राजेन्द्र कुमार की लम्बी कविता 'आईना-द्रोह'
प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार आमतौर पर आईना की छवि यही है कि जो सामने होता है वही वह दिखाता है। लेकिन काव्य सच कुछ और भी है। इस सच को रेखांकित किया है प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार ने। इसी क्रम में वे आईनाद्रोह शीर्षक से महत्त्वपूर्ण कविता लिखते हैं। आईना द्रोह को ले कर कवि उसका जैसे एक त्रिविमीय चित्र खींचता है। यह संयोग नहीं कि यह कविता भी तीन खण्डों में ही है। कवि किसी भी घटना को विज्ञान के नजरिए से देखने परखने का पक्षधर रहा है और राजेन्द्र कुमार ऐसे बिरले कवियों में से हैं जो इसे अपनी कविताओं में बरतते भी रहे हैं। आज राजेन्द्र कुमार जी का जन्मदिन है। हम पहली बार परिवार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके स्वस्थ, रचनाशील एवम सक्रिय दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजेन्द्र कुमार की लम्बी कविता 'आईना द्रोह'। राजेन्द्र कुमार की लम्बी कविता 'आईना द्रोह' हाँ-नहीं सबके अपने-अपने 'हाँ-हाँ' सबके अपने 'नहीं-नहीं' तना-तनी में कभी-कहीं तो साँठ गाँठ में कभी-कहीं "हाँ-हाँ, मुझे पता है वह मुझे मूरख समझता होगा या मासूम...