चंद्रेश्वर की कविताएं

 

चंद्रेश्वर 


मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में रिश्तो की बड़ी भूमिका होती है। खास तौर पर कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनका कोई विकल्प नहीं होता और जो हमारे जीवन को स्वरूप देने में हम भूमिका निभाते हैं। लेकिन जैसे जैसे हम जिम्मेदारियों के जाल में उलझते चले जाते हैं, रिश्ते नाते के लिए समय तक नहीं निकाल पाते हैं। उनके लिए हमारे पास समय तक नहीं होता, जिन्होंने हमें निर्मित किया है। हां, हम इतने मजबूर होते हैं कि चाह करके भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं होते। कवि लोग दूर से कविताएं लिख कर अपनी अनुभूति व्यक्त कर लेते हैं। कहानीकार कहानी लिख कर अपना मन्तव्य जाहिर कर देते हैं, लेकिन हकीकत तो अपनी जगह बनी ही रहती है। मां मनुष्य के जीवन का वह खूबसूरत रिश्ता होता है जिसे शब्दों में बयां ही किया जा सकता। मां पर दुनिया के तमाम कवियों ने कविताएं लिखी हैं। एक कविता कवि चंद्रेश्वर की भी है जिसमें वे 'बुढ़ापे में मां' को याद करते हैं। मां के पास गांव की स्मृतियां हैं जो उसे ज़िंदा रखे रहती हैं। आज पहली बार पर इस कविता के साथ साथ हम चंद्रेश्वर की कुछ अन्य कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। 



चंद्रेश्वर की कविताएं


लिबास पर एक नज़र ज़रूर जाती है 


लखनऊ के नीलकंठ रेस्तरां में आमतौर पर जाता है मध्यवर्ग जिसके बगल में ही खुले हैं दो ढाबे और 

जिनमें एक का नाम है विशुद्ध सरस्वती भोग ढाबा

दूसरे का नाम है यादव जी का ढाबा

इनमें साधारण लोग जाते हैं 

वैसे इनमें भी बढ़िया खाना मिल जाता है 

इनके अलावा भी अवध डिपो के सामने 

ठेले वाले बेचते हैं पूड़ी-सब्जी 

दाल-चावल और फास्ट फूड में ममोज एवं चाऊमीन भी

 

ये लखनऊ शहर है जहां घर से बाहर भी 

खाने के तमाम विकल्प खुले रहते हैं 

महंगे और सस्ते दोनों तरह के 

घर -परिवार से नाराज़ लोग हों या यात्री 

वे आते हैं इन्हीं ठिकानों पर 

वैसे भी अब घर में खाना पकाना हो रहा

मुश्किल दिन-ब- दिन 


जो हो, इनमें कहीं भी खाइए 

जाति-धर्म और मज़हब अब नहीं पूछता कोई 

जबकि आपके लिबास पर हर किसी की 

एक नज़र ज़रूर जाती है।

                    


दुनिया बदल गई कितनी 


दो-तीन दशक पहले की बात है 

जब टीवी देखने के लिए घर में 

एक साथ बैठता पूरा परिवार 


एक ही टीवी होता श्याम-श्वेत 

कभी-कभी तो गांव के 

सामुदायिक केन्द्र पर 

सौ-दो सौ की भीड़ इकट्ठी हो जाती 

'रामायण' एवं 'महाभारत' देखने 


और पहले की स्मृतियां है जब

सिनेमा हॉल में भारी भीड़ उमड़ती 

'मुगले आज़म' और 'शोले' देखने के लिए 


''प्यार किया तो डरना क्या" और 

"मुहब्बत ज़िंदाबाद" जैसे गाने सुनते हुए 

जोश में आ जाते लोग 

न कोई हिन्दू दिखता

न कोई मुसलमान 


टिकट के लिए सिनेमा हॉल की खिड़की पर 

युवकों में मारपीट की नौबत आ जाती 


देखते ही देखते कितना बदल गया मंज़र 

अब एक ही मकान के हर कमरे में लगा है

दीवार से चिपक कर टीवी रंगीन 

और उससे जुड़े हुए हैं सैकड़ों चैनल 

पर हकीकत में उन्हें देखने की 

किसी को फुर्सत नहीं 

अब हर हाथ में मोबाइल है फाइव जी का 


ज़्यादातर सिनेमा हॉल बंद हो चुके हैं 

या फिर वे बदल चुके हैं 

माल-मल्टीप्लेक्स में 


मुख्य धारा का हिन्दी सिनेमा अब 

मनोरंजन नहीं 

तनाव पैदा करता है 

प्यार-मुहब्बत के बदले 

बांटता है नफ़रत 


ऐसे भी शक की नज़रों से देखा जा रहा 

प्यार की बात करने वालों को 

नफ़रत का पाठ पढ़ने और पढ़ाने वाले 

सपूत बन घूम रहे हैं हर जगह 

चौक-चौराहों पर 


सचमुच अभी मैंने पैंसठ पार नहीं किया 

और मेरी दुनिया बदल गई कितनी

पहचानना उसे तो अब 

कितना मुश्किल।

     


कविता का आंचल

  

कविता को मिला इतना

...बड़ा आँचल

वही... हाँ ...वही बाँध सकती 

इसके एक छोर से

दुःख को गिरह पार कर 

चाहे वह जितना हो

मात्रा और भार में


वह एक बैलगाड़ी भर ही क्यों न हो

एक ट्रक भर...

एक रेलगाड़ी भर...

या कह लो विपुल पृथ्वी भर ही क्यों न हो 


तो भी बाँध सकती वह दुःख को

अपने आँचल के एक छोर से

गिरह पार कर


वह बनी ही है इसी के लिए 

दुःख तो सहोदर ठहरा उसका। 




           


ख्याति


ख्याति बढ़ती जाती जितनी ही  

उसी अनुपात में होता जाता 

मनुष्य छोटा 


जिस तरह आकाश में ज़्यादा गरजते 

या उमड़ते-घुमड़ते बादलों में 

होता टोंटा पानी का

यश:काय व्यक्ति भी होता जाता 

अंदर से रिक्त 


ख्याति का चक्कर एक असाध्य रोग 

इससे छिन जाता सब 

सुख-सुकून व्यक्ति का


सरल - सहज जीवन होता बाधित

आदमी खो बैठता अपना हासिल 

प्यार भी


बचा रहता केवल रार-तकरार 


ख्याति क्रूर और जटिल बना देती 


आपको पता तक नहीं होता 

और वह फँसा देती एक ऐसे नशे के जाल में 

जिससे निकलना मुश्किल ही नहीं ...

नामुमकिन होता 


इस नशे से निजात पाने के लिए 

किसी तरह की चिकित्सा की 

बात न कीजिये तो ही 

बेहतर होगा मेरे यार।

       


कविता और यूटोपपिया 


मनुष्यता के घोर संकट के समय में 

बर्बर, क्रूर, हिंसक एवं 

आततायी सत्ताओं के बरक्स 

निर्गुण कवियों में कबीर ने 

सबसे पहले अपनी कल्पना एवं विवेक से 

चुना अमरपुर नगर को

एक ऐसा नगर जहां बराबरी का राज होगा 

न्याय के साथ समाज होगा शोषण मुक्त 

भेदभाव से परे सब सुखी होंगे 


फिर बेग़मपुर नगर को 

अपनी कल्पना एवं विवेक से चुना रैदास ने

जो ग़म रहित होगा


बाद में सिंहल द्वीप की खोज की

जायसी ने जहां अपूर्व सुंदरी 

राजकुमारी पद्मावती रहती थी 

उन्होंने रूप की आराधना की

प्रेम और सौंदर्य में ही किया 

दीदार ईश्वर का 


ये सारे के सारे नगर काल्पनिक

मगर वास्तविक नगरों से भी 

ज़्यादा प्रभावी बनाया इन्हें कवियों ने 


इन कवियों के विवेक ने ही  रचा 

अपने-अपने यूटोपियाई नगरों को


भक्ति आंदोलन के उत्तरवर्ती दौर में 

सगुण कवियों ने चुना 

वास्तविक नगरों को ही 


अपने यूटोपियाई विचारों और कल्पना 

और विवेक के साथ

जैसे सूरदास और उनकी धारा के

तमाम कवियों ने चुना वृन्दावन को


तुलसीदास ने चुना अयोध्या को


ये नगर वास्तविक हो कर भी 

कविता की काल्पना में दिखते

चमकते हुए ज़्यादा 

मगर अमरपुर और बेगमपुर की 

बात ही निराली है 


इन कवियों के विचार 

भले ही अलग-अलग 

इनके कवित्त विवेक भी

मगर इनकी कविताई में समान 

एक बात और वह यह कि 

सभी कमोबेश प्रेम और 

सौंदर्य के ही पक्षधर 


सभी के केन्द्र में थी

भक्ति के आवरण में 

ढंकी हुई मनुष्यता


यहां ईश्वर भी दिखता 

मनुष्य की तरह


यहां अन्याय का प्रतिकार 

सत्ता की ग़लत नीतियों का प्रत्याख्यान 

उनकी पक्षधरता 

सिर्फ़ सच के साथ 


उनकी यूटोपिया में शामिल 

स्वप्न और समाधान 


उनकी कविता में 

दुःख की कथा

तो सुख के रास्ते की 

तलाश भी।

            


मेरे पास न लाठी न भाला 


मेरे पास न लाठी न भाला

न तीर न कमान 


न ढाल न तलवार 

न गोली न बन्दूक 


बस! एक सीना किसी नवजात

शिशु के कोमल माथे के बराबर 


किसी स्नेहिल हथेली के बराबर 


वह भी कवच रहित 


बस! एक मन शब्दों  में रमा 

जगमग होता उनके प्रकाश से 


उसी मन से जुड़ा एक मस्तिष्क भी 

तर्कशील विवेक संपन्न 

जो नहीं जानता

दैन्य...पलायन...


इस मेरे ज़िद्दी मन-मस्तिष्क का 

क्या बिगाड़ लोगे 


देह तो ठहरी ससुरी नश्वर...

इसके नष्ट होने का क्या ग़म

अगर  कोई बड़ा उद्देश्य

हो सामने।

          



          

बुढ़ापे में मां 


इतना करीब से तो नहीं देखा था 

कभी भी मां को जैसे देख रहा हूं 

अब इसे बुढ़ापे में 


देखकर इसे एक गहरी 

वितृष्णा पैदा हों रही है

ज़िन्दगी से ही


इतना सुबकना... कराहना इतना 

इस तरह रोना-धोना बात-बात में 

बबुआ... बबुआ कह कर 


मां के हृदय की ममता चली गई है 

अब तो सुषुप्तावस्था में 


उसे ही हर पल चाहिए

सहानुभूति हमसे 

हमारे नाती-पोतों से


तीन-साढ़े तीन साल पहले 

कोरोना काल में 

पिता के जाने के बाद जो आई 

उसकी ज़िन्दगी में रिक्तता 

उसे हम सब नहीं भर पाए 

आज तलक 


पिता चल बसे थे अचानक 

उनका ऐसे जाना

हमें गहरी उदासी में उतार गया था 


वैसे मां जब भी रोती है 

मेरा कलेजा होने लगता है 

चाक-चाक 

उसका दुःख देखा नहीं जाता है 


काश! मां का दुःख हर लेता

हर लेता उसकी पीर 

मन की भी

उसके चेहरे पर देखता मुस्कान 


मां जब रोती है 

कितना बेबस बना देती है 

पूरे परिवार को


मैंने अब तक बच्चों को 

रोते देखा था 

जवान को भी 

मगर किसी को बुढ़ापे में नहीं 


मां को दी गई मेरी तसल्ली 

काम नहीं करती

मां  रहती है बहुत ही डरी-डरी


अब भी वह मृत्यु से डरती है 


उसे ऐसे में भी कुछ 

रस मिलता है बतरस में 

और यही रस तो दुर्लभ है 

मेरे शहर में 


यहां बिना मतलब

या बेमकसद 

किसी से मिलने-जुलने 

या गपियाने की फुर्सत कहां 


मां बिल्कुल जब

डूबने-उतराने लगती है 

निराशा के भंवर में 

करती है याद गांव को ही 

और पाती फिर इस हाल में भी 

ज़िन्दगी जीने का हौसला


गांव की स्मृतियां उसे

हारने नहीं देती हैं।

    


ख़ुशबू


वह अपने प्रेमी के प्यार में दीवानी थी

एक दिन भाग गई पिता के घर से

जहां भय पसरा था चारों तरफ़ 


वह ख़ुशबू थी पर भाग कर 

कहां छुप पाती, किस जगह जाती


हर ओर तो खड़े थे गली के मुहानों 

चौक-चौराहों यहां तक कि 

घर के ओसारे और आंगन में भी 

झपट्टा मार कर दुपट्टा छीनने को तैयार 

भेड़िए बहुत खूंखार  


ख़ुशबू तो फैलती ही है 

हवा का संग-साथ पा कर 

पूरा माहौल करने लगता है महमह


ख़ुशबू आख़िर में पकड़ ली गई

पुलिस की दबिश थी ज़ोरदार 

ऐसे मामलों में वह कितना 

मुस्तैद हो जाती है 

ज़िम्मेदार भी बहुत 


पुलिस ने ख़ुशबू को पकड़ कर 

सौंप ही दिया उसके पिता के कर कमलों में 

उसे महफूज़ रखने के लिए 


पर वह भी एक दुर्दांत दरिन्दा ही निकला

उसके कर कमल नहीं, 

कटार हुए साबित।

     




किताबों का सफ़र 


उन दिनों गाँव वाले मकान में 

बाबा रखते थे

बरामदे की दीवार में बनी 

एक छोटी-सी 

काठ की अल्मारी में 

कुछ धार्मिक ग्रंथ 

लाल सूती कपड़े में बाँध कर

जिनके बिना अपने 

जीवन की कल्पना 

नहीं कर पाते थे वे


उनके ग्रंथ दिखते थे 

आवरण सहित 

विशेष मौकों पर ही


कोई ग्रंथ निकाल कर

जब कुछ बाँचते वे

करते थे पाठ 

श्लोकों का भी 

सस्वर


अन्वय कर उनका 

फिर बताते अर्थ 

तो उनके चेहरे पर 

फैल जाती थी 

अनोखी दीप्ति


वाल्मीकि, भवभूति, कालिदास के 

काव्य ग्रंथों के साथ

व्यास के चारों  वेद, 'महाभारत'

कई स्मृतियों, शास्त्रों को 

रखे हुए थे वे संभाल कर

एक कुशल गृहिणी के 

गहनों की तरह


तुलसी का 'मानस' तो 

सूर का 'सूरसागर' भी 

रखे हुए थे वे


हाँ, कबीर का 'बीजक' 

नहीं था उनके पास


'महाभारत' रखे तो थे

पर पढ़ने से उसेे 

रोकते थे हर किसी को

कहते थे कि इसे पढ़ने से 

टूट सकता है 

एक हँसता-खेलता 

संयुक्त परिवार


भाई-भाई में 

पैदा हो सकता है

वैमनस्य


कबीर का निर्गुण सुनने से भी

डरते थे वे

मृत्यु का भय सताने लगता था 

उनको


अपशकुन की तरह लगते थे

निर्गुण भजन उनको


'गीता' पढ़ कर भी वे 

नहीं होना चाहते थे 

अनासक्त जरा-सा भी

इस दुनिया से आसक्ति ही 

अच्छी लगती थी उन्हें


माया में लिथड़ कर ही 

नाती-पोतों की गोद में 

लेना चाहते थे वे 

आख़िरी सांस


ऐसे ही माहौल में धीरे-धीरे 

बनायी मैंने

अपनी पसंद की 

नयी किताबों के लिए

थोड़ी-सी जगह

जिनसे जीवन में मिला था

सोचने-विचारने का 

नया नज़रिया

नया रास्ता


प्रेमचंद के 'गोदान'

जैनेन्द्र के 'त्यागपत्र'

रेणु के 'मैला आँचल'

अज्ञेय के 'शेखरःएक जीवनी'

निराला के 'चतुरी चमार','कुकुरमुत्ता' 

और 'सरोज-स्मृति' के लिए


नागार्जुन के 'पुरानी जूतियों का कोरस'

मुक्तिबोध के 'चाँद का मुँह टेढ़ा है'

त्रिलोचन की 'धरती' और धूमिल के 

'संसद से सड़क तक' के लिए


पहले महुए की लकड़ी की 

पुरानी छोटी-सी संदूक में 

रखना शुरु किया था 

अपनी पसंदीदा किताबों को

जिनसे रोशनख़्याल हुआ था 

मेरा दिलो-दिमाग़


अब बाबा नहीं है और 

बस गया हूँ लखनऊ में


मेरी उन दिनों की सारी क़िताबें  

उस छोटे-से संदूक से 

बाहर निकल कर 

सफ़र करती रही हैं 

मेरे संग-संग 

रेलगाड़ियों और बसों में


वे गाँव से आरा

विद्यानगर से बलरामपुर 

और अब लखनऊ में 

ले रही हैं सांस


वे दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं

अब कई-कई अल्मीरों में 

आराम से लेटी हुई हैं

उनके बीच होना 

बहुत शक्ति देता है

उनके साथ होना 

देश-दुनिया, समाज और 

इंसानियत के साथ होना है


अब तो देश के कोने-कोने से वे 

दौड़ती चली आ रही हैं 

मेरे वर्तमान पते से

उनको डाकिए से पाते ही 

कलेजे से लगा लेता हूँ


जैसे ज़िंदा रहने के लिए 

रोटी चाहिए मुझे

जैसे तन ढकने के लिए 

कपड़ा चाहिए मुझे

जैसे धूप-शीत-बारिश से 

बचने के लिए 

एक अदद मकान चाहिए मुझे

वैसे ही......हाँ-हाँ वैसे ही 

अपनी आत्मा को बचाने

उसे रचने-गढ़ने के लिए 

किताबें चाहिए मुझे।

        


नींद से बाहर 


यह औरत नींद से बाहर आई है 

सोई थी जो पितृसत्ता की 

मर्यादाओं की 

गोलियां खा कर

नशीली 


डूबी रही जो 

एक लंबे दु: स्वप्न में 

साल-दर-साल 


इसके चेहरे पर उसकी 

कामनाएं अधूरी 

पढ़ी जा सकती हैं 


अब इसे अपने पिता, पति, पुत्र

भाइयों की विपुल प्रशंसाओं की 

जरूरत नहीं रही


यह प्रशंसाओं की क़ैद से 

बाहर आ रही है 

इतना ही नहीं

सारी हदें 

सारी वर्जनाएं तोड़ कर

बनना चाहती है 

आज़ाद परिंदा 


इसे बचपन से ही करता रहा है 

आकर्षित 

नीले आसमान का 

खुला विस्तार 


यह अतीत पर पोत देना चाहती है 

कोलतार ही कोलतार

 

यह इसी जीवन में  

तलाशती है 

एक और नया जीवन 


यह सब कुछ भूल कर 

चाहती है आगे बढ़ना 


यह मीरा बन कर चाहती है 

नाचना हाथों में ले कर 

कठताल 


यह सूर की गोपियों की तरह 

तोड़ देने में रखती है 

यक़ीन 

कुल की रीतियों को 


प्यार के लिए 

जो फंदा बनी हैं

इसके गले में।

         


अपराजिता हिन्दी 


आगे बढ़ती रही वह

नाइंसाफी होती रही

जबकि हरदम

साथ उसके 


सत्ता की दुलारी वह

बन न सकी


हां... हां आगे ही

बढ़ती रही फिर भी 


गांवों  के खेत-खलिहानों में 

पली-बढ़ी वह 

फैलती गई पुष्ट हो कर 

देश-दुनिया में 


उसने गले लगाया सबको 

सबकुछ सहा-सुना

खिली रही

सुंदर सुमन की तरह


कभी हारी-थकी नहीं

चलती रही अविराम 

गांव-गांव डगर-डगर

ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर 


नगर-महानगर की 

चौड़ी सड़कों पर

पर्वत-पठारों पर


बसों, कारों, रेलगाड़ियों

मोटरगाड़ियों

पानी के जहाज़ों 

और हवाई जहाज़ों में भी 

यहां तक कि 

साइकिल की पिछली 

सीट पर भी बैठ चालक से 

करती हुई मीठी गपशप 

दिखी वह खिली-खिली 

ललाई लिए चेहरे पर 


वह रेलमपेल में 

धक्का-मुक्की में 

हर जगह दिखी 

दौड़ती-भागती हुई

कभी चीखती तो 

कभी गुनगुनाती-गाती

नारे लगाती हुई 

बनी रही अपराजिता 


बकौल कवि त्रिलोचन 'उसकी

सांसों को आराम नहीं था'।

      


नतीजा सिफ़र


आप जिस व्यक्ति से बात करना चाहते हैं 

वह अभी दूसरी काॅल पर व्यस्त है

कहना कठिन है कि वह कब ख़ाली होगा

हो सकता है वह बिस्तर पर लेटा हो

हो सकता है वह डायनिंग टेबल पर बैठ कर 

खाना खा रहा हो

हो सकता है वह अपने गांव में 

धान के खेत के पास डड़ार पर खड़ा हो 

हो सकता है वह किसी बस में या ट्रेन में सफ़र कर रहा हो

हो सकता है वह कोई कवि हो और देर रात 

अपना दुखड़ा सुना रहा हो किसी साहित्यिक यार से 

हो सकता है वह किसी बाज़ार में हो

हो सकता है वह किसी शादी के मंडप में हो

हो सकता है  वह दुल्हा बना हो

हो सकता है वह दुल्हन बनी हो

हो सकता है सुहागरात मनाने की तैयारी चल रही हो

और मोबाइल पर उस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हों


यह भी संभव है वह विदेश में हो और 

ले रहा हो हालचाल मां-बाप का

तसल्ली के लिए 


हो सकता है वह वह कमोड पर बैठा हो

और गुफ्तगू कर रहा हो प्रेमिका से 

बहरहाल, आप प्रेमिका की जगह प्रेमी भी 

पढ़ सकते हैं 

                           

हां-हां भाई! आप अभी जिस नंबर पर 

बात करना चाहते हैं

उस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं

कृपया कुछ देर प्रतीक्षा करें


ऐसा भी संभव है यह प्रतीक्षा 

कुछ लंबी खींच जाए

इसके अलावा कोई अन्य 

विकल्प भी तों नहीं है 


आप जिसके पड़ोस में रहते हैं 

वह भी आपके ख़िलाफ़ किसी 

गहरी साज़िश में मुब्तिला है 

आपसे थोड़ी सजगता अपेक्षित है 


आप जिस जगह रात में लेटे हुए हैं 

अपने शयनकक्ष के गद्देदार बिस्तर पर 

वही से खोदी जा रही होगी एक लंबी गहरी सुरंग 

जो सीधे जाती होगी किसी दूसरे शहर की ओर 

कृपया आप थोड़ी सावधानी बरतें 

वर्ना कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है 


बाद में आप करते रहेंगे 

अफ़सोस ही अफ़सोस 

नतीजा सिफ़र साबित होगा।



चंद्रेश्वर (संक्षिप्त परिचय)


30 मार्च 1960  को बिहार के बक्सर ज़िले के आशा पड़री गांव के एक सामान्य किसान परिवार में जन्म।


उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग, प्रयागराज से चयनित होने के बाद 01 जुलाई 1996 से एम.एल.के.पी.जी. कॉलेज, बलरामपुर में हिन्दी विषय में शिक्षण का कार्य आरंभ किया। 26 वर्षों के शिक्षण कार्य के बाद 30 जून 2022 को विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्ति के बाद लखनऊ में रहते हुए स्वतंत्र लेखन कार्य।


हिन्दी-भोजपुरी की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में 1982-83 से कविताओं और लेखों का लगातार प्रकाशन। अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित। 

तीन कविता संग्रह -'अब भी' (2010), 'सामने से मेरे' (2017), 'डुमराँव नज़र आयेगा' (2021)।

एक शोधालोचना की पुस्तक 'भारत में जन नाट्य

आंदोलन' (1994 ) एवं एक साक्षात्कार की पुस्तिका 'इप्टा-आंदोलनःकुछ साक्षात्कार' (1998) का प्रकाशन। भोजपुरी कथेतर गद्य की दो पुस्तकें --'हमार गाँव' (2020), 'आपन आरा' (2023) एवं 'मेरा बलरामपुर' (हिन्दी में कथेतर गद्य, 2021-22 ) का भी प्रकाशन।


सम्मान: 

1.भोजपुरी कथेतर गद्य कृति 'हमार गांव' पर  सर्वभाषा सम्मान - 2024  

2.रेवांत साहित्य गौरव सम्मान - 2024



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



पता 


'सुयश', 631/58, ज्ञान विहार कालोनी, 

कमता (फ़ैज़ाबाद रोड) 

226028

लखनऊ 


मोबाइल - 7355644658

9236183787


ई मेल- cpandey227@gmail.com

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