकालीन कविता में तैयब हुसैन 'पीड़ित' की दखल बहुत मजिगर रूप में है। प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित तैयब जी की कविता व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य ले कर चली है जिसमें मानवीय संवेदना, पूँजीवादी प्रकोप से उबरने की कामना, न्यायप्रिय और सामाजिक व साम्प्रदायिक सद्भावना कायम रखने की प्रेरणा जैसी बातों को पूरी तरजीह मिली है।
"लाल लहू पियले लउके सेमर फूल
मौसम के कपड़ा में लँगटे बबूल
ए नजरिया के का हो गइल!"
- प्रकृति में भी सामाजिक चेतना पिरो कर ताजे उपमानों से भरे नवगीत लिखने वाले कवि ने गाँवों की जो कल्पना की है उसमें सामाजिक चेतना के साथ-साथ सांस्कृतिक बोध भी है-
"पसगयबत पाहुन के आगम में
छप्पर पर कउआ के काँव
हमर गाँव।"
भगवती प्रसाद द्विवेदी भी समकालीन कविता के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनकी कविताओं में देशज संवेदनाओं के अलावे व्यक्ति-मन की पीड़ा की सहज-स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुई है। अपनी मातृभाषा भोजपुरी के प्रति अपने आभ्यंतरिक अनुराग को प्रकट करता कवि कहता है-
"जइसे चरवाही से छूटल
गाइ के आहट पावते
खूँटा में बन्हाइल बछरू
लागेला डँकरे
ओने ओकर माइयो लागेले हँकरे
जइसे ल इकाई के रोआई सुनते
लरकोरी मतारी का छाती से
फफात दूध लागेला टघरे
ओइसहीं जब-तब अनसोहातो
जबान पर आ जाली
होके खुलासा
हमार मातृभाषा।"
('मातृभाषा' -'जौ-जौ आगर', भगवती प्रसाद द्विवेदी)
समकालीन कवियों में तीन नाम - अशोक द्विवेदी, बलभद्र और प्रकाश उदय- ऐसी व्यापक सोच और चिंतन के कवि हैं जिनसे समकालीन भोजपुरी कविता को नयी ताकत, दिशा और गति मिली है। लोक धुन, लोक लय और लोक संस्कृति के प्रति तीनों का गहरा और आत्मीय लगाव रहा है। तीनों के अनुभव का आकाश विस्तीर्ण और व्यापक है। जन-जीवन से निकटता, काव्यात्मक अनुभूति और संवेदना के बल-बूते, इन तीनों कवियों ने अपने काव्य-विवेक से ऐसा समृद्ध काव्य-लोक सृजित किया है जिसमें पर्याप्त मौलिकता और रुचिरता, वैविध्य और सौष्ठव तथा सौन्दर्य और गांभीर्य भी है। तीनों कवियों की रागात्मक चेतना जितनी हृदयावर्जक और मसृण है, उतनी ही उनकी बौद्धिकता भी प्रखर और प्रासंगिक है।
लगभग एक ही कालखंड के इन तीनों कवियों ने ग्राम्य अंचल की प्रकृति, संस्कृति, संस्कार, व्यवहार, पर्व-त्यौहार-लोकाचार, खेती-धंधे तथा जीवन के अन्य क्रिया-कलापों में अपनी गहरी अभिरुचि और आस्था रखते हैं। गाँवों की पीड़ा, संघर्ष और सपनों से ये पूरी तरह वाकिफ हैं और तमाम विपरीतताओं और विसंगतियों के बावजूद अपनी कमियों और मजबूरियों में भी जीवन-रस और उमंग-उत्साह बचाये रखते हुए पारस्परिक सहयोग और सद्भावना के प्रति सजग रहने की ग्रामीण जन की चाहत को इन कवियों ने अपनी कविताओं में पूरा 'स्पेस' दिया है। मजदूरों और किसान के जीवन के प्रति सहानुभूति ही नहीं समानानुभूति से इनकी कविताएँ परिपूर्ण हैं। किसानी जीवन की दिन भर की हाड़-तोड़ मिहनत और संघर्ष के बावजूद उनके कौटुम्बिक जीवन के प्रेम-राग और हास-परिहास को भी इन कवियों ने जिस संवेदना के साथ उकेरा है उससे दो बातें साफ होती हैं। पहली तो यह कि बिना खेतों-खलिहानों, बाग-बगीचों में उतरे तथा रोपनी-कटनी, दँवनी-ओसवनी, पटवनी-निकउनी को निकट से निरखे-परखे ऐसी पंक्तियाँ किसी कवि के जरिये संभव नहीं हो सकतीं। और दूसरी यह कि दिन भर खेतों में खटाई के बावजूद इन खेतिहर मजदूरों के जीवन में भी प्रेम की कितनी प्रगाढ़ता, गहराई और मधुरता होती है उसे इन कवियों की पंक्तियों में परखा जा सकता है-
[1]
"रोपनी से सोहनी ले
कटिया-ओसवनी
नन्हा के बाबू के
जोहनीं-बोलवनीं
अइते तऽ छइते पलनिया
मँड़इया मोर झाँझर लगे।"
(अशोक द्विवेदी, 'कुछ आग कुछ राग', 2014)
[2]
"दूनू परानी के ना ओराइल बात
सटल ना होठ कबो
बात-बतकही आ हँसी-मजाक में बन्हाइल खेत आ समय
कि रोपते-रोपते रामकिसुन बो के हाथ में परल एगो अझुराह आँटी जब
बोलली लगाहि बात कि
अँटिया बन्हले बाड़ऽ
कि अपना बहिनिया के जूड़ा।"
(बलभद्र, 'कब कहलीं हम, 2015)
[3]
"आहो आऽहो
रोपनी के रउँदल देहिया साँझहीं निनाला
तनी जगइहऽ पिया
जनि छोड़ि के सूतलके सूती जइहऽ पिया।
××××
आहो आऽहो
चूल्हा से
चउकिया तक ले
देवरू-ननदिया तक ले
दिनवा त दुनिया भर के
रतिए हउए आपन, जनि गँवइहऽ पिया
धइ के बँहिया प माथ बतियइहऽ पिया।"
(प्रकाश उदय, 'अरज-निहोरा', 2020)
ऊपर के इन तीनों उद्धरणों से स्पष्ट है कि समकालीन भोजपुरी कविता भोजपुरी समाज की किसानी और कौटुम्बिक व्यवस्था से बहुत गहरे तक जुड़ी हुई है। भोजपुरी ग्रामीण अंचल की पूरी धड़कनें, उसके संघर्ष और सपने इन पंक्तियों में चित्रित हैं। भोजपुरी की ऐसी कविताएँ श्रम के प्रति सम्मान-भाव जगाने के साथ-साथ आम जन की स्वाभाविक रागात्मिका वृत्ति का मनोरम आख्यान भी रचती दिखती हैं।ये तीनों कवि आज भी सक्रिय हैं और समकालीन भोजपुरी कविता के मजबूत स्तंभ बने हुए हैं।
[तीन]
भोजपुरी समकालीन कविता को समकालीन संदर्भों से जोड़ कर उसकी पूरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ भोजपुरी के समकालीन कवियों ने देखा है। कुछ उदाहरण यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि भोजपुरी समकालीन कविता मौजूदा दौर में समय और समाज की सच्चाइयों को बखूबी समझती है। बतौर उदाहरण कुछ कवियों की कविताओं को देखा-परखा जा सकता है-
[1]
आदिम गीतन के अटूट स्वर में
पूरा मन से होत रहे प्रार्थना
कि कबहूँ ना चूके इनार के सोत
कि कबहूँ ना
सूखे हमनी के कंठ
माई हरदम रहस विदमान
आँखि के कोर से उँखी के पोर तक में।
('इनार के बियाह'-प्रमोद कुमार तिवारी)
[2]
"रवनवा राम जी के लगे आइल
उनका गोडे प गिर गइल, कहलस -'देखीं!
अब हमरा आ रउरा में
कवनो टसल नइखे रहि गइल
एगो सीता जी रहली
त ऊ धरती में समा गइली
अब उनकर कवनो मामला बचल नइखे
रहल सवाल राज काज के
त हम रउरे पालिसी के कायल हो गइल बानी
अब हमरो रउरे रसता प चलेके बा
जनता खातिर जियेके बा
जनते खातिर मरेके बा!"
('राम रावण के नया लड़ाई'-सदानंद शाही)
[3]
"अजब कहानी बा बथुआ क
बिना बोअले उगि जाला खेतन में
फसलन के सोरि से सोरि मिलावत
खेतन के सोहनी में किसान सोहि देलें बथुआ
कहेलें बहुत हो गइल बा अरकस-बथुआ खेतन मा
जबकि ऊ जानेलें ओकर सीरत।"
('बथुआ'-जितेन्द्र श्रीवास्तव)
[4]
"गइनीं गाँवे
ना मिलल केहू चाचा, बबुआ, भइया
लटकल रहे घर प ताला
गोड़ पड़े बस ऊँचा-खाला
गली में मिलल एगो हाँफत भूत
पोतले रहे सऊँसे देहे भभूत
महकत रहे जइसे मूत
का कहीं रउवा से
भगनीं हम गऊँवा से/गऊँवा दउरत रहे हमरा पाछे/
देखनीं भूतवा हमरा आगे लागल नाचे/ना बूझनीं रउवा?
('जब गइनीं आरे' - हरे प्रकाश उपाध्याय)
[5]
सरग के पार नदी में
छप-छप
नहातिया एगो मेहरारू
सोना के थरिया में अछत-दूब ले के
पुरइन के पतई प
खाड़ होई
खाड़ होई
महावर से रचल पाँव
घूघ हटाई आ राँभे लागी गाय
घूघ हटाई
आ नाद प दउर जइहें बैल
झाड़ू उठाई
झक-झक साफ करी घर
चूड़ी बजाई... जगाई -
उठऽ हो
जाय के बा तहरा
पहाड़ के ओह पार..।"
('भोर' - निलय उपाध्याय)
[6]
"जतकुटवा अब शहर ना आवेला
गांव-टोला में अबहू कहियो
लऊकत होइहें
हांको लगावत होइहें कौनो जतकुटवा
मेहराईल थाकल आवाज में
काहे कि उनके पता बा कि
पत्थर के जोर
अऊरी बोली समझे वालन के
अखिरिये निसानी बाड़े ऊ लोग
कौनो ना कौनो दिन
बिला जाए खतिरा तइयार!"
('जतकुटवा' - ध्रुव गुप्त)
[7]
"अब त बगदाद के अस्पताल में
एगो बेड प
अमेरिकी बमन के लच्छेदार
आतिशबाजी का बीच
भींजत ब इसलिए बानीं
हम अली इस्माइल
एक दिन पतझड़ बीत जाई
जल्दिये आई
बिना बाजू के
दिमाग से लड़े के दिन जल्दिये आई।"
('अली इस्माइल' - जितेन्द्र कुमार)
[8]
"मदरिया खूब नचाई नाच
बाइसकोप फइलवलस अइसन
केहू न जाई बाँच।
डमरू देखऽ
गजब बजवलस
सभका के दउराय बझवलस
बोली अइसन झूठ
कि बूझी स ऊँचे दुनिया साँच।"
('मदरिया खूब नचाई नाच" - सुरेश काँटक)
[9]
"हकमारी कइके ऊ
भर लिहले बोरी
चूस-चाट के भरलें
घर के तिजोरी।
×××
जात आ जमात देख
जनमत के बँटले
धागा सनेहिया के
खोज-खोज कटलें
दलित के देह के
फरात रहे छेना
नसीब नइखे उनका..।
एसी में देसी बिचार त लगेना
नसीब नइखे उनका
घर ईरान के बेना।
नसीब नइखे उनका..।"
('नसीब नइखे उनका' - हरेन्द्र हिमकर)
[10]
"किछु बेसिये चमकत बा एह घरी
बाजार में सोना
बनि के दग-दग पीयर
भरमावत हर छन सभकरा के
हम अइसनो में पावल चाहीला
ओही सोच के
जवन हिरावल के दम राखेला।"
('बाजार में सोना '- चंद्रेश्वर)
[11]
"एजवा हम बहुते खुश बानीं
कहे वाला त कहबे करी कि
हम एजवो उनके किरिपे से बानीं
बाकिर हमरा बुझाला
जे जहिया ले हम बानीं
तहिये ले ऊहो बाड़ें
हमरा के ओरिया के
अपना के हेरवावे के खतरा
ऊ ना मोल लीहें।"
('मोनालिसा आ महाकुंभ' - सुनील कुमार पाठक)
[12]
"जे सोख जालें
नदिया के कुल पानी
हड़प लेलें ओकर किनारा
निकाल बेचेलें ओकर बालू
तलहटी ले ना छोड़ेलें
बटोर के ओकर पत्थर
डाल देलें कुल के क्रशर में
ऊहे छेड़लें बाड़ें अभियान
नदी बचावे के
एकरा से बढ़िया का होई?"
('एकरा से बढ़िया का होई?' - संतोष पटेल)
[13]
"अनाज के ललक में
चिरई चल जाले सब जगह
एक-एक दाना खातिर
लगावेले सब जोग
ब डर छोड़ देले अपना घोंसला पर
हमार माई रोज भोरे
दुआरी पर डालेली अनाज
कि कवनों बच्चा भुखाइल ना बचे।
सभके सीखे के बा
उड़ान।"
('उड़ान'- अंचित)
ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि समकालीन भोजपुरी कविता में कवियों ने रूमानियत से यथासंभव अपने को मुक्त और विलग रखने की कोशिश की है। परम्परा-प्रचलन आदि के प्रति अनावश्यक इनमें कोई लगाव या आस्था नहीं दिखती। समकालीन भोजपुरी कविता के कवियों ने जीवन, जगत, समय और समाज से अपने को सीधे जोड़े रखा है। वे आँखिन देखी में विश्वास करते हैं और अपने पाठकों से भी सीधा संवाद बनाये रखने के पक्षधर हैं। समाज, जीवन और राजनीति की विसंगतियों के प्रति समकालीन भोजपुरी कविता में व्यंग्य और क्षोभ का स्वर तो है ही जड़ता, अतार्किकता, वैमनस्य, शोषण, हिंसा, धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिकता आदि के विरुद्ध आक्रोश इस कविता की मूलभूत पहचान है। समकालीन भोजपुरी कविता युगीन समस्याओं से मुठभेड़ की कविता है। कवियों ने यहाँ सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ अपने आत्मसंघर्ष को भी अपनी कविताओं में रूपायित किया है। व्यापक जनपक्षधरता भोजपुरी समकालीन कविता का मूल चरित्र है और यह कविता हर चीज को फरिया-फरिया कर देखने की अभ्यस्त होने के बावजूद जीवन को समग्रता-संपूर्णता में देखती है। इस कविता के प्रतिपाद्य साँचों में ढले नहीं हैं, इनकी अनगढ़ता ही इनका वास्तविक सौन्दर्य है। यहाँ 'इनार का बियाह', 'जतकुटवा', 'फुलगोभी', 'बथुआ का साग'- कुछ भी कविता के दायरे में आ सकता है। यहाँ कुछ भी अमहत्वपूर्ण नहीं है। यह कविता साधारणता में ही असाधारणता की प्रतीति है। समकालीन भोजपुरी कवि मामूली से मामूली चीजों, घटनाओं और बातों को कविता की शक्ल-सूरत में ढाल सकता है और उसे अपनी काव्यात्मक प्रतिभा, सौष्ठव और विवेक से काव्य-गरिमा प्रदान कर सकता है।
[चार]
भोजपुरी समकालीन कविता में हर तरह की विमर्शगत रचनाएँ भी देखने को मिलती हैं। नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, वृद्ध विमर्श, बाल चिंतन, किसानी चर्चा,पर्यावरण चिंतन आदि हर तरह के विमर्शों पर भोजपुरी समकालीन कविताओं में भी काफी ईमानदार और संजीदा रचनाएँ देखने को मिलती हैं।
नारी विमर्श से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कविता- संग्रह भी प्रकाशित हैं, जिनमें बेशक कुछ उल्लेखनीय हैं- 'बेटी मरे त मरे कुँआर '(प्रकाश उदय, 1988), 'औरत जात' (मलयार्जुन, 2008), 'पंखिया जनि काटऽ' (कनक किशोर, 2025), 'कठपुतरी' (भोजपुरी में अनुदित, संपादक : कनक किशोर, 2022) आदि। नारी 'विमर्श से जुड़ी भोजपुरी के समकालीन कवियों की कुछ रचनाएँ बानगी के तौर पर देखी जा सकती हैं-
[1]
"सिकाइत तोहरा से नइखे
ओह लोग से बा
जे हमनीं के कुँआर सुहागिन बनावेला
आ कबहूँ
कवनों दुशासन अइसन
कोलाहल के बीचे हमनीं के
लँगटे करत
परत दर परत उघारत
ठठात हँसेला।"
(उमाकांत वर्मा)
[2]"एगो मेहरारू/डगर प/ओड़िया भरल घासि आ/कोरा में के लरिका उतारि के /उतरि गइल खेत में/चारू ओर ताकि-ताकि /हाऊ- हाऊ दूनू हाथे/लहसन,बूँट आ खेसारी के टूसा/फुरहुरा के फाँड़ में/मूठा का मूठा/अँटावति बिआ/दिमाग लगावत बिआ।"('एगो मेहरारू'-महेन्द्र गोस्वामी)
[3] "बेटी हऊ/गऊ नियन चुपचाप रहऽ/केहू कुछो कहे,सुनऽ/मुँह सी के सहऽ/बेटी हऊ।×××/मत देखऽ सपना/आ करऽ मत कल्पना /भीतरे-भीतर सीखऽ नीके/
तावा नियन तपना/हथियार के भीत नियन/गलऽ,चुपे ढहऽ/बेटी हऊ ।"('बेटी हऊ '-सुरेश काँटक)
[4]-"माई री/मछरी होइतीं /झिंझरी खेलतीं/घुमरी परतीं/उलटी धारे /गउमुख चढ़तीं/जेने चहितीं/ओने जइतीं/नदिया तरतीं/कवनों मछुआ डालित /महाजाल त ना?/सुगनी होइतीं/सोना नभ में/भाँवरी परतीं/सुरुज-चनरमा /कावर उड़तीं/ काइनात के/चारू ओरी/पाँव पसरतीं।"(दिनेश पांडेय ,कठपुतरी,2022)
[5]- "अब ना बेचाई खेत दहेजवा के खातिर/हम ना बनबि कठपुतरी के माफिक/अब ना बिकाई भौजी गहना-गुरिया/खुली ना अब खूँटा से तोर धनु गइया/
भइया हो पूरे द सपनवा हमार/पँखिया जनि काटऽ।"(कनक किशोर)
[6]"स्त्री के देह के/भूगोल में भुलाइल/मरद/तनिका इतिहासो उलटि के देखऽ/समझऽ/स्त्री खाली देह ना होले/एह खातिर/ हमरा मनो के पढ़ऽ।"(कनक किशोर)
[7]"बुआ, सुआ के पिंजरा खोलत/सोच रहल बाड़ी/खुल के हँसे न खुल के रोवे/ई कइसन जिनिगी/आसमान ना धरती आपन/आफत में बा जी/बाहर भीतर जमल अन्हार/खरोंच रहल बाड़ी।/पाँव पसरलस जब उछाह/तब अजगुत घाव मिलल/जिनिगी के सपना के ना /कतहीं ठहराव मिलल/कठुआइल अपना अतीत के /कोंच रहल बाड़ी।"(अक्षय पांडेय)
[8]चौदह बरिस पर दिन फिरल/बाकिर घर से निकालल गइली/तत्पर संतोष ना भइल/देके अगिन परीक्षा/गइली समाय/अलोप हो गइली/फाटल धरती/ओही पुरुखवा के ना मुँह देखलीं/जेकर कथा बाँचीले/गाइले हरिकीर्तन/हमहूँ इहे बेवहार उठवलीं/मेहरी के मारीं/ मूसर से फारीं/चलत आवत बाड़ी/जमाने से।"(औरत जात-मलयार्जुन)
[9]
"नियति त ई बा कि
बेटियन के जन्म पर
खुशी होले घर-बाजार-द्वार
आ किस्मत के रोवेलें
इज्जत के ठेकेदार
बाकिर सबसे बड़ साँच बात तऽ ई बा कि
दूनू ठेकाना पर
दरकेले टूटेले
आ सिसकेले बेटिये
कहीं चुपचाप लोर बोलेला
कहीं कलप के घुँघरू बोलेला।"
(संध्या सिन्हा)
[10]
"पढ़ ललमुनिया तोरे पढ़ले
घोर अन्हारे दीप जरी
बढ़ ललमुनिया तोरे बढ़ले
एक दुनिया के डेग बढ़ी
×××
हँस ललमुनिया तोरे हँसले
तिमिर-कलश में भोर भरी।"
(आकृति विज्ञा 'अर्पण')
ऊपर की भोजपुरी कविता के उद्धरणों से स्पष्ट है कि नारी-विमर्श से जुड़ी भोजपुरी कविताओं में नारी जीवन की पीड़ाओं को पूरी संवेदना और वास्तविकता के साथ अभिव्यंजित किया गया है।यहाँ नारी और पुरुष के बीच सामाजिक बराबरी और पारस्परिक सहयोग की कामना की गई है।भोजपुरी में नारी- विमर्श की कविताएँ परिवर्तनकामी होकर भी अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक मर्यादाओं को तिलांजलि देकर नहीं चली हैं।नारी -पुरुष के रिश्तों को समानता, मधुरता और एक दूसरे के प्रति सम्मान-भावना से देखने की चेतना और आधारभूमि और पर खड़ी ये कविताएँ अपने भोजपुरी समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक बोध को भी अक्षुण्ण बनाये रखती हैं। यहाँ यह भी गौरतलब है कि भोजपुरी गीत-संगीत जिस पर आज भी अश्लीलता और भौंडापन का आरोप पूरे जोर-शोर से लगाया जा रहा है,उससे इतर भी भोजपुरी संस्कृति और साहित्य-सृजन की दुनिया ऐसी है जहाँ मनुष्यता की पहचान बलवती हुई है,मानवीय संवेदना और करुणा के तार झंकृत होते हैं,सम्बन्धों को एक नयी पहचान मिली है।हाँ एक चीज थोड़ी खटकने वाली है,और वह यह कि भोजपुरी नारी -विमर्श की भी अधिकतर बातें पुरुष कवियों की लेखनी के जरिए ही सामने आयी हैं।फलत:अनुभूति की मौलिकता और प्रामाणिकता का सवाल भोजपुरी की नारी -विमर्श की कविताओं पर उठना लाजिमी है।अन्य भारतीय समाजों की तरह भोजपुरिहा समाज में भी नारी-शोषण की समस्या बदस्तूर जारी है।रोजी-रोटी के लिए गाँवों से दूसरे जिलों या राज्यों के लिए पलायन का अंतहीन सिलसिला आज भी बरकरार है।इसका खामियाजा सीधे तौर पर भोजपुरी क्षेत्र की महिलाओं को भोगना पड़ता है।किन्तु इसका एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि भोजपुरी क्षेत्र के पुरुष या नारी -दोंनो अपने श्रम पर ज्यादा भरोसा करते हैं।भोजपुरिहा जन किसी दूसरे प्रदेश या देश के लिए 'लाइबलिटी ' नहीं बल्कि एक 'एशेट ' होते हैं।अपने श्रम और संघर्ष के बल पर कई राष्ट्रों के पुनर्निर्माण का इतिहास भी रचा है इन्होंने। भोजपुरी नारी- विमर्श की कविताएँ वस्तुत: शील,श्रम,साहस,संघर्ष और संकल्प की कविताएँ ज्यादा हैं ।निश्चित प्रतिरोध भी है मगर पुरुष-प्रतिकार के जरिये नयी नारी -अस्मिता गढ़ने की आपाधापी और उतावलापन नहीं।निश्चय ही भोजपुरी कवयित्रियों का काव्य -स्वर उतना मजबूत और धारदार नहीं है ।दूसरी तरफ,यहाँ पुरुषों द्वारा नारी- सम्मान की खूब कविताएँ रची गई हैं और नारी- शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध रचती कविताओं की भी कमी नहीं है।
[पॉच]
कबीरदास और संत रविदास की कविता की पृष्ठभूमि पर उपजी-पनपी और फूली-फली भोजपुरी में दलित कविताओं की भी कमी नहीं है। दलितों के प्रति सहानुभूति वाली कविताएँ तो अनेकश: हैं मगर स्वयं दलितों द्वारा रचित कम ही सही, परन्तु सामाजिक जड़ता,पाखंड, विभेद ,वैमनस्य आदि को तोड़ने वाली स्वानुभूत सशक्त दलित कविताएँ भी भोजपुरी में हैं।भोजपुरी के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ही है कि 'सरस्वती ' में 1914 में छपी बिहारी कवि हीरा डोम की भोजपुरी कविता 'अछूत की शिकायत ' से हिन्दी दलित कविता की भी शुरुआत मानी जाती है।इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण पंक्तियों को देखा जा सकता है-
"हमनीं के राति दिन दुखवा भोगत बानीं,
हमनीं के सहेबे से मिनति सुनाइबि।
हमनीं के दुख भगवनओं न देखता जे
हमनीं के कबले कलेसबा उठाइबि।
×× ×× ××
बभने के लेखे हम भिखिया न मांगब जा,
ठकुरे के लेखे नाहि लउरि चलाइबि
सहुआ के लेखे नाहि डांडी हम मारब जा,
अहिरा के लेखे नाहि गैया चोराइबि।
भटउ के लेखे न कवित्त हम जोरब जा,
पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।
अपने पसीनवां कै पइसा कमाइबजां
घर भर मिलि- जुली बांटी- चोटी खाइबि।
हड़वा- मसुइया के देहइया है हमनीं कै,
ओकरे के देहिया बभनो के बानी।
ओकरा के घरे-घरे पुजवा होखत बा जे,
सगरे इलकवा भईले जजमानी।
हमनी के इनरवा के निगिचे न जाइले जा,
पांके में से भरि-भरि पिअतानीं पानी
पनही से पिटी- पिटी हाथ -गोड़ तुड़ि देलें
हमनी के इतनी काहे के हलकानी!"))
[‘सरस्वती’ -संपादक-महावीर प्रसाद द्विवेदी ,सितंबर-1914, भाग' 15, खंड- 2, पृष्ठ संख्या- 512-513 ]
यह पूरी कविता ब्राह्मणवादी व्यवस्था और सामन्ती व्यवहारों की खूब खबर लेती है और विभेदकारी सामाजिक परम्पराओं के प्रति विद्रोह का एक सशक्त स्वर बनकर उभरती है।ऐतिहासिक महत्व की इस कविता के अलावे भी दलित-गैरदलित कवियों की अनेकानेक कविताओं में दलितों की समस्या, उनका प्रतिरोध,संघर्ष और संकल्प मुखरित है।
रमापति रसिया (नथुनी प्रसाद कुशवाहा) मनुवाद पर जबर्दस्त प्रहार करते लिखते हैं-
"मनु के मान बढ़ाव मति
जाति पाति के भेद-भाव ही सबका के छितरवले बा
सोना अइसन नगरी में सदियन से आगि लगलवे बा
कर्मकांड का रसरी से कसि कसि के बोझा बान्हल बा
स्वर्ग नर्क के छान लगा के भारतवासी छानल बा
कब ले रहब छानल तू अब आगे छान लगवा मति
मनु के मान बढ़ाव मति।"
बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव 'ढीबरीलाल' (गोविंदगंज,चंपारण) की कविताओं में दलित जाति के परिवारों की वेदना को बहुत उत्तेजक और प्रभावकारी रूप में चित्रित किया गया है ताकि इनके संघर्ष को ताकत मिल सके-
1-"फुटहा खाते दिन गइल बीत/गर्मी,बरखा आ घाम,सीत/बिस्टी फटही तन पर इनका/बा बड़ा बोझ मन पर इनका /मऊगी के लुगरी तार-तार/पेवन लागल बाटे हजार/
लइका लँगटे तन आर-पार! "(चमरटोली)
2-"गाँव का बाहर बगइचा के पास में/डोमन के घर बा खोभार बाटे बाँस में/जिनगी भर जनलस ना कुआँ के पानी /तेहू पर कहेला हिन्दूए नू बानीं।"(डोमटोली)
दलित कवयित्री डॉ. प्रिया सोनकर (बी.एच.यू) की भोजपुरी कविता में दलित कविता का आक्रोश और उबाल चरम पर है-
"तू जवना के सभ्यता आ संस्कृति कहे लऽ/ऊ हऽ शोषण के कारखाना/तू कहेलऽ एकरा के बचावे के बा/हम कहिला हमरा ओकरा के खतम करे के बा××××हमरा हाथ में चूड़ी के जगह अब हँसुआ बा/जेकरा से हम क्रांति करब।"
बिहार के पश्चिम चंपारण,नेपाल और झारखंड आदि राज्यों के कुछ जिलों में रहनेवाले भोजपुरी भाषियों ने आदिवासी जन-समुदाय की समस्याओं को अपनी कविता में चित्रित किया है।रामनाथ पाठक प्रणयी,हरेराम त्रिपाठी चेतन,गंगा प्रसाद अरुण, बलभद्र, सिपाही सिंह 'श्रीमंत ', कनक किशोर आदि अनेक कवियों ने आदिवासी समाज की प्रकृति के साथ निकटता,सामुदायिक सहयोग की भावना,अपने पर्व-त्यौहार, नृत्य, गीत-संगीत,चित्रकला आदि से गहरे जुड़ाव ,श्रममूलक जीवन-शैली आदि को प्रमुखता से चित्रित किया है।अपनी प्रकृतिप्रियता और सरल-सहज जीवन-शैली के लिए अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भी अग्रणी भूमिका निभाने वाले आदिवासियों के साथ हो रहे छल,शोषण और प्रपंच आदि को भी भोजपुरी कविता ने अपना विषय बनाया है।संदर्भत: आदिवासी जीवन को निकट से देखते हुए अपनी कविता में उसे अभिव्यक्त करने वाले भोजपुरी कवि कनक किशोर जी की कविता की पंक्तियाँ उदाहरण -स्वरूप प्रस्तुत हैं-
"का ई सांच ह?/जल /जंगल /जमीन लूटाता /ताल - तलैया -पोखर सुखाता /आजु विकास के /आन्हर दौड़ में /दरक रहल बा /खड़ा हिमालय /सबके पीछे सरकार बा /रूप बदलि के।"
संतोष पटेल अपने कविता-संग्रह 'अनबोलता' में आदिवासियों में देवतुल्य सम्पूजित बिरसा भगवान पर एक सुन्दर कविता भोजपुरी में लिखी है-
"उलगुलान के नायक /आजादी के गायक/बहुजन के उन्नायक/मुंडा वीरान के सेनानायक/रहलें बिरसा मुंडा!"
समकालीन दौर में अनेक गैरदलित और दलित कवि भोजपुरी दलित कविता को समृद्ध कर रहे हैं। इसी तरह भोजपुरी कविता को अनेक अल्पसंख्यक समुदाय के कवियों यथा -मास्टर अजीज, रसूल मियाँ, तैयब हुसैन पीड़ित, जौहर शाफियाबादी, गुलरेज शहजाद, ऐनुल बरौलवी, नुरैन अंसारी प्रभृति दर्जनों मुसलमान कवियों ने देशप्रेम से परिपूर्ण और सामाजिक सरोकार से जुड़ी विविध विषयों से जुड़ी कविताएँ रचते हुए समकालीन भोजपुरी कविता को समृद्ध किया है।दरअसल, भोजपुरी ग्रामीण संस्कृति में सामाजिक सद्भाव और धार्मिक औदार्य की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कवियों के प्रतिरोधी स्वरों में भी प्रतिशोध और प्रतिकार नहीं बल्कि सदाशयता का भाव प्रखर है।
[छ:]
समकालीन दौर में हिन्दी की भाँति भोजपुरी में भी नवगीत, गजलें और अन्य विभिन्न छंदों में भी कविताएँ आज खूब लिखी जा रही हैं। इस दौर में विभिन्न पीढ़ियों के कवि एक साथ सक्रिय हैं। गजलों की दुनियाँ में सौरभ पांडेय, आसिफ रोहतासवी, जौहर शाफियावादी, मनोज भावुक, सुनील कुमार तंग, मिथिलेश गहमरी, नुरैन अंसारी आदि दर्जन भर नाम विशेष रूप से चर्चित हैं जबकि गंगा प्रसाद 'अरुण', आनंद संधिदूत, कुमार विरल,रिपुंजय निशांत, कमलेश राय, भालचंद्र त्रिपाठी , अक्षय पांडेय, शशि प्रेमदेव, सुशांत शर्मा प्रभृति अनेक सुविधाओं ने भोजपुरी नवगीत विधा को समग्र रूप से विकसित किया। 'नेवान' (सुनील कुमार पाठक) से शुरु हुई भोजपुरी हाइकु कविता की परम्परा में भी आज दर्जन भर से अधिक स्वतंत्र हाइकु- संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
कुल मिला-जुला कर देखा जाए तो भोजपुरी की समकालीन कविता का विकास एक स्वस्थ दृष्टि और दिशा-बोध के साथ हो रहा है। भोजपुरी समकालीन कविता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषताओं के तौर पर कुछ बातें रेखांकित की जा सकती हैं।पहली यह कि इनमें किसी प्रकार का कोई बड़बोलापन (ओवर-टोनिंग) नहीं है।यहाँ प्रयोगधर्मिता के नाम पर अर्थहीनता का विस्तार और अमूर्तन के नाम पर अबूझ पहेली जैसी बात नहीं है। हिन्दी की तरह भोजपुरी समकालीन कविता एकतरहीपन का शिकार न होकर पर्याप्त विषय-वैविध्य से परिपूर्ण है।भोजपुरी समकालीन कविता में अपने पाठकों से सीधा संवाद बना लेने की भरपूर क्षमता है ।कारण कि आज भी भोजपुरी में मंच की कविता और किताबों तथा पत्र-पत्रिकाओं की कविता में कोई खास दूरी नहीं है। आज भोजपुरी कविता की एक विशेषता यह भी है कि 'समकालीनता' का बोध भोजपुरी की छंदमुक्त और छांदस-दोंनो तरह की कविताओं में देखने को मिलता है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि आनंद संधिदूत,गोरख मस्ताना,सुशांत शर्मा, गुलरेज शहजाद आदि कवियों ने आज के दौर में भी समकालीन वैचारिक प्रखरता से भरपूर 'अग्निसंभव' (आनंद संधिदूत), 'एकलव्य' (गोरख प्रसाद 'मस्ताना'), 'जटायु' (सुशांत शर्मा) जैसी प्रबंधात्मक काव्य-कृतियों का भी प्रणयन किया है।
[सात]
समकालीन भोजपुरी कविता सिर्फ अंचल विशेष और गाँव की कविता नहीं है । आज नागर-बोध से भी यह सम्बलित है। प्राकृतिक सुषमा के साथ-साथ भौतिक और औद्योगिक विकास की खूबियाँ और खामियाँ -दोंनो यहाँ मुखरित हैं।सामाजिक-राजनीतिक जन-पक्षधरता और प्रतिबद्घता तथा जन-विरोधी सत्ता के तिलिस्म और वंचक चरित्र के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति को सशक्त करने का काम भी समकालीन भोजपुरी कविता ने बखूबी किया है। आज हिन्दी कविता लोक जीवन और लोक संस्कृति के जिस रास्ते पाठकों में अपनी वापसी करती दिख रही है, दरअसल वह लोक जीवन, उसके सुवास, संस्कार आदि तो भोजपुरी कविता के अपने 'खोंइछा' के मंगलाचार और अनुपम संचय रहे हैं। कथ्य और शिल्प के स्तर पर भी भोजपुरी समकालीन कविता का विस्तार और वैविध्य बेहद रोचक और रमणीय रहा है। सोच और संवेदना की दृष्टि से भी यह उत्कर्षपूर्ण है।विचार, चिंतन, भावोत्कर्ष, सौन्दर्य-बोध आदि सभी दृष्टियों से यह सशक्त और निपुण है।साथ ही, आज के प्रचलित तमाम विमर्शों , यथा-नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी चिंतन, कृषक चिंतन, वृद्ध विमर्श आदि को भी अपने काव्य-संसार में बसाये हुए यह कविता काव्य-विवेक और अभिव्यक्ति के स्तर पर भी बहुवर्णी और बहुआयामी है। रुचिर सहज संवेद्य बिम्बों , प्रतीकों और मिथकीय प्रयोगों से परिपूर्ण भोजपुरी समकालीन कविता अपनी रुचि और रचाव, कहन और रहन - दोनों रूपों में इतनी मजबूत ठाठ-बाट वाली कविता है कि किसी भी भारतीय भाषा की समृद्ध कविताओं के साथ अग्रपांक्तेय हो सकती है।भोजपुरी कवि सिपाही सिंह 'श्रीमंत' की एक कविता की ये पंक्तियाँ तो जैसे आज की भोजपुरी कविता का आत्मकथ्य ही लगती हैं-
"गुमसुम-गुमसुम तनिको ना भावे हमें
आँधी हईं आँधी अंधाधुंध हम मचाइले
नाश लेके आइले कि नया निरमान होखे
नया भीत उठेला पुरान भीत ढाहीले।"
पत्राचारीय पता -
फ्लैट नंबर-303, परमानन्द पैलेस
सर गणेश दत्त काॅलेज के समीप,
रघुनाथ पथ, आर पी एस मोड़
दानापुर, पटना-801503 (बिहार)
मोबाइल -7261890519
ईमेल - skpathakbis@gmail.com
[नवीन जी! ई आलेख कनक जी के संपादन में निकले वाली एगो हिन्दी किताब खातिर हिन्दी में लिखे के पड़ल रहे। एह के जल्दिये भोजपुरियो में करिके कहीं छपवा दीले।]








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