विजेन्द्र जी के संग्रह ‘आँच में तपा कुंदन’ पर जीतेन्द्र जी की समीक्षा




वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी दस जनवरी को अपनी उम्र का अट्ठाहत्तरवाँ पड़ाव पूरा कर रहे हैं। इस उम्र में भी जिस प्रतिबद्ध ढंग से वे लेखन कार्य में जुटे हैं वह हमें अचंभित करता है। उनका अध्ययन क्षेत्र व्यापक है। विश्व साहित्य पर उनकी पकड़ तो है ही वे बिल्कुल नए से नए रचनाकारों की रचनाओं पर भी नजर रखते हैं। बहरहाल, पिछले साल उनका एक और कविता संग्रह ‘आँच में तपा कुंदन’ प्रकाशित हो कर आया है। इस संग्रह का चयन एवं संपादन डॉ0 रमाकान्त शर्मा ने किया है। इस संग्रह पर एक समीक्षा हमारे लिए लिखी है कवि-कथाकार जीतेन्द्र जी ने। तो आईए पढ़ते हैं यह समीक्षा ‘प्रेम, सौन्दर्य और उल्लास के कवि विजेन्द्र जी’

प्रेम, सौन्दर्य और उल्लास के कवि विजेन्द्र जी

जितेन्द्र कुमार

                हमारा समय निष्करूण हो रहा है। हमारा हृदय संकुचित हो रहा है। बड़ी-बड़ी दुर्घटनाओं से भी हम संवेदित नहीं होते। हमारे अंतः का मरुथल पसर रहा है। ऐसे संकटकाल का प्रतिरोध कोई कवि कैसे करे? वरिष्ठ कवि-चित्रकार विजेन्द्र जी को प्रेम पर भरोसा है। प्रेम कविताएँ लिख कर संवेदनहीन समय का रचनात्मक प्रतिरोध संभव है। ‘‘आँच में तपा कुंदन’’ की कविताओं से कवि के रचनात्मक प्रतिरोध की भाषा को समझा जा सकता है। दुनिया बहुत बड़ी हैसहित अनेक कविताओं में नाटकीय संलाप है। इस कविता का मूल कथ्य है कि मैंको तुम के प्रेम पर पूरा भरोसा है। कवि प्रगीत की लय में खूब रमते हैं। मैं तुम्हें एक बार में/ नहीं देख सकता’, की आवृत्ति कविता में तीन बार होती है। इस आवृत्ति से कविता में गति पैदा होती है। तुमउस विराट संसार में समाहित है जिसके क्रिया -व्यापार की ओर कवि का ध्यान बार-बार आकर्षित होता है। कवि की सामाजिकता इतनी व्यापक है कि वह एक बार में अपनी जीवन-संगिनी को भी सम्पूर्णता में नहीं देख सकता। कविता में कुछ काव्य-बिंब हैं जो कवि की जीवन-दृष्टि और सौंदर्यबोध को आलोकित करते हैं। कविता का स्थापत्य संश्लिष्ट है। मैंऔर तुमके संलाप में मेहनकश किसान की छवि के अतिरिक्त ऋतु के आगमन की दस्तक है, पूर्वजों के चेहरों पर पड़ी झुर्रियाँ हैं, नीम की खुरदरी छाल है, झुरमुटों से दिखता बाल रवि और उसके उर्वर इलाके का गौरव आम का पेड़ है। यानी प्रकृति और समाज अपने तमाम वैभव और स्मृतियों के साथ प्रस्तुत हैं। इस प्रस्तुत को कोई संवेदनहीन ही नकार सकता है। कवि की ज्ञानात्मक संवेदना ईमानदारीपूर्वक अपनी सहचरी से कहता है कि मैं तुम्हें-एक बार में नहीं देख सकता। क्योंकि प्रेम में भी मैं उतना संकीर्ण नहीं कि मेरा प्रेम स्वकीया तक सीमित रहे। जनता के मुक्ति-संघर्ष के रास्ते सरल नहीं हैं, एक रेखीय नहीं हैं, वहाँ कई मोड़ हैं। नई-नई चुनौतियाँ हैं। कविता में रमने पर कविता में जो तुमहै वह जनता की प्रतीक लगती है। लंबे संघर्ष के कारण, संघर्षशील जनता थोड़ी विचलित है, अपने अंदर का भेद नहीं खोलना चाहती। संघर्षशील जनता की आँखों में भरोसे के बिम्ब हैं जो सारे वृक्षों के तनों से ज्यादा पुख्ता है। इन सटीक काव्य-बिम्बों के माध्यम से कवि संघर्षशील जनता में असीम भरोसा व्यक्त करते हैं। भरोसा शब्द विश्वास की अपेक्षा ज्यादा सम्प्रेषणीय है क्योंकि यह लोक का है। विजेन्द्र जी को लाल रंग बहुत पसंद है। यह रंग जोश और जवानी का रंग है, यह क्रांति का रंग है। इस यांत्रिक समय में बाल रवि का लाल रंग झुरमुटों के पार दिखता है। कवि को भरोसा है कि बाल रवि शीघ्र ही झुरमुटों के ऊपर उठकर आकाश में दीप्त होगा। बबूलों के इलाके में कवि को अकस्मात् आम का पेड़ दिखता है। उसका भरोसा और दृढ़ हो जाता है। ऐसे में कवि जीवन-संघर्ष में एक और मोड़ चुनता है।


संग्रह में कई कविताएँ हैं जिसमें विजेन्द्र जी की जीवन-संगिनी उषा जी तुमके रूप में उपस्थित हैं। इनमें दाम्पत्य-जीवन की सहज छवियाँ हैं। दाम्पत्य-जीवन की इन छवियों के माध्यम से वे उन तमाम मध्यवर्गीय स्त्रियों में संवेदनात्मक ज्ञान का आलाके दीप्त करना चाहते हैं जो अपने पति से, विशेषकर सामाजिक ऐक्टीविस्ट पति से छोटी-छोटी निजी आकांक्षाएँ रखती हैं। इन छोटी-छोटी प्रगीतात्मक कविताओं का ध्वन्यात्मक संदेश सामाजिक एक्टीविस्टों के लिए भी है कि दाम्पत्य-जीवन की गाड़ी सहज ढ़ंग से चले, इसके लिए वे भी थोड़ा जिम्मेवार बनें। उषा जी कवि के प्रेम का आलंबन हैं, जीवन-संगिनी के रूप में घर-गृहस्थी की संचालिका भी हैं। आतिथ्य उनके स्वभाव में है। कवि-मित्रों को हाथ का बना खाना खिलाती हैं। लेखक भोजन के स्वाद को भूल नहीं पाते। गृह-कार्य में वे पसीने से तरबतर रहती हैं। उनके बच्चे उन्हें अन्नपूर्णाकहते हैं। विजेन्द्र जी इतना विपुल लेखन कार्य कर सके, इसमें अन्नपूर्णा का सहयोग भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन अन्नपूर्णा हर हाल में प्रसन्न नहीं रह पातीं। वे अपना विरोध मौन रह कर, कवि जी से एक दूरी बनाकर प्रकट करती हैं। कई कविताओं में इस मौन विरोध की आत्मपरक छवियाँ हैं। इन मौन विरोधों के चट्टानों की चुप्पी को विजेन्द्र जी ज्ञानात्मक संवेदना के ताप से पिघलाने की कोशिश करते हैं, यहाँ मुझे ताप शब्द की जगह आँच लिखना चाहिए क्योंकि वह लोकधर्मी शब्द है। ‘‘पानी बरस रहा है’’ में मौसम बड़ा खुशगवार है। उषा जी कवि को सामने दीखती हैं। लेकिन चुप्प हैं। कवि जब घर आते हैं तो दरवाजा खोलने के बाद उनकी ओर देखती तक नहीं। हँसती नहीं। कुशल नहीं पूछतीं। बच्चे इस तनाव को भाँप जाते हैं। वे भी हँसने की जगह तलाशते हैं। कवि तब ज्ञानात्मक संवेदना का हथियार उठाते हैं। वे समझाते हैं कि हम सामाजिक संवेदना से अलग निजी संवेदना कैसे बनायेंगे? पश्चिमी राजस्थान अकाल ग्रस्त है और ऐसे समय में पानी बरस रहा है। पानी का बरसना ऐसे अकाल ग्रस्त प्रदेश में सबकी प्रसन्नता की बात होनी चाहिए। इस तरह विजेन्द्र जी लोक की संवेदना से उषा जी को जोड़ते हैं। तब कविता निजी प्रेम की नहीं, बल्कि लोक से प्रेम की कविता बन जाती है।



इस क्रम में उपहारकविता की चर्चा की जा सकती है। उपहारशीर्षक कविता संग्रह में दूसरी कविता भी है। कवि राजधानी से लौटे हैं घर। पत्नी के लिए अथवा बच्चों के लिए कोई उपहार नहीं लाये। कविता में सूचना है कि राजधानी का बाजार उपहारों से पटा पड़ा था। तब उन्होंने कोई उपहार क्यों नहीं खरीदा? क्या वे बाजार का इस तरह प्रतिरोध कर रहे थे कविता में प्रतिरोध की बात दर्ज नहीं है। कवि मूर्ति शिल्पियों की गली में घूम रहे थे। वहाँ उन्होंने एक रंगरेजिन को चटक रंगों में कच्चा सूता खूबसूरती से रँगते देखा। कवि ने श्रम के सौंदर्य को सराहा। कवि-पत्नी की चिंता कवि के सेहत की है। कवि की चिंता है कि पूरा मरूथल पूर्वी राजस्थान की तरफ बढ़ने को आतुर है। यह सामान्य रूपक नहीं है। कवि विचलित है कि बहुतों का (कविता में सिर्फ तुम्हारा) भरोसा टूट रहा है। कवि इतना कठोर नहीं है कि पानी बरसने से (बूँद गिरने से) उनमें स्फुरण नहीं हो। यह मरुथल संवेदनहीनता का मरुथल है, मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का मरुथल है। सपाट शब्दों से ढली यह कविता बहुत अच्छी कविता का आस्वाद देती है। प्रेम सिर्फ करूणा नहीं है, प्रेम एक मानवीय मूल्य है, प्रेम संवेदनहीन समय में प्रतिरोध है। प्रेम का आयतन बहुत बड़ा है।



                इस कड़ी में अनेक कविताओं की चर्चा की जा सकती है। आइये, ‘रजत धूपको देखें, इसमें उषा जी की गृहिणी की छवि आलोकित है। हालाँकि इसमें मुझे भारतीय स्त्री की बहुसंख्या की छवि दिखती है जो गृहिणियाँ हैं। गृहिणी रूपी उषा जी गृह कार्य की व्यस्तता में अस्त-व्यस्त और पसीने से तरबतर हैं। कपड़े फींचते समय उनकी अँगुली में चोट लगी है। वे अखबार में कवि का नाम छपने से कोई विशेष खुश नहीं होतीं। वे काव्य-चर्चा पसंद नहीं करतीं। तीन रूपकों के अतिरिक्त कविता का स्थापत्य अभिधात्मक है। कविता से पता चलता है कि गृह-कार्य में अस्त-व्यस्त इस गृहिणी को उसके कार्यों को सम्पन्न करने में किसी आदमी का कोई सहयोग नहीं है। ऐसी गृहणियों से हम कवि काव्य-चर्चा में भागीदारी खोजते हैं। उषा जी या अन्य गृहिणियाँ अपनी सघन भौंहों को वक्र कर अपना प्रतिरोध जताती हैं। इसी कड़ी में ‘‘उन्हें पहचानो’’ को भी पढ़ें! कवि और उनकी जीवन-संगिनी के वैचारिक धरातल में फर्क है। उनकी ज्ञानात्मक संवेदना का स्तर एक नहीं है। इसकी नाटकीय संरचना के संलाप में मैंउर्फ सामाजिक ऐक्टिविस्ट कवि का वैचारिक आग्रह है जीवन सहचरी से कि गंदी बस्तियों में रहनेवाले लोगों की धड़कनों को सुनो/उन्हें पहचानो/उनकी आँखें कहाँ देखती हैं। उनके कान कहाँ सुनते हैं। (देखो) गृहिणी रूपी तुमका आग्रह है कि चलो, यहाँ से निकल चलें। कवि की ज्ञान संवेदना आहत होती है। वह अपने कानों में अपनी आत्मा की आवाज सुनता हैः कहाँ, कहाँ चलें। आगे भी/ कोई बेहत्तर हालात नहीं। कवि महसूस करता है कि यहाँ मैं (वह) बिल्कुल अकेला हूँ (है)। यहाँसिर्फ स्थलका बिम्ब नहीं है, बल्कि यहाँमें वह काल-खंडभी समाहित है जिसमें मैंऔर तुमका संवाद जारी है। मैं की त्रासद स्थिति को महसूस कीजिये कि संवेदना को बचाने में उसकी जीवन-संगिनी साथ निभाने को तैयार नहीं है। प्रेम को बचाने के आत्मसंघर्ष में प्रेयसी पर से भरोसा टूट रहा है। संवेदनहीनता का मरुथल क्षण-क्षण पसर रहा है और संकट में लोगों को छोड़कर तुम (यह समाज) भाग रहा है। इससे बढ़िया यथार्थ का अक्स क्या होगा?



                विजेन्द्र जी के प्रगीतात्मक कविताओं का मूल स्वर प्यार है। इस कडी़ में संग्रह (आँच में तपा कुंदन) की चिनग आँच कीसच्चा मोती, अन्न भरी पृथ्वी, कुंदन, ओ चन्द्रमा, तँबई चेहरा, ओ कवि, चौड़ती जड़ें, तुम्हारी बातें सच हैं, समय को पहचानो, प्रिय सुनो, नमन, भरा बादल, उगान, आँच का फूल, तुम यहाँ नहीं हो, तुम्हारी याद, रजत धूप, उपहार, पानी बरस रहा है, अन्नपूर्णा, उर्वर भूमि आदि उल्लेखनीय प्रेम कविताएँ हैं। प्रेम सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है। कविता में प्रेम को श्रम से संबद्ध करना जनसंस्कृति को समृद्ध करना है। मनुष्य की नियति केवल श्रम करना नहीं जैसा गीता में महाकवि वेदव्यास ने कृष्णा के मुख से कहलवाया है, अपितु अपने श्रम के फल पर पूर्ण अधिकार के लिए संघर्ष करना और उसे प्राप्त करना उसका मानवाधिकार है। मनुष्य जीवन सिर्फ दासता के लिए नहीं है। साम्राज्यवादी शक्तियों के नियंत्रण और निर्देशन में बाजार की संस्कृति संवेदनहीन, निष्करूण एवं मानव विरोधी हुई है। बाजार की जनविरोधी दलाल संस्कृति का सांस्कृतिक प्रतिरोध रचनात्मक साहित्य से संभव है। पूँजी द्वारा सृजित दुष्काल में प्यार करना कठोर पत्थर उठाने के सदृश है। इस दुष्काल में प्यार भरे संस्पर्श से सिहरन नहीं होता। फूलों की गंध में देशी बबूल की कसैली छाल का आस्वाद है। विजेन्द्र जी के लिए प्रेम की आकृति बीहड़ जैसी होती है (घने बादलों के बीच) 1.पद, प्रतिष्ठा एवं ऐश्वर्य में कोई पहाड़ जैसी ऊँचाई प्राप्त कर सकता है, लेकिन मूल चीज है हृदय की उर्वरता। प्रेम उसी हृदय में पनप सकता है जिसकी हृदय भूमि उर्वर हो। प्रेम की तलाश में विजेन्द्र जी श्रम-सौंदर्य को स्थापित करते हैं। श्रम-सौंदर्य के अनूठे रूपक उनकी कविताओं में कतार में खड़े मिलते हैं। श्रमशील किसान एवं मेहनतकश कामगार का जीवन उन्हें बेहद आकर्षित करता है। आसपास के परिवेश से उनका गहरा परिचय है। उनकी कविताओं में स्थानीय भूदृश्य के बिंबों का चित्रण यात्रावृतांत के शिल्प में व्यंजित मिलते हैं। किसान जीवन के चित्रण में वे खूब रमते हैं, खूब जमते हैं। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए बाबा नागार्जुन और केदार नाथ अग्रवाल की कविताएँ याद आती हैं। कहा जाता है कि आरम्भ से ही नागार्जुन की कविताओं का एक बड़ा हिस्सा प्रकृति से सम्बन्धित रहा है। प्रकृति उन्हें आकर्षित करती रही और उनका यात्री मन उसमें रमता रहा। पौड़ी गढ़वाल के पर्वतीय ग्रामांचल जहरी खाल प्रवास में रहकर लिखी गई उनकी कविताओं में प्रकृति का महज दृश्य वर्णन नहीं है बल्कि उसे वे मानवीय संवेदना से सीधे जोड़कर देखते हैं। उनकी कविताएँ सुन रहा हूँ, बाघ आया उस रात, जंगलों में; ध्यानमग्न वक-शिरोमणि, डियर तोताराम, क्रंदन भी भा सकता है आदि ध्यातव्य हैं।




जीवन में थिर कुछ भी नहीं है। यथार्थ गतिशील है। ऋतुएँ गतिशील है। विजेन्द्र जी लिखते हैं-



पतझर के बाद

वसंत जरूर आयेगा

थिर कुछ नहीं

न तिनका, न सूर्यकण

न बूँदें

न हवा



वे कहते हैं कि संघर्षरत जीवन में प्यार और गति का यही रिश्ता है।





                एक उल्लेखनीय प्रगीत हैः ढ़लान! कविता के नीचे फूट-नोट में लिखा है कि विजेन्द्र जी चुरू (राजस्थान) में एक वर्ष तक उपाचार्य के पद पर आसीन थे। एक वर्ष की छोटी अवधि में वे राजस्थान के परिवेश और भू-दृश्य से बहुत शीघ्र आत्मीय संबंध स्थापित कर लेते हैं। ढ़लानमें वे पत्नी के साथ अरावली के ढ़लान से उतर रहे हैं। अरावली के ढ़लान का आकर्षक चित्रण है। यह चित्रण शुद्ध भू-दृश्य का चित्रण नहीं है। इस चित्र में सूखी घास, कटीली झाड़ियों और हरी बेलों पर खिले पीले फूलों के साथ चितकबरी बकरियाँ हैं, ढ़ोरों (घोरों) के साथ चरवाहे हैं, ऊन उतारी हुई काली, सफेेद, भुक्सैली भेड़ें हैं जो इठलाती हुई ढ़लान से उतर रही हैं। स्पष्ट है यहाँ अरावली के पहाड़ी इलाकों में बसे किसानों और गड़ेरियों का चित्र भू-दृश्य में आलोकित है। विजेन्द्र जी का स्थानीय मानव जीवन के साथ तादात्म्य संबंध का यह साक्ष्य है।



                विजेन्द्र जी की मार्क्सवादी जनपक्षधरता असंदिग्ध है। वे द्वंद्वात्मक पद्धति से प्रकृति के रहस्यों का विश्लेषण, अवलोकन एवं चित्रण करते हैं। इस संवेदनहीन समय की पहचान यांत्रिक समय के रूप में करते हैं। इस यांत्रिक समय का मुकाबला वे ज्ञानात्मक संवेदना (प्यार) से करना चाहते हैं। पराजय उन्हें स्वीकार नहीं। जीवन की अनुभूतियाँ और विचार-धारा उन्हें सतत् संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं। एक छोटी कविता है; ‘‘उठी लहरें’’। इसमें कवि जीवन में उल्लास के स्त्रोत को प्रकृति और समाज की वस्तुगत स्थितियों में देखते हैं।



जीवन के ढ़लान पर भी

सूर्योदय ने

मुझको बुलाया

.................

जो अधपेट सोते हैं

सूखे कंदमूल खा कर

फिर भी जीवित हैं



कवि की ज्ञानात्मक संवेदना हजारों किसानों और मजूरों से तादात्म्य संबंध स्थापित करती जिनका जीवन बहुत संघर्षमय एवं कठिन है। जिस उपज के उत्पादन में उनका श्रम लगा है, उस उपज का एक छोटा हिस्सा ही उन्हें मिलता है (ताप को सह कर)।. कठिन जीवन के ऐसे बिम्ब संग्रह में भरे पड़े हैं। इन दारूण वस्तुगत स्थितियों को देखकर विजेन्द्र जी तड़प उठते हैं। ऐसे में संघर्ष के उन साथियों से किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए वे तैयार नहीं जो संधर्ष के रास्ते से अलग हो गये, उनके साथ कपट किया, उन्हें अपमानित किया और उन्हें भी जनसंघर्ष के पथ से विमुख करने की कोशिश की। ऐसे कटु क्षणों का उल्लेख वे कई कविताओं में करते हैं। ‘‘इकतारा बजाता समय’’ में वे कहते हैं-



आज भी धूमता हूँ

वैशाली की सड़कों पर

उनसे अपने को अलग किये हूँ।

जिनकी हँसी के पीछे

विषाक्त कपट छिपा है।



एक अन्य कविता ‘‘जो पक गया है अब’’ में लिखते हैं-



मैंने हर बूँद

जीवन को कड़वाहट के साथ पी है।

हर विष-दंश को

शतदल की नाभि में सहेजा है

जिन्होंने अपने इरादे बदले

वे मुझसे अलग हुए

जिनके आलोक वलय टूटे

उन्होंने मुझे धिक्कारा


एक और कविता ‘‘प्यार का कोई नाम नहीं” में मित्रों के कपट के कुछ बिंब हैः



मुझे कपट से खुरचने वाले मित्र खुश रहें!

उन्होंने दंश सहने को उम्र दी है।

बहुत से आए

मेरी देह से छाल उपाट कर ले गये।

टहनियाँ काट मुझे उगने से रोका

मेरी जड़ों पर प्रहार किये।



ये भाव चित्र और कई कविताओं में हैं। पूरी तस्वीर उभर नहीं पाती। विरोधी मित्र रहे हैं। आखिर उनका पक्ष क्या था, बहरहाल जनसंघर्ष के पथ में तीखे मोड़ आते हैं। विजेन्द्र जी ने खुले मन से उन स्थितियों की ओर संकेत कर दिया। कविता में दो पंक्तियों के बीच काफी स्पेस होता है। संवेदनशील पाठक के लिए संकेत काफी है।



                एक छोटी सी कविता हैः ‘अमोला।‘ यह मात्र 24 शब्दों की कविता है। शब्दों के अनुपात में पंक्तियाँ भी कम हैं- सात सबसे छोटी पंक्ति मात्र दो शब्दों की, सबसे बड़ी पंक्ति छह शब्दों की/ कविता का कथ्य हैः कवि का आजीविका के लिए दोआबा से मरुथल में विस्थापन। यह विस्थापन सिर्फ कवि का नहीं है। (भारतीय) निम्न वर्ग से मध्यवर्ग तक आजीविका के लिए विस्थापित है। इस कविता में सुंदर देखना विन्यस्त है। देखने में अस्पष्टता है। विस्थापन में भी देखा-सुंदर।



देखा तुम्हें हर बार

आँख भर कर

यह प्यार का आग्रह है।



एक अन्य कविता‘‘सौदा’’ मात्र 27 शब्दों की है। एक आत्मालाप है। इसमें प्रथम पुरूष अप्रस्तुत है। मध्यम पुरूष भी अनुपस्थित। बाजार के प्रभाव में व्यक्तित्व की पहचान खो गई है। कविता सहृदय को बेचैन करती है। और कई छोटे-छोटे प्रगीत हैं-उगान, आँच के फूल, फूल की आभा खिली, क्या फर्क है, वे समझते है; उन आँखों से, भरा बादल, शब्द, आँच में कुंदन तपा है, उठो जागो, त्रासदी, कंटीली टहनियाँ, नमन, तुम आओ, काली आँख आदि। विजेन्द्र जी बिंबों और रूपकों के कवि हैं। उनके रुपक प्रगीत में गति और लय पैदा करते हैं। उगान में मैं’ ‘तुमको पहली बार देखता है। यह पहली बार का देखना कैसा है? रूपकों की ऐन्द्रिकता देखें-एक महकते कटहल की तरह, जैसे चैत की फसल पर चढ़ा सुनहरापन, जैसे आँख का कालापन, एक फल की तरह पकते देखा, एक मछली की तरह बेचैन, एक चिड़िया की तरह नर की खोज में उदास और भारी। सभी रूपक प्रकृति और किसान-जीवन से संबद्ध हैं।



‘‘पौड़ती जड़ें’’ मालारूप निरंग रूपक के प्रयोग की दृष्टि से उल्लेखनीय है। तुम्हारा प्यारके लिए इतने रूपक हैं-



तुम्हारा प्यार

गुड़हल का सुर्ख-बड़ा-फूल

मेरी खिड़की की रोशनी है (है)

वह मेरी धड़कनों की लय है(है)

आकाश में-रसमय शब्द का विस्तार

और साँसों की नमी है।



सारे रूपक जीवन और प्रकृति से।



इस संग्रह में कई कविताओं में जीवन-साक्ष्य के अनूठे बिंब हैं। इन बिंबों को पढ़ते हुए मुझे बार-बार याद आता रहा कि विजेन्द्र जी पचहत्तर पार के हैं। ऐसा लगता है जैसे कवि ने अपने जीवन का मिशन पूरा कर लिया हो और अब वे कार्यक्षेत्र से रात्रि विश्राम के लिए लौट जाना चाहते हैं। ‘‘समय को पहचानो’’प्रगीत को देखें। चलो, चलें पंक्ति की आवृति चार बार होती है। मैं चुप है। मैं के माथे पर चिंताओं की गहरी लकीरें हैं। तुम का प्रस्ताव है कि चलो, चलें। क्यों? क्योंकि संध्या ढ़लने को है। पेड़ अपनी छायायें/समेट रहे हैं। मैं का कथन है कि (अभी) सड़कें भरी हैं/भरे कोलाहल में सुनता हूँ। कोइल को कुकते/ तुम कहती है कि पक्षी लौट रहे हैं-घोंसलों को /चलो चलें /वैशाली की सड़कें पार करते मैं को डर लगता है। मैं कहता है कि वाहनों को जाने दो। अभी ठहरो जल्दी नहीं है। लेकिन मैं की सहमति है कि संध्या वृक्षों के झुरमुटों में/ अपने थके डैनें खुजलाती है। समय को पहचानने के साथ तुम भरोसा भी देती है कि निराश होने की जरूरत नहीं है। अंतिम कथन तुम का ही हैः चलो, चलें। ताप को सहकरमें एक बिंब हैः अब साँझ घने पेड़ों मे/पंख तोल रही है। .......मुझे निराशा के गान भी/ गाने दो/‘‘उठी लहरें’’ में एक बिंब हैः जीवन के इस ढ़लान पर भी/ सूर्योदय ने/ मुझको बुलाय ‘‘सागर मेरे अंदर’’ में बिम्ब हैः इस ढ़लती साँझ के रक्ताभ द्वार पर/ ‘‘नवा काल की डाली’’ कविता आरंभ होती हैः हम दोनों थक कर/शिथिल हुए हैं/ झरे फूल मुर्झाए/डालें निर्यात हुई हैं। ‘‘ दो पात’’ का मुख्य कथ्य जीवन-सांध्य ही है।



एक ही डाल पर

हम दोनों

दो बात-पीले अधपीले

रात है गाढ़ी

...... हुआ है हल्दिया रंग फीका

हुए हैं पटसनी

जो थे कमर तक बाल काले

पोटुए हैं खुरदरे

घिसे लगते नाखून

दरकती खाल

झुर्रियाँ बेतरतीब

आँखों में पकती उदासी

हवा चलती तेज जब भयभीत होते हैं।..........

.

लेकिन विजेन्द्र जी प्रबल द्वंद्वात्मक आत्मविश्वास और भरोसे के कवि हैं। उनकी जिजीविषा कहती है कि –



जनता है सूर्य

अभी और तपना है हमें

वह होगा अस्त

हमें जगते देखने को सुबह।



संदर्भः-

आँच में तपा कुंदन (कविता-संग्रह), विजेन्द्र,

चयन एवं संपादन, डॉ0 रमाकान्त शर्मा,

रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुरः-342011 (राजस्थान)





सम्पर्क-

मदन जी का हाता, आरा-802301

मो0-09931171611


टिप्पणियाँ

  1. वरिष्ठ लोकधर्मी कवि विजेंद्र जी का जीवन कविता को समर्पित है
    विजेंद जी कि कविता का सम्बंध देश कि मिट्टी से है।कविताओं में मोहब्ब्त,उदासी, रिश्तों कि गर्माहट, बचपन कि यादें, और सब कुछ खो कर भी आम आदमी बने रहने कि फ़ितरत। ज़िन्दगी को हर लम्हा जीने का यक़ीन मिलाता है।
    जितेन्द्र कुमार जी ने विजेंद्र जी के कविता संग्रह "आँच में तपा कुंदन "की समीक्षा में प्रेम, सौन्दर्य, और उल्लास का कवि कहा है। विजेंद्र जी के बहु आयामी व्यक्तित्व को बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ के साथ पेश किया है।
    शाहनाज़ इमरानी

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  2. Vijendra ji ko janm din ki hardik subhkamnaye. samiksa kavitao per satik vichar kia gya he. badhai. Manisha jain

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