शिवांगी गोयल की कविताएँ


शिवांगी गोयल


लेखक परिचय :

शिवांगी गोयल का जन्म बिहार के सिवान जिले में 13 जुलाई, 1997 को हुआ था। वर्तमान में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में शोध-कार्यरत हैं। शिवांगी गोरखपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्वर्ण-पदक धारक भी रह चुकी हैं। वह कविताएँ लिखने में विशेष रुचि रखती हैं; साथ ही कुछ रचनाएँ विभिन्न पत्रिकाओं, अखबारों में एवं ऑनलाइन साहित्यिक वेबसाईट्स पर भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शिवांगी ने हिन्दीनामा (फ़ेसबुक पेज) के लिए बतौर संपादक (2017-2019 तक) काम किया है। चुनिंदा कविताओं का मराठी अनुवाद प्रकाशित है।


एप्स्टीन फ़ाइल्स हमारी दुनिया का क्रूर सच है। सभ्य और सम्भ्रांत दिखने वाले लोग कितने असभ्य और घिनौने हो सकते हैं, यह उजागर हो गया है। खेलने खाने की उम्र वाली बच्चियां, जो दुनिया की चालाकियों से अंजान होती हैं, इन हिंसक भेड़ियों की आसान शिकार बन जाती हैं। समाज सेवी, राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, धार्मिक नेता के छद्म वेश में दिखने वाले इन पुरुषों का वास्तविक हिंसक वेश सामने आ गया है। वासना से भरे हुए इन भेड़ियों के लिए मासूमियत का कोई अर्थ नहीं। अब यह कहावत सही लग रही है हमाम में सभी नंगे हैं। किसे कहा जाए कि वह बेदाग है। हम अब तक जिसे श्रद्धेय समझते आए थे, वह भी अपनी वास्तविकता में एक हिंस्र जानवर ही दिखा। इन बच्चियों को सम्बोधित करते हुए हम कह सकते हैं कि एक पुरुष होने के नाते हम शर्मसार हैं। हम माफ न किए जाने लायक हैं। शिवांगी गोयल ने अपनी कविताओं में अपने समय की लैंगिक हिंसा को बेबाकी से दर्ज किया है। वह हिंसा जिस पर आम तौर पर पर्दा डाल दिया जाता है। ये कविताएँ हमारे समय की उस पुरुष हिंसा और क्रूरता दस्तावेज हैं, जिसके बारे में बात करने से प्रायः बचा जाता है। शिवांगी ने अपनी कविताओं में स्त्री जीवन के दुःख, स्त्री जीवन की हिंसा, अपने आस पास के बनावटी परिवेश, छद्म जीवन और अमानवीय परिस्थितियों को करीने से दर्ज किया है। इन कविताओं को गौर से पढ़ा जाना चाहिए। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवांगी गोयल की कविताएँ।


शिवांगी गोयल की कविताएँ


नर-पिशाच आते हैं माँ 


माँ, ये उनके प्रेत हैं 

जिनके नाम साहित्य में नहीं लिए जाते

एप्स्टीन फ़ाइल्स में मिलते हैं सालों बाद 

बच्चियों की मासूमियत मर जाने के बाद 


माँ, सपने में भूत आते हैं 

प्रेत आत्मायें आती हैं 

उन सब की जिन्होंने किसी को छुआ है 

बगैर इजाज़त बिना मर्ज़ी के 

माँ! सपने में नरपिशाच आते हैं 

मेरी खुशियों का खून पीने 

मुझे बार-बार खींच कर बिस्तर पर पटकते हैं 

तुम्हें आवाज़ देती हूँ तो मुँह तकिये से दबा देते हैं 

अपनी घिनौनी उँगलियाँ मेरे मुँह में भर देते हैं

घुट कर मर जाती हूँ तो नंगा कर देते हैं 

मुर्दा शरीर नोचते हैं, खून निकाल देते हैं 

मेरे सपने में आ जाओ माँ, मुझे बचा लो प्रेतों से 

ये हाथ में श्रेष्ठता बोध का मानव-लिंग लिए 

खड़े मुझसे पूछते हैं 

‘हाथ में पत्थर क्यों?’ _ दुबारा पूछते हैं 

तिबारा पूछेंगे! मैं जवाब देते थक गयी हूँ माँ 

मेरे हाथ से आत्म रक्षा का पत्थर तक छिन गया है 

वो आ रहे हैं माँ _ उस पत्थर से मेरे शरीर का 

हर मुलायम हिस्सा खुरच देंगे, 

मुझे खुरदुरा बना देंगे, जो मुझे प्यार से छूने आएगा 

उसको भी चुभ जाऊँगी मैं 

मैं मुलायम रहना चाहती हूँ माँ 

प्यार से छूई जाना चाहती हूँ; अब 

मानसिक बलात्कार करने को आतुर

डरावने प्रेत आते हैं 

मुझे बचा लो माँ! 



जीवन साथी से 


तुम्हारे चमड़े की एक गंध है

किसी इत्र की खुश्बू के आवरण के बग़ैर 

एक घरेलू गंध

उम्रदराज, पहचानी हुई, परिचित 

जैसे तुमने कोई पर्दा उतारा हो और मेरे लिए और सहल हुए हो

और करीब, और समकालीन, और मयस्सर 

तुम्हारे चमड़े की गंध बाबा की पीठ से आती थी बचपन में

तुम मेरे पास, पहली बार मेरे अपने लगे

मैंने रक्तिम उत्साह नहीं, स्थिर कंपन जाना उस रोज़

एक लय में साथ थिरकती दो साँसें, दो अस्थिपंजर, दो किसलय

यह पहचान इस बात से आई कि तुम्हारे चमड़े से मेरे घर की महक आती है

तुम मुझसे अलग नहीं हो, अप्राप्य नहीं हो, दुर्लभ नहीं हो, मुश्किल नहीं हो, 

मेरे हो! मेरे! 

किसी मंदिर की मूरत नहीं, घरेलू आदमी 

जिसके साथ परिवार की तरह रहा जा सकता है

जिसे अपनाया जा सकता है



मेरी बच्ची 


तुम कैसे आईं मेरे पास 

म्लान होते मुख के साथ 

किस सामीप्य किस अधिकार से बैठ गईं  

तुम्हारी चँचलता, घुँघराले केश मुझे मेरे बचपन की याद दिला रहे 

तुम हँसीं तो मुझ में मुस्कान खेल गई

मैं एकटक तुम्हें देखती रही 

फिर तुम्हारे बढ़े हुए हाथ में मैंने अपना फ़ोन थमा दिया 

किस कातरता से तुमने दुबारा मेरी ओर अपना हाथ बढ़ा 

फ़ोन का पासवर्ड खोलने की इल्तिजा की 

फ़ोन खोलना यानि अपने जीवन का रहस्य खोलना 

कौन हो तुम मेरी?

तुम मेरा जीवन जान कर मुझसे प्यार कर सकोगी?

मैं तो इस अनाथालय में भी शायद ग्लानि-वश चली आई हूँ 

एक अजन्मे बच्चे की हत्या का बोझ पच्चीस सालों से लिए 

जाने लड़का था या लड़की, पर मेरे ही जैसे सुंदर 

मेरे ही जैसा क्रूर और दम्भी, मेरी आधी जान ले कर गया 


मैं तुम्हें भावना के अभाव से, अकेलेपन से मार दूँगी 

मुझमें हिम्मत नहीं तुम्हारे आगे अपना जीवन खोलने की 

मुझमें हिम्मत नहीं तुम्हें पालने की

मैं जाती हूँ, मेरा फ़ोन वापस दो 

लेकिन ये क्या? तुमने तो अपने छोटे, कोमल हाथों से 

मेरे दुपट्टे का छोर, मेरा मन बाँध लिया 

रुक जाऊँ?




अवसाद के दौरान 


जब तुम पूछते रहे “कुछ कहना है?”

तब दुखी थी, सोचती रही 

किस भाषा में बिना बोले कह पाऊँगी अपना दुख 


कैसे मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है 

मैं भी अपनी नहीं, किसी और की 

तुम भी मेरे नहीं किसी और के 

यह घर भी अपना नहीं किसी और का 

यह देश काल समय कविताएँ कुछ भी अपनी नहीं 


जो दाल-भात अपने हाथों से सान कर तुम्हें नेह से खिलाती रही,

जो सिगरेट तुम्हारे हाथों से पीते किसी पूर्व प्रेमी के बारे में सोचती रही 

जिस आसमान को छत समझ कर उसके नीचे सोती रही 

जिन पीले बल्बों को तारे मान कर देखती रही 

जिस अनाम प्रेम की बातें तुमसे रात भर करती रही 

एक सच जिसके झूठे सपने रात के तमाम होने तक देखे 

सब में तो मिलावट है 


इतना सब जान कर भी पूछते हो मुझे क्या कहना था 

कहने जाती तो इतनी हिचकियाँ बँध जातीं, इतना रोना आता कि तुम डर जाते

मेरे पास कह देने के लिए प्रेम नहीं है, दुख है 

अथाह दुख, जो मेरा भी अनचीन्हा है 

मुझसे मत पूछो कि मुझे क्या कहना है 



कमाऊ पतोहें


बेटों की कमाऊ पतोहें कभी नहीं खटकी ससुर को 

तस्वीरों में उनकी साड़ियाँ रहीं हल्दी के दाग़ों से बेदाग़ 

और उनकी नाकें बाकी बहुओं से थोड़ी ऊपर 

वो तस्वीर में भी गमकती रहीं बेला-विटा की आधुनिक गमक से 

उनके चेहरों पर छलकती रही गर्व की एक मुद्रा 

उनके चेहरे पर सास के ताने से उपजी कोई शिकन नहीं 

कोई घी तेल मसाले से सने आँचल नहीं 

कोई सब्ज़ी जलने से बचाने की पहल नहीं 

उनकी आँखें बदस्तूर खुद को खोजने की होड़ में नहीं शामिल रहीं 

उनका अस्तित्व माटसाब की बहू के वजूद से ज़्यादा का बना रहा 


वो स्त्रीवाद का पर्याय बनीं और उन्होंने देखा हल्दी सने हाथों को हेय दृष्टि से 

उनकी दृष्टि ने घरेलू काम को बना दिया हेय, और हेय 

बाकी बहुओं को हीन, और हीन


जंग जाने कब औरत और औरत के बीच ही छिड़ गई 

ससुर अपनी कमाऊ पतोह को देख मुसकुराते रहे 



दुनिया बदलने से डरे लोग 


हमने अपने दामादों की तारीफ़ की 

बहुओं को कोसा, परम्पराओं में बाँधा 

हमने अपनी माँओं के पैरों तले जन्नत देखी 

अपनी सासों से बैर पाला, झगड़े किये 

हमने बेटों को सौंपे ज़मीन-ओ-घर के कागज़ 

बेटियों को थमाई घर और ससुराल की इज़्ज़त 


हमने दुनिया भर के मर्दों को कुत्ता कहा 

अपने घर के मर्दों को कहा आदर्श पुरुष 

हमने दुनिया भर की लड़कियों को कहा लालची, धोखेबाज़ 

अपने घर की औरतों को सभ्य, संस्कारी 


अपने इर्द-गिर्द हमने बनाई एक नकली विरोधाभासी दुनिया 

जिसमें हम खुद को महान समझ जी रहे हैं 

और एक दिन हम मर जायेंगे, इतिहास में दर्ज हुए बग़ैर 

क्योंकि हमने दुनिया नहीं बदली 

दुनिया के डर से खुद को बदल लिया। 




वो तुम्हारी सुंदर यादों को खा जाएगा 

 

वो तुम्हारी तमाम सुन्दर यादों में घुल जाएगा

उन पर काबू पा लेगा

उनकी सुन्दरता छीन लेगा 

जब तुम वापस उस याद की सुन्दरता में लौटना चाहोगे

तब वो ढिठाई से मुस्करा देगा उस याद में

तुम हँसना चाहोगे और रो पड़ोगे 


तुम जगह को याद करोगे, वो याद आएगा

तुम याद को याद करोगे, वो याद आएगा

तुम उसको भूलना चाहोगे, वो याद आएगा

तुम अदृश्य को देखोगे, वो याद आएगा


एक दिन तुम याद करोगे अपनी पिछली याद 

और तुम्हे बस ये याद आएगा कि तुम्हें 

जगह की याद उसकी याद के बिना नहीं आती


अपनी सुन्दर जगहों पर अकेले जाया करो

उन्हें बचा रखो उसके साथ के अतिक्रमण से

वो तुम्हारी सारी सुन्दर यादों को खा जाएगा

उनके अवशेष में एक दिन तुम पाओगे 

बस वो बचा है, याद नहीं



तुम भी मुझको जाने दो 


तुम मुझे मुहब्बत की एक रस्म समझाओ

जो ये तुमसे कहती हो मुझको बाँध कर रक्खो 

जो तुम्हे बताती हो आसमाँ के सीने में

कोई हुक सा लटका हो पक्षियाँ पकड़ने को

या किसी समन्दर ने कोई नाव बाँधी हो

या बसंत ने अपनी शाखों से फूल बाँधे हों

या शरीर ने अपनी आत्मा को रस्सी से

यूँ जकड़ के रक्खा हो कि वो नहीं निकल पाए 


सबकी अपनी आदत है, सबकी अपनी आज़ादी

सब समय के बंदी हैं, सब समय से घायल हैं

अब हमारे रिश्ते का जो समय मुक़म्मल था 

वो तो बीत जाएगा

चिड़िया लौट आएगी, नाव पार जाएगी

डाल पर ज़रा देखो पतझड़ों का मौसम है

एक फूल सूखा है, एक पत्ता टूटा है

देह पूरी घायल है

खून-खून रिसता है

आत्मा परेशाँ है 


तुम भी मुझको जाने दो!



सबसे बड़ा दुख


सबसे बड़े दुख में

इंसान खाना खाना नहीं छोड़ता

न पानी पीना, न पूरी नींद सोना

उसे शराब का नशा नहीं दरकार होता है

दुख का नशा उतारने के लिए 


सबसे बड़े दुख में

इंसान आत्महत्या नहीं करता है

लोगों से मिलना नहीं छोड़ता है

आँखों से आँसू नहीं बहाता है


सबसे बड़े दुख में

इंसान ज़िन्दा रहता है

और भीतर से मर जाता है!


प्रेम जब आया 

प्रेम जब आया 

पीड़ा के साथ आया 

अंतहीन सवालों के साथ आया 

भीगे रूमालों के साथ आया 

प्रेम के गीत हमेशा दुख के गीत बने रहे 

प्रेम की याद दुख की याद 

प्रेम का बिस्तर दुख की किर्चियों से भरा रहा 

जिस पर से उठ कर जाते वक़्त 

दुख की किर्चियाँ शरीर से चिपकी रहीं 


प्रेम जब आया सिर्फ़ प्रेम की तरह नहीं आया 

राजनीति की तरह आया 

वादे किये, मुकर गया 

डेमोक्रेसी से ज़्यादा आततायी की तरह आया 

तबाही मचाई, मर गया 

मार दिया गया 

उस इतिहास की तरह आया जिससे कभी कुछ नहीं सीखा गया 

बस दोहराया गया, फिर-फिर दोहराया गया 

उस यूटोपिया की तरह आया 

जिसे कभी नहीं पाया गया 


प्रेम जब आया 

रोते बच्चे की पुकार ले कर आया 

अपने फ़रेबी होंठों से मेरा नाम पुकारते आया 

आखिरी प्यार के ज़ख्मों को फिर-फिर कुरेदता आया

नए पथरीले रास्तों पर नंगे पाँव चल कर फिर से 

खून बहाने का प्रलोभन लिए आया 

और लोग फिर-फिर चले प्रेम के आग्रह पर 

प्रेम के पीछे से किसी ने आवाज़ दी – कलाई काट दो 

कलाई काट दी गई   

आवाज़ आई – बैन करो 

सारी रात बैन किया गया 

बाल उलझाए धूल झाड़ते कैस की तरह 

अँधेरा जिया गया 

प्रेम किया गया 



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क


ई मेल  : shivangigoel.197@gmail.coms

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