सन्तोष दीक्षित के उपन्यास पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा
राजनीति भी अपनी तरह से अपने समय का मिथक गढ़ती रहती है। हर पार्टी और राजनीतिज्ञ जो सत्ता पर काबिज होता है, अपने राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का दावा करता है। भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक कांग्रेस शासन में रही और अपने हिसाब से वह सत्ता को संचालित और परिभाषित करती रही। 2014 से भारतीय राजनीति में एक नए युग का आरम्भ हुआ जिसे 'न्यू इंडिया' जैसा एक चमकदार नाम दिया गया है। इस न्यू इंडिया में सब कुछ उलट पलट सा गया है। धर्म का उभार इसका एक प्रमुख अंग है। वैसे भी भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की हमेशा एक नेतृत्वकारी भूमिका रही है। आज इस जाति और धर्म का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। सन्तोष दीक्षित ने अपने उपन्यास 'खलल' के जरिये इस न्यू इंडिया की कवायद को करीने से विश्लेषित करने की कोशिश की है। जितेन्द्र कुमार ने इस उपन्यास की एक विस्तृत पड़ताल की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सन्तोष दीक्षित के उपन्यास 'खलल' पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद'।
'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद'
जितेन्द्र कुमार
रामराज की वापसी का सपना दिखाने वाली पार्टी इस सदी के दूसरे दशक में केन्द्र में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल रहती है। देश के कई राज्यों में उस पार्टी की सरकारें पहले से चल रही हैं। केन्द्रीय सत्ता पर कब्जा होने के बाद रामराज समर्थक पार्टी की सरकार न्यू इंडिया गढ़ने का सपना बेंच रही है। न्यू इंडिया एक हिन्दू राष्ट्र होगा, जिसमें मुसलमानों की सत्ता में भागीदारी ऊँट के मुँह में जीरा के बराबर होगी। इस सरकारी एजेंडा से सामुदायिक सद्भाव में ख़लल पड़ा है। चर्चित उपन्यासकार संतोष दीक्षित के उपन्यास ‘ख़लल’ के कथानक की मूल संवेदना इसी विषय पर केन्द्रित है। इस उपन्यास की कथाभूमि पवित्र गंगा के दक्षिणी तट पर बसे पौराणिक महानगर (पटना) का एक उपनगरीय इलाका आज़ादनगर है जो पूरबी छोर पर बसा है, जिसे न्यू इंडिया के स्वप्नजीवी मुर्गियाचक कहना पसंद करते हैं। आज़ादनगर की अधिकांश आबादी निम्नमध्यमवर्गीय है जो आपस में भाईचारे और मज़हबी सह-अस्तित्व को स्वीकारते हुए रहती है।
‘ख़लल’ लगभग तीन सौ साठ पृष्ठों का उपन्यास है जो बिहार के एक बड़े शहर के एक उपनगर आज़ादनगर में बसने वाले निम्न-मध्यमवर्गीय लोगों की जद्दोजहद की कहानी कहता है। इस उपन्यास के अध्यायों को न कोई संख्या दी गई है न कोई शीर्षक दिया गया है, यह लगभग तैंतालीस अध्यायों में प्रस्तुत है।
‘ख़लल’ संतोष दीक्षित का पाँचवा उपन्यास है। वे एक स्थापित और प्रतिष्ठित कहानीकार और व्यंग्यकार भी हैं। उपन्यास का नामकरण ख़लल मानीखे़ज है; यह अरबी मूल का शब्द है जो प्रायः हो रहे कार्य में अशांति पैदा करने के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। उपन्यास के गद्य में अरबी, फारसी और उर्दू के शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया गया है, इससे उनके गद्य की भाषा में कोई जटिलता और उलझाव नहीं आती बल्कि उपन्यास की गद्य-भाषा एक नया वैशिष्टय प्राप्त करती है; जिसके भाषिक सौंदर्य को अधिक प्रभावी बनाती है।
आज़ादनगर इलाके के निम्न मध्यमवर्गीय जीवन का जीवंत वर्णन है जो काग़जी विकास पर्दाफाश करता नज़र आता है: ‘‘गली दक्षिण से उत्तर की ओर जाती थी। शुरुआत के पूरब की तरफ के चन्द घरों में गाय, भैंस बँधे और रँभाते दीख रहे थे तो पश्चिम की ओर के मकानों में बरामदे में कहीं कपड़ों पर इस्त्री फेरी जा रही थी जो.....। खुली नालियाँ ऊपर तक भरी हुईं और बदबूदार थीं। सड़क पर जहाँ-तहाँ बहता गोबर और कीचड़..... तो दीवारों पर गोयठों की भरमार। चार घर पार करते ही पश्चिम की ओर किसी पुराने ढहे हुए विशाल दो-मंजिली कोठी का बाहर से दीखता लकड़ी का बुलन्द फाटक। ......। इसके सामने बाहर से चटाई के लटकते चिलमनों वाले कई-कई घर। फिर एक इमामबाड़ा। इसके सामने चहारदीवारी के भीतर..... शायद कोई मस्जिद हो....।’’
इसी मोहल्ले में मुख्य किरदार सियाराम सिंह के पिता रिटायर्ड दरोगा छत्रपति सिंह ने सफ़ेद बालों वाली एक पोपली वृद्ध बेवा शन्नो का मकान अपने नाम रजिस्ट्री करायी है, जिसके आँगन में शन्नो के पूर्वजों की दो कब्रें हैं। इसी मकान को देखने दिखाने छत्रपति सिंह बड़े बेटे को साथ ले कर जाते हैं। वे निम्न मध्यवर्गीय बसावट का वर्णन यों करते है: ‘‘लम्बी-पतली और उबड़-खाबड़ सी कई गलियों को लाँघ जब इस गली में घुसे, रास्ता और भी सँकरा हो उठा था। इस सँकरे रास्ते के मुहाने पर एक छोटा-सा जीर्ण-शीर्ण शिवालय था। .....इसमें दर्शनीय था तो काले पत्थर का बना एक विशालकाय शिवलिंग।’’ यानी इस मोहल्ले में शिवालय और मस्जिद दोनों का सह-अस्तित्व है।
उपन्यास ‘ख़लल’ का कथानक एक रेखीय नहीं है, बल्कि इसकी बुनावट में सियाराम-जरीना, धनंजय-शबनम, संगीता-अशरफ़ की प्रेम-कथाओं; सियाराम सिंह के मध्यवर्गीय जीवन से शक्तिशाली उच्च मध्यमवर्ग में वर्गांतरण; अपार्टमेंट संस्कृति का उभार; रामनवमी के अवसर पर शोभायात्राओं का आरंभ, भोपाल से आये ठेकेदार सुलेमान मियाँ का मुर्गियाचक में नया आलीशान मकान, ‘अमृत फिनान्स एण्ड इन्वेस्टमेण्ट कम्पनी प्रा. लि.’ द्वारा स्थानीय गरीबों का रोकड़ गबन, दिल्ली दंगों में मुर्गियाचक के अब्दुल रज़्जाक के निर्दोष बेटा सादिल की गिरफ्तारी और उसके पुश्तैनी घर को एक सप्ताह के अंदर बुलडोज कर देने का प्रशासन की नोटिश; शिव मन्दिर में अचानक कल्कि माई का अवतरण और उनका गायब होना; विधायक जी द्वारा कल्कि माई मन्दिर निर्माण की घोषणा, नगर निगम चुनाव में झोंपड़पट्टी निवासी पार्वती कुमारी की जीत और महत्त्वाकांक्षी सियाराम सिंह की हार, कल्कि माई मन्दिर परिसर और पवित्र गंगा तट तक कॉरिडोर निर्माण हेतु मुर्गियाचक के वाशिंदों की जम़ीन अधिग्रहण की घोषणा, वामपंथी डॉ. सिंह का ढुलमुल चरित्र; मन्दिर निर्माण वाली कंपनी के साथ मुम्बई जा कर सियाराम सिंह, वामपंथी डॉ. सिंह और गुलाम मियाँ के साथ भारी मुआवजा राशि ले कर समझौता; सियाराम सिंह का मुआवजा ले कर पूणे शिफ्ट कर जाना, मुआवजे के लिए मुर्गियाचक के निवासियों के धरना-प्रदर्शन के समानांतर कथावाचक आचार्य कौशलानंद का प्रयोजित कथावाचन आदिकथा-प्रसंग गुंफित हैं। सबसे मज़ेदार यह है कि इतने कथा-प्रसंगों से गुजरते हुए कथा-प्रवाह में कोई रूकावट नहीं आती और न मूल कथानक बिखरता है न उपन्यास अपने मूल कथ्य से विचलित होता है। विधायक, सियाराम सिंह, अनिल साव, सुनील साव, मलखान सिंह परिहार, सत्ताधारी दल से जुड़े हैं लेकिन सबका मिशन एक ही है- पैसा, पावर और राजभोग। इसके लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं; किसी को कुचल सकते हैं।
न्यू इंडिया का एजेंडा इस सदी के दूसरे दशक के पहले का है, उपन्यास इसकी जड़ तलाशते हुए सन् 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस से उठती हवा के रुख की पड़ताल करता है। बाबरी मस्ज़िद ध्वंस की घटना बिहार के मुर्गियाचक की आबादी में सनसनी पैदा करती है। वह वहाँ के समाज में दरार डालती है। साजिशकर्ताओं की योजना के दरार अनुकूल है; उनकी मंशा है हिन्दू-मुसलमान के बीच फाँक हो। वे सत्ता के लिए धर्म का औजार पजा रहे हैं। ‘‘याद है, बाबरी मस्जिद ढ़हाने का उन्माद!..... । यह थरथराता प्रश्न पूरे इलाके को दो खेमों में बाँट गया था। शिवालय के पास ही कुछ लड़कों ने बजरंग दल का ऑफिस खोल रखा था। इसको ले कर और दहशत थी मुर्ग़ियाचक में (पृष्ठ 70)।’’ किसी ने तब प्रश्न उठाया था तो सुभान मियाँ ने शान्त, संयम स्वर में कहा था- ‘‘आसपास के सभी हिन्दुओं से हमारा बरसों का दुआ-सलाम है, मिलना-जुलना है, वह भला क्यों हमला करेंगे हम पर.....?’’ वे गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक हैं। वे हिंदू-मुसलमान मिल्लत को बचाना चाहते हैं।
सुलेमान मियाँ बुजुर्ग सुभान मियाँ से सहमत नहीं है। लेकिन सुभान ख़लीफा सुभान मियाँ से हिन्दू-मुस्लिम मिल्लत के बारे में ज्यादा उदार और दरियादिल हैं। वह बेनमाजी मस्जिद को हिंदुओं को सौंप देने के पक्ष में हैं। वह फरमाता है कि ‘‘देश में अमन-चैन और भाईचारा बहाल रखने की खा़तिर मुसलमानों की यह कुर्बानी सुनहरे हरफ में लिखी जाती’ (पृष्ठ 71)।’’ वह इस्लाम को एक उदार और दरियादिल कौम की पहचान देना चाहता है।
सुभान मियाँ ईमानदार, उदार और बेबाक इंसान हैं। सियाराम के पिता छत्रपति सिंह और सुभान मियाँ में गहरी छनती थी। गुलाम सुभान मियाँ का पालक पुत्र है। पुलिस में रहते हुए छत्रपति सिंह सरकारी नौकरी दिलवाने में गुलाम की जगह एक हिन्दू रजक की पैरवी करते हैं, सुभान मियाँ छत्रपति के व्यवहार पर कठोर टिप्पणी करते हैं- ‘‘हमारे यहाँ केवल संविधान सेकुलर है, तन्त्र पूरी तरह साम्प्रदायिक। इस क़ागजी सेकुलरिज्म की धज्जी एक न एक दिन उड़ कर रहेगी, देख लेना (पृष्ठ 69)।’’ सियाराम सिंह उपन्यास में एक ढुलमुल चरित्र का प्रतीक है। सुभान मियाँ का चरित्र सियाराम सिंह के चरित्र का प्रतिलोम और समानान्तर है। पारिवारिक मित्रता और खान-पान के बाद भी सियाराम एकलौते बेटे की शादी में बुजुर्ग सुभान मियाँ को नेवता देने में संकोच कर रहा है। होने वाले समधी यू. पी. के हैं और सत्ताधारी पार्टी में ऊँचे ओहदे पर हैं। उनको बारात में ‘हिजाब, लम्बी दाढ़ी, टोपी आदि से सख़्त परहेज है।’ सुभान मियाँ सियाराम को बेबाक फटकारते हैं और सन् 2014 से देश की बदली हुई सियासत को स्पष्टतः रेखांकित करते हैं: ‘‘यह एक नया सिलसिला शुरू हुआ है इधर हिन्दुओं के बीच .....एक श्रेष्ठता बोध के साथ हिटलरी जहालत के दौर में लौटने का..... आजादी के इतने सालों तक हमने जो सोच और मानसिकता बनायी थी, उसे धो-पोंछ डालने का (पृष्ठ 66)।’’ इसके बाद भी जब सियाराम के पिता का निधन अचानक गाँव (मोतिहारी) में हो जाता है तब अपने आदर्शों का ख़्याल रखते हुए सियाराम के साथ एम्बुलेंस ले कर गाँव जाते हैं और दोस्त छत्रपति सिंह की शवयात्रा में घाट तक जाते हैं।
बाबरी मस्ज़िद ध्वंस के प्रतिरोध में मुर्गियाचक में सुलेमान मियाँ की सरपरस्ती में मुसलमानों का एक दल मुख्य सड़क पर निकलता है; उन्मादी भीड़ तोड़फोड़ करती है; पुलिस बल पर पथराव होता है; दोनों ओर से गोलीबारी होती है; सुलेमान मियाँ मारा जाता है। उस समय बिहार में माई गठबंधन की सरकार है। सामान्य हालत होने पर सरकार का एक मंत्री सुलेमान के घर चेक दे जाता है। सुभान मियाँ की राय है कि ‘‘इन गुण्डों-बदमाशों को मुआवजा बाँटते चलिएगा तो दंगा कैसे रुकेगा? (पृष्ठ 72)।’’ इसलिए सुभान मियाँ पर बाजार से लौटते हुए जानलेवा हमला होता है।
सचिवालय के मुजाज़िम नाटे मियाँ राजभक्त आदमी है। उपन्यास में उनकी निम्नवर्गीय जिंदगी का कारूणिक वृत्तांत है। वे दो हजार चौदह के राष्ट्रीय आम चुनाव में होने वाले प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के भाषणों और घोषणाओं में मुख़्तलिफ रूप से दीवाने थे। सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान को जारी रखते हुए नदी किनारे वाले रास्ते को रोज झाडू लगा कर चमकाते थे। ज्यादा लोग उनके अभियान का मज़ाक उड़ाते। रिटायरमेंट के बाद वे किडनी के मरीज हो जाते हैं; पत्नी भी शुगर, रक्तचाप और गठिया की पेशेंट। बच्चों की शिक्षा ठीक-ठाक नहीं हो सकी। नाटे मियाँ एक दिन गुजर जाते हैं। उनकी शव यात्रा पर व्यंग्य कर सियाराम सिंह फँसते हैं और डर कर घर में घुस जाते हैं। दूसरी ओर नाटे मियाँ की शवयात्रा को ग्वालटोली में भी ‘राम नाम सत्य है’ की सलामी मिलती है। नाटे मियाँ गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल हैं। सियाराम सिंह यहाँ भी प्रधानमंत्री का चाटुकार और बुज़दिल नज़र आता है।
सन् 2014 में केन्द्र में जो नयी सरकार बनती है, वह ‘न्यू इंडिया’ बनाने की घोषणा करती है। सब समझ रहे हैं कि कुछ अपरिहार्य कारणों से हिन्दू राष्ट्र कहने में नये सत्ताधारी दल को असुविधा हो रही है। इसमें संविधान सबसे बड़ा बाधक है, और संसद में हिन्दू राष्ट्रवादियों को दो तिहाई बहुमत नहीं है। हिन्दू राष्ट्र बनाना उनकी कार्यनीति है और मंदिर निर्माण, रामनवमी की शोभा-यात्रा, यज्ञ-कीर्तन-भजन आयोजित करना, मजहबी एकता की आलोचना, नफ़रती स्लोगन लगाना, जनता को राष्ट्रवादी-देशद्रोही में बाँटना आदि उनके रणनीतिक कौशल है; ‘ख़लल’ इसकी औपन्यासिक गाथा है।
उपन्यासकार नई वस्तुगत स्थिति को इस प्रकार रखते हैं - ‘‘मन्दिर का निर्माण या जीर्णोद्वार अब एक ऐसा सामाजिक आन्दोलन बन चुका है जिसमें समाज के सभी तबके के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे हैं (पृष्ठ 95)।’’ कथाभूमि आज़ादनगर उर्फ मुर्ग़ियाचक में भाँति-भाँति के लोग भरे हुए हैं। लेकिन अब हूबहू वैसा नहीं रह सकता है। ‘‘लोगों पर अब कुछ दबाव डाले जा रहे हैं। .....। यह दबाव कालान्तर में बढ़ता ही जा रहा है.....। आगे किसी बड़े परिवर्तन के संकेत मिलने लगे हैं। ............। पहले लोग ‘मुख में राम बगल में छुरी’ वाली कहावत कहते थे। अब तो मुख में राम और बगल में राजनीति वाली हक़ीकत है। ऐसी ही राजनीति मोहल्ले (मुर्ग़ियाचक) में अनिल साव ने शुरू कर दी थी और लोग बुत बने देख रहे थे (पृष्ठ 97)।’’ मुर्ग़ियाचक शिवालय के ठीक सामने अनिल साव की विधवा माँ की किराने की मामूली दुकान है। विधवा के दो बेटे ऑटो चलाते हैं; दो किसी दुकान में काम करते हैं। अनिल की एक आँख बचपन से खराब है, इस कारण शादी नहीं हुई। वह शिवालय में शिवलिंग पर प्रतिदिन जल चढ़ाता है। ‘ओम नमः शिवाय’ का पाठ जोर-जोर से करता है। मोहल्ले में उसकी छवि शिवभक्त की है। मन्दिर आंदोलन के लिए वह एकदम सुटेबल बॉय है। अचानक एक दिन पत्रकार अपने अखबार में एक फ़ीचर लिखता है जो मुर्ग़ियाचक के सात शिवालयों के बारे में है। इन मन्दिरों के वास्तुशिल्प और शिवलिंगों के आकार-प्रकार में एकरूपता है। सर्वेश बताता है कि इन मन्दिरों का निर्माण सन् 1905 में एक व्यक्ति ने कराया था। उनका एक प्रपौत्र अपने तीन बेटों के साथ इसी शहर के इस मोहल्ले में बसे हुए थे। इन मन्दिरों के लिए खरीदी गयी जमीन के तमाम दस्तावेज आज भी सुरक्षित हैं। सर्वेश ने फ़ीचर में एक मन्दिर को चालू बताया और इसी शिवालय का चित्र छापा। उसने फ़ीचर में अनिल साव के नाम का उल्लेख किया था। यह एक फेक नैरेटिभ भी हो सकता है जो न्यू इंडिया की रणनीति के अनुकूल था। उपन्यासकार ने मन्दिर बनवाने की पृष्ठभूमि और कारण का क्रिटिक रचा है- ‘‘उन्होंने जो साक्षात्कार दिया था उसके अनुसार वह लोग कलवार (जायसवाल) थे और उनके दादा-परदादा के जमाने में उन लोगों का शराब का धन्धा था जो कि क़ाफी बढ़िया चलता था। अपने समय में उन लोगों ने इफरात धन कमाया। धन कमाने के अपने तरीके को लेकर उनके भीतर गहरा अपराध बोध और क्षोभ था। इसी के प्रायश्चितस्वरूप उन्होंने इस इलाके में सात मन्दिर बनवाने का संकल्प लिया और इसे पूरा किया (पृष्ठ 99)।’’ मन्दिर निर्माण के कारणों में एक कारण गहरा अपराध बोध एवं पापबोध भी है।
पत्रकार सर्वेश की रिपोर्टिंग न्यू इंडिया मिशन का हिस्सा लगती है। स्थानीय विधायक संघी हैं। शिवालय का जीर्णोद्धार विधायक जी की प्राथमिकता बन जाती है। संविधान की भावना का उल्लंघन संघी राजनीति की रणनीति है ही। अनिल साव के नेतृत्व में मोहल्ले के फुर्सती और लफड़िया लड़कों की टुकड़ी उपलब्ध है। अब वे उनके राम हैं और वो तमाम उनके हनुमान। घर-घर से भारी चंदा वसूला जाता है। शिवालय का जीर्णोद्धार होता है, उसका भव्य उद्घाटन होता है। साथ में एक सामुदायिक भवन भी बनता है। अखण्ड कीर्तन का प्रोग्राम बनता है।
न्यू इंडिया में जनता को धार्मिक अंधविश्वासों के आगोश में लेना है। जनता की आर्थिक, शैक्षिक समस्याओं को दैविक प्रकोप बताना है। सरकार सिर्फ गोवर्न करेगी; देवी-देवता जनता की समस्याओं का निदान करेंगे। इसलिए फेक, आधारहीन, अवैज्ञानिक नैरेटिभ फैलाते हुए श्री गणेश कीर्तन को ‘‘कलयुग (पूँजीवाद) के प्रकोप से बचाने वाला सबसे अचूक उपाय बताया गया (पृष्ठ 102)’’। ‘‘मन्दिर के महात्म्य को ले कर छपाये गये पर्चे बाँटे गये। इस पर्चे में व्यापार की प्रगति होने, गुप्त मनोकामना की पूर्ति होने, बाँझ स्त्री को पुत्र प्राप्ति होने एवं सन्तान की सरकारी नौकरी लगने के सच्चे किस्से उदाहरण के साथ छापे गये (पृष्ठ 102)’’। इस तरह उपन्यास अतीतवादी संघ द्वारा धर्म की आड़ में अंधविश्वास फैलाने के करिश्मे को उजागर कर अपनी सोद्देश्यता प्रमाणित करता है। इस तरह के धार्मिक पाखंड पर जहाँ सिस्टम चुप रहता है, वहाँ साहित्य मशाल लेकर सजग दिखता है। न्यू इंडिया की परिकल्पना में जनता की तकदीर का निर्माता आधुनिक शिक्षा नहीं पूजा-पाठ है। अदृश्य शक्तियाँ युवाओं का भविष्य सँवारेंगी। उपन्यास में लेखकीय टिप्पणी है- ‘‘पूजा-पाठ से ही तकदीर सँवरती है। अनिल साव मन्दिर के भीतर बैठा अब इसी तरह की लोक-लुभावन बातें करता है। उसके पास हर दुख-दर्द के लिए अलग-अलग व्रत-उपवास एवं पूजा-पाठ सम्बन्धी उपाय थे (पृष्ठ 103)’’। उपन्यासकार का ज्वलंत नैतिक प्रश्न है - ‘‘क्या यह एक नये राष्ट्र के निर्माण का शैशव काल है..... या एक जर्जर बूढ़े देश के पुनर्नवा हो उठने का अमृत महोत्सव (पृष्ठ 104)’’?
‘ख़लल’ का मुख्य किरदार सियाराम सिंह संघी है। मुर्ग़ियाचक से वह रामलला अपार्टमेंट के फ्लैट में शिफ्ट कर गया है। पिता छत्रपति सिंह के खरीदे मकान में उसके छोटे भाई जयराम का परिवार रहता है; सियाराम का हिस्सा अक्षुण्ण है। सियाराम राजनीतिक सरोकार से मुर्ग़ियाचक के बाशिंदों के संपर्क में रहता है। मोहर्रम के अवसर पर इधर आया तो शिवालय का प्रभारी अनिल साव मिल गया। सियाराम अनिल साव से मन्दिर की आय के बारे में पूछता है। और मन्दिर की आय बढ़ाने का नुस्खा विस्तार से समझाता है- ‘‘धन्धा जमाना है तो कुछ चमत्कार पैदा करो। न हो तो किसी दिन किसी सँपेरे से कह कर एक नाग मन्दिर में चुपके से रखवा, दरवाजा बन्द करवा दो। सुबह तबीयत खराब होने का बहाना कर अण्ठियाये पड़े रहो और पूजा करने वालों को दरवाजा खोलने दो। उसके बाद देखो तमशाऽ......चमत्कार.....! धर्म और राजनीति को जमाने में थोड़ी नाटक-नौटंकी जरूरी है। जनता बहुत चालाक है, केवल मीठे वचनों से झाँसे में आने वाली नहीं (पृष्ठ 112)।’’ इसी चमत्कार का सहारा न्यू इंडिया का प्रत्येक कर्ताधर्ता लेता है; वह विधायक हो या प्रधान रक्षक। संघ की यही राजनीतिक कार्यपद्धति है। इसी गुप्त षड्यंत्रकारी कार्य-पद्धति को उपन्यासकार उजागर करता है। यह उसका नैतिक और ऐतिहासिक कार्यभार है।
मुर्ग़ियाचक की ध्वनि-प्रदूषण समस्या पूरे देश के शहरों की ध्वनि-प्रदूषण की समस्या का रूप है। प्रोफेसर सुभाष महतो जैसे बुद्धिजीवियों के परिवार के लिए मुर्ग़ियाचक का ध्वनि प्रदूषण जानलेवा है। दूसरी ओर कुटिल राजनीतिज्ञ सियाराम सिंह चाहता है कि ‘‘इस दफ़ा हमको वोट देने का एनाउन्समेण्ट भी मन्दिर से होना चाहिए’’ (पृष्ठ 112)। उपन्यासकार इस ध्वनि प्रदूषण के कारकों की समीक्षात्मक सूची प्रोफेसर सुभाष महतो की डायरी के माध्यम से पाँच से अधिक पृष्ठों में पिरोते हैं। यह धर्मनिरपेक्ष सूची पर्यावरण संरक्षण का मूल्य रचती है।
ऊपर कहा गया है कि ‘ख़लल’ उपन्यास का कथानक एक रेखीय नहीं है; इसमें मुर्ग़ियाचक का महावृत्तांत है जिसमें न्यू इंडिया के बैनर तले राजनीति, चुनाव, मन्दिर-मस्जिद विवाद, ध्वनि प्रदूषण, हसमत अली साहेब उर्फ़ हस्सू मियाँ की प्रोपर्टी डिलर बनने की क़वायद, जब्बार मियाँ का अंतरधार्मिक विवाह, धनंजय प्रसाद का धर्मांतरण, सुनील साव और सलीम की गुंडई आदि अनेक रोचक उपकथाएँ अनुस्यूत हैं जो ‘ख़लल’ को पठनीय बनाती है।
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| सन्तोष दीक्षित |
न्यू इंडिया के माहौल में सुनील साव स्वयंभू हिन्दू धर्मरक्षक है। वह जफ़र के हिन्दू लड़की से विवाह को देश पर खतरा कहता है। वह शासन-प्रशासन का अंग नहीं है, फिर भी एक दिन शाम के झुटपुटे में मो. जफर को घेर कर तड़ाक-तड़ाक चाँटे जड़ता है। हस्सू मियाँ जफ़र को बचाते हुए समझाता है सुनील साव को- ‘‘जफ़र ने बकायदा निकाह किया है और उन माँ-बेटी का सहारा बना हुआ है (पृष्ठ 125)।’’ हर किसी को आजादी है अपना प्रेम चुनने की। लेकिन न्यू इंडिया का निजाम प्रेम की आजादी नहीं देखा। सुनील साव हिन्दू धर्म का अनाधिकृत खैरख्वाह है। वह सलीम को चुनौती देता है- ‘‘यह सरासर लव जेहाद है। देश पर ख़तरा है इससे। देश के बीच में जो आएगा गोली खाएगा (पृष्ठ 125)।’’ हस्सू मियाँ और जफ़र की गिरफ्तारी होती है। इसी कड़ी में फिजिक्स टीचर मोहम्मद अतीक अहमद खाँ की बेटी शबनम और आर्ट्स टीचर धनंजय प्रसाद की प्रेम कहानी तथा बाद में हिन्दू धर्म की पुरानी बिडम्बना के कारण धनंजय प्रसाद के मोहम्मद इस्लाम बनने की दिलचस्प कथा गुंफित है। इस प्रसंग पर गैर साम्प्रदायिक नजरिया वाले बुजुर्ग सुभान चा उर्फ सुभान मियाँ का संवाद महत्त्वपूर्ण है- ‘‘आ जाओ हमारे धर्म में......। .....यहाँ जो भी आता है उसका इस्तकबाल किया जाता है। तवारीख गवाह है कि हिन्दुओं के इसी छुआछूत, सामाजिक बहिष्कार और अत्याचार से त्राहिमाम करते लाखों नीची जाति के लोग हमारे यहाँ शामिल हुए (पृष्ठ 133)।’’ सुभान मियाँ के संवाद में भारत में इस्लाम धर्म फैलाने के एक मजबूत ऐतिहासिक कारण की अंतर्ध्वनि है जिसमें उपन्यासकार का इतिहास-बोध भी प्रतिध्वनित होता है।
उपन्यास में मुर्ग़ियाचक की राजनीति के अंडरवर्ल्ड की कथा पूँजीवादी लोकतंत्र में सत्ता और सत्ता-समीकरण के धागों की बखूबी पड़ताल करती है। न्यू इंडिया के किरदार पूँजीवादी लोकतंत्र की सीढ़ियाँ चढ़ कर सत्तासीन हुए हैं। किसी की सत्ता हो, उनपर जातिवादी सामाजिक शक्तियों का रसूख रहता है। इस कथा के किरदार हैं स्थानीय विधायक, प्रोफेसर सुभाष महतो, रंगबाज सुनील साथ, अपराधी सलीम, बालू-गिट्टी-ईंट और अवैध शराब धंधेबाज योगेश यादव और कॉलेज का भूमिहार प्रिंसिपल। सुनील साव मन्दिर और गुंडागर्दी के रास्ते राजनीति में आगे बढ़ना चाहता है। प्रोफेसर सुभाष महतो का रिश्ता उस बामी संगठन से है जो गोला-बारूद पर विश्वास करते हैं। वे मन्दिर के जीर्णोंद्वार के स्वभाविक विरोधी हैं। एक दिन बाजार से लौटते समय प्रोफेसर महतो को सुनील साब का एक गुर्गा हड़काता है; उनकी सारी हेकड़ी किरकिरी हो जाती है। कॉलेज के एक समारोह में मंच-संचालन करते हुए मुख्य अतिथि विधायक जी की वे प्रशंसा करते हैं, मौका बढ़िया देख कर आँख पोंछते हुए उस शाम की घटना बताते हैं; वाम और दक्षिण की मैत्री जाति समुदाय के आधार पर पनपती है। चार बार के विधायक, जिनके कई कई पेट्रोल पम्पों के साथ-साथ गाड़ियों के दो-दो शो रूम है, प्रोफेसर महतो को अभय दान देते हैं- ‘‘आखिरकार आप भी तो हमारे वृहत् पिछड़े समुदाय से आते हैं! (पृष्ठ 140)’’ इसके बाद ही डंका इमली मोहल्ले का सलीम मोहल्ले के बाहर पुलिया के नीचे अधमरे हालत में घर वालों को कराहते मिलता है। उसके बयान पर सुनील साव गिरफ्तार होता है। ग्वाला टोली का उभरता नेता योगेश यादव थाने से सुनील साव की जमानत कराता है। गाजे-बाजे के साथ जुलूस की शक्ल में सुनील साव घर लौटता है। उसे भीड से ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ और ‘हिन्दू रक्षक’ की उपाधि से विभूषित किया जाता है। न्यू इंडिया के निजाम में गुजरात से बिहार तक अपराधियों को इसी प्रकार महिमामंडित किया जा रहा है। उपन्यास में इस राजनीतिक सत्य की सार्थक प्रस्तुति है।
लेकिन सुनील साव खाने-पीने का स्थायी जोगाड़ चाहता है। वह अपने लिए एक मन्दिर का जीर्णोद्धार चाहता है। योगेश यादव न्यू इंडिया का राजनीतिक दर्शन उसे समझाता है: ‘‘धरम-करम, पूजा-पाठ सब बड़े लोगों की आड़ हैं, जिनकी ओट में बड़े-बड़े खेला चलते हैं। तुमको भी बड़ा खिलाड़ी बनना है...... आगे की बात विधायक जी के सामने होगी (पृष्ठ 145)।’’
विधायक जी पुराने संघी हैं। जब पार्टी का सिम्बल ‘दीपक’ था, उन दिनों से वे उसके साथ हैं। अब तो केन्द्र में न्यू इंडिया का निजाम है। अब पार्टी के अप्रकाशित एजेंडे के क्रियान्वयन के लिए वे सरकारी आवास पर पार्टी समर्थकों की बैठक करते हैं। उपन्यास में उनकी पहलकदमियों और राजनीतिक दृष्टिकोणों का सजीव चित्रण है। मन्दिर की राजनीति को वे वैज्ञानिक नज़रिया देने की कोशिश करते हैं- ‘‘जिस प्रकार से वैज्ञानिक ‘लैब टु लैण्ड’ प्रोग्राम देते हैं, वैसे ही हमें ‘मन्दिर से समाज’ का कार्यक्रम अपनाना चाहिए।न.......मन्दिर के कार्यकलापों को पूरे समाज में फैला कर एक क्रान्तिकारी धार्मिक चेतना क्यों नहीं विकसित की जा सकती? (पृष्ठ 157)।’’ यह अद्भुत विमर्श उपन्यास में विन्यस्त है। विधायक जी न्यू इंडिया की कार्य-योजना विस्तार से समझाते हैं- ‘‘धर्म के नाम पर एकजुट हो कर इसके नाम पर मर-मिटने के लिए तैयार लोगों की फौज बनानी है। ऐसी फौज का निर्माण हमारे अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है (पृष्ठ 157)।’’ रामनवमी की भव्य शोभा यात्रा निकलती है। भयानक ध्वनि प्रदूषण से लोग घबरा गये। प्रोफेसर महतो के चेहरे पर एक अन्तहीन वेदना पसर जाती है। मुर्ग़ियाचक में लोग कान में रुई ठूँस कर अपने काम में मशरुफ रहने का दिखावा करते हैं। इस दरमियान जब्बार की अम्मी गुजर जाती हैं। उनसे जरा भी शोर बर्दाश्त नहीं होता था। दो दिन बाद रामलोचन के पिता गुजर जाते हैं। एक दो दिन से ‘डेक’ की आवाज से धड़कन बढ़ने की बात कह रहे थे। इस अराजक ध्वनि प्रदूषण पर सुभान मियाँ, शाइर मरीम राशिद, सियाराम और जयराम के बीच सार्थक संवाद है। बड़े कौशल से उपन्यासकार ने इसे कथानक में पिरोया है। इस मन्दिर राजनीति के पीछे दिगाम को सब जानते है, लेकिन उनका प्रबंधन गौर करने लायक है, शोभायात्रा में विधायक (पिछड़ी जाति) रंगीन साफे और रामनामी दुपट्टे में सजे सबसे आगे चलते हैं। उनके साथ योगेश यादव भी हैं। हनुमान की वेशभूषा में फेंकू राय है। जुलूस में सबसे आगे हाथ में नंगी तलवार लिये अनिल साव और सुनील साव थे। इसी भीड़ में सियाराम सिंह भी हैं।
उपन्यासकार संतोष दीक्षित ‘ख़लल’ के दो मजबूत संघी किरदारों- विधायक और नगर निकाय चुनाव का उम्मीदवार सियाराम सिंह- के दोहरे चरित्रों का क्रिटिक रचते हुए न्यू इंडिया का सपना बेचने वाले चोटी के नेताओं के दोहरे चरित्र पर भी कैमरे का फोकस डालते हैं। इस तरह उपन्यास गंभीरता के साथ खिलंदड़े अंदाज में समय की राजनीति के विरोधाभासों को उजागर करता है। सियाराम सिंह का समधी मलखान सिंह परिहार पार्टी का केन्द्रीय नेता है। समधी के चुनाव प्रचार में वह नहीं आ रहा है। सियाराम को दुःख है कि समधी ने अपने दामाद राजदीप के माध्यम से खबर भेजवायी कि ‘‘उनका चीन जाना बहुत जरूरी है। यह एक तरह से उनके ‘बिजनेस’ से ज्यादा ताल्लुक रखता है, बनिस्वत राजनीति के। वह वैसे भी चीन आते-जाते रहते हैं; किसी को बतलाते नहीं (पृष्ठ 215)।’’ यह संवाद किस नेता की चीन-यात्राओं के बारे में है सभी पाठक समझते हैं। पत्रकार सर्वेश सियाराम को पुस्तक मेला का पास देता है। वह झेंपते हुए पास अपनी जेब में सरकाता है। पुस्तक मेला जाना वह ‘वामपन्थी चोंचलेबाजी’ समझता है। उनके सामने ‘‘कई-कई अपढ़ नेताओं की सफलता का उदाहरण है। जब विधायक सार्वजनिक तौर पर एलान करता है मुर्ग़ियाचक के लोग उसके वोटर नहीं हैं तब सियाराम सुभान ख़लीफ से कहता है- ‘‘महत्त्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को ऐसा अलगाववादी एवं किसी समुदाय विशेष को चोट पहुँचाने वाला बयान नहीं देना चाहिए (पृष्ठ 199)।’’ लेकिन जब सियाराम का सहोदर भाई जयराम दिल्ली में गिरफ्तार मुर्ग़ियाचक के अब्दुल रज्जाक के बेटे साहिल की रिहाई के लिए पावरफुल समधी मलखान सिंह परिहार से सिफारिश करने का निहोरा करता है तब सियाराम दूसरा चेहरा दिखाता है- ‘‘तुम काहे को इतने बेचैन हो? .......यह उन लोगों के समाज का मामला है, तुम फालतू का टाँग काहे अड़ा रहे हो?’’ इस प्रसंग में लेखक ने सियाराम-जरीना की प्रेम-कथा को बाखूबी पिरोया है। जनसंपर्क के दौरान सियाराम को मुर्ग़ियाचक में दो रोटी के लिए मोहताज बीमार बूढ़ा वेल्डिंग कारीगर, बूढ़े टेलर मास्टर तीन फीट के कुबड़े जहूर मियाँ, साइकिल की कैरियर में अण्डे से भरे कूट के कैरेटे के साथ बूढ़े शाइर करम राशिद मिलते हैं; जो गरीबी, बीमारी और जहालत के प्रतीक हैं। सियाराम की मनुष्यता काँप जाती है। तब वह एक मनुष्य के रूप में इतिहास में झाँकता है- ‘‘आतंकवादी का सम्बन्ध भी पैसेवाले लोगों और उनकी दुनिया से हैं। ....यहाँ भी ऐसे ही खाते-पीते लोग ‘इस्लामिक स्टेट’ का गुपचुप एजेण्डा चलाते होंगे....... और निश्चित रूप से यह पैसे वाले ही होंगे जो एक नय भारत के निर्माण में किसी आन्दोलनकारी की तरह लगे हुए हैं (पृष्ठ 197)।’’ सियाराम सिंह जैसे चरित्र की खोज या निर्माण उपन्यासकार की उपलब्धि है। वह नगर निगम का चुनाव लड़ते हुए जन संपर्क के दौरान विचलित कर देने वाले अनुभवों से गुजरता है। उसे रास्ते में परिचित शाइर करम राशिद मिलते हैं। करम राशिद गरीबी और जहालत में भी अपना स्वाभिमान नहीं खेाते, वे सियाराम सिंह की ओर एक अपरिचित दृष्टि फेरते आगे बढ़ जाते हैं। सियाराम सिंह को कलेजे में जोरदार धक्का लगता है।
पार्टी का विधायक सियाराम सिंह को कम धोखा नहीं देता। उसने नगर निगम चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार झोंपड़पट्टी की पार्वती कुमारी को बनाया है। पार्वती झोंपड़पट्टी के बाहर शहर के पॉस होटलों में दैनिक कार्यक्रमों में एंकरिंग करती हैं। झोंपड़पट्टी से बाहर वालों की नज़र में वह एक हाई प्रोफाइल काल गर्ल है। सियाराम को भाई जयराम के साथ जनसम्पर्क के दौरान पता चलता है कि ‘‘विधायक जी ने कैण्डिडेट तय कर लिया है- पार्वती कुमारी (पृष्ठ 226)।’’ वही रहेगी अबकी उम्मीदवार। बड़ा गेम है विधायक जी का ..... और सुनते हैं कि एकदम सेफ है। रामलला अपार्टमेण्ट की ओर रिक्शे से लौटते सियाराम सिंह का जोश ठण्डा हो जाता है। वे तय करते हैं कि विधायक को अपनी ओर से कभी फोन नहीं करेंगे। समधी मलखान सिंह परिहार ने जब धोखा दिया था तो उनको भी आगे फोन न करने का निर्णय लिया था। चुनाव का नतीजा आता है। आश्चर्यजनक रूप से सियाराम सिंह चौथे स्थान पर रहते हैं। रामलला अपार्टमेंट से उनको मात्र पाँच वोट मिलते हैं।
उपन्यास में अनुषांगिक कथाओं के माध्यम से धार्मिक बाह्याचार पर पात्रों और लेखकों की सार्थक टिप्पणियाँ हैं। कम पेंशन में राजेश्वर प्रसाद का पारिवारिक जीवन संकटग्रस्त रहता है। उनका आर्थिक संकट व्यवस्थागत है जिसका समाधान वे भोले बाबा की कृपा से चाहते हैं। मन्दिर में नियमित चंदा देने और सुबह-शाम तीन घण्टे वक्त जाया करने के बाद भी कमाऊ जवान बेटा ज्ञानू को बचा नहीं पाते। वे महसूस करते हैं कि ‘राजनीति अब उद्योग है। इससे उगाही पूँजी बड़े पूँजीपतियों तक जाती है। फिर वहाँ से चन्दा के रूप में लौटती है (पृष्ठ 235)।’’ फिर भी मन्दिर में पाँच हजार का चन्दा दे कर महामृत्युंजय का जाप कराते हैं। इस उपकथा में सियाराम सिंह और प्रोफेसर महतो की आवाजाही होती है।’’ जीवन और समाज में धर्म की ख़ललअन्दाजी हिंसक तरीके से बढ़ती जा रही है।’’
उपन्यास में कल्कि देवी की अवतार बुढ़िया का नाटकीय प्रवेश अंतिम तिहाई में होता है। छठ पर्व की तैयारी के दिनों में रात के दो बजे मन्दिर सचिव अनिल साव को मन्दिर की सढ़ियों पर टहटह लाल साड़ी और ब्लाउज में बूढ़ी अचानक दिखती है। बूढ़ी जैसे आसमान से टपक पड़ी हो। बाद में अनिल साव द्वारा उसे मन्दिर के सटे कमरे में रखवाना, खिलाने-पिलाने की व्यवस्था करना, बुढ़िया का नहा धो कर आरती में शामिल होना, चौराहे के पवन हलवाई द्वारा दोने में पूड़ी-जलेबी ले कर सेवा में पहुँचना, दर्शनार्थियों द्वारा प्राप्त नगदी अनिल साव को सौंप देना, विधायक जी द्वारा एक दिन अपने गले में पड़े हार को बुढ़िया के गले में डाल देना, बुढ़िया द्वारा उनको मन्त्री बनने का आशीर्वाद और विधायक जी का अगले सप्ताह सिंचाई मंत्री बन जाना, नगर निकाय चुनाव में पार्वती कुमारी को विजयी भव का आशीर्वाद, दूसरे उम्मीदवार सियाराम सिंह को आशीर्वाद नहीं देना, पप्पू चाय वाले का सपने में उल्लू पर सवार मॅमा (बुढ़िया) को देखना, जित्तू हजाम का गहरी रात मेें शेर पर सवार त्रिशुलधारी मॅमा को देखना, स्थानीय कवि द्वारा बुढ़िया को कल्कि अवतार घोषित करना और उस पर एक चालीसा लिखना आदि सब प्रायोजित जादुई यथार्थ की तरह जबर्दस्त रोचक है। यह एक नई आख्यायिका थी जिसमें भूख, गरीबी और मजबूरी की कोई चर्चा नहीं थी। यह आख्यायिका तब गढ़ी जाती है जब ज्ञानू की मौत के बाद राजेश्वर प्रसाद का परिवार बगल के टूटे-फूटे मन्दिर में जाने लगता है। सही है कि यथार्थ तेजी से विस्थापित हो रहा था। बुढ़िया को कल्कि अवतार के रूप में महिमामंडित करना व्यवस्थागत साजिश थी। धंधाबाज योगेश यादव बिना हकलाए साजिश से पर्दा हटाता है- ‘‘मॅमा एक बड़ा प्रपंच है। विधायक जी का जादू वाला खेला है। इसका असर तो चुनाव के बाद देखिएगा। करोड़ों का खेला है...... कई सौ करोड़ का! (पृष्ठ 254)।’’
उपन्यास की कथाभूमि एवं छोटे बड़े सभी किरदारों का परिचय पाठक को मिल चुका है। इसका क्लाइमेक्स अगले सौ पृष्ठों में प्रस्तुत है।
नगर निगम का चुनाव हारने के बाद मुख्य किरदार सियाराम के भीतर एक नया सियाराम पैदा होता है। वे समाज-सेवा का मार्ग चुनते हैं। पत्रकार सर्वेश भावात्मक रूप से उनके साथ हैं। लेकिन उनके जीवन की त्रासदी अभी बाकी है। वे ‘तन से सुन्दर और मन से गन्दे लोगों का संग्रहालय’ रामलला अपार्टमेण्ट छोड़ कर मुर्ग़ियाचक में रहने आ जाते हैं।
पूँजीवादी सत्ता के नाटक का अंतिम दृश्य मुर्ग़ियाचक में मंचित होता है। नगर निकाय चुनाव का रिजल्ट आने के बाद शिव मंदिर की सीढ़ी पर मिली कल्कि अवतार बुढ़िया की भौतिक उपस्थिति गैर जरूरी हो जाती है। छठ पूजा की रात अवतरित हुई कल्कि देवी सरस्वती पूजा की रात लोपित होती है। धर्म के धंधेबाज मनमाना अफवाह फैलाने में जुट जाते हैं। इस प्रकरण का उपन्यासकार कथात्मक क्रिटिक रचते हैं। न्यू इंडिया का सपना बेचने वाली समिति अपनी सत्ता की जड़ों के सुदृढ़ीकरण के लिए कला माध्यमों का उपयोग जानती है। पाठक कश्मीर फाइल्स और केरला फाइल्स फिल्मों को याद कर सकते हैं। पौराणिक मिथकों पर आधारित धारावाहिक दूरदर्शन के माध्यम से घर-घर में परोसे जा रहे हैं। वृत्त-चित्र बनाये जा रहे हैं। सुख-समृद्धि सरकार नहीं लाएगी, सुख-समृद्धि बुढ़िया के नाम पर बने कल्कि-मंदिर में पूजा करने से आएगी। विधायक जी कल्कि माई मन्दिर निर्माण का प्रार्थनापत्र मुस्कराते हुए प्राप्त कर लेते हैं। ‘कल्कि माई निर्माण मोर्चा’ बन गया। वे गंगा की धारा से विशाल हंस पर सवार हो कर निकली और प्राचीन शिव मन्दिर की सीढ़ियों पर प्रकट हुई; फिर सरस्वती पूजा की रात हंस पर सवार हो कर गंगा में समा गई। अद्भुत वृत्त-चित्र! फिर शोभा-यात्रा और मस्जिद में जलती लुकाठी और समुदाय विशेष के लोगों की गिरफ्तारी। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक की स्मृतियों में मुजफ्फरनगर और संभल सहित अनेक प्रायोजित दंगे कौंधते हैं। उपन्यासकार यथार्थ के इन बिखरे टुकड़ों से देश के वर्तमान यथार्थ की कथात्मक प्रस्तुति करते हैं।
न्यू इंडिया के एक केन्द्रीय मंत्री के अखबार में छपे बयान से मुर्ग़ियाचक के लोगों को पता चलता है कि गंगा के किनारे यहाँ कल्कि माई मंदिर का निर्माण अवश्य होगा। मन्दिर निर्माण का ठेका एक बड़ी कंपनी को दी जाती है। कंपनी के लोग कल्कि माई मंदिर के लिए जगह चुनते हैं तथा मंदिर से गंगा तट तक कॉरिडोर निर्माण के लिए तोड़े जाने वाले मकानों पर निशान लगाते है; मकान की जमीन का कागजात दिखाने पर मुआवजा का आश्वासन देते हैं। अधिकांश गरीबों के पास मकान और जमीन के कागजात नहीं हैं। इस कथा-प्रसंग में ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘आन्दोलनजीवी’, ‘कमण्डलवाद’ पदों पर रोचक विमर्श गुंफित है।
न्यायपूर्ण मुआवजे के लिए प्रोफेसर राजेश्वर सिंह की लाल झंडा पार्टी के नेतृत्व में जुलूस निकलता है। उस जुलूस में अनिल साव (शिव मन्दिर के सचिव), सुनील साव (शिव मन्दिर के अध्यक्ष), बुजुर्ग सुभान खलीफा गुलाम के नेतृत्व में मुर्ग़ियाचक के तमाम लोग, योगेश यादव के पीछे ग्वालटोली के लोग, लाल झण्डे-पताके के साथ जुझारू कार्यकर्तागण रहते हैं। भीड़ के दबाव से बैरिकेड टूट जाता है। अचानक से फायरिंग की आवाज गूँजती है। सुभान खलीफा की पीठ में गोली लगती है। वे भहरा कर गिरते हैं। भीड़ बिखर जाती है। उनको अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। उनकी जान नहीं बच पाती है। जुलूस में पुलिस उनके आगे थी। पीठ में गोली पीछे से लगी। लेखकीय टिप्पणी गौरतलब है- ‘‘उस शाम खलीफा के जनाजे में..... विधायक जी तक ने चेहरा दिखाने की रस्म अदायगी से भी खुद को अलहदा रखा। मन्दिर के आसपास के तमाम हिन्दू...... गैरहाजिर थे। अनिल साव तक एक बार झाँकने नहीं आया (पृष्ठ 308)।’’
वामपंथी प्रोफेसर राजेश्वर सिंह, जिनका बेटा निशान्त, सियाराम सिंह के बेटा राजदीप सिंह चौहान के साथ, एक ही कॉरपोरेट कंपनी में ऊँचे पद पर हैं, वस्तुस्थिति का मूल्यांकन करते हैं- ‘‘यह सरकार धार्मिक एजेण्डे या ऐसे तमाम समाज में ख़लल पैदा करने वाले मुद्दे जानबुझकर उठा रही है...... यह अपने दूरगामी योजना के तहत काम कर रही है...... समाज की समरसता, सांस्कृतिक विभिन्नता और आपसी भाईचारा की भावना को जितना अधिक हो सके, मटियामेट कर दिया जाए। नफरत की भावना जितनी अधिक फैलेगी, व्यक्ति उतना ही अकेला और कमजोर होगा (पृष्ठ 309)।’’ वामपंथी डॉ. सिंह के बेटे की नौकरी कम्पनी में छँटनी के कारण चली जाती है। उनका मजाहिया स्वभाव और तमाम स्वास्थ्यवर्धक बातें हवा में विलीन हो जाती हैं।
न्यू इंडिया का मूल राजनीतिक एजेंडा मन्दिरों के जीर्णोद्धार की आड़ में भारतीय संविधान में निगमित ‘सेक्युलर’ शब्द की भावना को अशक्त एवं शून्य करता है। इसलिए एक सुबह तमाम अखबारों में एक खबर सुर्खी बनती है- ‘‘तीस फीट ऊँची बनेगी कल्कि माई की प्रतिमा (पृष्ठ 311)!’’ मुर्ग़ियाचक में खलबली मच जाती है। सियाराम सिंह की ‘अस्तित्व बचाव संघर्ष समिति’ पुनः सक्रिय हो जाती है। उपन्यासकार ने पृष्ठ 312 से 316 तक में जबर्दस्त जादुई यथार्थ का सृजन किया है। मुर्ग़ियाचक के चौराहे पर अचानक बेआवाज चौड़ी शानदार गाड़ी - रॉल्स रायस फैण्टम- का आगमन होता है। इस भव्य वाहन से निकलने वाले महामानव की प्रभावशीलता का बेजोड़ वर्णन उपन्यास में है- ‘‘वह इस सदी का ऐसा महामानव था, जिसके एक इशारे पर सत्ता और सरकार के सारे तिलिस्मों के दरवाजे खुल जाते थे (पृष्ठ 312)।’’ भारतीय सत्ता के गूढ़ चरित्र के बारे में बहुत गंभीर टिप्पणी है। यानी भारतीय सत्ता को नियंत्रित करनेवाली शक्तिपुंज प्रत्यक्ष सत्ता के बाहर है। प्रायः सत्ताओं का यथार्थ यही होता है। इस रिमोट कंट्रोल की झलक उपन्यास सफलतापूर्वक दिखाता है। यहाँ एक गहरा राजनीतिक बोध स्पष्ट है। उसी महामानव के पास ‘‘कल्कि माई के भावी मन्दिर का पूरा ब्लू प्रिंट है। भावी मूर्ति की तस्वीर के साथ-साथ पौराणिक धार्मिक ग्रन्थों से इस देवी के नाभि-नाल सम्बन्ध का सबसे प्रामाणिक साहित्य और ...... और...... (पृष्ठ 313)।’’ यह महामानव देश का एक विख्यात पूँजीपति है। मुर्ग़ियाचक के विस्थापित होने वाले लोग सियाराम सिंह के नेतृत्व में ‘महामानव गो बैक’ के नारे से उसका स्वागत करते हैं। लेकिन महामानव मुर्ग़ियाचक के लोगों को सपना दिखा कर लौटता है।
महामानव कोठी वाले को मुआवजे का विदेशी चेक सौंप कर भव्य वाहन से एयरपोर्ट चला जाता है। विस्थापन का विमर्श रचने के लिए दो मुख्य किरदार पूर्व पराजित संघी सियाराम सिंह और थके-घिसे वामपंथी प्रोफेसर डॉ. सिंह। इन दोनों की मनःस्थिति (आत्मगत स्थिति) का सटीक चित्रण उपन्यासकार ने किया है। ये स्वयं व्यक्तिगत समस्याओं में उलझे हैं। दोनों के बेटे विदेशी कंपनियों से छंटनीग्रस्त हैं। सियाराम का बेटा राजदीप दिल्ली या पुणे में शिफ्ट करना चाहता है; डॉ. सिंह का बेटा निशान्त भी भारत लौट आता है। लेकिन डॉ. सिंह ‘क्रान्तिकारी’ सुझाव देने से बाज नहीं आते हैं- ‘‘एक-एक घर में लाल झण्डा लहरवा दीजिए।’’ दूसरी ओर महामानव की कार्य-योजना शुरू हो गई है। विधायक जी इसे मन्दिर योजना के समर्थक है। स्वतंत्र पत्रकार अपनी शॉर्ट फिल्म के जरिये कॉरिडोर का विकल्प फ्लाई ओवर बताता है। जी-20 सम्मेलन के दौरान दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ियों को केन्द्र सरकार ने विशाल हरे पर्दो से ढँकवा दिया था कि विदेशी मेहमानों को भारत की गरीबी नजर नहीं आये। स्वतंत्र पत्रकार समय के यथार्थ का विमर्श रचता है- ‘‘ऐश्वर्य और समृद्धि की भव्यता का जहाँ भोंडा प्रदर्शन होता है धर्म और संस्कृति के नाम पर, वैसी जगह गरीबी और फटेहाली की नग्नता का दीखना, इस पूरे मखमली परिदृश्य पर टाट के पैबन्द की तरह नजर आएगी,.... इसे तो हटना ही है..... मिटना ही होगा (पृष्ठ 323)।’’
‘ख़लल’ के कथानक में महापण्डित कथावाचक आचार्य कौशलानन्द जी महाराज उर्फ चुलबुल बाबा में यदि पाठकों को युवा कथावाचक भूतदर्शी संत बागेश्वर बाबा की छवि दिखे तो आश्चर्य नहीं! जहाँ कल्कि माई मन्दिर के निर्माण के खिलाफ महिलाओं का जत्था धरना-प्रदर्शन कर रहा हो वहाँ हिन्दूत्व की शक्तियाँ चुलबुल बाबा जैसे संतों का इस्तेमाल करेंगी नहीं तो क्या करेंगी। इसलिए धरना-प्रदर्शन के पाँचवे दिन चुलबुल बाबा का पण्डाल धरना-स्थल से मात्र एक किलोमीटर पूरब गंगा तट पर बन गया। चुलबुल बाबा कल्कि माई की जबर्दस्त फर्जी कथा सुनाते हैं। धरना-प्रदर्शन इससे प्रभावित नहीं होता है। सियाराम सिंह धरना-प्रदर्शन का नेतृत्व करते हैं और उनकी बेटी और दामाद दोनों धरना के समर्थन में ठुमके लगाते हैं। एक शाम जन संस्कृति मंच के कलाकार भी प्रस्तुति देते हैं। लेकिन पूर्णिमा के दिन धरनार्थियों की संख्या कम रहती है। धरना-प्रदर्शन लंबा चलता और और गर्मियों के दिन आ जाते हैं। सत्ता चाल चलती है। बातचीत के लिए तीन लोगों को मुम्बई बुलाया जाता है। हवाई टिकटें एकदम तैयार। सियाराम सिंह, डॉ. सिंह और गुलाम का नाम ऊपर से तय होता है। धरना-प्रदर्शन के दौरान भूटन उर्फ़ जमीला और ग्वालटोली के शुक्ला नामक ‘डिश टीवी’ के समर्पित योगदान की मार्मिक उपकथाएँ बहुत टची हैं।
सियाराम सिंह, डॉ. सिंह और गुलाम की मुम्बई यात्रा का दिलचस्प वर्णन यहाँ विन्यस्त है। वामपंथी डॉ. सिंह और गुलाम सत्ता की रणनीति में फँस जाते हैं; आश्चर्यजनक रूप से बागी संघी सियाराम सिंह अपने को बचा लेते हैं। ‘‘डॉ. सिंह ने बताया कि पिछली रात उन्होंने चौपाटी पर बीयर पीते हुए गुजारी लेकिन यह छुपा गये कि उनके साथ एक मन-भावन सुन्दरी भी थी (पृष्ठ 336)।’’ मुर्ग़ियाचक की जमीन को दख़ल करने के लिए कंपनी का महामानव वार्ताकारों को सुरा, सुंदरी और अकूत धन (मुआवजा राशि) परोस कर, उनके बेटों (राजदीप-निशान्त) को कंपनी में समाहित कर, बाशिंदों को अच्छे दिनों का सपना दिखा कर, समझौते के दस्तावेजों पर उनका दस्तखत प्राप्त कर लेता है। तीनों नेताओं को राजी; कर लेने के बाद कंपनी तेजी से अपने कदम बढ़ाती है। उपन्यास के पृष्ठ 337 से 360 में कॉरपोरेट परस्त व्यवस्था के आंतरिक संसार के सत्याभासी यथार्थ के बिखरे टुकड़ों को उपन्यासकार कथात्मक अंदाज में संघनित करते हैं, जिसमें न्यू इंडिया निर्माण प्रक्रिया पर गहरा तंज अंतर्ध्वनित है। ढाई वर्ष के रिकॉर्ड समय में कॉरिडोर, मंदिर एवं सौंदर्यीकरण काम पूरा हो गया। जो एक सबसे जरूरी काम नहीं हो पाया सही से.... वह था विस्थापित लोगों के पुनर्वास और उनके रोजी-रोजगार से जुड़ी योजना का क्रियान्वयन। देखते-देखते दो वर्ष बीत जाते हैं। न्यू इंडिया के प्रधानमन्त्री कल्कि माई मंदिर का भव्य उद्घाटन करते हैं। ए आई तकनीक से ऐसी व्यवस्था की गई कि ‘‘प्रधानमन्त्री के विदा होने के समय प्रतिष्ठापित मूर्ति ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया और फिर एक हाथ हिला जनता का अभिवादन किया (पृष्ठ 353)।’’ एक कवि-वकील विस्थापितों के लिए कानूनी लड़ाई के लिए योगेश यादव और गुलाम से वकालतनामे पर पच्चीस हजार फीस के साथ दस्तखत करा लेता है। सबसे अधिक सियाराम सिंह प्रभावित होते हैं वे पुणे की सड़कों पर सुबह-शााम भटकते हुए अक्सर लोगों से पूछते दिखते हैं- ‘‘कोर्ट का फैसला आया का?’’ उपन्यास में मुख्य किरदार सियाराम सिंह की मनोदशा का मार्मिक वर्णन है। वे मुर्ग़ियाचक के विस्थापित बाशिंदो के दुःख-दर्द के सच्चे प्रतीक हैं। वे दीवार लेखन करते हैं- ‘‘दीवार लेखक जनक्रान्ति की दिशा में पहला कदम है।’’ एक दिन दिल्ली से विशेष पुलिस टीम उनको गिरफ्ताार कर लेती है। उन्हें ‘अर्बन नक्सल’ होने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है। उनका बेटा राजदीप और बहू इस संगीन मामले से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। उपन्यासकार अपने समय के बहुआयामी सत्य की कथात्मक पुनर्रचना करते हैं।
‘ख़लल' (उपन्यास)
लेखक : संतोष दीक्षित
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन प्रा. लि.
सी-21, सेक्टर- 65
नोएडा (उ.प्र.) - 201301
मूल्य : 450 रु.
प्रथम संस्करण : 2025
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| जितेन्द्र कुमार |
सम्पर्क :
जितेन्द्र कुमार
मो. 9113426600
शब्दसंख्या - 6950



27.05.2026
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद वरिष्ठ कवि एवं पहली बार ब्लॉग के संचालक आत्मीय संतोष कुमार चतुर्वेदी जी।