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सीमा आज़ाद की कहानी 'अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं'

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  सीमा आज़ाद  लोकतन्त्र राजनीति की सबसे बेहतर शासन प्रणाली इसीलिए है कि इसमें सबको, चाहें वह किसी भी धर्म, जाति, नस्ल या समुदाय का हो, अपनी मर्जी के मुताबिक रहने और जीने  का अधिकार प्राप्त होता है। सबको विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होती है। अल्पसंख्यक समुदाय भी इस प्रणाली के तहत खुद को सुरक्षित महसूस करता है। लेकिन जब यह लोकतन्त्र धीरे धीरे 'बहुसंख्यकतन्त्र' या 'भीड़तन्त्र' में तब्दील होने लगता है तब अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कुछ डरे डरे या आशंकित से रहने लगते हैं। 'मॉब लिंचिंग' जब कानून का जगह लेने लगती है तब यह भय लाजिमी भी हो जाता है। यह लोकतन्त्र के लिए त्रासद होता है। इतिहास गवाह है कि नाजी जर्मनी में यहूदियों के साथ किस निर्ममता के साथ व्यवहार किया गया। आज की परिस्थितियां भी कुछ इसी तरह की होती जा रही हैं। सीमा आज़ाद ने इस हालात को बेहतर तरीके से अपनी कहानी में अभिव्यक्त किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सीमा आज़ाद की कहानी 'अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं'। 'अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं' सीमा आज़ाद कमरे में सन्नाटा था। दो लो...

सीमा आज़ाद की कहानी 'लखन कहां का रहने वाला है'

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सीमा आज़ाद हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है - साम्प्रदायिकता। यह समस्या अचानक ही उठ खड़ी नहीं हुई। इसका अपना एक इतिहास है। एक भयावह अतीत है। अतीत में हम इसका दंश भी विभाजन के रूप में भुगत चुके हैं। वास्तव में साम्प्रदायिकता की भावना  हमारे मन मस्तिष्क में कुछ इस तरह भर दी जाती है कि हम अच्छाई -बुराई में फर्क करने का विवेक खो देते हैं। उन्माद में सब कुछ जाति, धर्म और वर्ग की रक्षा के नाम पर सुनियोजित ढंग से इस तरह किया-कराया जाता है कि आम लोग उसके पीछे की कुत्सित मानसिकता को समझ नहीं पाते। सीमा आज़ाद ने इन्हीं मनोभावनाओं को अपनी इस कहानी के माध्यम से समझने की एक उम्दा कोशिश की है। हो सकता है कि शिल्प के स्तर पर यह सपाटबयानी जैसा लगे लेकिन इसके अभिप्राय स्पष्ट हैं। तो आइए पढ़ते हैं सीमा आज़ाद की यह कहानी 'लखन कहां का रहने वाला है?'          लखन कहां का रहने वाला है? सीमा आज़ाद जैसा कि आप जानते हैं मेरा नाम लखन है, मैं दिल्ली में रहता हूं और सब्जी का ठेला लगाता हूं। मैं अपने बारे में सब कुछ बता सकता हूं, सिवाय इसके कि मैं कहां का रहने वाला हूं क्योंकि ...

सीमा आज़ाद की कहानी 'बंटवारा'

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आजादी के बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना भारतीय इतिहास में एक ऐसे काले अध्याय के रूप में अंकित है जिसने भारत के दो प्रमुख धार्मिक सम्प्रदायों के बीच वह संदेह और अविश्वास पैदा कर दिया, जिसे पाटना मुश्किल था । भारत की गंगा-जमुनी तहजीब में इस हिन्दू-मुस्लिम एका का बड़ा हाथ रहा है । कट्टरवादी दरारें पैदा करने की चाहें कितनी भी जुगत करें लेकिन वे इस तथ्य को झुठला नहीं सकती कि इस्लाम हमारे भारतीय संस्कृति में कुछ इस तरह रच-बस चुका है जिसे अलगाना किसी के बूते की बात नहीं । खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा से लेकर बोली-बानी तक में यह एका स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है । एक तरह से कह सकते हैं कि दोनों सम्प्रदायों के बीच यह सम्बन्ध शरीर और आत्मा जैसा है । एक के बिना दूसरा अस्तित्व विहीन । साहित्य में इसे आधार बना कर अनेकानेक कहानियाँ और कविताएँ लिखीं गयीं । सीमा आजाद की कहानी इस परम्परा में होते हुए भी इसलिए विशिष्ट है कि इसने मानव मन के उन रेशों को उभारने का सफल प्रयास किया है जो धर्म के किसी भी अवरोध को सख्ती से अस्वीकार करती है ।  आज यानी पाँच अगस्त को सीमा का जन्मदिन है । सीमा को जन्मद...