सामयिक प्रकाशन से अभी प्रकाशित हो रहे कैलाश बनवासी के उपन्यास ‘लौटना नहीं है’ का एक अंश







कैलाश बनवासी अपनी कहानियों के लिए हिन्दी में पहले से ही ख्यात रहे हैं. अभी हाल ही में कैलाश ने अपना एक महत्वपूर्ण उपन्यास पूरा किया है.  ध्यातव्य है कि कैलाश बनवासी का यह पहला उपन्यास है. 'लौटना नहीं है'  नामक यह उपन्यास सामयिक प्रकाशन से छप कर आने ही वाला है. प्रस्तुत है इसी उपन्यास का एक अंश आपके लिए. 
 
जात न पूछो फूलों की

 कैलाश बनवासी

   इस संस्था को लेकर सभी के मन में तरह-तरह की शंकाएं थीं। प्रायः आए हुए लोगों में कोई भी इसके बारे में ठीक-ठाक जानता नहीं थी, इसलिए संदेह भी थे, इसकी विश्वसनीयता को लेकर। खासतौर से हम जो इतनी दूर से आए हैं।

   इस समय हम इसी पर बात कर रहे थे आपस में।



   -ये साली है किस टाइप की? इतनी आलीशान बिल्डिंग! देख के कोई कहेगा ये अनाथ आश्रम है?
   -क्या इनको गौरमेंट से सहायता मिलती है?
   -लेकिन अपनी गौरमेंट तो खुद अनाथ आश्रम चलाती है! बहुत फटीचर टाइप की! हमेशा फंड की किल्लत रहती है। कभी-कभी तो बच्चों को खाने के लाले पड़ जाते हैं, बाकी सुविधा तो छोड़ो!


   -ये तो कोई और ही चीज लगती है भाई! बाहर से पैसा आता है, तभी तो!
   -अपने ही देश में कितनी जगह तो इनकी शाखाएं हैं....बैंगलोर, गौहाटी, मनाली, विशाखापट्टनम, भोपाल...।
   -देश तो देश, विदेश में भी काम करती है इनकी संस्था। देखे नहीं, वहाँ फोटो टंगे हैं ...जर्मनी, फ्रांस, नेपाल, केनिया... और पता नहीं कहाँ-कहाँ!


   -साली कोई लफड़े वाली जगह तो नहीं? लड़की की सुरक्षा का सवाल है!
  -देखने से तो ऐसा कुछ नहीं दिखता। सब ठीक-ठाक ही दिखता है। बिना परमीशन के कोई आदमी घुस नहीं सकता।
  -गार्ड अपनी ड्यूटी में कितना चुस्त है!


    यहाँ की बस छिटपुट बातें ही हमको मालूम थीं। मसलन,अनाथ बच्चों को ये बिल्कुल घर जैसा पालते हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई की बेहतरीन व्यवस्था है- संस्था के ही स्टैण्टर्ड इंग्लिश मीडियम स्कूल्स। ऐसी व्यवस्था पाने के लिए तो लोग तरसते हैं,और इनको फ्री आफ कास्ट।
 
 यहाँ काम में लगी लड़कियों को देख कर भरोसा होता था। चुस्त चपल चालाक। व्यावहारिक। हँसमुख और स्वतंत्र। लड़कियों को इतने खुले दिमाग और एडवांस देख कर निश्चय ही हम जैसे लोग अभिभूत थे। और दंग! लेकिन फिर भी कुछ हमारे भीतर रह जाता था। हम जो छोटे शहरों के थे, जहाँ अभी भी लड़कियों की दोस्त सहेलियाँ ही होती हैं, उन्हीं के साथ उनका घूमना-फिरना और मिलना-जुलना। लड़कियों को ऐसे केवल सिनेमा में देखने के आदी थे, इसलिए इतनी सहजता से उन्हें लड़कों से बात करते देख अजीब लगता था, भीतर घर कर चुके कस्बाई संस्कार उभर आते थे, और नहीं चाहते हुए भी उनकी नैतिकता पर मन में सवाल उठने लगते थे। शायद यह महानगरीय युवा संस्कृति थी जिसका अभी छोटे शहरों में आना बचा था। हमारे जैसे लोग सचमुच थोड़े उलझन में थे।

     हमारे भीतर कुछ टकरा रहा था, कुछ टूट रहा था, कुछ बन रहा था। बनने में अभी समय लगना था। नये वातावरण में ढलने में। नयी सोच को ग्रहण करने में।


      गुप्ता ने अपने कंधे से लटकते थैले से मिठाई का डिब्बा निकाला। उसमें समोसे थे। अब तक हमारा अपना एम.पी.वाला ग्रुप बन चुका था। गुप्ता,चैरे और निषाद को मैं अंकल संबोधित करने लगा था और वे मुझे मेरे नाम से।



                                                   (चित्र : उपन्यासकार कैलाश बनवासी)
     
गुप्ता जी इस बीच इंटरव्यू शुरु हुआ कि नहीं इसका पता लगा के आ चुके थे। बोर्ड के दूसरे मेम्बर अभी भी नहीं पहुँचे थे। और वह बताने लगे, संस्था के बारे में मैंने गेट में खड़े उन संतरियों से पता किया, क्या है भई यहाँ का वास्तविक हालचाल?... क्योंकि अगर किसी जगह की असलियत मालूम करनी हो तो सबसे पहले वहाँ के छोटे कर्मचारी को पकड़ो। वो बताएंगे सच। तो उन लागों ने बताया, यहाँ बाहर का एक भी आदमी बिना परमीशन के प्रवेश नहीं कर सकता। इसके लिए बहुत सख्ती है! अगर मान लो आपकी रिश्तेदार यहाँ है तो भी पहले पूरी बात कनफर्म की जाती है। यहाँ जो भी काम करते हैं वो दो रिश्तेदारों से अधिक का नाम नहीं दे सकते जो यहाँ उससे मिलने आएंगे। ना ही यहाँ महिलाओं को यों ही बाहर जाने दिया जाता है। हास्टल की तरह उन्हें हर हफ्ते तीन घण्टे की परमीशन मिलती है। इसलिए सुरक्षा के बारे में आप निश्चिंत रहिए। 

    ‘‘ऐसा?’’
    यह हमारी बगल में बैठे एक अधिकारी-से दिख रहे व्यक्ति ने कहा था, जो गुप्ता की बातें ध्यान से सुन रहा था। उनके साथ कंधे तक कटे बालों वाली एक लम्बी लड़की थी, वह भी कोट पहने थी। पता चला वे हरियाणा के करनाल से आए हैं। वह स्कूल में लेक्चरर हैं। ठीक-इाक आर्थिक स्थिति वाले दिखते थे।


    ‘‘आपने क्यों भर दिया?’’ इस बार चैरे ने पूछा, ‘‘ये तो विधवा या पति द्वारा छोड़ी गई महिलाओं को प्राथमिकता देंगे?
    लड़की ने कहा, ‘‘हमने तो ऐसे ही भर दिया था।’’
     उसके पिता ने कहा, ‘‘हम तो वास्तव में देखना भर चाहते थे कि क्या है। भई ये लोग कैंडिडेट को आने-जाने का फेअर आलरेडी दे रहे हैं, तो हमने सोचा, चलो हो आते हैं। इसका भी एक एक्सपीरिएंस हो जाएगा।’’


    ‘‘बिल्कुल ठीक किया आपने। बच्चे ऐसे ही तो सीखते हैं। हमने भी अपनी भतीजी को इसी लिए लाया है। हम जबलपुर से आए हैं।’’ गुप्ता अपने बोलने का कोई मौका नहीं चूकता।
     ‘‘काफी दूर से आए हैं आप लोग।’’ उसने कहा।


      लॉन में भीड़ बढ़ती जा रही थी। वे जिनकी ट्रेन या बस लेट थी, पहुँच रहे थे। जिस ‘मदर’ पोस्ट को हम यूँ ही समझे थे उसके इंटरव्यू के लिए अच्छे-अच्छे लोग पहुँचे हैं, यह देख कर एक खुशी-सी हुई। या,वाकई बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि लोग जहाँ जगह मिले पहले वहीं सेट हो जाना चाहते हैं, बाकी चीजें बाद में सोचेंगे। इस कलंक को कैसे भी, पहले, अपने से परे कर देना चाहते हैं!


     इधर पहले से इंतजार कर रहे लोग बार-बार रिसेप्शन में जाकर पूछ आते थे। और पूछ आने के बहाने उस सुंदर नेपाली बाला को देख आते, जो स्वयं भी मुस्कुरा कर लोगों को जरा ‘एंटरटेन’ कर रही थी, अपनी ‘ड्यूटी’ ठीक तरह से निभाती हुई।

   ‘‘सब आ चुके हैं...बस डायरेक्टर सर रह गए हैं...।....अब्भी फोन किया था उन्होंने। निकल गए हैं। एक अरजेंट मीटिंग में थे जर्मनी एम्बेसी में। ... बस आधा घंटा और ...प्लीज...!’’ वह मुस्कुरा रही है,लोगों की अधीरता पर मरहम लगाती। 






   एक घंटे से भी अधिक समय बीत चुका था वहाँ बैठे-बैठे। अब थोड़ी उकताहट हो रही थी। और धूप भी तेज होकर चुभने लगी थी। तभी वह नेपाली बाला लॉन में आती दिखाई दी। चटख लाल ब्लेजर में हल्के भूरे रंग का कोट पहने। नीली मिडि घुटने तक थी, जिसके नीचे उसके एकदम गोरे-सफेद पैर थे, चिकने...धूप में चमकते। साथ में सफेद वर्दी वाला एक अटेंडेंट। सबको लगा, अब इंटरव्यू शुरु होने वाला है। सब पूछने लगे, डायरेक्टर साब आ गए? कब शुरु होगा?


     वह लॉन में कुछ आगे आ कर खड़ी हो गई। लोग उसके गिर्द आ गए।
     ‘‘सुनिए! प्लीज!’’ वह ऊँची आवाज में सबको बताने लगी- देखिए, डायरेक्टर सर अभी पहुँच जाएंगे थोड़ी देर में। उन्होंने कहा है, आए हुए लोगों को मदर्स क्वार्टर्ज दिखा लाइये। आप लोग देख भी सकते हैं और उनसे जो पूछना चाहें, पूछ भी सकते हैं! ये जयपाल हैं, ये आपको घुमाएंगे। तो आप लोग इनके साथ चले जाइये!’’
      ओ.के. मैडम।


      जयपाल, जिसकी वर्दी खासी सफेद थी,धूप में चमक रही थी। उसकी मूँछें भी गहरी काली चमकीली थीं। वहाँ उपस्थित हमारे ग्रुप सहित तीस-चालीस लोग उसके साथ हो लिए। एक छोटे-मोटे जुलूस की शक्ल में हम उसके पीछे-पीछे चलने लगे।  


    ‘‘ये अच्छा हुआ। इनके बारे में सीधे यहाँ काम करने वालों से पूछ सकेंगे।’’ मैंने साथ चल रहे चैरे से कहा।
    ‘‘हाँ, यहाँ की सब बात हमको पता होना चाहिए।’’


    साथ चल रहे लोगों में एक साहबनुमा व्यक्ति था, ग्रे कलर का कोट और सुनहरी कमानी का चश्मा पहने। वह बार-बार अपनी अँग्रेजी जताते हुए अटेंडेंट से पूछ लेता था, तुम कब से काम कर रहे हो...पेमेंट कितनी मिलती है...कितने का स्टाफ है वगैरह।, जब गुप्ता ने अपने को एम.पी. वाला बताया तो वह खासे गर्व से बताने लगा हम ग्वालियर से हैं....और यहाँ अपनी कार से आए हैं, मय अपनी बेटी और ड्राइवर के। उसका लहजा और व्यवहार बड़ा वी.आई.पी. किस्म का था। और सबका लीडर बनने की ख्वाहिश में सबसे ज्यादा बोलता-पूछता हुआ।

    लॉन के सामने, कुछ दूर पर सिंगल स्टोरी क्वार्टर का सिलसिला था। अटेंडेंट हमें किसी कुशल गाइड के समान बता रहा था, ये सबसे बड़ा सेंटर है साब हमारा...यहाँ चालीस मदर्स क्वार्टर हैं...पीछे अभी तीस और बन रहे हैं...गर्मी तक कम्पलीट हो जाएंगे...।

     ये बड़े आकर्षक फ्लैट थे, कतार से, एक से बने हुए। सामने की दीवारों पर कलात्मक रफ पत्थर लगाए गए थे। ये महज अपने आर्किटेक्ट में ही आधुनिक नहीं थे, बल्कि रंगाई-पुताई और साज-सज्जा में भी। उन शानदार मजबूत फ्लैट्स के आगे बच्चों के खेलने के लिए खूबसूरत लॉन और उनमें बच्चों के लिए रंग-बिरंगे झूले,फिसलपट्टियाँ,सी-सा...।
    कंचन जंघा, माउंट एवरेस्ट, सतपुड़ा, अरावली...ये यहाँ के फ्लैट्स-ग्रुप के नाम थे।


   दूसरों का तो पता नहीं लेकिन मेरे और गौरी के लिए यह एकदम नया और अनोखा था। अनाथ बच्चों के लिए इतना कुछ होगा हमें जरा भी अनुमान नहीं था! कितना अच्छा है ये! काश! गौरी का यहाँ हो जाए तो गौरी कितना खुश रहेगी! उस क्षण मन में सिर्फ यही कामना जागी थी। कितना अच्छा होगा! कैसे भी तो हो जाए!! बहुत रोमांचित था मैं। जाने क्यों, अब और ज्यादा कुछ देखने-सुनने की इच्छा नहीं थी। हम जैसे अभिभूत थे! यह सब हमारे उम्मीद से कई गुना अच्छा था। ऐसा कभी सोचा भी नहीं था! लगा, चयन हो जाने पर गौरी यहाँ गुजार लेगी अपना जीवन! हमारे घर के जीवन से भी कहीं बेहतर जीवन! 




     मैं यहाँ गौरी के जीवन की कल्पना करके ही खुश हो रहा था! यह एक सुख था, जिसमें देर तक डूबे हुए रहा जा सकता था। न जाने कितनी देर तक!
     और गौरी! वह तो मुझसे भी कहीं ज्यादा इसकी आशा से भरी हुई थी, जिसे उसके चेहरे पर मुग्धता के खिले हुए मुस्कान से समझा जा सकता था।
     सामने के एक फ्लैट में अटेंडेंट हमें ले गया।
     घर देख कर हम चकित थे। किसी मध्यवर्गीय घर के जैसा सुसज्जित ड्राइंग रूम! मनोरंजन और जरूरत की सारी सुविधाएं- टी वी, वी.सी.आर.,फ्रिज, सोफा, दीवान....सब। अनाथ आश्रम तो किसी नजर से नहीं!!
     आइये जी आइये! सोफे पर बैठी एक अधेड़ पंजाबी महिला ने मुस्कुरा कर हमारा स्वागत किया, बैठिए!
     बैठे सिर्फ चंद लोग। ग्वालियर वाले सज्जन आगे थे यहाँ भी।



     -अच्छा तो आप यहाँ की मदर हैं?
     -जी हाँ!
   -कब से हैं आप यहाँ?
   -जी,मुझको तो पंद्रह-सत्रह साल हो गए इधर।
   -कितने बच्चे हैं आपके पास?
   -सात हैं जी। दो तो पढ़-लिख कर बाहर नौकरी कर रहे हैं। मुस्कुराई हैं वे।
   -अच्छा! वेरी गुड!...संस्था की तरफ से आपको क्या मिलता है?
    -पेमेंट है न हमारी।महंगाई भत्ते सहित।
   -और इन बच्चों के लिए?
     -इनके लिए हर महीने बच्चे के हिसाब से उनका खर्चा दिया जाता है...उनके कपड़े-लत्ते, खाने वगैरह के लिए।




    -अच्छा, इतने सब लोगों की देखभाल का काम आपका होता है?
   -हान्जी। मैं माँ हूँ इनकी तो देखभाल तो मुझे ही करनी होगी न! फिर मुस्कुरायीं वह।
    -बहुत अच्छा जी। बहुत अच्छा। अच्छा ये बताइये, ये टीवी,वी सी आर या टेप रिकार्ड जो आपके यहाँ हैं, ...ये सब क्या संस्था ने दिए हैं?
    -नई जी, ये तो हमने अपने पेमेंट से,और बच्चों के खर्च से बचा कर खरीदे है!
    -तो संस्था आपको इसके लिए कुछ नहीं देती?
   -नई जी इसके लिए नइ देती। देखो,ये आपका घर है जहाँ आपने और आपके परिवार ने रहना है। अब ये आपके ऊपर है कि आप इसका कैसा इस्तेमाल करते हो! चाहे तो बचाइये...चाहे तो...! वे हँसने लगीं।


    -आंटी जी, देखने से तो बिल्कुल नहीं लगता कि ये कोई अनाथ आश्रम है...कि यहाँ अनाथ बच्चे रहते हैं!
   -बिल्कुल जी! संस्था का उद्देश्य भी यही है, कि बच्चों को उनका हक... एक माँ का प्यार मिले! वे यहाँ अपने माँ के साथ घर की तरह रहें। बिल्कुल घर के जैसा! उनको ये अहसास ही न हो कि हम अनाथ हैं...कि हमको प्यार करने वाला कोई नहीं, ...कि हमारे वास्तविक माँ-बाप कोई और हैं! इसी लिए तो उनको अपना एक घर दिया गया है...घर जैसी ऐसी सुविधाएं दी जा रही है! देखिए बच्चे बड़े होने पर तो सब जान ही जाते हैं, फिर भी, इस बात को उनसे जितना दूर हम रख सकें, उतना ही अच्छा! 


   -यहाँ बच्चे आपको मम्मी बुलाते हैं?
   -हान्जी। यही बुलाते हैं। मैंने बताया न, इनमें और बाहर के बचों में हम कोई अंतर नहीं रखना चाहते। अंतर बस इतना ही है कि वे बाहर खुले में रहते हैं और हम यहाँ। बाकी कोई फरक नइ।
    -वैसे, आप हैं कहाँ की रहने वाली?
    -जी, मैं तो भटिंडा पंजाब से हूँ।
    -वहाँ जाती हो आप? छुट्टियों में...या शादी-ब्याह में? छुट्टी मिलती है इधर घर जाने की?


    -छुट्टी मिलती है। साल में एक बार आपको घर जाने की मिलती है। पहले ज्यादा जाना होता था,पर यहाँ भी तो आपका घर है...इनको भी तो आपने देखना है जी। रिश्ते-परिवार में शादी-ब्याह तो लगे ही रहते हैं ...लेकिन हम औरों की तरह हर शादी-ब्याह में तो नहीं जा सकते न! घर वाले तो बुलाते ही रहते हैं। वे भी आते हैं मिलने के लिए। पर घर वालों का ज्यादा आना-जाना ठीक नहीं है ऐसे घर के लिए।   


   -अच्छा, और आप के बेटे कहाँ सर्विस कर रहे हैं?
   -एक बेटा तो डिफेंस में इंजीनियर है जी...कम्पयूटर इंजीनियर...शिलाँग में। दूसरा बैंगलोर में बैंक में काम करता है।
   -उनकी शादी हो गई?
   -हान्जी, एक की हुई है। पिछले ही साल। वे इस बात पर खुश हो गयीं जैसे माँ एं अपने बेटों के लिए हुआ करती हैं।
   -लड़की किसने पसंद किया?
   वे हँस पड़ी इस सवाल पर। कहा, हम दोनों ने। मैं तो कहती थी तुमको जिससे करनी है बता दे पुत्तर,मैं राजी हूँ। शादी में लड़के-लड़की की पसंद होनी चाहिए। जिंदगी साथ तुमको गुजारनी है। पर बोला नइ, आप पसंद करो।


   -वे लोग पैसा भेजते हैं आपको?
  -हाँ-हाँ, क्यों नहीं? माँ जो हूँ उनकी! वो तो कहते हैं, मम्मी जी, आप यहाँ आ के रहो, हमारे साथ! मैं बोलती हूँ, नहीं बेटे, तुम लोग अपना कमाओ, खुश रहो। मैं इसी में खुश हूँ। यहाँ तुम्हारे छोटे-भाई-बहन हैं। मैं वहाँ आ जाऊँगी तो इनकी देखभाल कौन करेगा? वैसे मैं जाके हफ्ता दिन दोनों के यहाँ रह आई हूँ। अरे,बहुत रुकने को बोलते थे। पर क्या करोगे? अपना काम ही कुछ ऐसा है! ये बच्चे भी साथ गए थे मेरे।


   - ये बताइये,संस्था को क्या आप अपनी मर्जी से छोड़ सकती हैं?
    -वैसे तो रिटायरमेंट की सुविधा है साठ साल में। बीच में चाहे कोई तो छोड़ सकता है, उसकी मरजी। पर ये संस्था के लिए अच्छी बात नहीं है।
   - क्यों भला?


    -दरअसल बात ये है कि बार-बार उनकी माँ बदलती रहे तो इनको गिल्टी फील होती है। ये महसूस करने लगते हैं हम अनाथ हैं, और ये लोग तो बस अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। बार-बार माँ बदलने से उनको मानसिक परेशानी होती है। एक माँ के साथ जो रिश्ता बन जाता है वह माँ बदलने से टूट जाता है। इनके कोमल मन को ठेस लग जाती है। फिर ये किसी को भी वैसा प्यार नहीं कर पाते। दिल में हमेशा के लिए शक बैठ जाता है कि ये भी कल को हमको छोड़ के चली जाएगी। इसलिए इनको बीच में छोड़ के जाना ठीक नहीं।


   -आपके रिटायरमेंट के बाद ये बच्चे आप के ही रहेंगे?
   -बिल्कुल जी। भला माँ-बच्चों का रिश्ता कभी टूटता है?
   -ये बच्चे तो अलग-अलग जाति धर्म के होते हैं। इनको इनका धर्म बताया जाता है या आपका धर्म ही..?


   -अजी बच्चों का क्या धरम और क्या जात? ये तो पानी के जैसे हैं जी, जिसमें मिला लो उसी रंग के हो जाएंगे। जब मैं इनकी मम्मी हूँ तो मेरा धरम ही इनका धरम। मैं सिक्ख धरम को मानती हूँ तो मेरे बच्चे इसी को मानते हैं। जैसे मेरे बाजू के क्वार्टर में साउथ इंडियन महिला हैं...रेड्डी कर के...तो उनके बच्चे उनका धरम मानते हैं। वैसे एक बात यहाँ बहुत ही अच्छी है, त्यौहार किसी भी धरम के हों, मनाते सब मिल-जुल कर हैं। एक साथ! यहीं मैदान में। क्या दीवाली...क्या ईद...क्रिसमस...होली...सब! 


   हम आश्चर्य से उन्हें ऐसे देख रहे थे जैसे वह किसी दूसरे लोक की प्राणी हो!


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सम्पर्क -
                 
कैलाश बनवासी
41,मुखर्जी नगर,
सिकोलाभाठा, दुर्ग (छ.ग.)


मो.- 09827993920
ई-मेल: kailashbanwasi@gmail.com  
                            

(उपन्यास अंश में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी की हैं.)

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