हेमन्त शर्मा का आलेख 'कटुता नहीं समरसता का कुंभ'
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हेमन्त शर्मा |
महाकुम्भ विशेष : 22
'कटुता नहीं समरसता का कुंभ'
हेमन्त शर्मा
कुंभ समरसता का उत्सव है। पृथ्वी का सबसे बड़ा लोक पर्व है। आस्था की त्रिवेणी है। मत मतांतर का वैश्विक समागम है, और लोक संवाद के लिए सृष्टि का सबसे बड़ा मंच है। यह हिन्दू सांस्कृतिक परम्परा का नाभि तीर्थ है। कुंभ आदिकाल से मनुष्यता के संवाद का मंच भी रहा है.जब की संवाद के बाक़ी साधन नहीं थे। तब धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के निमित्त ‘मॉस कम्युनिकेशन’ का काम कुंभ करता था।
राज्यसत्ता अपने मद में और समाज अपने स्वार्थ में बहक न जाए, इस बाबत कुंभ वक्त के साथ एक अभीष्ट संचालक और नियंत्रक बनकर उभरा। यहॉं त्याग, तप, हठ, योग को सँभालने वाले निर्मोही संत, प्रजा और राजा को बताते थे कि किन बातों की चिंता करने की ज़रूरत है। समाज में किन मूल्यों को क्षति हो रही है और कौन सी नई धारणाएं बलवती हो रही हैं। भारत के हर कोने से लोग कुंभ आते थे और स्नान, ज्ञान, व्रत, त्याग, सत्संग का लाभ पाते थे। कुंभ में ही भारतीय समाज अपनी विभिन्न संस्कृतियों, कलाओं, संसाधनों और अनुसंधानों को शो केस भी करता था। कुंभ ऐसा प्रयोजन है जिसमें आमजन लाभार्थी हैं, संत जन साक्षी हैं, व्यापारी और रियासतें सहभागी हैं, और इसका वैविध्य व्यापक है, दृश्य है और सतत है।
लेकिन कलयुग के प्रकट सत्यों में धार्मिक अपरदन की कथा का एक पाठ कुंभ भी है। यहॉं धर्म के कॉरिडोर्स में वैभव, विस्तार, विलास और व्यक्तिवाद हिलोरे ले रहा है। जिन्हें निर्लिप्त होना था, वे आसक्त दिख रहे हैं। जिन्हें गंगा में पाप धोने थे, वे कीच उलीच को बाध्य हो रहे हैं, जिनके शब्दों में धर्म उपदेश होने थे, वे राजनीति, भेदभाव, सत्तांध और साधनों की भूख में जीभ चला रहे हैं। गंगा उनके कमंडल में भी नहीं हैं। कुंभ दिव्यता से निकल कर भव्यता में उलझता जा रहा है। संकट यह भी है कि इन सब संक्रमणों के बीच सुधार और मूल स्वभाव की बात कोई नहीं करना चाहता है। इसलिए आमजन, आयोजन और आध्यात्म की त्रिवेणी में आध्यात्म सूखता नज़र आ रहा है। आयोजन फैल रहा है और तारणहारिणी गंगा लगातार सिकुड़ रही है।
अमरता के लोभ में लोग चौतरफा कुंभ की ओर दौड़ रहे हैं। समुद्र मंथन से जो अमृत निकला वह प्रयाग में छलका। उसी अमृत की तलाश में कुंभ के लिए साधु, संत, मंहत, बैरागी, बाबा, योगी, आचार्य, महामंडलेश्वर सब कूच कर रहे हैं। जिसने घर छोड़ दिया, समाज छोड़ दिया, राज छोड़ दिया, सत्ता छोड़ दी. साधु हो गया, बैरागी हो गया। उसे भी अमृत की लालसा है। अमरत्व की प्रबल चाहत है। बड़ा विरोधाभासी है यह कुंभ। हमारे सनातन में चाह, इच्छा, लालसा से आगे है संतत्व। संत जो परिग्रहहीन हैं, गृहहीन हैं। सब कुछ त्याग चुके हैं। एक ऐसे लोगों का समुदाय जो व्यक्ति के तौर पर मर चुके हैं। देह के रूप में शव हैं। जो अपना पिंडदान स्वयं कर संत बने हैं। यह संत कुछ बटोरते नहीं। सिर्फ मानव मन की पीड़ा बटोरते हैं। किसी एक जगह से बंधे नहीं होते। सब जगह इनकी होती है। वे अपनी निजता खो कर सबके होते हैं। इनकी साधना अलग-अलग हो सकती है। पर गन्तव्य एक. उन्हें सिर्फ मोक्ष चाहिए। फिर उनमें भी अमृत के लिए यह हाहाकारी होड़ क्यों? अमृत की चाह देवता और असुर दोनों में है। लेकिन संत इन दोनों से बड़ा है। संत का लक्ष्य अमृत नहीं है क्योंकि संतत्व स्वयं में अमरत्व है। फिर ये कैसी मरीचिका? जो संतों को मनुष्य बना दे रही है। ऐसा मनुष्य जो माया का दास है, मोह से ग्रस्त है, इच्छाओं के घोड़े पर सवार विजय को व्याकुल है।
कुंभ देश की समरसता का ऐसा महापर्व है जहां बिना किसी न्योते, अपील या शासनादेश से जाति, वर्ग, धर्म, संप्रदाय से परे लोग सहस्त्राब्दियों से इकट्ठा होते हैं। यह जमघट वैमनस्यता नहीं फैलाता। न कटुता और बंटवारे की बात करता है। फिर कुंभ में ‘कटने और बँटने’ की बात क्यों? महाकुंभ को बाबाओं के वैभव, अखाड़ों के ऐश्वर्य और भक्तों के विलास का साधन नहीं बनना चाहिए। सुना है आस्था के इस कुंभ में डेढ़ लाख की एक कॉटेज मिल रही है। भक्तिकाल में अष्टछाप के एक कवि हुए कुंभनदास. जिन्होंने उस वक़्त की सत्ता से कहा था-
“संतन को कहां सीकरी सों काम।
आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरिनाम।।”
उनका कहना था संतों को सत्ता से क्या लेना देना? वे तो राज और समाज छोड़ चुके हैं। लेकिन फिर भी कुंभ में सत्ता पाने के लिए राजनीतिक विमर्श संतों के बीच हो रहे हैं। संत राजनैतिक प्रस्ताव पास करना चाह रहे हैं। सत्ता और संतत्व सनातन के दो छोर हैं। पर इस कुंभ में तो संत सत्ता के जुगाड़ में दिखते हैं। दरअसल कुंभ अपना अर्थ खो रहा है। संगम की त्रिवेणी में सरस्वती लुप्त हैं। लेकिन कुंभ के आयोजन को ले कर जो कुछ भी हो रहा है उसे देख कर लगता है पूरे माहौल से सरस्वती लुप्त हैं।
कुंभ नाम से एक बिम्ब उभरता है। नदी के किनारे आस्था का जन समुद्र। नाना प्रकार के साधुओं का जमघट, अजब-गजब साधुओं के अनोखे करतब, बहुलतावादी संस्कृति की मुकम्मल तस्वीर। संतों-असंतों का जमावड़ा। परम्परा और अतीत के दर्शन। बेखुदी का आलम। समूची गृहस्थी की गठरी सिर पर रख आस्था में डूबा श्रद्धालु। भीड़ में खोए हुए लोगों की सूचनाएं। बोध, संतुष्टि, मृत्यु, शोक, आह्लाद के चेहरे। यही अमृत कुंभ की तस्वीर रचते है। सब इसी के लिए तरसते हैं।
कुंभ मेला है पर तमाशा नहीं। कुंभ का भाव है समागम। देश भर के अखाड़े, पीठ, मत, सम्प्रदाय, शंकराचार्य यहां जुटते हैं। अलग अलग संप्रदायों के विचार-वैचित्र्य होते हुए भी संवाद होता हैं. यहॉं लोग जुटते हैं किसी एक की स्तुति के लिए नहीं। बल्कि अपने विस्तार के लिए। चित्त के विस्तार के लिए। ज्ञान के विस्तार के लिए। विराट के दर्शन के लिए। क्योंकि प्रयाग का मतलब है संगम। जुड़ने की भावना। भाव, धाराओं के जुड़ने की भावना। आदमी से आदमी के जुड़ने की भावना। बिना इस भावना के कुंभ सफल नहीं होता।
प्रयाग की त्रिवेणी में कुंभ के दौरान सिर्फ नदी ही नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था भी बहती है। यही आस्था कुंभ का अमृत तत्व है। जन आस्था का यह महाकुंभ ही समाज चलाता है। महीने भर के इस महाकुंभ में जो करोड़ों लोग आते हैं, उन्हें कोई न्यौता नहीं देता है। न कोई विज्ञापन, न कोई अपील, न मुफ्त भोजन और न ही रहने का इंतजाम। फिर भी सदियों से भारत की बहुलता ऐसे ही यहां आ रही हैं। ये तो आजकल सरकारें जबरन न्यौता भेज, विज्ञापन कर "पिसान पोत भंडारी" बनने का प्रयास करती है। अनंत काल से बिना किसी अपील या निमंत्रण के हमारी सभ्यता का यह सबसे बड़ा जमावड़ा संगम तट पर होता रहा है। तमाम विघ्न-बाधा पार कर मजबूरी की गठरी सिर पर लादे जो आम लोग यहां आते हैं, उन्हें वही श्रद्धा यहां तक लाती है जिस सामूहिक श्रद्धा और निष्ठा से यह देश चलता है। जो लोग कुंभ को महज एक पोंगा धार्मिक आयोजन समझते हैं, उन्हें न इसका धार्मिक अर्थ समझ पड़ता है न लौकिक।
प्रयाग में त्रिवेणी की सरस्वती एक प्रतीक है। तीर्थकामी लोगों की आस्था की। यह भी सवाल मौजू है कि सरस्वती नदी क्या कभी प्रयाग में थी भी? उसका अस्तित्व तो अब विज्ञान प्रमाणित करता है पर प्रयाग में नहीं। मानसरोवर से निकलकर यह नदी कच्छ के रन तक पहुंचती है। फिर प्रयाग में कैसे इसका प्रवाह? वह तो इस उत्तरी प्रांत में स्वतंत्र जलधारा के रुप में कभी नहीं बही। कहीं कोई प्रमाण नहीं है कि सरस्वती कभी यहां बहती थी। दरअसल सरस्वती यहां लोक के रुप में मौजूद थी। कुंभ में जनसमुद्र के तौर पर वह बहती है।
पिछले कुंभ से अक्षयवट के भी दर्शन होने लगे हैं। अकबर के बनाए किले में यमुना के किनारे अब तक यह अक्षयवट बंद था। कहते हैं अक्षयवट प्रलय में भी नष्ट नहीं होता। इस पर विष्णु का निवास है। स्वयं भगवान शिव ने इसे प्रयाग में रोपा था। वनगमन के दौरान राम, लक्षमण, सीता ने भी इसके दर्शन किए थे। ऐसा तुलसीदास लिखते हैं। बाद में यह किला सेना का आयुद्ध डिपो बन गया और अक्षयवट से कूद कर साधू-संत मोक्ष के लिए आत्महत्या करने लगे। ‘सुसाइड प्वाइंट’ बनने के बाद इस वट को किले में बंद कर आम लोगों की पहुंच से दूर कर दिया गया। इस बार कुंभ के मौके पर वह खुला है।
हमारे विकास की रफ़्तार ने भले गंगा को आचमन लायक न छोड़ा हो, यमुना कीचड़ हो गई हो, सरस्वती अनंत काल से लुप्त हो, बावजूद इसके करोड़ों लोगों की आस्था ही त्रिवेणी को पवित्र और पुण्यदायी बनाती है। गंगा से अपना नाता बासठ बरस का है। उसके किनारे जन्मा। वहीं शरीर बना। कामना है उसी में यह शरीर नष्ट हो। सबसे पहले मैं 1977 के महाकुंभ में गया था। तब छोटा था, अपनी चाची के साथ गया। मौसी की कुटिया में रहा। तब से हर कुंभ में जाने का सिलसिला जारी रहा। मेरे लिए यह पाँचवा महाकुंभ है। संगम के किनारे टेंट में मैंने कल्पवास भी किया है। साठ वर्ग किमी के दायरे में बसे तम्बुओं के शहर में इस दफा भी करोड़ों लोग आएंगे। आप कितने भी तीसमार खां हों, इस विशाल, विराट मेले में आते ही आपका अस्तित्व खो जाता है। व्यक्तित्व भीड़ का हिस्सा बनता है। सैंतालिस साल से कुंभ में जाते-जाते मेरे लिए कुंभ अब शाश्वत भारत में विलीन हो उसे समझने का महापर्व है। जातीय सामाजिक दायरों से मुक्त हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक। बहुलता में एकता का उद्घोष।
अपने पहले कुंभ 1977 में दारागंज से झूंसी तक गंगा का जो पाट मैंने देखा था, गंगा अब वहां वैसी नहीं दिखती। क्या कर दिया हमने इस जीवनदायिनी के साथ? मेरे देखते-देखते गंगा प्रयाग में सरस्वती बनने की राह पर है। यही हाल रहा तो मेरा बेटा गंगा को यहां वैसे ही ढूंढेगा। जैसे संगम में आज हम सरस्वती को ढ़ूंढ रहे हैं।
कुंभ का पहला लिखित प्रमाण प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में मिलता है। हर 12 साल में लगने वाले कुंभ मेले को पूर्ण कुंभ कहते है। अर्धकुंभ हर 6 साल में होता है। लेकिन अर्ध कुंभ सिर्फ प्रयागराज और हरिद्वार में ही लगता है। 12 पूर्ण कुंभ के बाद यानी हर 144 साल पर एक महाकुंभ आता है। महाकुंभ का आयोजन सिर्फ प्रयाग में ही होता है।
कुंभ का अहंकार से भी रिश्ता है। पौराणिक कथा है। देवराज इंद्र अहंकारी हो गए थे और इसी वजह से उन्होंने ऋषि दुर्वासा का अपमान कर दिया। अपमानित हो कर ऋषि दुर्वासा ने इंद्र को श्रीहीन होने का शाप दे दिया, इस कारण स्वर्ग का ऐश्वर्य, देवताओं का धन-वैभव सब कुछ नष्ट होने लगा। दुखी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने कहा कि शाप को दूर करने के लिए असुरों के साथ मिल कर समुद्र मंथन करना पड़ेगा। मंथन से कई दिव्य रत्नों के साथ अमृत भी निकलेगा, अमृत पान से देवता अमर हो जाएंगे और स्वर्ग का वैभव लौट आएगा। विष्णु की बात मान कर देवराज इंद्र ने दैत्यराज बलि से बात की। दैत्यराज बलि भी रत्न और अमृत पाने की इच्छा से समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन के लिए वासुकि नाग की रस्सी बनाई गई और मदरांचल पर्वत को मथानी। समुद्र मंथन शुरू हो गया। समुद्र मंथन से एक-एक करके कुल 14 मुख्य रत्न निकले थे। मंथन के अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश ले कर प्रकट हुए।
देवताओं और दानवों में होड़ लगी कि अमृत पहले कौन छकेगा? अमृत को दानवों से बचाने के लिए इन्द्र ने अपने बेटे जयंत से अमृत कुंभ ले कर देवलोक जाने को कहा। पर दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने जयंत को कुंभ ले कर भागते देख लिया। देवताओं और दानवों में अमृत के लिए युद्ध छिड़ गया। जयंत अमृत कुंभ बचाने में तो सफल रहा पर इस छीना-झपटी में देवलोक में आठ और पृथ्वी लोक में चार जगह कुंभ से अमृत छलक गया। पृथ्वी पर ये बूँदें प्रयाग के संगम तट पर, उज्जैन के क्षिप्रा तट पर, हरिद्वार में गंगा के किनारे और नासिक में गोदावरी तट पर गिरी।
तब से कुंभ इन्हीं चारो में बारी बारी से लगता है। हर शहर का अवसर बारहवें साल बाद आता है। अमृत के लिए सुरों-असुरों में बारह रोज तक युद्ध चला था। देवताओं का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर है। इसलिए कुंभ का हिसाब बारह बरस का बैठता है। इस देव दानव संघर्ष के दौरान कुंभ की सुरक्षा का दायित्व बृहस्पति, चंद्रमा, सूर्य और शनि का था। चंद्रमा को अमृत गिरने से, बृहस्पति को उसे दानवों से बचाने, शनि को देवताओं की हिफाजत और सूर्य के पास कुंभ को टूटने से बचने का जिम्मा था। इसलिए कुंभ में इन ग्रहों की विशेष स्थिति होती है। तब से जब भी सूर्य मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में आता है, तो प्रयाग में महाकुंभ लगता है। कुंभ का आयोजन तारों की गति, स्थिति और ग्रह-नक्षत्रों के स्थान पर निर्भर है जब यह सब उस स्थिति में होते हैं तो कुंभ आता है। सूर्य की गति को कौन रोक सकता है? इसलिए कुंभ अवश्यंभावी है।
कुंभ का कोई वैदिक प्रमाण नहीं मिलता। यह लोक पर्व है। वेदों में कई जगह कुंभ शब्द प्रयुक्त ज़रूर हुआ है। जल प्रवाह से उसका संबंध भी है। एक जगह तो चार की संख्या भी निर्दिष्ट है पर न तो उसका संबंध अमृत-मंथन की कथा से जुड़ता है और न हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक के चार कुंभ-पर्वो से कोई संगति बनती है. देखिए-
जघानं वृत्रं स्वधितिर्वनेव रुरोज पूरो अरदत्र सिन्धून्।
विभेद गिरं नवमित्र कुंभमा गा इन्द्रो अकृणुतस्व युग्भि:..
(ऋग्वेद, 10/89/7)
इसका मतलब है- इन्द्र सूर्य अथवा विद्युत मेघ को मारता है। जिस प्रकार कुठार जंगलों को काटता है उसी प्रकार वह मेघों को ध्वस्त करता है और नदियों को पानी से युक्त करता है। वह नये घड़े के समान मेघ का भेदन कर चट अपने सहयोगी मरुतों के साथ बरसता है।
पौराणिक ग्रंथों मसलन नारदीय पुराण (2/66/44), शिव पुराण (1/12/22/-23), वाराह पुराण (1/71/47/48) और ब्रह्मा पुराण में कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को ले कर उसके ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध हैं। कुंभ के बाबत शुक्ल यजुर्वेद का जो मंत्र उद्धत किया जाता है- (19/87) उसका संदर्भ सही नहीं है. मंत्र इस प्रकार है-
कुम्भे वानेष्ठुर्जनिता शचोभिर्यास्मित्रगे योन्यां गर्गो नन्त:.
प्लाशिर्व्यक्त शतधार उत्पन्त्ते दुबे च कुम्भी स्वधा पितृभ्य...
यहॉं कुम्भो और कुम्भी का अर्थ स्त्री-पुरुष के संयोग से संतानोत्पत्ति का रूपक प्रस्तुत किया गया है। भाषा-भाष्य (दयानंद सरस्वती, पृ.729) में इसका अर्थ है- कुंभ पर्व सत्कर्म के द्वारा मनुष्य को इह लोक में शारीरिक सुख देने वाला और जन्मान्तरों में उत्कृष्ट सुखों को देने वाला है। यह अर्थ उदात्त भावना से युक्त है। लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह अर्थ सही है?
अथर्ववेद के दो मंत्रों में भी कुंभ शब्द आता है।
पूर्ण: कुम्भोधिकाल आहितस्तं वै,
पश्यामो बहुधा नु संनत:।
-अथर्व 19/53/3)
सइमा विश्वा भुवनानि प्रत्यइ,
काल समाहु परमेव्योमन्।।
इसका अर्थ क्षेमकरण दास त्रिवेदी करते हैं: समय के प्रयोग से धर्मात्मा लोग अनेक सम्पत्तियों के साथ सद्मति प्राप्त करते हैं। यहां ‘पूर्ण कुंभौ’ शब्द का मतलब पूर्ण कुंभ भी मानें तो 12 वर्ष के कुंभ का उल्लेख कहीं नहीं है। दरअसल, इस त्योहार का उल्लेख वैदिक ग्रंथों, सूत्र साहित्य, महाकाव्य-पौराणिक ग्रंथों, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों में नहीं है। समुद्र मंथन की कहानी कुछ महाकाव्य-पौराणिक ग्रंथों में जरूर मिलती है, लेकिन पृथ्वी पर चार स्थानों पर चार बूंदों के छलकने की घटना का कोई उल्लेख कहीं नहीं है। लगता है कुंभ मेले की परम्परा को सम्मानजनक प्राचीनता प्रदान करने के लिए महाकाव्य-पौराणिक मिथक को किसी समय जोड़ा गया होगा।
तो इस सारी बहस के बीच कुंभ का अतीत कैसे देखा जाए, इस सवाल का जवाब सम्राट हर्ष के कालखंड में निहित है। कुंभ का मौजूदा स्वरूप सम्राट हर्ष के समय से शुरू होता है। कुंभ के इतिहास में आज तक हर्षवर्धन जैसा कोई दूसरा दानवीर नहीं हुआ। इतिहास में पहली बार कुंभ का वर्णन करने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग छठी शताब्दी ईस्वी में भारत आए थे। उन्होंने सम्राट हर्षवर्धन द्वारा दान देने की 75 दिनों की पूरी प्रक्रिया का वर्णन किया। वे हर कुंभ में अपना सब कुछ दान कर देते थे। जब तक कि उनके राजसी वस्त्र समेत उनके पास का तमाम धन खत्म न हो जाए। राजसी वस्त्र दान करने के बाद वे अपनी बहन राजश्री से वस्त्र मांग कर पहना करते थे। 'कुंभ मेले के सबसे पुराने लिखित साक्ष्य के मुताबिक यह करीब 2,000 साल पुराना उत्सव है। 590 में जन्मे हर्षवर्धन ने 606 से 647 ईसवी तक राज किया। वे हर पांच साल में एक बार प्रयागराज में धर्म सभा करते थे। वे कुंभ से ही अपने राज्य का संचालन भी करते थे। कुंभ के दौरान राजा हर्षवर्धन के दान करने के दो तरीके थे। एक ये कि वे दान समारोह आयोजित कर उसमें दान देते थे. और दूसरा ये कि वे अपनी आय को चार बराबर हिस्सों में बांटते थे- शाही परिवार के लिए, सेना/प्रशासन के लिए, धर्म के नाम पर, गरीबों के लिए। कुछ संदर्भ तिब्बत से भी कुंभ मेले के आयोजन के मिलते हैं। कामा मैकलेन की किताब “पिलग्रिमेज एंड पावर” में इस बात का जिक्र है। इस किताब में 1765 से 1954 में तिब्बत के कुंभ मेलों का जिक्र है।
कुंभ में चारों शंकराचार्य और इन पीठों की रक्षा के लिए बने तेरहों अखाड़े सभी स्नान पर्व पर सबसे पहले स्नान करते है। अखाड़ों के प्रशासनिक प्रमुख तो इनके श्री महंत होते है, पर अखाड़े को वैचारिक और आध्यात्मिक आधार देते हैं महामण्डलेश्वर और आचार्य महामण्डलेश्वर। महामंडलेश्वर एक से ज्यादा होते हैं मुख्य महामंडलेश्वर को आचार्य महामंडलेश्वर कहते हैं। हिंदू धर्म में अखाड़ों की अपनी समृद्ध और लड़ाकू परंपरा रही है। जब आठवीं-नौवीं शती में पतनशील बौद्ध धर्म के सामने शंकराचार्य ने वैदिक धर्म की स्थापना की तो ये अखाड़े धर्म की रक्षा के लिए बने। आदिशंकर ने भारत के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए। उत्तर में बद्रिकाश्रम, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में पुरी और दक्षिण में शृंगेरी। इन मठों के नाम पड़े ज्योतिष पीठ, शारदा पीठ, गोवर्धन पीठ और शृंगेरी पीठ। इन मठों की रक्षा और हिंदू धर्म पर बढ़ते इस्लाम के खतरे से निपटने के लिए अखाड़े बनाए गए। जहाँ संन्यासियों को शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र की भी दीक्षा दी जाती थी। जो शास्त्र से नहीं मानते, उन्हें शस्त्र से मनाने के लिए अखाड़ों का जन्म हुआ था। इन अखाड़ों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के बाद इन अखाड़ों ने अपना सैन्य चरित्र त्याग दिया। शुरू में सिर्फ चार अखाड़े थे पर वैचारिक मतभेद के चलते इनका बंटवारा होता गया। अखाड़ों के दो संप्रदाय हुए- शैव और वैष्णव। जो शिव के साथ आचार्य शंकर की आराधना करते हैं, वे शैव अखाड़े हुए और जो विष्णु की आराधना करते, रामानंद को मानते, वे वैष्णव अखाड़े कहलाए। रामानंद वैष्णव गुरु थे, जो शंकराचार्य से कई शताब्दियों बाद हुए। शैव संप्रदाय के छह मुख्य अखाड़े थे और वैष्णवों के सात। इन्हीं तेरह अखाड़ों के भरोसे हिंदू धर्म था।
शैव अखाड़े के संन्यासियों को ‘नागा’ और वैष्णव अखाड़ों के संन्यासियों को ‘वैरागी’ कहा गया। नागा और वैरागी हर वक्त लड़ने-भिड़ने को तैयार रहते थे। नागा कपड़े नहीं पहनते थे और वैरागी सफेद कपड़े पहनते थे। वैष्णव साधुओं में चार संप्रदाय हैं- रामानुजी, रामानंदी, निंबार्क और माधव चैतन्य। अयोध्या में रामानंदी संप्रदाय का दबदबा रहा है, इसलिए राम जन्मभूमि पर होने वाले हर हमले में आक्रांताओं से रामानंदी वैरागी ही लोहा लेते रहे। निर्वाणी अखाड़ा रामानंदी संप्रदाय के तीन खाड़कू संगठनों में से एक था, जो धर्म की रक्षा के लिए मरने-मारने का काम करते हैं। इसके दो अंग हैं—निर्मोही और दिगंबरी अखाड़ा। इनका प्रमुख केंद्र अयोध्या है। निर्वाणी अखाड़े का केंद्र अयोध्या की हनुमानगढ़ी है। पहले यह हनुमान टीला या हनुमान मंदिर था। अठारहवीं शती में उत्तर भारत में मुगल शासकों का प्रभुत्व हुआ। अवध के नवाब सफदरजंग (1739-54) ने बाबा अभयराम दास को हनुमान टीले पर सात बीघे जमीन दी। सफदरजंग के पड़पोते आसिफ-उदौला ने पैसे दे उस जमीन पर दुर्गनुमा मंदिर बनवाया। बाद में अवध के नवाबों ने जमीनें दान दे उस गढ़ी का विस्तार करवाया। बाबा अभयराम दास इस गढ़ी के पहले गद्दीनशीन या श्रीमहंत हुए। बाद में यह स्थान निर्वाणी अखाड़े के नागा साधुओं का केंद्र बना।
इन अखाड़ों के महंत ही नए वैरागी की भर्ती करते। नए साधु को मठ का महंत ही दीक्षित करता है। नया रंग-रूट तीन साल तक ‘यात्री’ या ‘छोटा’ कहलाता है। अगले तीन साल वह ‘बानगीदार’ कहा जाता है। उसका काम अखाड़े में होने वाली पूजा-पाठ में मदद करना होता है। फिर तीन साल वह खाना बनाने और परोसने के काम में रहता है, तब उसे ‘हुड़ाडंगा’ कहते हैं। अगले तीन बरस वह ‘मूरतिया’ बन सेवा करता है। यानी बारह साल की इस कठिन प्रक्रिया से गुजरने के बाद वह नागा या वैरागी कहलाने लायक होता है। अयोध्या में ज्यादातर रामानंदी वैरागी साधु हैं, जो इस्लामी आक्रांताओं के हमले होने पर उनसे लोहा लेते थे।
अखाड़ों में साधुओं की भर्ती आसान नहीं होती है। शैव परंपरा में नागा साधु बनने के लिए अखाड़े को काफी समय देना होता है। अगर कोई साधु बनना चाहता है, तो उसे कुछ समय अखाड़े में रह कर अपनी सेवाएं देनी होती हैं। सेवा का समय 6 महीने से लेकर 6 साल तक भी हो सकता है। फिर, किसी कुंभ मेले में उसे दीक्षा दी जाती है। इसके लिए व्यक्ति को अपने सांसारिक जीवन का त्याग करना पड़ता है, खुद का पिंडदान करना होता है। करीब 36 से 48 घंटे की दीक्षा प्रक्रिया के बाद उसे नए नाम के साथ अखाड़े में प्रवेश मिलता है। अखाड़ों में नागाओं की भर्ती सिर्फ कुंभ के दौरान ही होती है।
इस बार के कुंभ में प्लास्टिक के नरमुंड पहने कुछ बहरुपिए भी आपको स्वांग करते दिखाई देंगे। साधुओं के हाथ में लेटेस्ट आइफ़ोन दिखाई देगा। स्मार्टवॉच भी है। लैपटॉप भी है। टेंट हाइटेक हुए हैं। साधन संपन्न हुए हैं। कुंभ अब हाईटेक हो गया है। यहां त्याग, तपस्या के बरक्स वैभव और विलास भी दिखता है। डेढ़ लाख के टेंट, हैलिपैड, संगम ले जा कर स्नान कराने वाली याट, आधुनिक होटल आपको कुंभ के मेला क्षेत्र में मिलेंगे। एक जमाना था जब कुंभ शास्त्रार्थ का केंद्र हुआ करता था। तर्क और ज्ञान से यहां धर्मयुद्ध जीते जाते थे। कुमारिल भट्ट और आचार्य शंकर का शास्त्रार्थ यहीं हुआ था। बता दें कि कुंभ को संस्थागत रुप आचार्य शंकर ने ही दिया था। उसके बाद मंडन मिश्र और शंकराचार्य फिर मंडन मिश्र की पत्नी भारती तथा शंकराचार्य के शास्त्रार्थ के सूत्र भी यहीं मिलते हैं। वक्त बदला है। संत अब यहां धर्म पर, अध्यात्म और मोक्ष पर नहीं, प्रधानमंत्री कौन बने? किस राजनीतिक दल को समर्थन दिया जाए, इस पर विचार करते हैं। अब शास्त्रार्थ वाले साधु भी नहीं हैं। गोली, बन्दूक, बोलैरो, सफारी और आई-पैड वाले साधु जरूर मिलते हैं।
प्रयाग में गंगा उदास है। प्रदूषित है। इसका पानी लगातार घट रहा है। इस नदी का भी सरस्वती की तरह लोप हो सकता है। नदियों ने महान संस्कृतियां पैदा की हैं। हम उसे नष्ट कर रहे हैं। जिसे हम बना नहीं सकते उसे हमें मिटाने का हक भी नहीं है। सोचिए, गंगा के बिना प्रयाग या काशी या कुंभ जैसे शब्द और संज्ञाएं क्या अपना अर्थ सुरक्षित रख सकेंगे। कुंभ की ये पूरी परंपरा और रचना गंगा और संगम के कारण ही तो है। आप साधन के लिए पैसे लगा रहे, प्रचार के लिए पैसे लगा रहे, सुविधाओं के लिए पैसे लगा रहे, मेले को लगातार विस्तार देने और सर्वसंपन्न बनाने में पैसे लगा रहे, लेकिन गंगा का क्या। गंगा की सुध किसे है? संगम की सुध किसे है? संगम तक पहुँच रहे पानी में मंदाकिनी का कितना अंश है? कितना प्रतिशत जल ऐसा है जो ऋषिकेश से उतरा है? तो क्या बारिश और शहरों, उद्योगों के कचरे की धार को हम मोक्ष के लिए खड़े करोड़ों लोगों के लिए प्रस्तुत करते रहें और फिर ऐसी प्रस्तुतियों का समय कब तक? गंगा जिस दिन सरस्वती होने लगेंगी, धर्म के नाम पर धर्महीनता की पट्टी खुल जाएगी और फूटा कमंडल किसी को न वरदान दे सकेगा, न मोक्ष।
कुंभ का अर्थ है घट, कलश, कमंडल। संचय का पात्र। कितना स्पष्ट दर्शन निहित है कुंभ के नाम में ही और हम उसे देख नहीं पा रहे. संचय करें, संरक्षित करें, एकत्र करें, पवित्र करें, प्रवाहित और गतिशील करें। वैर से उठें, भेद से उठें, भ्रम से उठें, स्वार्थ से उठें. समावेशी हों, समग्र हों, समेकित हों। यही कहता है कुंभ। यही कहता है समय। यही कहती हैं गंगा।
इस कुंभ में इसके मूल भाव, नाम-गुण और गंगा को हम बचाएंगे, कम से कम यह संकल्प तो लें।
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