चन्द्रेश्वर का संस्मरण 'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'


अनन्त कुमार सिंह 


हाल ही में पटना में अनन्त कुमार सिंह पर जनवादी लेखक संघ की एक गोष्ठी हो रही थी। गोष्ठी के कई वक्ता ऐसे भी थे जो अनन्त कुमार सिंह के व्यक्तित्व और लेखन से परिचित ही नहीं थे। तब वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र कुमार ने इस बात पर अपनी चिन्ता जाहिर करते हुए कहा कि जनवादी लेखक संघ बिहार के सदस्य तक अगर अनन्त बाबू को नहीं जानते हैं तो यह दुखद है। अगर हम अपने ही लोगों को नहीं पढ़ेंगे तब साहित्य और रचना कर्म कैसे आगे बढ़ पाएगा। जब जनवादी लेखक संघ बिहार के लोग अनन्त बाबू को नहीं जानते तो बाहर के लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है। अनन्त जी ने 100 के आस पास कहानियां लिखी, एक उपन्यास लिखा और इसके साथ साथ सीमित संसाधनों के बावजूद आरा से 'जनपथ' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का निरन्तर संपादन करते रहे। कवि चन्द्रेश्वर से भी अनन्त जी के कुछ खट्टे कुछ मीठे सम्बन्ध रहे। अपने संस्मरण में चन्द्रेश्वर ने अनन्त बाबू को बेबाकी से याद किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चन्द्रेश्वर का संस्मरण 'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'।


अनंत कुमार सिंह पर संस्मरण 

'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'


चन्द्रेश्वर 


रविवार, 5 अप्रैल 2026 को जब कहानीकार शीन हयात के फ़ेसबुक वॉल से मुझे जानकारी मिली कि हम सबके प्रिय कथाकार एवं 'जनपथ' साहित्यिक पत्रिका के संपादक अनंत कुमार सिंह (अनंत बाबू) हमारे बीच नहीं रहे तो एक पल के लिए सहसा यक़ीन नहीं हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है? हालांकि सच तो यही था कि अनंत बाबू हमारे बीच अब नहीं रहे। मैं उनके बारे में उनकी मृत्यु के तत्काल बाद उनके बारे में कुछ लिख नहीं सका था। अब भी उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद भी उनकी स्नेहिल स्मृतियों को सहेज नहीं पा रहा हूं। वे मुझे एक तरह से अपना छोटा भाई मानते थे और जब मुझसे किसी बात को ले कर उनकी अनबन होती थी तो वे मेरी जीवनसंगिनी कवयित्री इन्दु जी से मेरी शिकायत करते थे। वे इन्दु जी को अपनी भावह मानते थे। 


सन् 2009-10 की बात रही होगी जिन दिनों युवा कवि कुमार वीरेंद्र (अब कुमार वीरेंद्र लुकाठियन) 'जनपथ' के कार्यकारी संपादक बनाए गए थे। कुमार वीरेंद्र के काफी अनुरोध एवं दबाव पर ही मैंने 'जनपथ' के लिए एक स्तंभ 'मित्र की कविता' लिखना आरंभ किया था। उन दिनों यह पत्रिका मासिक निकल रही थी और इसे दिल्ली सरकार से हर अंक पर विज्ञापन भी मिल रहा था। मैंने इस स्तंभ में सबसे पहले एकांत श्रीवास्तव पर लिखा था। एकांत मेरे समकालीन हिन्दी कवि हैं। नवें दशक की समकालीन हिन्दी कविता के दुलरुआ कवि भी। बाद में अपने कुछ समकालीन हिन्दी कवियों में निलय उपाध्याय, विमल कुमार, बद्रीनारायण पर लिखा था। इस स्तंभ का आख़िरी और चौथा लेख बद्रीनारायण पर ही लिखा गया था। बद्रीनारायण पर जब मैंने लेख लिखा तो अनंत बाबू ने उसमें से कुछ अंशों को तब हटाने के लिए कहा था। जब मैं अपने आलेख के उन कुछ अंशों को न हटाने के अपनी ज़िद पर अड़ा ही रहा तो अनंत बाबू ने कहा था कि मेरी भावह से बात कराइए। मैंने अंततः अपने लेख से उस अंश को हटा तो दिया था, मगर 'जनपथ' में उस स्तंभ में वह लेख आख़िरी साबित हुआ था। दरअसल हुआ यह था कि मैंने बद्रीनारायण को नवें दशक के कवियों में नया घनानंद साबित करने की कोशिश की थी। 


उस दौर को ले कर एक बात सबकी स्मृति में अब भी होगी कि जब बद्रीनारायण को 1991 में उनकी एक कविता 'प्रेमपत्र' पर भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला था तो उस वर्ष के निर्णायक वरिष्ठ हिन्दी कवि केदारनाथ सिंह ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि बद्रीनारायण 'प्रेम की पीड़ा' के कवि हैं। बद्रीनारायण को वह पुरस्कार उनकी एक कविता 'प्रेमपत्र' पर मिला था। मैंने जो लिखा था उसका आधार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक लोकप्रिय कथन था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य के इतिहास' में रीतिमुक्त कवि घनानंद को 'प्रेम के पीर का' कवि कहा है। आचार्य शुक्ल के ही 'प्रेम के पीर' पद को ले कर उसमें केवल 'पीर' शब्द को केदार नाथ सिंह ने 'पीड़ा' में बदल दिया है। इसी बात पर अनंत बाबू ने कहा था कि बद्री नारायण अपने आरा ज़िले के कवि हैं। इस बात से उनके कवि का महत्व कम होता है। अंततः वह अंश हटाया गया था तब मेरा आलेख छपा था। इसी के बाद से मैंने 'जनपथ' में 'मित्र की कविता' स्तंभ लिखना हमेशा के लिए बंद कर दिया था।



इस घटनाक्रम के बाद भी 'जनपथ' में कुमार वीरेंद्र ने मेरी कुछ कविताएं छापी थी। अनंत बाबू ने उसका विरोध नहीं किया था। हमारे साथ उनका सम्बन्ध सामान्य ही हो रहा था कि एक और घटना घटी थी। आरा में 2009 में ही जलेस की ओर से मेरा एकल काव्य पाठ कुमार वीरेंद्र ने रखा था। कुमार उन दिनों भोजपुर जलेस इकाई के सचिव थे। मेरा काव्य पाठ सुधाकर उपाध्याय के आवास, मदन जी का हाता, पकड़ी चौक के पास आयोजित किया गया था। उस काव्य पाठ में श्रीराम तिवारी, जगदीश नलिन, नीरज सिंह, अनंत कुमार सिंह भी शामिल हुए थे। काव्य पाठ आरंभ होने के कुछ पहले मैंने अनंत बाबू के आगमन के कुछ समय पहले ही बैठक में उपस्थित लोगों के सामने कह दिया था कि 'अगर मुझे अनंत कुमार सिंह और कुमार वीरेंद्र में से किसी एक को ही चुनना होगा तो मैं कुमार वीरेंद्र को चुनूंगा।' जब यह बात अनंत बाबू को पता चली तो वे, स्वाभाविक था कि बहुत दुःखी हुए। इसी के बाद उनसे मेरा मिलना-जुलना कम होता गया था। दरअसल जब एक लंबे अरसे बाद मैं अपने उस बयान पर सोचता हूं तो पाता हूं कि मेरा वह बयान निहायत ही अपरिपक्व था। मुझे इस तरह स्पष्ट नहीं बोलना चाहिए था। हालांकि इस बयान के पीछे भी मेरी एक पीड़ा छुपी हुई थी। आरा में मैं जिन कहानीकारों के संपर्क में आया उनमें से किसी ने खुल कर तो किसी ने दबी जुबान से मुझे कहानी आलोचना लिखने के लिए ही प्रेरित किया। इसी तरह मेरे समकालीन कवियों ने भी मुझे कविता की आलोचना की तरफ़ मोड़ना चाहा था। ऐसी जटिल परिस्थितियों के बीच उस दौर में सिर्फ़ कुमार वीरेंद्र ने ही मुझे बराबर कविता लिखते रहने के लिए प्रेरित किया और आरा में जलेस की ओर से कई बार मेरा एकल काव्य पाठ आयोजित कराया। मैं आज भी मानता हूं कि मेरी प्रिय विधा कविता है। इसके बाद कथेतर गद्य लेखन में मेरा मन रमता है। आलोचना मेरे लेखन की दुनिया में सबसे बाद में जगह पाती है।


जो भी हो, अनंत बाबू से मुझे जो स्नेह, सहयोग मिला था, वह अपरिमित और अतुलनीय है। मैं दिसंबर 1991 में जब इप्टा आंदोलन पर डा. शिव कुमार मिश्र के निर्देशन में शोध करने के बाद पुनः गांव लौट आया तो तीन साल नौकरी मिलने की प्रतीक्षा में बीते थे। इसके बाद पुनः मैं आरा में परिवार सहित लौट आया था। 1995 में। उस दौरान लगभग रोज़ाना दोपहर बाद अनंत बाबू के कोआपरेटिव बैंक में उनसे मिलने आता था। वे उन दिनों ब्रांच मैनेजर थे। कभी- कभी मैं इन्दु और अपने दो बच्चों के संग भी उनके बैंक में पहुंच जाता था। वे हमें देख कर परेशान नहीं होते थे और ज़ोरदार स्वागत किया करते थे। वे रसगुल्ले और समोसे मंगा कर खिलाते थे। वे मेरे बेरोज़गारी के दिनों में संबल बने थे। उनका स्नेह और मधुर व्यवहार सभी मिलने-जुलने वाले लेखकों से इसी तरह का होता था। 


उनके बारे में एक बार मेरे कवि मित्र निलय उपाध्याय ने कहा था कि 'अनंत बाबू रिश्तों के प्रति चयनधर्मी नहीं हैं। उनके दिल के दरिया में बहुत सी अच्छी चीजों के साथ खर-पतवार भी बहता रहता है।' जो हो, मेरा अनुभव है कि अनंत बाबू अपने स्वभाव में नरमी, तरलता एवं कोमलता रखते हुए भी अपनी शर्तो पर रिश्ते बनाते थे। मेरे अंदर सब कुछ के बावजूद उनके लिए गहरे सम्मान का भाव था। वे एक अच्छे इंसान के साथ-साथ, एक अच्छे कहानीकार और संपादक भी थे। हालांकि मेरे साथ उनका रिश्ता पहले की तरह फिर कभी सामान्य नहीं हो पाया। एक बार वे 2015 में जब जलेस के एक बड़े कार्यक्रम में लखनऊ आए थे तो उनसे मेरा आमना-सामना हुआ था। मेरे अभिवादन के बाद भी उनकी बेरूखी क़ायम थी। बहरहाल, मुझे यह बात अब भी परेशान करती है। उन्होंने एक बार मुझे 'जनपथ' का अतिथि संपादक भी बनाना चाहा था। उनकी इच्छा थी कि केदार नाथ अग्रवाल पर मैं 'जनपथ' का एक अंक संपादित करूं। मैंने अपनी व्यस्तता के चलते मना कर दिया था। 


जो भी हो, अनंत बाबू एक ऐसी शख़्शियत हैं जो हमेशा मेरी स्मृतियों में बसे रहेंगे। वे कहानीकार उपन्यासकार दोनों ही थे। मेरी स्मृति के अनुसार उन्होंने 100 के आस पास कहानियां लिखी थी। एक उपन्यास 'ताकि बची रहे हरियाली' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। एक उपन्यास और था, उसका शीर्षक याद नहीं आ रहा है। उनकी कुछ कहानियां जो मेरी स्मृति में अब भी कौंध रही हैं, वे हैं - "और लातूर गुम हो गया", "चौराहे पर", "भैरवी राग", "अब और नहीं", "अथ चुनाव कथा"," जागते रहो", "हीरवा की मौत", "उसका फ़ैसला", विभाजन रेखा", "ब्रेकिंग न्यूज", "अपने लोग" आदि। वे आरा स्कूल के कहानीकार थे। उन्होंने मगध विश्वविद्यालय, बोध गया से अर्थशास्त्र में एम. ए. किया था। उन्होंने देर से कहानी लिखना आरंभ किया था। उनकी पहली कहानी "अपने लोग' 1984 में हिन्दू सिख दंगे पर लिखी गई थी। इस पर जलेस आरा इकाई की ओर से गोष्ठी भी हुई थी। बाद में 1985 में यह कहानी सव्यसाची की पत्रिका "उत्तरार्द्ध" में छपी थी। उन दिनों मैं आरा जैन कालेज में हिन्दी विषय में एम. ए. का छात्र था। सन् 1984 में ही जैन कालेज, आरा में हिन्दी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई प्रारंभ हुई थी। हम लोग का बैच पहला था। बहरहाल,अनंत कुमार सिंह के कहानीकार को नवें दशक में एक पहचान मिली थी। बिहार सरकार की ओर से उनके कथा साहित्य पर कुछ पुरस्कार भी मिले थे। आरा उनकी कर्मभूमि थी। वे मूलतः रहने वाले थे गया ज़िले के बहेरा कलां गांव के। यह गांव आमस रोड पर स्थित है। वे बैंक की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद कुछ साल आरा में ही रहे, अपने मित्र संजय श्रीवास्तव के साथ। अंततः वे गांव पर ही जा कर रहने लगे थे। उनका अचानक हमारे बीच से इस तरह अनुपस्थित होने से हमारे जैसे उनके कई मित्रों के मन को गहरा आघात पहुंचा है। उनकी स्मृति को हमारा प्रणाम। 

 

चंद्रेश्वर 


सम्पर्क


मोबाइल : 9236183737

टिप्पणियाँ

  1. संस्मरण में, किंचित, उनकी वैचारिकी पर भी लिखा जाना चाहिए था। संस्मरण सुपठनीय है। मैं भी कुछ एक समृद्ध साहित्यकारों की संगत में रहा। उनके आचरण की विराटता याद आती है। यह संस्मरण पढ़ कर लगा, वैसी विराटता अनंत बाबू में थी। स्मृति-नमन🙏

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  2. अनंत बाबू ने 'जनपथ' में मेरे पहले हिन्दी कविता संग्रह 'कविता का सर्वनाम ' की समीक्षा छापी थी।मेरी वरीय सहकर्मी पदाधिकारी नीलम पांडेय जी जो स्वयं एक कहानीकार थीं ,से मिलने वे बराबर सूचना भवन आते थे।उन्हीं मुलाकातों में मैं भी शामिल हो जाता था कभी-कभी।उनकी सहजता ,उदारता ,निश्छलता पहली बार में ही सकारात्मक प्रभाव छोड़ती थी किसी पर भी।
    चंदेश्वर जी ने बहुत बेबाकी से उन्हें याद किया है।अनंत जी के रसगुल्ले भी बद्रीनारायण जी की रसगर प्रेम कविताओं के प्रति जिसे आसक्त नहीं कर पाये ,वे कान्ता सम्मत उपदेश से द्रवीभूत हो गये! चलिये संस्मरण में आरा के बद्रीनारायण के प्रति अनंत बाबू की पक्षधरता न तो अनुचित प्रतीत होती है न ही 'जनपथ ' के प्रति चंचंदेश्वर जी का विराग ही अस्वाभाविक लगता है।संस्मरणकार ने अनंत बाबू के साथ-साथ अपने को भी पूरी तरह बचा लिया है।विराग का यह रागत्व सचमुच स्पृहणीय है।-सुनील कुमार पाठक, पटना।।

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    1. चंदेश्वर की जगह 'चंद्रेश्वर' पढढ़ा जाये कृपया।

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  3. स्मृति लेख से नवेदशक के कवि कथाकार अनंत कुमार सिंह पर अच्छी जानकारी दी है। बधाई

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