विद्यानिवास मिश्र का निबंध 'कुंभ पर्व'

 

विद्या निवास मिश्र 



आजकल इलाहाबाद अपने कुम्भ मेले के आयोजन के लिए चर्चा के केन्द्र में है। हिन्दू धार्मिक एवम सांस्कृतिक परम्परा में कुम्भ, कलश या घट का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। बिना कुम्भ के कोई धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता। घट में जल भरा जाता है। यह घट की पूर्णता का द्योतक होता है। इसमें भरा जल प्रतीकात्मक रूप से नदियों के जल का प्रतिनिधित्व करता है। विद्यानिवास मिश्र ने इस घट की आध्यात्मिकता को विश्लेषित करते हुए उचित ही लिखा है 'यह कुंभ जीवन की पूर्णता, उर्वरता और प्रकाशमयता का प्रतीक होने के साथ निखिल सृष्टि के साथ उसके तादात्म्य, समस्त देवत्व के साथ उसके सायुज्य और सर्वभूतहित के लिए उसके उपयोज्य भाव का भी प्रतीक है।' विद्यानिवास मिश्र के निबन्ध विद्वता से भरे तो होते ही हैं, साथ ही उनमें ऐसी सहजता होती है जिससे पाठक सहज ही अपना जुड़ाव महसूस करने लगता है। 'महाकुम्भ विशेष' के अन्तर्गत आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं विद्यानिवास मिश्र का निबंध 'कुंभ पर्व'।



महाकुम्भ विशेष : 21


'कुंभ पर्व'


विद्यानिवास मिश्र


कुंभ का नाम लेते ही हमारे सांस्कृतिक मंगल-बोध के एक साथ कई स्तर उघड़ आते हैं। एक कुंभ है जो क्षीरसागर के मंथन से निकला, अमृत से लबालब भरा कुंभ है। यह कुंभ जिन-जिन स्थानों पर इस भूतल पर रखा गया और जिस-जिस ग्रहयोग के कालबिंदु पर रखा गया, उन उन स्थानों पर, उस-उस ग्रहयोग के कालबिंदु पर प्रति बारह वर्ष के बाद कुंभ पर्व मनाया जाता है। वे स्थान हैं- प्रयाग, उज्जयिनी, हरिद्वार और नासिक। एक कुंभ है, जो समस्त देवों के अधिष्ठान के रूप में प्रत्येक मांगलिक कार्य में प्रतिष्ठापित किया जाता है, उसे गोबर से गाँठा जाता है, गोबर की रेघारियों में जौ के दाने धंसाए जाते हैं, इस कुंभ को समस्त तीथों के जल से, सर्वोषधियों से भरा जाता है। इसके नीचे सप्तधान्य रखे जाते हैं, इसके ऊपर पंचपल्लव रख कर अक्षत से पूर्ण नारिकेल-युक्त एक पूर्णपात्र रखा जाता है और उस पूर्णपात्र के ऊपर एक दीप। इस पूर्णकुंभ के चारों ओर जितनी तेजी से जौ के अंकुर बढ़ जाते हैं, उतनी ही मंगल कार्य की संसिद्धि सफल मानी जाती है। एक प्रकार से यह कुंभ जीवन की पूर्णता, उर्वरता और प्रकाशमयता का प्रतीक होने के साथ निखिल सृष्टि के साथ उसके तादात्म्य, समस्त देवत्व के साथ उसके सायुज्य और सर्वभूतहित के लिए उसके उपयोज्य भाव का भी प्रतीक है।


एक दूसरा कुंभ है, जो सृष्टि की घटना के बार-बार नए जन्म के साथ पुरावृत्त होने का प्रतीक है। इसीलिए मातृत्व और वात्सल्य के स्रोत के रूप में कुंभ सिद्ध उपमान बन गया है। दूसरी ओर जब मृत्यु के बाद और्ध्वदैहिक कृत्य संपन किए जाते हैं, उस समय एक घट पीपल की डाली में लटकाया जाता है, उसके नीचे एक बहुत छोटा-सा सुराख किया जाता है, घट को प्रतिदिन भरा जाता है, जिससे उस सुराख से बूंद-बूंद जल रिसता रहे और पीपल की जड़ को सींचता रहे। एक प्रकार से मृत्यु को नए जीवन में रूपांतरित करने की यह संधि-प्रक्रिया है। एक घट रीत-रीत कर जीवन-तरु को संतान परंपरा के प्रतीक रूप वृक्ष को सींचता है। इस प्रकार अपनी सार्थकता पा कर ही वह अपने सूक्ष्म शरीर में आप्तकाम हो कर प्रवेश कर सकता है। मानवदेह जीवन-रस से परिपूरित होने के लिए है, पर साथ ही यह परिपूरण भी सृष्टि के निरंतर नए-नए प्ररोहों को सींच-सींच कर ही सार्थक है। मृत्यु जीवन की इति नहीं, नए सिरे से लोकमंगल की साधना के पहले का अल्प विराम है, पूर्णता के लिए नई तैयारी का उपक्रम है।


पूज्य महामना मालवीय जी के बारे में प्रसिद्ध है कि वे कहा करते थे, 'कोई पात्र अगर पूरा न भरा हो तो दो प्रकार से इसे देखा जा सकता है। एक दृष्टि कहेगी कि पात्र आधे से ज्यादा खाली है, पर वह दृष्टि केवल खाली देखती है और भारतीय दृष्टि कहेगी कि चलो आधा भर गया, अब कुछ ही और भरने को है। इस देह-घट को बराबर इसी दृष्टि से देखना है, कितना भर गया और अगर कुछ कसर दीखती है तो यह मान कर चलना चाहिए कि कहीं कोई दूसरा घट इसके खाली होने से भर रहा है।' प्रत्येक दशा में घट की परिपूर्णता और घट की परिपूरकता का ध्यान बना रहना चाहिए।




एक चौथा घट है जिसे दसों दिक्पाल दिग्गज भर-भर के उससे लक्ष्मी का अभिषेक करते हैं। विश्व की शोभा बिना सार्वदेशिक मंगलवारि से अभिषिक्त हुए निखार नहीं पा सकती। दसों दिशाएं जिसकी ओर किसी आशा से उन्मुख होंगी, वह दसों दिशाओं को अपने सौंदर्य से, अपनी समृद्धि से, अपनी उदारता से आप्यापित किए बिना रह कैसे सकती है? लक्ष्मी का अभिषेक हो, राजलक्ष्मी का अभिषेक हो, कुंभ अपने रस से लक्ष्मी के मद को धो देता है, राजलक्ष्मी के कठोर चित्त की मृदुल बना देता है, समृद्धि को पर के लिए अर्पणीय बना देता है और रूपलक्ष्मी को सौभाग्य-सम्पन्न बना देता है। यह कुंभ निखिल विश्व की आकांक्षा का प्रतीक है, जो प्रत्येक अभ्युदय को अपने द्रवण से भरना चाहती है।


एक पांचवां घट है, जो हमारे समस्त दर्शनों पर छाया हुआ है। कार्य-कारण संबंध को समझाने के लिए मिट्टी का पड़ा एक मूर्धन्य उदाहरण है। मिट्टी उपादान कारण हो या समवायि कारण हो, बराबर याद आती रहती है, कुंभकार का चक्र बराबर घूमता रहता है, उसका डंडा बराबर निमित्त कारण बन कर चक्र को रोकता और नचाता रहता है। कुंभ या कार्य यानी रचना, कुंभकार यानी कर्ता यानी रचनाकार, चक्का यानी सृष्टिक्रम और मिट्टी यानी सृष्टि का अव्यक्त रूप। यह कुंभ कार्य है, इसलिए नश्वर भी है, मर्त्यभाव अर्थात् मृत्यु के आगे मानवीय अवशता के भाव का। महाभारत में बुद्ध के महाविनाश के अनंतर विदुर ने इसी मिट्टी के घड़े का बिंब ले कर नश्वरता की अपरिहार्यता का रूपक खड़ा किया है-


यथा च मृण्मयं भाण्डं चक्रारूढ़ विपद्यते।

किंचित्प्रक्रियमाणं च कृतमात्रमथापि वा।।

छिन्नम वाष्पशोष्यन्तमजीर्णमथवापि च।

आर्द्र वाप्यथवा शुष्कं पच्ययानमथापि वा ।।

उत्तार्यमाणमापाकाद् उद्धतं चापि भारत।

अथवा परियुज्यन्तमेवं देहाः शरीरिणाम् ।।"


'जैसे मिट्टी का घड़ा चाक पर रखते रखते कभी टूट जाता है, कभी हाथ से, कुछ शक्ल लेते, कभी गढ़े जाते ही, कभी चाक से काट कर निकालते भर में, कभी नीचे रखे जाने पर कभी गीले रखते ही, कभी सूख जाने पर, कभी पकाते समय, कभी आंवा से निकालते समय और कभी निकालने पर, उसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी कभी गर्भ में, कभी जन्म लेते ही, कभी बचपन में, कभी जवानी में और कभी बुढ़ापा आने पर मृत्यु की प्राप्त होता है। मृत्यु उम्र नहीं देखती।'




मृत्यु का यह बोध जहां एक ओर मनुष्य के हृदय को करुणा से आपूरित करता है। वहीं उसके मन में अमरत्व की एक प्यास भी जगाता है, मृत्यु का अतिक्रमण कर के, घट का अतिक्रमण कर के अमरत्व के अनंत महोदधि में एकाकार होने के लिए एक आवाहन भी देता है। नश्वर घट अमृत महोदधि में डुबकी लगा कर अपने को अमृत से भरता है, तभी अमृत भी एक आकार पाता है, नश्वर घट में ही परब्रह्म पूर्णात्पूर्णतर परब्रह्म अवतीर्ण हो कर सगुण और साकार होते हैं और सगुण साकार होने पर ही वे परम आत्मीय होते हैं, घट मनुष्य के लिए साधन है तो परमात्मा का साध्य भी है। बिना घट के अभिव्यक्त हुए यह बात भी कैसे समझ में आएगी।


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। 

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।


वह घट भरा है, यह घट भरा है, उस घर के आपूरण से इस घट का नया आपूरण होता है, पर पूरा-का-पूरा खाली हो कर भी, दूसरों को भर कर भी वह घट भरा ही रहता है। शर्त केवल एक है कि अपने को भरने का भाव बराबर दूसरे के आपूरण से प्रेरित हो, तभी यह न रीतने वाली पूर्णता बनी रहती है। आपूरण हीजीवन का परम लक्ष्य है।


शायद इसीलिए पूर्ण कुंभ मातृत्व अर्थात् सृष्टि के गौरव का प्रतीक तथा अधूरे एवं साकांक्ष सौंदर्य की अखंड सौभाग्यशालिता का प्रतीक बन गया। कालिदास ने शकुंतला और पार्वती के द्वारा घड़े भरवा भरवा कर जो पेड़-पौधों को सिंचवाया है, वह उनमें मातृत्व के गौरव की प्रारंभिक तैयारी के लिए ही। बाहर के लोगों की मातृत्व के इस प्रतीक के लिए कुंभ का उपमान बड़ा भद्दा और भोंडा लगता है। वे गोलाइयों को अपेक्षा उभरी हुई नोकों के प्रति अधिक आकृष्ट होते हैं; क्योंकि उनकी दृष्टि में नारी केवल यौवन का उभार है, मातृत्व की रेखाहीन वर्तुलता और पूर्णता नहीं।


इन अनेक प्रकार के कुंभों की बात सोचता हूं तो याद आता है कि अपना कुंभ छूंछा ही पड़ा हुआ है। ध्यान से सुनो, मेरी आत्मा के चारों ओर से आवाज आ रही है-शाम होने को आई, किस सौंदर्य के मोहजाल में, किन स्मृतियों में, किन चिंताओं में खोई हुई हो, 'गागर भरने की बेला बीती जाती है', जीवन का कुंभ पर्व व्यर्थ हुआ जा रहा है, भरे जल में डूबो, जाल की तरह अथाह, अपरिमेय, सरस और तृप्तिप्रद बनने के लिए, अमृत तुम्हारे मन में ही मथा जा रहा है, अपनी गागर को भरने के लिए उन्मुख हो, इस सागर को भर कर जब चलोगी, तभी तुम्हारी ओर विश्व गागर नागर करकाने के लिए मुड़ेंगे और तुम्हारे गागर का रस छलक कर उन्हें सराबोर कर देगा। तुम्हारा कुंभक प्राणायाम उस एक क्षण में ही पूरी सार्थकता पा लेगा, पर पहले गागर तो संभालो, कुंभ की पूर्णता को, कुंभ की सार्थकता तो मानो, नश्वरता को अनश्वरता की चुनौती के रूप में तो स्वीकार करना सीखो। यह कुंभ पर्व यही चुनौती देने आया है। सुनो, कितने कुंभ भरे जा रहे है, तुम्हारा ही कुंभ क्यों रीता रहे!



कंटीले तारों के आर-पार (1998)


(निबंध 'हिंदू होने का मतलब', पं. विद्यानिवास मिश्र रचनावली, खंड-15)



टिप्पणियाँ

  1. पंडित जी भारतीय संस्कृति , मिथक और विवेक के विलक्षण व्याख्याता थे। वे जड़ता और परंपरा में भेद करना जानते थे। वे एक सहृदय अध्येता थे जो अपनी वाणी और लेखनी से रस बरसाते थे।

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