प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'तूफान मेल'
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| प्रचण्ड प्रवीर |
सामाजिकता के अपने अलग किस्म के आयाम होते हैं। यह सामाजिकता ही एक दूसरे को आपस में जोड़ने का काम करती है। इससे ही रिश्ते नाते उपजते हैं जिससे एक दूसरे से जुड़ाव के साथ साथ संवेदनाओं का नया संसार निर्मित होता है। प्रचण्ड प्रवीर अपनी कहानी 'तूफान मेल' में इसका जिक्र उम्दा तरीके से करते हैं। कोलकाता में जनमे रमेश साढ़ू की मुलाकात एक यात्रा में उत्तराखंड की एक लड़की हिमानी नेगी से होती है। दोनों की निकटता की परिणति अन्ततः शादी के बंधन में होती है। जीवन त्वरित गति से चलता रहा और आखिर एक दिन उन्होंने पाया कि तूफान की गति से जीवन कुछ झोंको के साथ अपने अंदाज़ में आगे बढ़ गया। 'कल की बात' के अन्तर्गत प्रचण्ड प्रवीर की यह 290वीं प्रस्तुति है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'तूफान मेल'।
कल की बात – 290
'तूफान मेल'
प्रचण्ड प्रवीर
कल की बात है। जैसे ही मैँने दफ्तर मेँ कदम रखा, बाहर आते मोहित ने टोका। “कहाँ तूफान मेल की तरह चले जा रहे हैँ? चलिये हमारे साथ कैफेटेरिया।” मैँने उससे कहा कि मैँ बैग रख कर और लैपटॉप चालू कर के दस मिनट मेँ आता हूँ। नयी नौकरी मेँ सँभल कर चलना होता है। दुश्मन मेँ दोस्त और दोस्त मेँ दुश्मन की भ्रान्ति हो जाती है। किसी भी संस्था मेँ पहले कुछ महीने कदम फूँक-फूँक कर रखना होता है। फिर मैँने सोचा कि दस मिनट के कैफेटेरिया ब्रेक के लिये कोई कुछ न कहेगा और नौकरी बची रहेगी।
बहरहाल जब मैँने कैफेटेरिया मेँ कदम रखा, मैँने देखा कि मोहित के साथ पर टेबल पर सीधी और खुले बालोँ वाली सुनहरे रङ्ग वाली सुनहरे रङ्ग के फ्रेम का चश्मा पहने सुन्दरी हँस-हँस कर बातेँ कर रही थी। उसकी पतली-लम्बी उँगलियोँ पर हल्की गुलाबी नेलपॉलिश लगे थे। कानोँ मेँ खूब बड़े और गोल कुण्डल थे जो लम्बे बालोँ मेँ छुपती जा रहे जैसे कि उसके चेहरे पर छुपी हँसी जो हल्के-हल्के फूटती रह-रह कर फैलती जा रही थी। मोहित से ईर्ष्या करूँ या मैँ भी उस सुन्दरी के सान्निध्य का सुख उठाऊँ, यह सोच ही रहा था कि मोहित ने मुझे बुला लिया। मेरे बैठते ही उसने मेरा परिचय कराया, ”ये कविराज हैँ। कविता करने के कारण नौकरी से निकाले जाते रहे हैँ। अब इन्होँने तुम्हारी कसम खायी है समृद्धि कि ये तुम पर क्या, किसी भी नवयुवती पर कोई कविता नहीँ लिखेँगे।” सुन कर समृद्धि हँसते हुए बोली, “कॉरपोरेट मेँ कविता लिखने पर केस कर दिया जाता है। आप सँभल कर रहियेगा।” मैँने समृद्धि को अपना परिचय दिया। समृद्धि ने बताया कि वह श्रीनगर की रहने वाली है। साथ ही उसने जोड़ा, “बहुत से लोग को श्रीनगर के नाम से काश्मीर के श्रीनगर का भ्रम हो जाता है, लेकिन मैँ उत्तराखण्ड की हूँ।” समृद्धि और मोहित ने बातोँ-बातोँ मेँ बताया कि उनके छोटे-से ग्रुप मेँ बहुत जबरदस्त दोस्ती है। दोस्तोँ के लिये दूसरा हमेशा हाजिर हो जाता है। समृद्धि ने मुझसे मेरा फोन नम्बर पूछा और तुरन्त कॉल किया। मैँने फोन पर देखा, “समृद्धि बिष्ट कॉलिंग।” मैँने उसका नम्बर सहेज लिया। तभी समृद्धि को उसकी टीम से बुलावा आ गया और उसे जाना पड़ा।
ठीक उसी समय एक साँवले और ठिगने सज्जन ने कैफेटेरिया मेँ प्रवेश किया। उनकी तोन्द कुछ इस कदर बढ़ी थी कि वह शर्ट के बटनोँ के बन्धनोँ को तोड़ कर आजाद होने की कशमकश मेँ थी। लेकिन चेहरे पर अजब-सी मासूमियत और शान्ति लिये वे हमारी तरफ बढ़ते हुए आने लगे। मोहित ने मुझसे कहा, “आ गये साढू भाई।” मैँने हैरत से पूछा, “साढू भाई?” मोहित ने समझाया, “कुछ लोग सबके भाई होते हैँ। कुछ सबके जीजा बनते फिरते हैँ। लेकिन हमारे रमेश भाई ने सामाजिकता की नयी और पारिवारिक शब्दावली बनायी है। वे सबके साढू भाई हैँ।” तब तक रमेश जी हमारी बगल की कुर्सी पर आ कर बैठ गये। मोहित ने परिचय कराते हुए कहा, “आपसे मिलिये। आप हैँ कविराज। और आप हैँ रमेश जी।” रमेश जी ने शिकायत करते हुए कहा, “सिस्टम खराब होता जा रहा है। जहाँ देखो वहाँ ऐप। यहाँ कैफेटेरिया मेँ बिना ऐप के खाना ऑर्डर नहीँ कर सकते। आपकी बड़ी साली खाना बनाने मेँ अक्सर देर कर देती है। हमेँ कहना पड़ता है कि दफ्तर मेँ खा लेँगे। यहाँ इतना ऐप-तैप का ताम-झाम है कि सारे साढू भाइयोँ को भूखा रहना पड़ता है।” मोहित ने कहा, “मैँ तो नहीँ लेकिन कविराज ज़रूर आपके साढू भाई लगेँगे। ये भी ऐप-वैप के चक्कर मेँ यहाँ कुछ नहीँ खरीदते।” रमेश जी ने मुझे घूर कर देखा तो मैँने बात बदलते हुए पूछा, “आपका ससुराल कहाँ पड़ा?” रमेश जी बोले, “उत्तराखण्ड।” मैँने कहा, “वाह, वाह। देवभूमि उत्तराखण्ड। मैँने तो बचपन से यही तय किया था कि ससुराल तो उत्तराखण्ड मेँ ही होनी चाहिये।” रमेश जी ने निर्विकार हो कर अपना मोटा हाथ आगे बढ़ा कर मिलाया, “सही फरमाते हैँ साढू भाई। देवभूमि मेँ बसना सम्भव नहीँ है। अपना यहीँ दिल्ली मेँ दो आशियाने हैँ। कल हमसे ब्रोकर ने कहा कि नाइजीरिया एम्बेसी के लोग आपकी कोठी देखने आएँगे। हमने सोचा खाली पड़ी कोठी मेँ साली और साढू ना रहेँ तो कोई बात नहीँ, विदेशी ही सही। एम्बेसी वाला प्रॉपर्टी हड़पेगा नहीँ। हम चले गये समय पर। रंग-रोगन करने वालोँ को बुला कर बात कर रहे थे कि रंगाई-पुताई का कितना खर्च आयेगा। तभी हमने देखा कि कोई देसी आदमी बाहर से आया। नौकर से पूछ कर घर देखने लगा। मुआयना करने के बाद मेरे पास आया कि कोठी किराये पर लेनी है। हमने कहा कि भाई, हमेँ खबर थी कि नाइजीरिया एम्बेसी से कोई आएगा। तुम तो देसी निकले। वो बोलता है कि ‘अम देशी नाइ, आमि बाङ्गलादेशी।' कविराज, यह सुन के तो मैँ दो फीट वहीँ पर उछला। हमने ब्रोकर को फोन लगाया, वो बोला कि हमेँ भ्रान्ति हो गयी। बाङ्गलादेशी एम्बेसी बोलना था। हमने बाङ्गलादेशी को बोला कि कोठी का किराया पाँच लाख महीना पड़ेगा। अब वो दो फीट वहीँ पर उछला। बोला कि हमने सुना था डेढ़ लाख टका महीना। अब हम बोले कि तुमको सुनने मेँ भ्रान्ति हो गया। सुनते ही वो तूफान मेल की तरह निकल गया।”
मोहित ने हँसते हुए कहा, “साढू भाई, अब तूफान मेल बन्द हो गयी है।” रमेश जी कुछ गुर्राये। “क्या बात करते हो। मैँ पिछले महीने मैँ देहरादून से तूफान मेल से दिल्ली आया हूँ।” मोहित ने मोर्चा सँभाला, “आपको भ्रान्ति हो गयी है। दरअसल...” रमेश जी अब कुछ ऐसे गरम हुए कि लगा अब उनके चुस्त शर्ट के सारे बटन टूट कर बाहर गिर जाएँगे। वे कहने लगे, “तुम को मालूम ही क्या है। हर गाड़ी है तूफान मेल।” लेकिन मोहित को फोन पर कुछ ऐसा बुलावा आया कि उसे भी फौरन उठ कर जाना पड़ा। उन्होँने बात को दिल पर ऐसा लिया कि मैँने बात सँभाली, “अच्छा रमेश भाई, ये बताइए। आपका ससुराल उत्तराखण्ड मेँ कहाँ है?” रमेश भाई ने शान्त होते हुए कहा, “श्रीनगर। लेकिन नाम से आपको काश्मीर वाले श्रीनगर की भ्रान्ति हो जाएगी। दरअसल...।” मैँने टोकते हुए कहा, “अरे मुझे समझाने की जरूरत नहीँ है। आपकी एक साली उत्तराखण्ड से ही है, वो भी श्रीनगर से है। शहर के नाते साली लगेगी ही।” रमेश भाई सुन कर कुछ बेचैन हुए, “श्रीनगर से हैँ? हैँ?” मैँने कहा, “घबराइए नहीँ, मैँ बुला देता हूँ। यहीँ काम करती है।” मैँने समृद्धि को फौरन फोन लगा कर कहा, “समृद्धि, यहाँ तुम्हारे जीजा जी बैठे हैँ। अरे.. मतलब ये है कि उनकी पत्नी भी श्रीनगर से है। मैँने उन्हेँ बताया तो वे मिलने को इच्छुक हैँ।.... कैफेटेरिया मेँ ही बैठे हैँ। .. आ रही हो?”
रमेश भाई ने कहा, “परदेस मेँ कोई अपने देस का मिल जाए तो क्या कहने।” मैँने कहा, “साढू भाई। अपनापन तो बड़ी साली जी को लगेगा।”
तभी कैफेटेरिया मेँ तूफान मेल की तरह समृद्धि बिष्ट का प्रवेश हुआ। जब वह पास आयी, तब मैँने रमेश जी से परिचय कराया, “ये हैँ रमेश जी। इनकी पत्नी श्रीनगर से हैँ।” रमेश जी ने दोनोँ हाथ जोड़ कर कहा, “आप तो बहुत छोटी हैँ। मेरी पत्नी ने वहाँ ‘गढ़वाल विश्वविद्यालय’ से सन् २००० मेँ बीए किया था।” समृद्धि बिष्ट ने हँसते हुए कहा, “तब तो मैँ पैदा भी नहीँ हुयी थी।” रमेश जी कहीँ खो गये और बड़ी-बड़ी आँखे निकाल कर छत पर घूरते हुए बोले, “मेरा जन्म कलकत्ता मेँ हुआ। लेकिन किस्मत मेँ उत्तराखण्ड का दामाद होना लिखा था, सो वही हुआ। जरा बैठ जाओ। बात ऐसी है कि तूफान मेल मेँ बैठ कर जब मैँ दिल्ली आ रहा था तब ही आपकी दीदी से मेरी मुलाकात हुयी। वो भी हावड़ा से दिल्ली जा रही थी। उसके पहिये जोर से चलते, और अपना रस्ता तय करते। सयाने इससे काम निकाले, बच्चे समझे खेल। दुनिया ये दुनिया, तूफान मेल।[१] तो ऐसा समझिये कि मैँने भी अपना काम निकाल लिया और हिमानी जी को पटा लिया।” समृद्धि बिष्ट ने हँसते हुए पूछा, “हिमानी जी का पूरा नाम?” रमेश जी ने कहा, “हिमानी नेगी और मेरा नाम ‘रमेश साढू’।”
सुन कर मैँ चौँका, “आपका नाम साढू है?” रमेश जी ने डपट कर कहा, “हाँ भाई। वो तो मैँ मजाक मेँ खुद को दुनिया भर कर साढू बोलता फिरता हूँ।” समृद्धि बिष्ट ने उत्सुकता से पूछा, “आप साढू और वो नेगी। आप बंगाल के और वे उत्तराखण्ड की। आप लोग को विवाह मेँ परेशानी नहीँ आयी।” रमेश भाई ने उल्टे आश्चर्य से कहा, “प्रेम के सामने देश और जाति का बन्धन कहीँ टिकता है? आप दोनोँ ने भी तो नहीँ देखा! इन साढू भाई के नाम मेँ ‘बिष्ट’ कहाँ है?” यह सुनकर समृद्धि बिष्ट सकपका गयी। मैँने फौरन बात सँभाली, “समृद्धि जी आपकी साली लगेँगी और आपको उनके लिये अभी उपयुक्त वर ढूँढ के देना है। समझेँ आप।” रमेश जी को अपनी गलती समझ आयी और उन्होँने फौरन माफी माँगते हुए कहा, “माफ कीजियेगा। कविराज जी की त्वचा से उनकी उम्र का पता नहीँ चलता। वे भी पच्चीस से ज्यादा के नहीँ लगते। इन्होँने इतने अधिकार से आपको बुलाया तो मुझे भ्रान्ति हो गयी।” मैँने हँसते हुए कहा, “हिमानी दीदी से आपकी शिकायत करनी पड़ेगी साढू भाई।”
रमेश साढू का चेहरा पीला पड़ गया। कुछ मायूसी से ठण्डी आवाज आयी, “इस दुनिया मेँ उनसे मुलाकात अब सम्भव नहीँ है।” समृद्धि भी यह सुन कर चुप हो गयी। रमेश जी ने बात बदलते हुए कहा, “आपका ससुराल उत्तराखण्ड मेँ ही है न?” मैँने समृद्धि की तरफ चोर निगाहोँ से देखा तब उसने फौरन सीट से उठते हुए कहा, “मुझे बहुत काम है। बाद मेँ मिलूँगी।”
कोई कहीँ का टिकट कटाता [१]
एक आता है एक है जाता
सभी मुसाफ़िर बिछड़ जायेंगे, सभी मुसाफ़िर बिछड़ जायेँगे
पल भर का है मेल, पल भर का है मेल
तूफ़ान मेल ...
दुनिया ये दुनिया, तूफान मेल
ये थी कल की बात!
दिनाङ्क: 18/06/2026
सन्दर्भ:
१. गीतकार – पण्डित मधुर, चित्रपट- जबाव (1942)


बहुत दिनों बाद इतनी रोचक, हास्य और भावनाओं से भरी कहानी पढ़ने को मिली। रमेश साढ़ू का किरदार चेहरे पर मुस्कान ले आता है, वहीं उनकी आखिरी बात दिल को छू जाती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
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धन्यवाद!
साढ़ू भाई, आपने आखिर लिख ही दिया मेरे आशियाने का अफसाना!
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