प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएँ
यह समूचा जीवन तमाम कथा कहानियों और किंवदंतियों से भरा पड़ा है। आप कहीं भी जाइए हर जगह या परिवेश से जुड़ी कोई न कोई कहानी आपको मिल जाएगी। वैसे भी हर सौन्दर्य के पीछे एक इतिहास होता है। हर सौन्दर्य के पीछे अनथक श्रम जुड़ा होता है, जो प्रायः अनदेखा रह जाता है। हर सौन्दर्य के पीछे कुछ ऐसी क्रूरताएं होती हैं जो जड़ व्यक्ति में भी सिहरन पैदा कर दे। चेरापूंजी के नोहकलिकाई झरने के पीछे भी एक सिहरा देने वाली किंवदंती है। किंवदंती उस पुरुष चाहत की जो अपने प्रेम को पाने के लिए मासूम की हत्या से भी गुरेज नहीं करता। वैसे प्रेम तो उदात्त बनाता है। सच्चा प्रेम हमारी सोच को विस्तृत करता है न कि संकीर्ण बनाता है। जिस प्रेम में इस तरह की भावनाएं हैं वह विकृति है नं कि प्रेम। कवि प्रकर्ष मालवीय हाल ही में चेरापूंजी गए थे जहां उनका साक्षात्कार न केवल नोहकलिकाई झरने से हुआ बल्कि झकझोर देने वाली किंवदंती से भी हुआ। प्रकर्ष ने इसे अपनी एक कविता में दर्ज किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएं।
प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएँ
और कूद पड़ी कलिकाई
(चेरापूंजी में नोहकलिकाई झरने से जुड़ी लोककथा से प्रेरित)
पहली नज़र में
यह एक साधारण झरना ही लगता है।
पर कुछ देर
शांत भाव से
इसे देखते रहिए—
और सुनिए इसकी आवाज़।
तब पता चलता है
यहाँ केवल पानी नहीं झर रहा,
बल्कि, झर रहा है दुख
आँसुओं के सोते के साथ
दिखाई देती है
चट्टानों पर सिर पटकती कलिकाई,
और धुंध बन कर
घुल जाती है वादी की फ़िज़ा में.
सुनाई देती है एक चीख—
एक अंतहीन चीख,
जो सदियों से
टकराती रही है
इन चट्टानों से,
भटकती रही है
पूरी वादी में।
यह वही चीख है
जो एक दिन फूटी थी
कलिकाई के कंठ से—
जब उसके पति ने दिया उसे
प्यार का सबसे सुंदर उपहार—
एक अंतहीन धोखा।
कलिकाई—
खासी जनजाति की
एक सुंदर श्रमिक स्त्री,
वर्षावनों की तरह
गहन और शीतल मन वाली
अपनी नन्हीं बेटी की
अकेली दुनिया।
एक दिन
स्वीकार कर बैठी वह
एक पुरुष का प्रेम निवेदन.
एक ऐसा पुरुष
जिसे प्रेम था
कलिकाई के सुंदर शरीर से,
उसके गठीले बदन की
घुमावदार बनावट से—
लेकिन घृणा थी उसे
उस नवजात से,
जिसे अपने पूर्व पति से
जन्म दिया था कलिकाई ने—
लगातार बारिश से
पत्थर पर जम गए
शैवाल की तरह कोमल और ताज़ा
और, लिली के फूल की पंखुड़ी-सी
कोमल बेटी।
जब भी वह बढ़ता
प्रणय के लिए
कलिकाई की ओर,
फूट पड़ता
उस बच्ची का रुदन।
और हर बार
दौड़ पड़ती कलिकाई
अपने कामातुर पति को छोड़
अपनी बेटी की ओर.
देती सांत्वना उसे-
बस कुछ देर की ही तो बात है
फिर तो वो उसके ही साथ है
यह समझे बिना
कि प्रेम के आवरण के पीछे
धीरे-धीरे पनप रही है
घृणा की एक अँधेरी आग।
दिन-रात खटती रही कलिकाई।
टूटते बदन के साथ भी
रचती बसती रही
अपने नए घर में।
अपनी बेटी को देती रही
ममता की छाँव।
और जैसे-जैसे
उसका प्रेम बढ़ता गया
अपनी बेटी के लिए,
वैसे-वैसे
उसके नए पति के भीतर
घृणा और कुंठा
गहराती गई।
एक दिन—
थकान से चूर
घर लौटी कलिकाई
पाया नहीं किसी को भीतर
किंतु पाया भोजन है तैयार
भूख से व्याकुल
अपने पति के इस
प्रेम प्रदर्शन पर मोहित
खाती रही वह
जब तक कि
पूरी तरह तृप्त न हो गई।
फिर आदतन
भोजन के उपरांत
सुपारी काटने
बढ़ी सरौते की ओर—
और देखा,
वहाँ पड़ी है
सुपारी की तरह कुतरी हुई
एक छोटी-सी उँगली।
उसे देर न लगी
पहचानने में—
यह उँगली दरअसल किसकी है
उफ़्फ़! ये उँगली उसकी अपनी बेटी की है।
जैसे किसी नवजात पक्षी को
काटने से पहले
उसके अधखुले पंख एक एक कर
नोचे गए हों
पूरे इत्मीनान और बर्बरता के साथ
कुतरे गए अंग
उस मासूम के
जिसने अभी तक दर्द में
खुल कर रोना भी नहीं सीखा था.
ओह कलिकाई!
तू कैसे न पहचान पाई
मेमने के मांस-सा कोमल
वह मांस
किसका था?
क्या भूख
इतनी प्रचंड हत्यारिन हो सकती है
कि एक माँ
अपनी ही संतान का मांस
पहचान न सके?
और, कामोत्तेजना
इतनी प्रबल
कि एक बाप
अपनी सौतेली औलाद
का गला घोंट दे?
एक मर्मान्तक चीख
फूटी उसके कंठ से।
आत्मग्लानि की आग में
जल उठी कलिकाई।
एक तरफ़ सूर्य
कलिकाई के साथ
सारा दिन मजदूरी करने के बाद
पर्वत की पीठ पर निढाल पड़ा था
पूरा दिन आवारगर्दी कर के बादल भी
घाटी के दरवाज़े पर हौले से दस्तक दे रहे थे
पक्षी अपनी दिन भर की कमाई ले कर
घोंसलों को लौट रहे थे
और, दूसरी तरफ़
कलिकाई अपने उजाड़ दिये गए घोंसले
को पीछे छोड़
बदहवास चीखती हुई दौड़ पड़ी
और दौड़ती रही—
फिर
कूद पड़ी
उस ऊँची चट्टान से
जहाँ से गिर रहा है आज यह झरना।
सूर्य, बादल, पर्वत और पक्षी
सबने देखा—
कूद पड़ी कलिकाई।
लेकिन
किसी ने नहीं देखा
उसे नीचे गिरते हुए
वह आत्मग्लानि की आग में
भाप बन कर मिल गई
घाटी की हवा में।
हाँ—
उन सबने सुनी
उसकी वह मर्मान्तक चीख
ऐसी चीख जिससे
चट्टानों का सीना भी फट गया
और आँसुओं का सोता फूट पड़ा
झरना बन कर।
वह चीख आज भी
टकराती है चट्टानों से,
भटकती है पूरी वादी में।
और हर बार
जब जब गिरता है पानी
इस झरने से
लगता है—
जैसे
एक माँ की
अंतहीन चीख
अब भी
धरती पर गिर रही है।
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| चेरापूंजी का नोहकलिकाई झरना |
नींद और डर के बीच
मैं गहरी नींद में हूँ—
नींद, जो दुनिया की सबसे कारगर दवा है,
सबसे आरामदेह मलहम,
कुछ देर की मृत्यु—
और जीवन की दैनिक ऊर्जा भी।
नींद में मैं सपना देखता हूँ।
सपने—
जो हमारे डर सहेजते हैं,
जो हमारी चिंताओं को अपने भीतर पालते हैं।
हाँ, यह सपना ही तो है।
अंधेरा—गहरा अंधेरा।
इतना अंधेरा
कहीं नहीं होता,
सिवाय सपने के।
उसी अंधेरे में
दिखती है एक रस्सी।
और उस रस्सी पर
किसी नट की तरह
चलता हूँ मैं।
मेरे कंधे पर
डरा-सहमा बैठा मेरा बच्चा।
मेरी गोद में
ढेर सारे बच्चे—
डरे-सहमे बच्चे।
मैं बढ़ाता हूँ
एक-एक कदम
बहुत एहतियात से—
बिल्कुल वैसे ही
जैसे फ़िल्म डॉन में
रस्सी पर चलते हैं प्राण,
अपने बच्चों को बचाने के लिए।
मैं भी
अपने समय से घबराया हुआ
बढ़ाता जाता हूँ
एक-एक कदम।
मैं किससे बच रहा हूँ?
वह कौन है
जो इन बच्चों के भविष्य से खेल रहा है?
वह दाढ़ी वाला कौन है
जो अपने जिगरी दोस्त को
बच्चों की ओर इशारा करते हुए
कहता है—
ये उसकी फ़ैक्ट्री के
सस्ते मज़दूर हैं।
मैं घोषणा कर रहा हूँ-
‘नहीं—
ये बच्चे मज़दूर नहीं हैं।
मैं इन्हें
तुम्हारी फ़ैक्ट्री का
मज़दूर नहीं होने दूँगा, सेठ।’
यह कौन है
जो मेरे किरदार में खड़ा है,
लेकिन जिसका चेहरा
न मेरा है,
न प्राण का।
यह चेहरा
तो बिल्कुल
उमर ख़ालिद के पिता के चेहरे जैसा है।
शायद
हर परेशानहाल पिता का चेहरा
ऐसा ही होता है।
बस एक बार
यह रस्सी पार कर लूँ—
इन बच्चों को बचा लूँ।
सुरक्षित पहुँचा दूँ
इनके घर,
स्कूल,
और खेल के मैदान तक।
ये मेरे देश के बच्चे हैं—
मेरे देश के बच्चे।
लेकिन अचानक—
यह क्या हुआ?
पूरे एहतियात के बावजूद
फिसल कर गिर गया
मेरा अपना बच्चा।
मुश्किलों में घिरा
मेरा बच्चा
पापा-पापा की
कातर आवाज़ देता हुआ।
दर्द से तड़पता हुआ,
फिर भी मुझे आश्वस्त करता है—
“मैं ठीक हूँ, पापा।
मत घबराओ।”
दर्द में मुस्कुराता हुआ
मेरा बच्चा।
मैं उसे आश्वस्त करता हूँ—
मैं आ रहा हूँ, मेरे बच्चे।
बस थोड़ी देर और।
थोड़ी-सी हिम्मत और।
मैं हाथ बढ़ाता हूँ उसकी ओर।
वह हाथ बढ़ाता है मेरी ओर।
हम दोनों
हाथ बढ़ाने का अर्थ
अच्छी तरह समझते हैं।
फिर भी
इस भयानक अंधेरे में
हमारे हाथ
मिल नहीं पाते।
तभी
मैं बदहवास जाग उठता हूँ—
पसीने से तर-बतर।
हम दोनों के बीच सोए
अपने बच्चे को ढूँढता हूँ।
आश्वस्त होना चाहता हूँ—
इसलिए उसे चूमता हूँ।
उफ़्फ़!
यह सपना था।
लेकिन यह कैसा सपना था?
क्या यह वाक़ई सपना था?
और अगर सपना था,
तो कब तक रहेगा?
इस पर
ख़ुश होऊँ
या दुखी?
अब मैं जाग रहा हूँ।
इस गहरे अंधेरे में।
कितनी भयानक बात है
कि इस घुप्प अँधेरे में
सिर्फ़ मैं जाग रहा हूँ।
बाक़ी सभी
गहरी नींद में सो रहे हैं।
जाग रहा है
वह दाढ़ी वाला भी—
अपने दोस्त के साथ।
और जाग रहा है
मेरा यह डर—
कि यह
सिर्फ़ सपना नहीं था।
सम्पर्क
मोबाइल : 9389352502
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एक तरफ सूर्य सारा दिन मजदूरी करने के बाद पर्वत पर निढाल पड़ा था, वाह
जवाब देंहटाएंएक संवेदनशील मन और उससे संवेदित दृष्टि कहां कहां तक जाती है और जुड़ जाती है दूसरे की अनुभूति और अकही पीड़ा से।
जवाब देंहटाएंतुम्हारा डर हम सबका अनुभूत डर है। तुमने उसे सपने के रूप में व्यक्त किया ।
एक संवेदनशील मन और उससे संवेदित दृष्टि कहां कहां तक जाती है और जुड़ जाती है दूसरे की अनुभूति और अकही पीड़ा से।
जवाब देंहटाएंतुम्हारा डर हम सबका अनुभूत डर है। तुमने उसे सपने के रूप में व्यक्त किया ।
मन को झकझोरने वाली कविताएं
जवाब देंहटाएंप्रकर्ष जी की दोनों कविताएं बहुत अच्छी है इनमें से पहले कविता मैंने अपने पास पाठ के लिए सुरक्षित रखी हुई है देखिए कब संभव हो पाता है। नए कवियों में प्रकर्ष अपने कंटेंट और अपने अंदाज में सबसे अलग है उनकी कोशिश बताती है कि आने वाले दिनों में हमें उनकी बहुत सारी अच्छी कविताएं पढ़ने को मिलेगी मेरी शुभकामनाएं
जवाब देंहटाएं