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आशीष चौहान की कविताएं

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  आशीष चौहान फ्रांसीसी क्रान्ति ने 1789 ई में 'स्वतन्त्रता समानता, बंधुत्व' का क्रांतिकारी नारा दिया था। शीघ्र ही इस नारे की व्याप्ति वैश्विक स्तर पर हो गई। कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो अपने लिए स्वतन्त्रता और समानता न चाहता हो? दुनिया के सारे विवाद और दुनिया की सारी समस्याएं इस समानता को प्राप्त करने के क्रम में ही तो हैं। जिस दिन यह असमानता समाप्त हो जाएगी, दुनिया विवादरहित हो जाएगी। लेकिन यह सोच यूटोपिया ही है जिसे कभी साकार नहीं होना है। युवा कवि आशीष चौहान वास्तविकताओं से बखूबी परिचित हैं और लिखते हैं : 'दर्जनों मज़दूरों की मौत ढक जाती है धन्ना सेठ की बरसी पर/ बदल जाती है तीव्रता उनकी—जो डटे हुए हैं कुर्सी पर/ इस गणित की राजनीति में, समता बस एक ख़्वाब है/ कुछ मज़दूरों की मौत, एक सरकारी सूची का भाग है!' आशीष की दृष्टि स्पष्ट है और इनकी कविताओं में वह प्रतिबद्धता है, जो अब बीते जमाने की बात बनती जा रही है।  आशीष विधि के छात्र हैं और उनकी रुचि संस्कृति और पूंजीवाद को समझने में है। उन्हें मुक्तिबोध और गोरख पांडेय की कविताएँ पढ़ना पसंद है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते...

नवमीत नव का आलेख "स्पेस टाइम" और बिग बैंग थियरी

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  एडविन हबल मनुष्य के अन्दर जिज्ञासा की भावना ने उसके मन मस्तिष्क में सवाल पैदा किए। और इन सवालों के जवाब ढूढने में लगे हुए मनुष्य को तमाम ऐसी जानकारियां मिलीं जिसने अनेक नए सिद्धान्तों को जन्म दिया। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्य को ढूंढने में लगे खगोलविदों को  बिग  बैंग थियरी के बारे में पता चला। यह  थियरी कपोल कल्पित नहीं बल्कि पुष्ट तथ्यों पर आधारित है। नवमीत नव सरल भाषा में विज्ञान, तकनीक और स्वास्थ्य विषयों पर लिखते रहते हैं। उन्होंने बड़े सरल तरीके से  बिग  बैंग  थियरी को समझाने का प्रयास इस आलेख के जरिए किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  नवमीत नव का आलेख "स्पेस टाइम" और बिग बैंग थियरी। "स्पेस टाइम" और बिग बैंग थियरी नवमीत नव यह बात है 1929 की। खगोलशास्त्री एडविन हबल अपनी दूरबीन से अंतरिक्ष का अवलोकन कर रहे थे।  हबल  पहले वकील थे, लेकिन बाद में इनकी रूचि सितारों में हो गयी थी। तो यह अक्सर अपनी दूरबीन से सितारों को निहारते रहते और काम की चीजें नोट करते रहते।  वैसे हमें भी अपनी रूचि अनुसार काम की चीजें नोट करके ...

यतीश कुमार के संग्रह पर शिव पाल दुस्तावा द्वारा लिखा गया आलेख संवेदना और समाज का नया रंग : अंतस की खुरचन’

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  अनुभवों में रची बसी कविता किसी भी पाठक के अन्तर्मन को गहरे तौर पर प्रभावित करती है। कवि यतीश कुमार के पास अनुभव के अलग अलग बहुतेरे रंग हैं और इन रंगों से उन्होंने अपनी कविताओं को करीने से रंगा है।  ‘अंतस की खुरचन’  कवि यतीश कुमार का पहला कविता संग्रह है। हाल ही में  ‘अंतस की खुरचन’ का चौथा संस्करण प्रकाशित हुआ है जिस पर   शिव पाल दुस्तावा ने एक लम्बा आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  यतीश कुमार के संग्रह पर शिव पाल दुस्तावा द्वारा की गई समीक्षा 'संवेदना और समाज का नया रंग : अंतस की खुरचन'। संवेदना और समाज का नया रंग :  अंतस की खुरचन’   शिव पाल दुस्तावा  यतीश कुमार का कविता संग्रह ‘अंतस की खुरचन’ समकालीन हिंदी साहित्य में एक अनूठा पड़ाव है। इस संग्रह की कविताएँ न केवल व्यक्तिगत संवेदनाओं को उकेरती हैं, बल्कि सामाजिक यथार्थ, प्रगतिशीलता, यथार्थवाद, प्रकृति, प्रेम, और विसंगति के गहन दर्शन को भी सामने लाती हैं। प्रस्तुत समीक्षा तीन भागों में विभक्त है, जो यतीश की कविताओं के विविध आयामों—मौन और स्वर के ताने-बाने से ले कर सामाजि...

लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता की गज़लें

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  लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता इस बात में कोई संशय नहीं कि हिंदी गज़ल आज अपना एक मुकाम बना चुकी है। दुष्यन्त कुमार ने हिन्दी ग़ज़ल को जिस तरह आम जन जीवन और समस्याओं से जोड़ा वही आगे चल कर उसका मुख्य स्वर ही बन गया। अदम गोंडवी ने अपनी कहन के जरिए इसे और पैना तथा मारक बनाया। आज इस विधा में अनेक गजलकार सक्रिय हैं। लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ने इन सबमें अपनी अलग जगह बनाई है। लक्ष्मण इस समय की वास्तविकताओं से बखूबी परिचित हैं। खासकर विकास की आज की अधुनातन वास्तविकता से। वे लिखते हैं : 'तरक़्की तो वसूलेगी यूँ क़ीमत आदमी से,/ वो हिस्सा भीड़ का होगा मगर तन्हा मिलेगा/ किसी का चाँद बादल का निवाला हो चलेगा,/  किसी के हिस्से का सूरज यहाँ डूबा मिलेगा।' लक्ष्मण की ये गजलें समाज और जीवन के तमाम पहलुओं को सहज ही व्यक्त करती हैं। हाल ही में लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद से उनका नया गजल संग्रह 'ये किससे बोलता हूँ' प्रकाशित हुआ है। लक्ष्मण प्रसाद गुप्त को बधाई देते हुए आज पहली बार पर हम इसी गजल संग्रह से कुछ गजलें प्रस्तुत कर रहे हैं।  लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता की गज़लें  1 पानी पर तस्वीर बनाई पानी की आदम...