रजत कृष्ण के कविता संग्रह 'छत्तीस जनों वाला घर' पर भास्कर चौधुरी की समीक्षा





आज जब समीक्षाएँ लिखवाने की जिम्मेदारी खुद रचनाकार ही संभाल ले रहे हैं और कुछ तो एक कदम आगे बढ़ कर अपनी किताबों के साथ पहले से ही लिखी हुई समीक्षाएँ भेज दे रहे हैं ऐसे में अगर कोई कवि अपनी रचना के छपने के बाद भी चुप बैठा रहे तो उसकी निःसंगता ध्यान आकृष्ट करती है. ख़ासतौर पर तब यह अधिक मानीखेज तब हो जाता है जब उस कवि की कविताएँ आपको खुद अपने पर लिखने लिखवाने के लिए बाध्य कर दे. मेरा रजत कृष्ण से ख़ास परिचय नहीं है. इक्का-दुक्का फोन पर बात करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं. लेकिन जब हमारे हाथ में यह संग्रह आया तो मुझे लगा कि इस संग्रह पर समीक्षा लिखवायी जानी चाहिए. इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीस जनों वाला घर युवा कवि रजत कृष्ण का महत्वपूर्ण कविता संग्रह है. रजत ऐसे कवि हैं जो चुपचाप अपना काम करने में विश्वास रखते हैं. वे हवाई उड़ान नहीं भरते बल्कि अपनी जमीन से गहराई से जुड़े हैं. लोक की सुगन्ध इन कविताओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है. इस संग्रह पर हमारे लिए एक समीक्षा लिखी है कवि मित्र भास्कर चौधरी ने. तो आईए पढ़ते हैं यह समीक्षा.   

भास्कर चौधुरी

छत्तीस जनों वाला घर माने रजत कृष्ण का काव्य संसार
छत्तीस जनों वाला घर (कविता संग्रह) संकल्प प्रकाशन, बागबाहरा (छत्तीसगढ़)


बागबहरा में

रजत के घर यह मेरा

ग्यारहवाँ दिन है

पैर छुआ तो

बोले बाबूजी

उर आबे

मतलब फिर आना!


तो यह है कवि रजत कृष्ण का छत्तीस जनों वाला घर जहाँ कभी भी और किसी भी वक्त लोगों के आने का स्वागत होता है. जहाँ रिश्ते गोड्सी के चारो ओर इकट्ठे होते हैं और उसकी आँच में चमकते रहते हैं... जिसके खेतों का चावल मेरे घर पर भी पूरे वर्ष थोड़ा-थोड़ा कर के पकता है और बड़ी की खुशबू मुनगा और भटे के साथ पूरे घर को गमका देती है. दरअसल रजत की कविताएँ भी उनके जीवनानुभवों की तरह ही आहिस्ते-आहिस्ते पक रही हैं, ठीक बागबहरा के ईंटों की तरह जो धूप में आहिस्ते-आहिस्ते पकाई जातीं हैं. मुझे याद है 1995 में जब मैं पहली बार रजत के पते पर पहुँचा तो वे एक छोटे से कमरे में चालीस वाट के बल्ब की पीली रौशनी में झुके हुए से बैठे हुए थे. बुरी तरह टूटे और थके हुए से. उन्हीं दिनों रजत ने माँ से’, पिता से’, भाई से’, दादी से आदि शीर्षकों से मार्मिक कविताएँ लिखी जिन्हें जो कोई भी पढ़ता उसकी आँखें नम हो जाती. पर एक ओर जहाँ रजत की कविताएँ करुणा के सागर में गहरे डुबकियाँ लगवाती हैं वहीं मैं एक धूप का एक टुकड़ा नहीं हूँ’, अंधेरे की उमर’, ज़िंदगी फूल की जैसी कविताएँ रजत के अदम्य साहस, जिजीविषा और जीवन के प्रति गहरी आस्था एवं विश्वास का ठोस प्रमाण हैं. जल्दि ही रजत ने जीने का सलीका सीख लिया. चिट्ठियाँ और कविताएँ उनके जीवन के अभिन्न अंग बन गए. रजत लिखते हैं –


अंधेरे की उमर

चार पहर से अधिक

भला कब हुई,

खटखटाना

साहस और धैर्य की

कुण्डलियाँ

सूरज

खुद दरवाजा खोलेगा



इसी तरह –



मैं धूप का

एक टुकड़ा नहीं हूँ

जो आँगन में ही

फुदक कर

लौट जाउँगा

मैं तो

धरती के प्रांगण में

खुलकर खेलूँगा

चौकड़ी भरूँगा

हिरणी-सा

समूचे वन-प्रांतर में.



रजत का जन्म किसान परिवार में हुआ और रजत जिस शिद्दत से किसानों के दुख-सुख में शामिल होते हैं उनकी कविताएँ इसका बेहतरीन प्रमाण हैं. और यही नहीं रजत की कविताओं का किसान अफ्रीका का, इथोपिया, युगांडा और ब्राज़ील का किसान हो जाता है जब वे बत्तीस डिसमिल जमीन कविता में लिखते हैं –



खेत खार

अब कहाँ के...

कहाँ के किसान...

किसान अब वर्कर होंगे

यहाँ बनने वाली फैक्ट्री के! ...



आज हज़ारों कवि हैं और हज़ारों की संख्या में कविताएँ लिखी जा रही हैं पर इनमें से कितनी कविताएँ ठहरती हैं सवाल यह है? रजत उन बड़बोले कवियों में से नहीं जो झूठ और प्रपंच का सहारा लेकर आगे बढ़ते हैं और जिनका साल में कम से कम एक संग्रह तो छपता और पुरस्कृत होता है. रजत की कविताएँ दरअसल उनके संघर्ष और उतार-चढ़ाव भरे जीवन का काव्यात्मक प्रमाण है जहाँ वे कभी तो छत्तीस जनों वाला घर का अभिन्न हिस्सा बने घर और अड़ोस-पड़ोस के हरेक किस्से कहानियों में गहरी दिल्चस्पी लेते दिखाई पड़ते हैं तो कभी शोर से अलग प्याज के छिलकों की तरह अपने आपको परत दर परत जाँचते परखते हैं – आत्म मंथन करते हैं. एक बानगी देखें –



ज़िंदगी की राह

बहुत ठस हो रही है

और मैं धरती में

उस दरख्त को तलाश रहा हूँ

जिसकी जड़ किसी न किसी तरह

मेरे रग रेशे से जुड़ी होगी.... (दुःख की रात).



रजत की कविताएँ सरल मन की सहज अभिव्यक्ति है. वे जो जीते हैं वही लिखते हैं, पर वक्त देते हैं दो कविताओं के बीच ठीक फसल पकने की प्रक्रिया की तरह और लिखते हैं पेड़, पवन, पानी, आग जैसी गहरी अनुभूति की कविताएँ.



देह में चढ़ता है पानी

धीरे-धीरे

और पुख्ता होते जाते हैं

हमारे कदम...’,



पानी टहलता है

दबी-सोयी जड़ों की

बस्ती में

और लौट आती है

निर्वासन झेलती हरियाली... (पानी)

     
ध्वनि‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌-अनुकरण (Onomatopoeia) वाले शब्द मसलन ठस’, फट्’, झट्कारना आदि रजत की कविताओं में बड़े स्वाभाविक ढंग से आते हैं. लोकरंग में भीतर तक भीगी हुई रजत की भाषा उनके सतत गवेषणा का ही परिणाम है जिसे पढ़ने-सुनने-बोलने का अनुभव सचमुच अद्भुत है. रजत से रू-ब-रू होना और रजत को पढ़ना दरअसल उद्दात गुणों से भरपूर मनुष्य का जीवन सुंदरतम हो इस कल्पना को साकार करने के जतन में शामिल हो जाना है...          
     

 

सम्पर्क-


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