परांस-14 : नरेश कुमार खजूरिया की कविताएँ
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| कमल जीत चौधरी |
दिन और रात को मिला कर ही एक तारीख पूरी होती है। आम तौर पर दिन का जिक्र तो बढ़ चढ़ कर किया जाता है लेकिन रात का जिक्र दबी जुबान में किया जाता है। रात सियाह होती है। रात में सभी आराम करते हैं। नींद लेते हैं। जीवधारी होने के नाते नींद सबकी जरूरत होती है। पहले कभी रात के अँधेरे में अपराधी सक्रिय होते थे लेकिन अब तो दिन दहाड़े सारे अपराध बेखौफ घटित होते हैं। फिर रात पर ही यह तोहमत क्यों? लेकिन एक कवि जानता है कि रात के मतलब अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग होते हैं। कवि नरेश कुमार खजूरिया अपनी कविता में लिखते हैं 'क्या वही मतलब है/ रात का उस औरत के लिए भी/ जिसका कोई घर नहीं है/ बीमार बच्चे की माँ के लिए/ कैसी होती है/ रात?/ जो होती है/ मर्द की रात/ क्या वही औरत की होती है?/ क्या ट्रक ड्राईवर की भी/ रात होती है?/ अपनी झोपड़ी में/ अलाव सेंकता/ हुआ वह सोच रहा है:/ कैसी होती है/ राजा की रात?' सचमुच एक जैसी लगने वाली रात कितने अलग अलग अर्थ अभिप्रायों से भरी होती है। नरेश इन अभिप्रायों को न केवल पहचानते हैं बल्कि उसे बखूबी अपनी कविता में दर्ज भी करते हैं।
अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को पहले हम हर महीने के तीसरे रविवार को प्रस्तुत करते थे। अपरिहार्य कारणों से दिसम्बर महीने से यह कॉलम चौथे रविवार को प्रस्तुत किया जाने लगा है। इस कॉलम के अन्तर्गत अभी तक हम अमिता मेहता, कुमार कृष्ण शर्मा, विकास डोगरा, अदिति शर्मा, सुधीर महाजन, दीपक, शाश्विता, महाराज कृष्ण संतोषी, मनोज शर्मा, कुंवर शक्ति सिंह, शेख मोहम्मद कल्याण, निदा नवाज़ और अरविन्द शर्मा की कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस क्रम में आज हम चौदहवें कवि नरेश कुमार खजूरिया की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अन्तर्गत कवि की कविताओं पर कमल जीत चौधरी ने एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नरेश कुमार खजूरिया की कविताएँ।
परांस-14
कहीं भी रख देने की चीज़ नहीं है चाक़ू
कमल जीत चौधरी
'मैं मिट्टी की तरह
गीला होना चाहता था
आटे की तरह गुंथना चाहता था
चूल्हे में जलती आग की तरह
जलना चाहता था
फूल की तरह खिलना चाहता था
इस गहरी चाहत के बावजूद
मैं नहीं भीग पाया
उस मिट्टी की तरह
कि मुझ पर धान की फसलें झूम उठतीं।'
(एक दिन)
सभी खेत एक जैसे नहीं होते। परांस भी एक जैसी नहीं लगाई जा सकती। अभी तक तेरह 'परांस' लगा चुका हूँ। इनमें कुछ फसल काटने की; और अधिकतर रोपने और निराई-गुड़ाई करने की परांसें रहीं। कई बार 'परांस' लगाते हुए खेत बीच में ही छोड़ने का मन भी हुआ, मगर फिर मेड़ तक पहुँच कर ही दम लिया। फ़िलहाल यह दम बना हुआ है। 'परांस-14', नरेश कुमार खजूरिया की कविताई पर है। यह गुड़ाई करने की परांस है। मैंने 2010 से 2014 के बीच इस कविताई का बीजवपन देखा। 2026 आते-आते इस कविताई का पौधा खरपतवार के साथ कुछ बड़ा हुआ है। मुझे भान है कि गुड़ाई में खुरपी संभाल कर चलानी है, इस तरह कि पौधे को नुकसान न हो। पौधे के विकास में जो सतत बाधाएँ आ रही हैं, उस अनावश्यक को हटाना ज़रूरी है। नरेश की निम्नलिखित मुश्किल देखें:
'कैसे बोया जाए
पाला जाए
एक पेड़ सच्चाई का
यह मिट्टी
झूठ के बीजों के लिए
बहुत उपजाऊ होती जा रही है
कैसे
बोया जाए एक पेड़
सच्चाई का!'
(एक पेड़)
इस कविता में सरल और सुन्दर के कठिन होते जाने का दुःख प्रकट हुआ है। इस तरह के दुःख; अगर आत्ममंथन का साथ पा जाएँ तो कवि-संवेदना बल पा सकती है। नरेश की अधितकर कविताओं में आत्ममंथन की जगह परावलंबन है। यह कविताई प्रायः गेंद दूसरे के पाले में डाल देती है। नरेश कुमार खजूरिया के रूप में जिस सृजन-अंकुर से 2010 में मेरा साक्षात्कार हुआ, वह सुखद था। बाद में यह अंकुर; सृजन से इतर तो फला-फूला परन्तु कविता-कला और लेखन में अपेक्षाकृत विकास को प्राप्त नहीं हुआ। मगर नरेश में अब भी हर सूरत कवि होने की संभावना है। जम्मू-कश्मीर की हिन्दी कविता में जिन युवा कवियों से अपेक्षा की जानी चाहिए, उनमें नरेश अग्रणी पँक्ति में खड़े किए जा सकते हैं:
'वह
सब्ज़ी काटने के लिए
खोज रहा था
और बड़बड़ा रहा था:
मैंने पता नहीं कहाँ रख दिया
चाक़ू।
मैंने कहा:
बन्धु!
ऐसे ही
कहीं भी
रख देने की चीज़ नहीं है चाक़ू!'
(चाक़ू)
इस कविता में चाक़ू सुन्दर प्रतीक है। मेरी नज़र में यह एक अच्छी कविता हुई है। 'बड़बड़ा रहा था' और 'ऐसे ही कहीं भी रख देने की चीज़ नहीं है चाकू!' में गज़ब की व्यंजना और संकेत है। यह कविता हमें अपने-अपने पाठकीय विवेक व संस्कार अनुसार अलग-अलग जगहों पर ले जाती है। यहाँ प्रतिरोध और दायित्वबोध है। चीज़ों को सही जगह रखने और ज़रा सचेत रहने की प्रेरणा भी मिल रही है। इस कविता से स्वयं कवि को भी दिशा मिल सकती है। इसे इन्हें बार-बार पढ़ना चाहिए। आख़िर कवि को अपने शब्द, भाव, कहन, प्रतिक्रिया, सवाल, निज और दृष्टि, कहीं भी रख देने से बचना है।
आलोच्य कवि से मेरा साहित्यिक नाता बाद में है, पहले वे मेरे शिष्य रहे हैं। 2014 तक वे वैचारिक साथी भी थे। 2015 तक हम खूब संवादरत रहे। उसके बाद नरेश बहुत जल्दी में बहुत जगहों पर चले गए। इसी जल्दी के रथ पर सवार होकर इन्होंने अपना पहला कविता संग्रह और लोक साहित्य आधारित एक संकलन प्रकाशित करवाया। जल्दी का रथ; सारथी विहीन होता है। इन्होंने दोनों किताबें मुझे भेंट दीं। पढ़कर मन में यही ख़याल आया कि काश! यह किताबें फ़िलहाल न आतीं। चार-पाँच महीने पहले इन्होंने 'रात' शीर्षक से छोटी-छोटी लगभग चालीस अप्रकाशित कविताओं की एक फ़ाइल भेजी, और इस कड़ी पर राय रखने के लिए कहा। इनमें से जो अच्छी कविताएँ थीं, और इनके कविता संग्रह में जो अच्छी कविताएँ थीं, उन्हें इस परांस के लिए चुना है। इस चयन को भी एक राय के रूप में पढ़ा जाए:
'पहली रात को
आदमी ने
कैसे जिया होगा
पहली रात
अँधेरी रही होगी या चाँदनी
पहली रात ही
आदमी ने
जला लिया होगा दीया
या पहली रात
उसने सितारों की रोशनी में बिताई होगी!
पहली रात ने
आदमी को
इतना ज़रूर कहा होगा:
अँधेरों को मात देनी है।'
(रात-7)
इस कविता में आदिम अँधेरे से होड़ लेने का विश्वास जगमगा रहा है। यहाँ कविता के ज़रूरी तत्व कल्पना की सुन्दर उड़ान देखी जा सकती है। इनके यहाँ ऐसी कल्पना और काव्यगत प्रश्न अन्यत्र दुर्लभ हैं। यह कविता मानव-यात्रा को एक दार्शनिक स्पर्श भी देती है, और संघर्ष करने की प्रेरणा भी। 'रात' शीर्षक इस कड़ी की कुछ कविताएँ इन्हें व्यष्टि के पिंजरे से मुक्त करती हैं, और आवृत्ति के घर में कैद कर लेती हैं। लेकिन यहाँ कवि की सामाजिक चिंताएं और सरोकार ध्यान खींचते हैं। यहाँ वर्ग, लिंग, पेशे आदि से जुड़ी संवेदना इन्हें इनके पहलेपन से विलग करती है। कवि के पास जो आवृत्तियां हैं, वे सवालों में भी हैं:
'जो तुम्हारे लिए है
रात का मतलब
क्या वही मतलब है
रात का
उस औरत के लिए भी
जिसका कोई घर नहीं है
बीमार बच्चे की माँ के लिए
कैसी होती है
रात?
जो होती है
मर्द की रात
क्या वही औरत की होती है?
क्या ट्रक ड्राईवर की भी
रात होती है?
अपनी झोपड़ी में
अलाव सेंकता हुआ
वह सोच रहा है:
कैसी होती है
राजा की रात?'
(रात-3)
हमारी सोच और दृष्टि को सिर्फ़ हमारे लेखन से ही नहीं बल्कि हमारे सोशल नेटवर्किंग एकाउंट्स से भी जाना जा सकता है। नरेश के भी फेसबुक-इंस्टाग्राम अकॉउंट्स, पेज और यू ट्यूब चैनल से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। इन्हें निजी तौर पर भी जानता हूँ। इस तरह कह सकता हूँ कि 'परांस' के लिए चुनी कविताओं में नरेश स्वयं कम नज़र आते हैं। इनके लेखन के सन्दर्भ में यह श्रेयस्कर है। इन कविताओं में अभिव्यक्त मिट्टी को इन्हें अपने व्यक्तित्व पर लीपना चाहिए। हम सभी के लिए अपनी कविताओं से बाहर कवि-व्यक्तित्व अर्जित करना एक सुख और चुनौती है। नरेश के पहले कविता संग्रह (पिता के खेत) और अन्य को मिला कर लगभग एक सौ साठ कविताएँ पढ़ीं। यहाँ चुनी कविताएँ इनकी प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अच्छी कविताएँ हैं। प्रतिनिधि से मेरा आशय इनके व्यक्तित्व को उकेरने वाली कविताओं से है। इस अर्थ में इनकी प्रतिनिधि कविताएँ अच्छे पाठक को निराश करती हैं। इनमें साहित्यिक मुखरता नहीं, शोर है। आन्दोलन नहीं, नारेबाज़ी है। क्रोध नहीं, चिड़चिड़ापन है। स्निग्धता नहीं, कोरी भावुकता है। लय नहीं, सतही तुकबंदी है। शिक्षा नहीं, उपदेश है। प्रतिरोध नहीं, कटुता और प्रतिक्रियाएँ हैं:
'किसी के हौसलों पर पाँव रखना कोई तुमसे सीखे
मानता हूँ सीखने की एक तमीज़ होती है साहब
सिखाने की भी एक तमीज़ होती है।
भाषा में साफ़ होना एक बेहतर कला है
दिल से साफ़ होना कोई अदाकारी नहीं है जनाब।'
(भाषा में साफ़ होना)
यह ख़राब बात है कि हम अपने ख़राब से नहीं निकलने के बहाने तलाशते रहते हैं। हमारे इस कवि ने ख़राब को बहुत ख़राब तरीक़े से अपनाया है। इनके द्वारा लिखित उदय प्रकाश जी की प्रसिद्ध कविता की पैरोडी को बानगी के रूप में देखें :
'आदमी मरने के बाद नहीं जलता
जीते जी बहुत जलता है आदमी।
कम जला करो
ताकि मरने के बाद भी थोड़ा सा जल सकें।'
(जलन)
आवेश से भरी उपरोक्त पंक्तियां गद्य भी नहीं है। यह साहित्यिक भावों से विहीन हैं। कविताएँ तो क्या इन्हें अच्छा व्यंग्य भी नहीं कहा जा सकता। यह दोनों बंध इनके पहले संग्रह में संकलित हैं। इनके पास निजी प्रतिक्रियाओं, सतही तुकबंदियों, कोरी भावुकता और सपाट गद्य से भरी अनेक पंक्तियाँ हैं। यह मौलिकता, परिपक्वता, सघन शिल्प और भाषा के अभाव में साहित्यिकता को प्राप्त नहीं होतीं। नरेश की स्वाभावगत प्रवृतियों में रोष, ज़िद, कटुता, विद्रोह, मेहनत और पढ़ने-लिखने की पक्की धुन शामिल है। इन सकारात्मक-नकारात्मक अनुभूतियों में नरेश की ईमानदारी आकर्षित करती है। कवि रूप में इन्हें इस ईमानदारी का अतिक्रमण करना होगा। रोष, ज़िद, कटुता और विद्रोह को क्रमश: आक्रोश, प्रतिबद्धता, प्रखरता और प्रतिरोध में बदलना होगा, तो ही इनका श्रम, पठन-पाठन और शिक्षण; सामूहिकता के हक़ में सिद्ध हो सकता है।
'वह कवि ही क्या जिसमें आग न हो' जैसी पँक्ति आम-सी बात है। यह बार-बार कही गई है। मगर इसमें अभिव्यक्त कवि-दायित्व का विशेष महत्व है। कवि सीधे शब्दों में अपनी मंशा रेखांकित करता है। वह इतर भी बहुत मुखरता से लड़ने और मन में एक आग होने की बात करता है। 'चटख-चटख कर जलती लकड़ियों की आवाज़/उठती है मेरे भीतर से' में ध्वनि-बिम्ब, हौसला और आग है। इसके माध्यम से कवि की बेचैनी को मूर्तता मिलती है। एक और सशक्त उदाहरण देखें:
'रात
बार-बार
फड़फड़ा रही है-
एक सांप
घुस आया है
उसके घोंसले में।'
(रात-2)
'यह फूल किसके लिए है' कविता में स्मृति और मानवीय सम्बन्धों का ताप है। यहाँ अधिकार भाव है। 'आओ तुम/वैसे ही पूरे हक से/ जैसे पहले आती थी' में स्मृति और आत्मीयता के जीवंत भाव हैं। एक अन्य प्रेम-कविता, 'बाहर लू चल रही है' में तपती बैसाख और प्रेम-रंग का विरोधाभास है। इसमें ऐसा दृश्य है, जिसमें कविता प्रकृति और मानवीय द्वंद में सम्भव हुई है। ऐसे अनकहे को और खोलने और आकाश देने की आवश्यकता है। 'गाँव के एक बुज़ुर्ग को याद करते हुए' शीर्षक कविता; एक संस्मरण की तरह है। आत्मीय। इसके बहाने श्रम, समाज सेवा और सामूहिकता का मूल्य स्थापित हुआ है। 'रास्ते से पत्थर हटा दो, लोगों को परेशानी न हो!' में उपदेश है, मगर यहाँ बुज़ुर्गी की लौ भी है। इसे देख कर रास्ते प्रशस्त होते हैं।
इन्होंने आर्थिक तंगी और बेरोज़गारी को नज़दीक से देखा है। इस जीवन अनुभव को इनकी कविताओं में भी होना चाहिए था। जबकि यहाँ निम्न मध्यवर्गीय नाराज़गियां अधिक हैं। इन्होंने कोरोना पर लिखी कविताओं में सत्ता पर निशाना साधा है। मगर इनमें कोई मर्मस्पर्शी जुड़ाव, गहरी शिनाख़्त या सत्यापन नहीं दिखता। कविताओं में शब्दों को भावों का सहचर मिलना ज़रूरी होता है।
आलोच्य कवि का सम्बन्ध छोटे-छोटे टीलों और खेतों वाले इलाके की सख़्त भूमि से है। यह सख़्त; किसानों के लिए प्रतिकूल है। यह सख़्त भूमि; मानव की मेहनत, दीर्घता, गुरुता और धैर्य की परीक्षा लेती है। नरेश ने फ़िलहाल परीक्षा-भवन में प्रवेश पाया है। उत्तीर्ण होने के लिए इन्हें अचूक धैर्य की ज़रूरत है। वे विज्ञ तो हैं, मगर पूरी तरह से नहीं:
'पर्दा हटाया तो जाना कविता रहती है
मेरे आस-पास...
जैसे गाँव के आस-पास रहता है
कुआँ।'
(कविता रहती है)
लिखने के लिए पहले पर्दा हटाना ज़रूरी है। फिर देखना, और देख कर; अदेखे को भी देखना। पर्दा; खिड़की पर ही नहीं, हम पर भी पड़ा रहता है। कुआँ या अन्य जलसाधन हर गाँव के आसपास रहते हों, यह सत्य नहीं है। इस दौर में पानी पर इतनी ग़ैर जिम्मेदारी से लिखना ठीक नहीं है। गाँव को लेकर हम आदर्शवादी और रोमांसवादी अधिक हैं। हमारा देश बहुत बड़ा है। इसके कई अनछुए इलाकों के गाँव स्वर्ग हो सकते हैं मगर धूमिल के शब्दों में गाँव, 'भोजपुरी में नरक का अनुवाद' भी हैं।
यह व्यष्टि की कविताएँ हैं। इसमें जो बेचैनी है, वह निज की ज़िद से भरी हुई कवि-दृष्टि है। स्वयं लाल-लाल अक्षरों में दर्ज़ होने के दावे और अन्य द्वारा इतिहास काले अक्षरों में पढ़े जाने में एक दृष्टि-दम्भ नज़र आता है। इसमें रंगभेद भी है। यह बात एक अन्य कविता में 'आदमी को जहाँ से सफ़ेद होना चाहिए/ वहाँ धूप का कोई असर नहीं होता' पंक्तियों पर भी लागू होती है। इसके अतिरिक्त पत्थर से टकरा-टकरा कर इंसान बनने की ज़िद में भी पत्थर को तुच्छ बताने की वृत्ति हावी हो जाती है। ऐसा निज इन्हें काव्यदोष से निकलने नहीं देता, और वर्तनी दोष के लिए खुला छोड़ देता है, जैसे: 'छीन लेती थी भरी महफ़िल में/ मेरे हाथों के फूल' नहीं, बल्कि 'छीन लेती थी भरी महफ़िल में/मेरे हाथों से फूल' होना चाहिए। भाषा सरल ज़रूर है मगर इस पर कार्य करने की आवश्यकता है। एक बात और कि हमारे इस कवि को क्लिष्ट से बचे रह कर; सघन भावों को सम्भव करना है। जैसे:
'समय को थपकी मार
झुका देती है मेरी ओर।
देखो तो कितनी ताकतवर है माँ!'
(माँ)
इसी तरह 'शाम लौट आई' कविता में अभिव्यक्त विरह और प्रतीक्षा को बहुत सरलता से उकेरा गया है:
शाम लौट आई।
आज एक चिड़िया नहीं लौटी
घोंसले में
जाने के साथ लौट आना
कितना सुखद होता है
तुम लौट आओ
मैं इन तिनकों को रोज़ बुहारना चाहता हूँ
अपने दरवाज़े से।
(शाम लौट आई)
जो यह कहते हैं कि मौलिक कुछ नहीं होता, वस्तुतः वे कला हितैषी नहीं हैं। मौलिकता की कसौटी पर आलोच्य कवि का अपना कोई मुहावरा नहीं है। फ़िलहाल इन्हें किसी परम्परा विशेष में भी नहीं रखा जा सकता। इन पर अनेक प्रचलितों का प्रभाव है। आम और लोक प्रचलित कथन, सूक्तियां, रूढ़ियाँ, कथाएँ और मुहावरे आसानी से कविताओं में परिणत नहीं हो पाते। 'नमक होना', 'कविता बची रहेगी', 'फूलों का वज़न हर कोई नहीं संभाल सकता', ' गाँव के उस बुज़ुर्ग को नमन', 'दूध से धुले लोग', 'भाषा में पत्थर फेंकते हो', 'लाल अक्षरों में दर्ज हूँ', 'पत्थर से टकराता हूँ', 'सब कर दो राख', 'तुम अपनी ख़ैर मनाओ', 'ठंडे दिलों, ठंडे हाथों से लड़ाइयां नहीं लड़ी जातीं', 'हल्ला बोल', 'लाल टोपी में/ एक अधनंगा बच्चा हथौड़ी साध रहा है', 'गाँव वक्त से पहले बड़ा हो जाता है', 'राम जाने, मैं नहीं जानता' जैसी अनेक-अनेक पंक्तियां इन्हें कवियों की भीड़ से अलग नहीं होने देतीं। इनकी कविताओं को पढ़ते हुए प्रसिद्ध कविताओं के भाव याद आते हैं। ऐसे भाव इन्हें मौलिकता से वंचित करते हैं। 'मैं ख़तरनाक आदमी हूँ' को पढ़ते हुए आसी साहब का चर्चित शेर, 'मगर बाहोश मिलना, मैं ज़िंदा आदमी हूँ' हाज़िर हो जाता है। इसी तरह 'एक दिन', 'नई ज़मीन', 'मंगलमय हो नया साल', 'बची रहेगी कविता', 'एक बुज़ुर्ग को याद करते हुए', 'भाषा में पत्थर', 'सहमा हुआ आदमी', 'हथौड़ी से खेलता बच्चा', 'साथ-साथ', 'कोंपलें', 'एक चिट्ठी अपने पते पर' जैसी कविताओं में चिर-परिचित भाव हैं।
यह कविताई; अक्सर तुमने, उसने, वे और वह का प्रतिकार करते हुए मैं का शिकार होती है। यहाँ अपने होने में दूसरों को भूल जाने की आदत शुमार है। यह भाव इनकी कई प्रेम कविताओं में भी देखा जा सकता है। इनके आग्रहों और सम्बोधनों के समक्ष कई बार प्रेमपात्र भी पीछे छूट जाते हैं। इन्हें धावक नहीं दर्शक बनने की आवश्यकता है। इससे इनका सौंदर्यबोध परिष्कृत होगा। नरेश कविताओं की ज़मीन जानते हैं, यह भी कि 'जीवन आँख भर नहीं है।' मगर वे चूक रहे हैं। इनका अभी तक का लिखा, और लिखा जा रहा, इनकी यात्रा का ज़रूरी सामान है। याद रहे कि यह सतत लिखना एक सम्मान भी है। यह अभ्यास जारी रहा तो 'परांस' का यह कवि; एक दिन अवश्य महकेगा:
'मेरे हिस्से में वो बरसात
अभी आएगी
वो बसंत अभी आएगा
मैं पूरा-पूरा खिल उठूँगा एक दिन
अभी तो आग की तरह जल रहा हूँ
अभी ले जाया जाएगा मुझे
किसी बुझे हुए चूल्हे में
जहाँ मैं पकती रोटी की तरह
महकूंगा एक दिन!'
(एक दिन)
परांस पूरी हुई। जो अनावश्यक है, उस पर खुरपी चला दी है। सूरज डूबने वाला है। सुबह कविताई के इस पौधे को नई हवा मिले। अभिधा में कहूँ तो नरेश कुमार खजूरिया को सफल सार्थकताएँ चुनें। इन्हें नए रास्ते मिलें, जिन पर इन्हें खूब भटकना पड़े। जब अँधेरा सामने पड़े तो काव्य-लौ इनकी शिखा पर हो। मेरी ओर से खूब शुभकामनाएँ! धन्यवाद!
सम्पर्क:
कमल जीत चौधरी
मेल आई. डी.- jottra13@gmail.com
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| नरेश कुमार खजूरिया |
कवि परिचय:
नरेश कुमार खजूरिया का जन्म 10 जनवरी 1991 को जम्मू-कश्मीर के जिला कठुआ के गाँव कटली में हुआ। इनकी लेखन यात्रा की शुरुआत 2008-09 में हुई। विभिन्न सरकारी-ग़ैर सरकारी साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। 2016 के बाद यह सक्रियता कम हुई, मगर अपने फेसबुक एकाउंट, ब्लॉग, यू ट्यूब चैनल आदि पर सक्रिय रहे, और आज भी हैं। पत्र-पत्रिकाओं में न के बराबर छपे हैं। कमल जीत चौधरी द्वारा संपादित; जम्मू-कश्मीर के चुनिंदा कवियों के चर्चित साझा संकलन; 'मुझे आई डी कार्ड दिलाओ' (2018) में प्रमुख रूप से प्रकाशित हुए। 2021 में 'पिता के खेत' शीर्षक से इनका पहला कविता संग्रह सर्व भाषा ट्रस्ट से शाया हुआ। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'चार कोस पर बदले वाणी' शीर्षक से लोक साहित्य आधारित एक किताब संकलित की है। पिछले नौ सालों से जम्मू-कश्मीर उच्चतर शिक्षा विभाग में अस्थाई शिक्षक के तौर पर हिन्दी पढ़ा रहे हैं।
नरेश कुमार खजूरिया की कविताएँ
हाथ सेंकते जाओ
चटख-चटख कर
जलती लकड़ियों की आवाज़
उठती है मेरे भीतर से।
तुम कविता सुनने की बात कर रहे थे
सुन लो:
वह कवि ही क्या
जिसमें आग न हो
वह कविता ही क्या जिसमें आँच न हो
इस भरी सर्दी में
हाथ सेंकते जाओ
ठंडे दिलों
ठंडे हाथों से
लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जाती।
एक दिन
मैं मिट्टी की तरह
गीला होना चाहता था
आटे की तरह गुंथना चाहता था
चूल्हे में जलती आग की तरह
जलना चाहता था
फूल की तरह खिलना चाहता था
इस गहरी चाहत के बावजूद
मैं नहीं भीग पाया
उस मिट्टी की तरह
कि मुझ पर धान की फसलें झूम उठतीं
मेरे हिस्से में वो बरसात
अभी आएगी
वो बसंत अभी आएगा
मैं पूरा-पूरा खिल उठूँगा एक दिन
अभी तो आग की तरह जल रहा हूँ
अभी ले जाया जाएगा मुझे
किसी बुझे हुए चूल्हे में
जहाँ मैं पकती रोटी की तरह
महकूँगा एक दिन!
चाक़ू
वह
सब्ज़ी काटने के लिए
खोज रहा था
और बड़बड़ा रहा था:
मैंने पता नहीं कहाँ रख दिया
चाक़ू।
मैंने कहा:
बंधू!
ऐसे ही
कहीं भी
रख देने की चीज़ नहीं है चाक़ू!
माँ के लिए
मेरी झोपड़ी में लट्टू नहीं
जलती थी ढिबरी
हवाओं से डरती...
खाना परोसते-परोसते
माँ कितनी ही बार ढिबरी को हाथों से ढक
बुझने से बचाती थी
डगमगाती रोशनी में
माँ मुझे 'क' से कबूतर
'ख' से खरगोश पढ़ाती थी
झोपड़ी आज मकान हो गई है
रंग-बिरंगे बल्ब, ट्यूब लाइट्स हैं
ढिबरी न जाने मकान की नींव या दीवार की
किस ईंट के नीचे दब चुकी है
जिसकी रोशनी में मैंने सीखा
'क' से कबूतर
और लिख रहा हूँ 'क' से कविता
मुझे कविता लिखता देख
माँ खुश है
झुर्रियों भरे चेहरे पर कुलांचे भरती हँसी को देख
मेरा कवि-हृदय मुग्ध है
मैं सौभाग्यशाली हूँ
अभी सलामत हैं
मुझे रोशनी देने की खातिर
हवाओं से संघर्ष करते हाथ!
बाहर लू चल रही है
वे
शहतूत की छाँव में बैठ
शिकवे-शिकायतों में
मशगूल हैं
हाथों में हाथ
डाले
उड़ेल रहे हैं
प्रेम-रंग
एक-दूसरे पर
और उनके चेहरे की रंगत देखने वाली है
समय
बैसाख की तपती दोपहर का है
और बाहर लू चल रही है।
यह फूल किसके लिए है
मैं अक्सर
जिसे तोड़ लेता था
तुम्हारे लिए
आज मैंने
फिर तोड़ लिया है
वह लाल फूल
आओ तुम
वैसे ही पूरे हक से
जैसे पहले आती थी
छीन लेती थी भरी महफिल में
मेरे हाथों का फूल
वैसे ही पूछो
मेरी किताब के हाशिये पर लिख कर-
'यह फूल किसके लिए है...'
फूलों का वज़न
मैंने
उसको फूल दिया।
फूल
जितना ही
गाढ़ा था
उसका चेहरा
उतना ही
पीला पड़ गया
एक रंग था
जो उड़ गया
उसके हाथ
नहीं थाम पाए
वह कोमल फूल।
तब
मैंने जाना
फूलों का वज़न
हर कोई नहीं संभाल सकता!
माँ
समय को थपकी मार
झुका देती है मेरी ओर।
देखो तो कितनी ताकतवर है माँ!
रात
1-
एक उसकी रात है
एक मेरी रात है
दोनों की रात के बीच
एक दिन का
फासला है।
2-
रात
बार-बार
फड़फड़ा रही है-
एक सांप
घुस आया है
उसके घोंसले में।
3-
जो तुम्हारे लिए है
रात का मतलब
क्या वही मतलब है
रात का उस औरत के लिए भी
जिसका कोई घर नहीं है
बीमार बच्चे की माँ के लिए
कैसी होती है
रात?
जो होती है
मर्द की रात
क्या वही औरत की होती है?
क्या ट्रक ड्राईवर की भी
रात होती है?
अपनी झोपड़ी में
अलाव सेंकता
हुआ वह सोच रहा है:
कैसी होती है
राजा की रात?
4-
देशभक्ति की
बातें करने वालो
तुम काटोगे सैनिक की रात!
5-
जीवन में
कोई – कोई रात
नहीं भूलती है कभी भी।
6-
दिन भर काम से
खटते–भिड़ते
लौटे पिता
सोते हुए
कहते हैं -
रात न हो तो आदमी मर जाए।
7-
पहली रात को
आदमी ने
कैसे जिया होगा
पहली रात
अँधेरी रही होगी या चाँदनी
पहली रात ही
आदमी ने
जला लिया होगा दीया
या पहली रात
उसने सितारों की रोशनी में बिताई होगी!
पहली रात ने
आदमी को
इतना ज़रूर कहा होगा:
अँधेरों को मात देनी है।
गाँव के एक बुज़ुर्ग को याद करते हुए
जब मैं बहुत छोटा था
मैंने उन्हें उनकी अस्सी साल की उम्र में
गाँव की खड (बरसाती नाला) से पत्थर उठाते देख
पूछा था कि यह सब पत्थर क्यों उठाते रहते हो बाबा?
उन्होंने कहा था:
रास्ता बनाता हूँ, साफ करता हूँ!
मैंने देखा
हर बार बाढ़ आती रास्ता बहा ले जाती
पर वे काँपते हुए हाथ कभी हार नहीं माने
मैं बकरी चराने जाता, पास से गुज़रता
तो वे मेरे कंधे पर हाथ रख कहते:
पत्थर उठाने चाहिए रास्ते से
बाढ़ का क्या है, आती रहती है।
बाबा कुएँ के पास
अपने लगाए पीपल के नीचे बैठ जाते
सारी गर्मी की दोपहर
वहीं काटते
आते-जाते सबसे कहते
पेड़ लगाने चाहिए
बाबा को गए अब पूरे पंद्रह साल हो गए हैं
जाते-जाते भी बाबा कितना कुछ छोड़ गए
मेरे भीतर उनके कँपकँपाते कर्मठ हाथों का बिम्ब
मुझे आज भी कहता है:
रास्ते से पत्थर हटा दो, लोगों को परेशानी न हो!
कुएँ पर वह पीपल जिसके जवान होने पर
बाबा ने किया था भंडारा
वह अब भी लोगों को देता है ठंडी हवा।
गाँव के उस बुज़ुर्ग को नमन!
शाम लौट आई
शाम लौट आई।
आज एक चिड़िया नहीं लौटी
घोंसले में
जाने के साथ लौट आना
कितना सुखद होता है
तुम लौट आओ
मैं इन तिनकों को रोज़ बुहारना चाहता हूँ
अपने दरवाज़े से।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क:
नरेश कुमार खजूरिया
गाँव व डाकघर – कटली
तहसील - डींगा अम्ब, ज़िला – कठुआ
जम्मू-कश्मीर
दूरभाष- 07889736743





कविताएँ ठीक-ठाक हैं।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचनाएं 🍁
जवाब देंहटाएंसंभावनायों की पनीरी ,,,,,,,
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