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राजेन्द्र कुमार की लम्बी कविता 'आईना-द्रोह'

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प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार  आमतौर पर आईना की छवि यही है कि जो सामने होता है वही वह दिखाता है। लेकिन काव्य सच कुछ और भी है। इस सच को रेखांकित किया है प्रोफेसर राजेन्द्र  कुमार ने। इसी क्रम में वे आईनाद्रोह शीर्षक से महत्त्वपूर्ण कविता लिखते हैं। आईना द्रोह को ले कर कवि उसका जैसे एक त्रिविमीय चित्र खींचता है। यह संयोग नहीं कि यह कविता भी तीन खण्डों में ही है। कवि किसी भी घटना को विज्ञान के नजरिए से देखने परखने का पक्षधर रहा है और राजेन्द्र कुमार ऐसे बिरले कवियों में से हैं जो इसे अपनी कविताओं में बरतते भी रहे हैं। आज राजेन्द्र कुमार जी का जन्मदिन है। हम पहली बार परिवार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके स्वस्थ, रचनाशील एवम सक्रिय दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजेन्द्र कुमार की लम्बी कविता 'आईना द्रोह'। राजेन्द्र कुमार की लम्बी कविता 'आईना द्रोह' हाँ-नहीं सबके अपने-अपने 'हाँ-हाँ' सबके अपने 'नहीं-नहीं' तना-तनी में कभी-कहीं तो साँठ गाँठ में कभी-कहीं "हाँ-हाँ, मुझे पता है वह मुझे मूरख समझता होगा या मासूम...

शैलेंद्र चौहान द्वारा लिखी गई समीक्षा 'घिरे हैं हम सवाल से... हमें जवाब चाहिए'

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कुमार कृष्ण शर्मा जम्मू के सुपरिचित कवि हैं। उनकी कविताओं में जम्मू का परिवेश तो है ही, साथ ही वह मनुष्यता भी है जिससे कोई इंसान कवि बनता है। कुमार कृष्ण समाज में व्याप्त विसंगतियों को करीने से उभारते हैं। अपनी कविता आलू में वे लिखते हैं ' आलू खेतों में पैदा नहीं होते/ कुछ के लिए आलू फैक्ट्रियो में बनते हैं/ कुछ के लिए तोंदों में/ मेरे लिए पीठों पर उगते हैं आलू'। हाल ही में कवि का पहला संग्रह 'लहू में लोहा' नाम से प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा लिखी है चर्चित कवि एवम आलोचक शैलेन्द्र चौहान ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  कुमार कृष्ण शर्मा के पहले कविता संग्रह 'लहू में लोहा'  पर शैलेन्द्र चौहान की समीक्षा  'घिरे हैं हम सवाल से... हमें जवाब चाहिए'। 'घिरे हैं हम सवाल से... हमें जवाब चाहिए' शैलेंद्र चौहान हिंदी में कविताएं लगातार लिखी जा रही हैं। अन्य भाषाओं में भी लिखी जा रही होंगी लेकिन कविताओं के पाठक अत्यल्प  हैं। जो कविताएं इधर रची जा रही हैं, कुछेक दशकों से वे आम पाठक को पठनीय नहीं लगती। उसके पाठक पढ़े लिखे साहित्यिक रुचि रखने वाले पाठक ह...

के. विक्रम राव का आलेख 'यान जब चांद पर बसेगा, तब इश्को सुखन का क्या होगा?'

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  नील आर्मस्ट्रांग  मनुष्यता के इतिहास में आज का दिन एक यादगार दिन है। आज के ही दिन 20 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रांग ने पहली बार चांद पर कदम रखा था। हमारे लिए ग्रहों उपग्रहों की दुनिया खुल गई। चांद के बारे में जो तमाम बातें शायर कहा करते थे, वह एकबारगी ध्वस्त हो गईं। मनुष्यता के लिए एक नई खिड़की खुली। इस यादगार दिन को शब्दबद्ध किया है प्रख्यात पत्रकार के. विक्रमराव ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं के. विक्रम राव का आलेख 'यान जब चांद पर बसेगा, तब इश्को सुखन का क्या होगा?' 'यान जब चांद पर बसेगा, तब इश्को सुखन का क्या होगा?' के. विक्रम राव        प्रेमी जन हेतु आज का दिन संताप का है, संत्रास वाला भी। मगर वैज्ञानिकों के लिए कीर्तिमान है, यशस्वी भी। आज ही के दिन (20 जुलाई 1969) अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन के नेतृत्व में नासा का अपोलो-11 मिशन चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरा था। इस ऐतिहासिक उपलब्धि को मान्यता देते हुए, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021 में 20 जुलाई को “अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस” के रूप में घोषित किया था। अब तो चंद्...

प्रज्ञा की कहानी 'काठ के पुतले'

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प्रज्ञा यह बाहर जो दिन रात की चकाचौंध हमें दिखाई पड़ती है, उसमें तमाम लोगों की भयावह त्रासदियां घुली मिली होती हैं। छोटे बड़े शहरों के मॉल्स इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं जहां तमाम युवा छोटी सी पगार पर घंटों काम किया करते हैं। वहां उन्हें सांस लेने का भी चैन नहीं। उनके लिए कोई सुविधाएं नहीं। वाकई रोजमर्रा की आपाधापी इस कदर बढ़ती जा रही है कि लोगों के पास खुद के लिए ही समय नहीं। प्रज्ञा की कहानी 'काठ के पुतले' सिलसिलेवार ढंग से इस उत्पीड़न को बयां करती है। इसके समानांतर इस कहानी में वह प्रेम भी है जो जिन्दा रखने के लिए जरूरी कारक के रूप में दिखाई पड़ता है। प्रज्ञा हमारे समय की महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं। उनके पास अछूते विषयों पर कहानी लिखने का कमाल का हुनर है। इस कहानी को पढ़ते हुए आप खुद उनके इस हुनर से वाकिफ होंगे। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी 'काठ के पुतले'।                                 काठ के पुतले     ...