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हिदेआकी इशिदा से पंखुरी सिन्हा की बातचीत

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                        हिदेआकी इशिदा के साथ पंखुरी सिन्हा  हिदेआकी  इशिदा का जन्म 20 सितंबर 1949,  क्योतो शहर, जापान में हुआ। टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फॉरेन स्टडीज़ से हिंदी में एम. ए. करने के बाद, उन्होंने टोक्यो के डायटो बंका विश्वविद्यालय में 28 वर्षों तक अध्यापन किया। उनके अध्ययन के विषय आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य से जुड़े रहे हैं। उपन्यास, कहानी, कमज़ोर वर्ग पर लिखित रचनाओं में रुचि रही है. उनकी प्रकाशित कुछ पुस्तकें हैं, आलेख; उदय प्रकाश की कुछ रचनाओं का जापानी में अनुवाद, राही मासूम राजा के उपन्यासों में चित्रित मुसलमानों की समस्या। अभी पढ़ाई के दिनों से ही, वे दिल्ली विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग से जुड़े रहे हैं, और आज भी भारत आते जाते रहते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जापानी हिन्दीविद  हिदेआकी इशिदा से पंखुरी सिन्हा की बातचीत। हिदेआकी इशिदा से पंखुरी सिन्हा की बातचीत 1 आप सबसे पहले हिन्दी की ओर कब और कैसे आकर्षित हुए?  जब मैं यूनिवर्सिटी में दाखिला ले रहा था तब विषय के रूप में भारत को चुना था।...

रुचि बहुगुणा उनियाल का संस्मरण 'नयी साड़ी'

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स्त्री जीवन की त्रासदी किस प्रकार की होती है, इसका अनुमान तक लगा पाना सम्भव नहीं है। कभी-कभी ये त्रासदी कहानी या असम्भव जैसी लगती है लेकिन होती यह सच ही है। रुचि बहुगुणा उनियाल ने अपने संस्मरण में बारीकी से इस सच को उकेरने का काम किया है।  वह सच जो उन्होंने अपनी आंखों देखा है, जिसे महसूस किया है। अपरिहार्य कारणों से हम पिछले महीने श्रृंखला की इस कड़ी को हम प्रस्तुत नहीं कर पाए थे। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  रुचि बहुगुणा उनियाल का संस्मरण 'नयी साड़ी'। नयी साड़ी  रुचि बहुगुणा उनियाल बच्चों के लिए कपड़े लेने आए हैं लेकिन कुछ भी पसन्द ही नहीं आ रहा….. कपड़े देखते-देखते अचानक ही नवनीत जी कहने लगे, 'रुचा तुम्हें कुछ लेना है अपनी पसन्द का? कोई साड़ी-सूट लेने की इच्छा है तो कहो?' मैं तुरंत मना करती हूँ कि, 'ना ना मुझे कुछ नहीं चाहिए' हम गृहणियां भी कितनी अजीब होती हैं न अपने शौक-मौज और पहनने-ओढ़ने की आवश्यकताओं को  घर-परिवार से पहले कभी ख़याल में भी नहीं लातीं।                              ...

डस्टिन पिकरिंग की कविताएं, अनुवाद : बालकीर्ति

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  Dustin Pickering डस्टिन पिकरिंग कवि परिचय  डस्टिन पिकरिंग ट्रांसेंडेंट ज़ीरो (Transcendent Zero press) प्रेस के संस्थापक और हार्बिंगर एसाइलम (Harbinger Asylum) के संस्थापक संपादक हैं। उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें सॉल्ट एंड सॉरो, नोज़ नो एंड और ए मैटर ऑफ डिग्रीस शामिल हैं। उनका लघु कहानी संग्रह, द मैडमैन एंड फू (The madman and fu), साथ ही उनका अलौकिक षड्यंत्र उपन्यास बी नॉट अफ्रेड ऑफ व्हाट यू मे फाइंड : एलियन बुद्धा प्रेस द्वारा प्रकाशित किया गया था। वह ह्यूस्टन Houston, टेक्सास में रहते हैं। उन्होंने हफिंगटन पोस्ट, कैफे डिसेन्सस एवरीडे, द स्टेट्समैन (इंडिया), जर्नल ऑफ लिबर्टी एंड इंटरनेशनल अफेयर्स, द कोलोराडो रिव्यू, वर्ल्ड लिटरेचर टुडे और कई अन्य प्रकाशनों में लेखन में योगदान दिया है। वह यूट्यूब पर लोकप्रिय साक्षात्कार श्रृंखला ‘वर्ल्ड इंकर्स नेटवर्क’ की मेजबानी करते हैं। आप उन्हें इंस्टाग्राम: @poetpickering और ट्विटर: @DustinPickerin2 पर पा सकते हैं। बालकीर्ति एक समर्थ कवि हैं। उनकी ख्याति एक बेहतर अनुवादक की है। पहली बार के लिए  बालकीर्ति ने डस्टिन...

सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण टोला'

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  रामलीला भारतीय संस्कृति से नाभिनालबद्ध है। और साथ ही इसके सभी पात्र जन जन में सुपरिचित हैं। दशहरा आते ही चारो तरफ रामलीला की आज भी धूम मच जाती है। रामलीला के साथ उसके पात्र सामायिक तौर पर स्थानीय रूप से उसमें बहुत कुछ जोड़ते घटाते रहते हैं जो प्रतीकात्मक रूप से हमारे समाज से जुड़ा होता है। आलोचक सूरज पालीवाल की एक कहानी है  'रावण टोला' । 1980 के आसपास लिखी गई इस कहानी में सूरज जी जिन बातों को रेखांकित करते हैं वह आगे चल कर सामाजिक यथार्थ में बदलते हुए दिखाई पड़ते हैं। आज सूरज जी का आज जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण टोला'। 'रावण टोला' सूरज पालीवाल रामलीला समाप्त होने में अभी पाँच दिन बाकी थे। शहर में   पढ़ने वाले लड़के भी रामलीला का बहाना लगा कर गाँव में ऐश   कर रहे थे। लाल छींट की साड़ी जैसे तहमद की फैशन चल   पड़ी थी - इस बार गाँव में। बाल भी बाजने के मोहन कट नहीं, . कहते थे, 'बस एक ही नाई है अलीगढ़ में, जो ऐसे बाल काटता   है। और मालूम है - तीन रुपया लेता...

ममता कालिया की कहानी 'अपत्नी'

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  ममता कालिया  जब भी हम कोई कहानी पढ़ते हैं तो उसमें अपना समय और परिवेश देखते हैं। कहानी जो लय की तरह जीवन में उतर कर जीवन की बात करे तो वह फिर रोजमर्रे के जीवन की तरह ही जेहन में उतर जाती है और स्मृति में बनी रहती है। सुपरिचित कथाकार ममता कालिया की कहानियां कुछ ऐसे ही ढब की होती हैं जो आम बोलचाल की भाषा में जीवन का एक वितान रचती हैं। ममता जी भले अब गाजियाबाद नोएडा में रहती हों लेकिन इलाहाबाद उनकी रगों में जैसे बहता है। आज ममता कालिया का जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से ममता जी को जन्मदिन की मुबारकबाद। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ममता कालिया की चर्चित कहानी 'अपत्नी'। 'अपत्नी' ममता कालिया हम लोग अपने जूते समुद्र तट पर ही मैले कर चुके थे। जहाँ ऊंची -ऊंची सूखी रेत थी, उसमें चले थे और अब हरीश के जूतों की पॉलिश व मेरे पंजों पर लगी क्यूटेक्स धुंधली हो गयी थी। मेरी सा ड़ी   क़ी परतें भी इधर - उधर हो गयीं थीं। मैंने हरीश से कहा, उन लोगों के घर फिर कभी चलेंगे। हम कह चुके थे लेकिन! मैं ने आज भी वही सा ड़ी  पहनी हुई है। मैं ने बहाना बनाया। वैसे बात सच थी। ऐसा सिर्फ लापरवाही स...

सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'पारिवारिकता के साथ समय के स्पंदन'

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  सेवाराम त्रिपाठी मनुष्य द्वारा आविष्कृत संस्थाओं में परिवार का अपना विशिष्ट महत्त्व है। इसने मनुष्य में न केवल मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं का विकास किया अपितु उसे वह स्पेस प्रदान किया जिससे वह समूची मानवता की भलाई के लिए कुछ सोच समझ सके और कर सके। वैसे तो सामान्य तौर पर परिवार में प्रेम ही प्रमुख होता है परन्तु कभी कभी मनो मालिन्य भी पैदा हो जाता है। बावजूद इसके व्यक्ति परिवार में ही सब कुछ खोजने की कोशिश करता है। एक जमाना था जब परिवार का मतलब मां पिता के दादा दादी, चाचा चाची, भाई बहन भी हुआ करते थे। तब नाना नानी, मामा मामी, मौसी मौसा, बुआ फूफा आदि भी परिवार के विस्तृत अंग हुआ करते थे। लेकिन पूंजीवाद और उपभोक्तावाद के जंजाल ने परिवार के इस बने बनाए ढांचे को तोड़ कर रख दिया है। अब घर में होते हुए भी हम परिवार से दूर हैं। घर में होते हुए भी सोशल मीडिया के माध्यम से बातें करते हैं। सब कुछ के लिए समय है लेकिन आपस में मिल बैठ कर बात करने के लिए समय नहीं है। आलोचक सेवा राम त्रिपाठी ने इस पारिवारिकता पर एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा है जिसे आवश्यक तौर पर पढ़ा जाना चाहिए। कल सेवाराम जी का जन...