कुमार अंबुज की कविताएँ


कुमार अंबुज


कविता की दुनिया में कुछ कवि ऐसे हैं जिनका लिखा काफी कुछ अपना लगता है। पढ़ने गुनने का मन होता है। जो सत्ता की चाटुकारिता करता है वह भांड होता है। जो सत्ता की आलोचना करता है वह कवि होता है। कवि तो बेखौफ होता है। वह बेखौफ लिखते हुए ही अच्छा लगता है। आज के दौर में जब मीडिया के साथ साथ साहित्य भी सत्ता का पिछलग्गू बन चुका है, कुमार अंबुज बेखौफ कविताएँ लिख रहे हैं। लगातार लिख रहे हैं। आज उनका जन्मदिन है। प्रिय कवि को जन्मदिन की बधाइयाँ व ढेर सारी शुभकामनाएँ! आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं कुमार अंबुज की कविताएँ। 



कुमार अंबुज की कविताएँ


एक ही प्रेम 


एक प्रेम काफ़ी है ज़िन्दा रहने के लिए 

एक ही प्रेम नष्ट होने के लिए 

पर्याप्त है एक प्रेम का दंड


एक का ही वरदान कर देता है धन्य 

एक प्रेम की निराशा फैल जाती है दूर तक

और वही थाम लेता है आशा का चिथड़ा 

एक प्रेम से ऊब पैदा होती है, उसी से तृप्ति


एक प्रेम सूर्योदय और सूर्यास्त के लिए 

वही काफ़ी है रात में चाँद सितारों के वास्ते

एक प्रेम की व्यग्रता हो सकती है बर्दाश्त

सँभाली जा सकती है बस एक प्रेम की प्रसन्नता 

एक प्रेम गर्व से कर देता है सिर ऊँचा


और वही बैठा देता है घुटनों के बल 

जब कोई नहीं रहता, कुछ नहीं बचता 

सब विदा ले चुके होते हैं तो अतल की तलहटी में 

सूखे उजाड़ जीवन में टिमटिमाता है वही एक प्रेम 

उसकी टिमटिमाहट दिखती है प्रखर रोशनी की तरह 

जब सब तरफ़ कोलाहल, आपाधापी और घबराहट होती है


एक वही प्रेम हाथ थामकर देता है आत्मीय एकान्त 

और वही धकेल देता है जीवन की भागमभाग में 

एक ही प्रेम कर देता है जीना मुश्किल 

और एक उसी के लिए तो अटकी हुई है यह साँस।



तानाशाह की पत्रकार-वार्ता


वह हत्या मानवता के लिए थी

और यह सुंदरता के लिए

वह हत्या अहिंसा के लिए थी

और यह इस महाद्वीप में शांति के लिए

वह हत्या अवज्ञाकारी नागरिक की थी

और यह जरूरी थी हमारे आत्मविश्वास के लिए

परसों की हत्या तो उसने खुद आमंत्रित की थी

और आज सुबह आत्मरक्षा के लिए करना पड़ी

और यह अभी ठीक आपके सामने

उदाहरण के लिए! 



आदिवास


यदि मैं पत्थर हूँ तो अपने आप में एक शिल्प भी हूँ


जैसा मैं हूँ वैसा बनने में मुझे युग लगे हैं

हटाओ, अपनी सभ्यता की छैनी

हटाओ ये विकास के हथौड़े


मैं पत्थर हूँ, पत्थर की तरह मेरी क़द्र करो


ठोकर ज़रा सँभल कर मारना

पत्थर हूँ।



मुश्किल तो मेरी है


सड़कों पर, चैबरों में,

टी.वी. पर, ट्रेनों में, अखबारों में,

हर तरफ हैं धर्म की ध्वजाएँ

उनको क्या मुश्किल होना, मुश्किल तो मेरी है 


मैं जो रिक्शा चलाता हूँ

मैं जो बीड़ी बनाता हूँ

मैं जो गन्ना उगाता हूँ

मैं जो ट्रैफिक में फँस जाता हूँ

मैं जो उधारी में पड़ जाता हूँ

मैं जो शहनाई बजाता हूँ

मैं जो भूख से बिलबिलाता हूँ

उनका क्या, मुश्किल तो मेरी है 


मैं जो बच्चों की फीस नहीं चुका पाता हूँ

मैं जो कचहरी के चक्कर लगाता हूँ

मैं जो हाट-बाजार में घिर जाता हूँ

मैं जो ठंडे फर्श पर सो जाता हूँ

मैं जो निरगुनियाँ गाता हूँ

पड़ोसी से एक कटोरी शक्कर लाता हूँ

और आसपास के सुख-दुख में शामिल होते हुए

आखिर अपना हिंदू होना भूल जाता हूँ। 




मिटाने का गाना


जो कुछ बेहतर था उसे मिटा चुका हूँ

जो नहीं था उसे भी मिटा दिया है- था कह कर

यह जो दिखता है किसी और का हमारे जैसा नहीं

       इसलिए मिटाया है इसे अभी-अभी


संज्ञाएँ सर्वनाम विशेषण व्याकरण- मिटा रहा हूँ

संधि समास अलंकार भाषा- मिटा रहा हूँ

जो नहीं है मगर ज़रूरी है जिसका होना

उसकी संभावना उसकी आशा तक मिटा रहा हूँ


स्मृति इतिहास क्षेपक संस्कृति- मिटा रहा हूँ

मेरी कार्यसूची मेरी प्राथमिकता है मिटाना

आयात निर्यात यातायात मिटा रहा हूँ

मेरी कामयाबी मेरी उपाधि है- मिटाना

मिटाने का कहो कुछ भी

मैं मिटाना विशेषज्ञ मिटा दूँगा तुरंत


पर्वत समुद्र पर्यावास आदिवास- मिटा रहा हूँ

नदी, जंगल, झील, जलप्रपात- मिटा रहा हूँ

मिटाने के कर्तव्य पथ पर 

मिट जाऊँगा मैं भी एक दिन

नया कुछ भी बनाते हुए तुम्हें हरदम 

याद आता रहेगा-

         मेरा मिटाना।



आविष्कार

(संध्या के लिए)


हम धूल के बादलों को पीछे छोड़ आए हैं

तूफ़ानों से गुज़रने के निशान

                        नश्वर देह पर हैं

हमारे आगे पाँच हज़ार साल हैं अभी

दरअसल, अब समय की गणना का

कोई अर्थ नहीं रह गया है


हमारे पास आकाशगंगाएँ हैं

और साथ–साथ चलते आने से

यह ज़मीन और यह हवा

अँधेरे में जब हम एक–दूसरे को छूते हैं

तो प्रकाश होता है


हम चंद्रमा की तरफ़ उस निगाह से देखते हैं

जो दाग़ नहीं सुंदरता देखती है

इस चाँदनी में

यह जान लेना कितना अलौकिक है

कि तुम लौकिक हो

और मैं तुम्हें स्पर्श कर सकता हूँ

अपनी इंद्रियों से।


  

विस्मृति

(पिता के लिए)


एक दिन गड्डमड्ड होने लगती हैं चीज़ें, क्रियाएँ,

नाम, चेहरे और सुपरिचितताएँ

फिर तुम स्मृति का पीछा करते हो

जैसे बचपन की उस नदी का जो अब निचुड़ गई है

और हाँफते हुए समझने की कोशिश करते हो

कि विस्मृति ही अन्तिम अभिशाप है या कोई वरदान 


कुछ याद करना चाहते हो तो एक परछाईं-सी दिखती है

जो विलीन हो जाती है किसी दूसरी परछाईं में

इस अनुभव के आगे सारे दुख फीके हैं और बीत चुके हैं

दूर कहीं तुम उनकी तरफ़ देख कर मुस्करा सकते हो

लेकिन उनके मुखड़े याद नहीं आते

यही असहायता है, इतनी ही शेष रह गई है ताक़त 


ईर्ष्याएँ याद नहीं आ रहीं, क्रोध के सूर्य अस्ताचल हुए

प्रेम के चन्द्रमा डूब गए, वासनाएँ जारी हैं

जाने कैसे बची रह गई है स्पर्श की आदिम स्मृति

किसी को न पहचानने से अब कोई अपमानित नहीं होता

अगर पहचान लो तो वह अप्रतिम ख़ुशी से भर जाता है 


कोरी हो चली स्लेट पर लिखी जा रही हैं नई इबारतें

और सबक हैं कि याद नहीं रह पाते। 



भाई साहब 


भाई साहब नहीं होते तो मैं कुछ नहीं होता 

अभी भी कुछ नहीं हूँ जो हैं भाई साहब हैं 

यहाँ तक भी भाई साहब लेकर आए हैं

वहाँ तक भी गया तो

भाई साहब ही ले कर जाएँगे 

शोभा-यात्रा में भाई साहब ने ही बैठा लिया था 

उनकी सेवा में ही रहा कुछ दिन कारा में

भाई साहब के साथ फिर गया था जयकारा में 

लेकिन मेरे माथे पर नहीं कोई कलंक 

यह जो तिलक है

यह तो लगाया है भाई साहब ने ही


संगीन मौक़ों पर सगे भाई, रिश्‍तेदार, दोस्‍त

संगठन, साथी जब कोई नहीं आए काम

हमेशा भाई साहब ही मिले सामने मुस्‍कराते

मैंने शेष जीवन उन पर हारा

हालाँकि मेरे अपने भी हैं कुछ सिद्धांत 

अपनी जीवन शैली है और विचारधारा 

बस, मैं भाई साहब को मना नहीं कर पाता


प्रेम है भाई साहब का

इसलिए चला आया उनके साथ 

मुझे राजनीति से नहीं

भाई साहब से है प्‍यार भरपूर

उन्‍होंने ही सिखाया कीचड़ में खिलकर 

              कैसे रहें कीचड़ से दूर


कौन कहता है दक्षिणपंथी हैं भाई साहब 

अस्मितावादी, समाजवादी और वामपंथी भी

उन्‍हें भाई साहब ही कहते हैं 

वे भी हर वक्‍़त

हर किसी के लिए तत्पर रहते हैं 

उनके चेहरे पर दमकता है सदा

सहायता करने का संतोष 

उन्हें चंदा देने से नहीं लगता किसी को दोष 


भाई साहब हैं सर्वोपरि

मैं तो अनुज हूँ उनका छोटा भाई

सब जानते हैं समरथ को नहीं दोष गुसाईं

उनके कहने से ही ले रहा हूँ आपका ज्ञापन

कल मिल जाएगा आपको भाई साहब का विज्ञापन 

उनकी आज्ञा से ही दे रहा हूँ साक्षात्‍कार

मैंने तो कभी किया नहीं किसी पर अत्‍याचार

और भाई साहब तो संत हैं जैसे अल्‍लाह मियाँ की गाय 

वे नहीं होने दे सकते किसी के साथ अन्‍याय


हाँ, तलवार के साथ यह तस्‍वीर मेरी है

लेकिन मैं तो गया था दंगा रोकने

भाई साहब ने ही भेजा था भला मेरी क्‍या बिसात 

मैं सीधा-सादा आदमी

मेरे दामन पर नहीं कोई दाग़ 

हर जगह से बाइज्‍़ज़त बरी हुआ बारम्‍बार 

मुझे क्‍या मतलब चुनाव में जीत हो या हार 

मगर मैं भाई साहब के लिए सह सकता हूँ गाली

तो भाई साहब के लिए चला सकता हूँ गोली भी

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या 

यह दुनिया अगर जल भी जाये तो क्‍या

बस, मैं भाई साहब को कुछ नहीं होने दे सकता 

उन्हें किसी बात के लिए

            न नहीं कह सकता। 





जिसे ढहाया नहीं जा सका


जिसे तुमने सचमुच गोली मार ही दी थी

वह अब भी मुसकराता है तुम्हारे सामने दीवार पर

तुम्हारे छापेख़ाने उसी की तस्वीर छापते हैं

तुम दूसरे द्वीप में भी जाते हो तो लोग तुमसे पहले

उसके समाचार पूछते हैं तब लगता है तुम्हें

कि दरअसल तुम मरे हुए हो और वह ज़िन्दा है 


बुदबुदाते हुए हो सकता है तुम ग़ाली देते हो मन में

लेकिन हाथ जोड़ कर फूल चढ़ाते हो और फोटू खिंचाते हो

तुम शपथ लेते हो वह सामने हाथ उठाए दिखता है

तुम झूठ बोलते हो वह तुम्हारे आड़े आ जाता है

घोषणापत्र में तुम विवश दोहराते हो उसी की घोषणाएँ 


अब तुमने ढहा दी है उसकी मूर्ति तो देखो

सब तरफ़ सारे सवाल उसी मूर्ति के बारे में हो रहे हैं

बार-बार दिखाई जा रही हैं उसी मूर्ति की तस्वीरें

उसी चौराहे पर इकट्ठा होने लगे हैं तमाम पर्यटक

जिन्हें बताया जाता है कि यहाँ, यहीं, हाँ, इसी जगह,

वह मूर्ति थी। 



शृंखला


इस तरह तुम अकेले नहीं मर सकते

साथ में वह मरेगा जिसने तुम्‍हें मरते देखा

संदेहास्‍पद वह भी मरेगा जिसने तुम्‍हें मरते नहीं देखा

परिजन रिश्तेदार दोस्‍त जो दुख मनाएँगे मरेंगे

वे जो तुम्‍हारे मरते ही मर गए आधे-अधूरे पूरे मरेंगे

वे तारे टूटकर मरेंगे जिनके नीचे खुले में तुम मरे

सहकर्मी सहयात्री सहपाठी मरेंगे

       जो बता सकते हैं तुम कैसे मरे 

पोस्‍टमार्टम करनेवाला मरेगा फोरेंसिक प्रमुख मरेगा

जाँच अधिकारी मरेगा गवाह वकील न्‍यायाधीश मरेगा 

वे सब मरेंगे जो जानते हैं कि तुम क्यों मरे

गाँधी के तीनों बंदर मरेंगे आठ-दस यूट्यूबर मरेंगे

इस युग में तुम यों ही अकेले नहीं मर सकते 

जो लिखेगा मरेगा पत्रकार कथाकार कवि मरेगा

शख्‍़स जो पूछेगा कैसे मरा वह मरेगा  

जो मोमबत्‍ती जलाएगा मरेगा

जिसने हेल्‍प नंबर डायल किया मरेगा

लड़की मरेगी जो उस वक़्त फ़ुटपाथ से गुज़र रही थी 

पार्क में खेल रहा बच्चा और मारनेवाला शूटर मरेगा

जिस हवाई जहाज़ में बैठे उसका  पायलट मरेगा 

जिसने तुम्‍हें सबसे आख़िर में खाना परोसा

                                  वेटर मरेगा

उपदेशक मरेगा समाज सुधारक वैज्ञानिक मरेगा

ईमान मरेगा विधान मरेगा एक स्वप्न मरेगा

वीडियो बनाया जिसने वीडियो चढ़ाया

जिसने शेयर किया मरेगा

दीवार पर लिखा तुम्हारा सुभाषित मरेगा

फिर तुम्‍हारी किताबें तुम्‍हारी साइकिल तुम्‍हारा मकान

तुम्‍हारी व्‍हील चेयर मरेगी

वे झाड़‍ियाँ मरेंगी और वे फूल मरेंगे

जिन पर तुम मरते समय गिर गए 

जो याचिका दायर करेगा मरेगा

जिसे तुमने और जिसने तुम्हें किया प्रेम मरेगा

कोई इसलिए कि यह सब देख कर क्यों नहीं मरा

                                    अब मरेगा।


क्रूरता


धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा

प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी

झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा

क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा

एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग

पराजित न होने के लिए नहीं

अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी

फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में

फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में

फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी

निरर्थक हो जाएगा विलाप

दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू

पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को

फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी

लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी

सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे

सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता

और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी

उसका कोई विरोधी न होगा

कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य

और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी

और सोख लेगी हमारी सारी करुणा

हमारा सारा शृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए

और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना। 




 

शीर्ष बैठक


वह एक मुस्कराहट के साथ सभागार में प्रवेश करता है

उसने आते ही हर शख़्स को क़ब्ज़े में ले लिया है

कक्ष में बार-बार उसकी सिर्फ़ उसकी आवाज़ गूँजती है

वह विनम्र है लेकिन हर बात का उत्तर हाँ में चाहता है


धीरे-धीरे उसे घेर लिया है आँकड़ों ने

ग़ायब होने लगी है उसकी हँसी

वह चीखता है : मुझे यह काम दो दिन में चाहिए

और ठीक अगले ही पल तानता है मुट्ठियाँ

मानो अब मुक्काबाज़ी शुरू होने को है


अचानक वह गिड़गिड़ाने लगता हैः

देखिए, आप तो मरेंगे ही

मुझे भी ठीक से नहीं रहने देंगे

फिर वह तब्दील हो जाता है एक याचक में

वातानुकूलित कक्ष में सब उसके माथे पर

देखते हैं पसीने की बूँदें

दोपहर हो चुकी है और वह ग़ुस्से में है

अब वह किसी भी तरह का व्यवहार कर सकता है

उसके पास से विचार ग़ायब होने लगे हैं

उसकी अभिव्यक्ति चार-पाँच वाक्यों में सिमट गई है

‘मुझे परिणाम चाहिए’- एक मुख्य वाक्य है


उसकी कमीज़ पर चाय और दाल गिर गई है

लेकिन उसके पास इन बातों के लिए वक़्त नहीं है

वह कहता है चाहे बारिश हो या भूकंप

मुझे व्यवसाय चाहिए और और और

         और और और चाहिए

इतने भर से क्या होगा कहते हुए

वह अफ़सोस प्रकट करता है

फिर दुख जताता है

कि उसे ही हमेशा घोड़े नहीं दिए जाते

और जो दिए गए हैं वे दौड़ते नहीं


वह अगला वाक्य चाशनी में डुबोकर बोलता है

लेकिन सख़्त हो चुकी हैं उसके चेहरे की माँसपेशियाँ

उसके शब्द पग चुके हैं अनश्वर कठोरता में

हालाँकि वह अपने विद्यार्थी जीवन में सुकोमल था

ख़ुश होता था पतंगों को, चिड़ियों को देखते हुए

वह फ़ुटबॉल खेलता था और दीवाना था क्रिकेट का

लेकिन अब उससे कृपया खेल, पतंग

या पक्षियों की बातें भूल कर भी न करें

उससे सिर्फ़ असंभव व्यवसाय के वायदे करें

और अब उस पर कुछ दया करें

हड़बड़ाहट में आज वह

    रक्तचाप की गोली खाना भूल गया है


वह आपसे इस तरह पेश नहीं आना चाहता

लेकिन सत्ता, बाज़ार और महत्वाकांक्षाओं ने

उसे एक अजीब आदमी में बदल दिया है

बाहर शाम ढल रही है

पश्चिम का आसमान हो रहा है गुलाबी

पक्षी लौट रहे हैं घोंसलों की तरफ़ और हवा में संगीत है

लेकिन वह अभी कुछ घंटे और इसी सभागार में रहेगा

जिसमें लटकी हैं पाँच सुंदर कलाकृतियाँ 

मगर सब तरफ़ घबराहट फैली हुई है।



एक स्त्री पर कीजिए विश्वास


जब ढह रही हों आस्थाएँ

जब भटक रहे हों रास्ता

तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास

वह बताएगी सबसे छिपा कर रखा गया अनुभव

अपने अँधेरों में से निकाल कर देगी वही एक कंदील

कितने निर्वासित, कितने शरणार्थी,

कितने टूटे हुए दुखों से, कितने गर्वीले

कितने पक्षी, कितने शिकारी

सब करते रहे हैं एक स्त्री की गोद पर भरोसा

जो पराजित हुए उन्हें एक स्त्री के स्पर्श ने ही बना दिया विजेता

जो कहते हैं कि छले गए हम स्त्रियों से

वे छले गए हैं अपनी ही कामनाओं से

अभी सब कुछ गुजर नहीं गया है

यह जो अमृत है यह जो अथाह है

यह जो अलभ्य दिखता है

उसे पा सकने के लिए एक स्त्री की उपस्थिति

उसकी हँसी, उसकी गंध

और उसके उफान पर कीजिए विश्वास

वह सबसे नयी कोंपल है

और वही धूल चट्टानों के बीच दबी हुए एक जीवाश्म की परछाईं।



मृतकों की सूची


मृतकों की इस सूची में कितनी कमनिगाही है

कितनी ग़लतियाँ और कितनी लापरवाही

जबकि सब जानते हैं

इस संसार में एक को मारने से एक नहीं मरता

चार–छ: तो तुरंत ही मर जाते हैं

और पच्चीस-पचास धीरे–धीरे


जो लोग सोते हुए मारे गये

उनके सपनों में जितनी बातें थीं

जितने लोग थे जितने जीवन

वे सब मारे गये असमय

जो जाग रहे थे

उनके पास भी थीं आदमक़द इच्छाएँ

इन सबकी गिनती यहाँ छूट गई है

          बच्‍चों की तो बात ही क्या 


हालाँकि आप मनुष्यों द्वारा बापर ली गईं चीज़ों को

सिर्फ़ वस्तुएँ ही मानते आए हैं

फिर भी एक पुरानी नाव, मिट्टी का घड़ा

एक गेंद, लकड़ी की तीन पीढ़ी पुरानी कुर्सी

पीतल का हुक़्क़ा, राखदानी और उस कत्थई

     ओवरकोट के लिए शोक मनाया जा सकता है

और उस क़ब्र के लिए भी

जिसमें पहले से ही एक मृतक था


तितलियों की उम्र यों भी ज़्यादा नहीं होती

उन्हें मारने से किसी को कुछ हासिल नहीं हो सकता

लेकिन उन्हें इस सूची में

जगह देने तक में कोताही बरती गई

वृक्षों, चिड़ियों, घोंघों, कुत्तों, बिल्लियों

और बकरियों का भी

सभ्यता के लिए एक मतलब होता है

और उन मैदानों, दीर्घाओं, बग़ीचों का भी

जिनका भाषा में एक नाम है

जहाँ कुछ देर पहले दर्शकों का कोलाहल था

और वहाँ अब हाहाकार है


छोटी–मोटी वनस्पतियों को भी आप भूल रहे हैं

जो इस मौक़ा–ए–वारदात के जीवन में नहीं रहेंगी


लिखो, उन असफल कोशिशों के नाम लिखो

जो एक दूसरे को बचाने से ठीक पहले की गईं

उन्हें कम से कम

फ़ुट नोट में दर्ज़ किया ही जाना चाहिए

यहाँ उन आँसुओं का ज़िक्र किया जा सकता है

जो सिर्फ़ जीवित मनुष्य की आँखों से निकलते हैं

और अपनी वेदना से कइयों को मारते चले जाते हैं


इस अधूरी सूची में एक दिन

शामिल होंगे उनके नाम भी

जो मारने के उत्सव के बाद अपनी नींद खो देंगे

जिनकी आँखों में रेत किरकिराएगी

और गले रुँध जाएँगें

पानी पीते हुए, बच्चों को प्यार करते हुए

या टूटते तारे देखते हुए

जिन्हें दिखाई देंगे मरते हुए लोग

और उनके भी जो हर मारक प्रहार के बाद

ख़ुराक से तीन गुना ज़्यादा शराब पीते रहे

जो एक दिन बौखलाहट में

अपनी पत्नी अपने बच्चों को मार देंगे

और वे भी जो इस बर्बरता से सेवानिवृत्त हो कर

उन पदकों से निगाह भी नही मिला सकेंगे

जो उन्हें दिए गये थे नृशंसता की प्रशंसा में

जो एक दिन समझ ही लेंगे कि क्रूरता और वीरता

दो अलग और विरोधी शब्द हैं


अंत में उनके नाम भी आएँगे इसी असमाप्त सूची में

जो आधी रात में उठ कर यकायक

अपनी कनपटी पर मार लेंगे गोली।


टिप्पणियाँ

  1. क्या बात है, प्रेम, सत्ता, हिंसा और आम इंसान की तकलीफ को बहुत साफ और बेधड़क तरीके से रखा है आपने अपनी पोस्ट में। “एक ही प्रेम” से लेकर “मृतकों की सूची” तक हर हिस्से में अलग चोट लगती है। आप सीधे बात करते हो और घुमाते नहीं, यही सबसे असरदार चीज़ लगी।

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