चन्द्रेश्वर का आलेख 'आज की हिंदी कविता और तथाकथित मुख्यधारा का सवाल'


आज की हिन्दी कविता को लेकर तमाम तरह की नकारात्मक बातें की जा रहीं हैं। बहुत लोग तो बिना कुछ पढ़े-लिखे  ही इस  बात का  सियापा करने लगे  हैं  अब  कविता  बची  ही नहीं या  लिखी  ही नहीं जा रही। चंद्रेश्वर युवा कवि-आलोचक हैं और उन्होंने आज की हिन्दी कविता पर एक सतर्क निगाह डाल कर यह आलेख लिखा है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं   

'आज की हिंदी कविता और तथाकथित मुख्यधारा का सवाल'

चन्द्रेश्वर

आज की हिंदी कविता पर बात करते समय हम अक्सर भूल जाते हैं कि वह सिर्फ़ चंद साहित्यिक पत्रिकाओं या अख़बारों के साप्ताहिक परिशिष्टों तक ही सीमित नहीं है। वह कुछ बड़े हिंदी प्रकाशकों की ठेकेदारी तक भी सीमित नहीं है। वह अब भी मंचों पर गाई और पढ़ी जाती है ,जिसके क़द्रदानों की भी कमी नहीं है। इनमें भी कई कवि ऐसे हैं ,जो लोकस्वीकृति पा रहे हैं। इसी तरह ख़ुद कविता की क़िताबें छपा कर एक पाठक समुदाय के बीच जगह बनाने वाले कवियों की भी अनगिनत संख्या है। इनके अलावा भी अब सोशल मीडिया है। फेस बुक, ब्लॉग्स, इंटरनेट मैगज़ीन आदि पर तमाम नए -पुराने हिंदी कवि सक्रिय हैं। आज कविताओं को लोगों के बीच ले जाने के हज़ार साधन और माध्यम सामने हैं। कोई कविता पूरी होते -होते एक पाठक समुदाय के बीच आकर उपस्थित हो जाती है। आज कवि-कर्म कुछ जातियों या वर्गों तक भी क़ैद नहीं रह गया है। तथाकथित मुख्यधारा के बाहर भी हिंदी कविता का समंदर लहरा रहा है। 


हिंदी कविता का संसार भी कई तरह के हाशिये के विमर्शों से भर गया है। कई स्त्रियाँ रसोई घर का तापमान सहते हुए भी कविता रच -रच कर अपने संघर्षों, दुखों और स्वप्नों को सामने लाती रहती हैं। कई कवि उपेक्षित समाज और समुदाय के बीच से भी अपने अभावों ,स्वप्नों और संघर्षों को अभिव्यक्ति प्रदान कर रहे हैं। ऐसे में जब मुख्यधारा का सवाल बेमानी होता जा रहा है, सिर्फ़ उसी तक सिमट कर बात करना एक तरह की संकीर्णता है। आज इस समकालीन धारा की हिंदी कविता में वे ही नई पीढ़ी के कवि अपना चेहरा लिए अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं जो कविता को कारोबार या पुरस्कार हासिल करने का ज़रिया मानते हैं। अगर कवि धूमिल के शब्दों में कहूँ तो 'इनके लिए कविता कॅरियर चमकाने की चीज़ भर है।' आज ऐसे कवियों के हाथों में पड़ कर कविता एक बार फिर मुक्ति के लिए छटपटा रही है। आज कविता की पुकार में असर नहीं पैदा हो पा रहा तो इसके ज़िम्मेदार ये ही कवि हैं। इनके यहाँ कविता एक उत्पाद भर रह गयी है। इनकी कवितायेँ समय के सरोकारों और ताप -तेवर और प्रतिरोध की चेतना से रहित बौद्धिक जुगाली भर हैं। इन्हें पुरस्कार मिल सकता है, जनता का प्यार नहीं! अगर रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कहूँ तो 'ये धन्य हैं, इनको धिक्कार हैं! ये हिंदी की समकालीन कविता का एक विकट और अराजक दौर है। इस धारा की कविता पर आलोचना भी चुप है। अगर आलोचना का एक चेहरा सामने है भी तो वह हद से ज्यादा अविश्वसनीय है। उसमें सखियारो या याराना का भाव है। वो खेमेबाज़ी से ग्रसित है। एक तरह से कहूँ तो उसमें 'अहॊ रूपम, अहो ध्वनि' का बाज़ार गर्म है। आज जो कई पीढ़ियाँ हिंदी में कविता लिख रहीं हैं, उनमें ऊपर की दो -तीन पीढ़ियाँ ही संजीदा हो कर कवि-कर्म में संलग्न हैं। अगर साफ़ कहूँ तो उनमें भी कुछ गिने -चुने कवि ही दिखते हैं जो कविता के परिदृश्य पर मजबूती के साथ खड़े हैं। अब भी हिंदी के शीर्ष कवियों में केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण के होने के ख़ास मायने हैं। इसी तरह विनोद कुमार शुक्ल, चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, अशोक वाजपेई, लीलाधर जगूड़ी, विजेंद्र, ऋतुराज, नरेश सक्सेना, वीरेन डंगवाल, ज्ञानेन्द्र पति, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, आलोक धन्वा, विजय कुमार, अरूण कमल, मदन कश्यप, लीलाधर मंडलोई, देवी प्रसाद, कुमार अंबुज, एकांत, अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व आदि की उपस्थिति मायने रखती है। 

इधर १९८० के बाद के कुछ कवियों में एक तरह की छीना -झपटी और लूट -खसोट की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। इन कवियों में एक तरह की हड़बड़ी भी है।ये झटपट इतिहास में दर्ज़ हो लेना चाहते हैं। दरअसल, ये चुके -पिटे लोग हैं। हालाँकि पुरस्कार पाने और छपास रोग में ये अग्रणी हैं। ये ग़लत -सलत बहस चला कर अपना नाम और चेहरा आगे करना चाहते हैं। ये जब अपने दौर की बात करते हैं तो अपना प्रस्थान का समय एक दशक कम कर देते हैं। इसी तरह अब इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में आये कुछ कवि अर्ध दशक में ही सिमटने लगे हैं। ये नई पीढ़ी के नाम पर दशकों वाली बात कविता और आलोचना को कमज़ोर करती रही है। इधर कुछ ऐसे नई पीढ़ी के कवि समकालीन कविता के परिदृश्य पर कविता के नाम पर ऐयाशी करने में व्यस्त हैं, जो भाषा और उसके व्याकरण से जरा भी वाकिफ़ नहीं हैं। मैं इस लेख में ऐसे ऐयाशों का नाम लेना ज़रूरी नहीं मानता। उन्हें सब जानते -पहचानते हैं। आज नई पीढ़ी के कई कवियों के लिए कविता सिर्फ़ शब्दों का खेल रह गई है। उनकी कविताओं में समय और समाज को चीन्ह पाना कठिन है। इनकी कवितायेँ पत्रिकाओं और संकलनों के लिए शोभा की चीज़ हैं। उनका आम आदमी और सामान्य पाठक से कोई सरोकार नहीं हैं। वे पुस्तकालयों की अलमारियों में क़ैद होने के लिए अथवा पुरस्कार पाने अथवा सिर्फ़ यश की कामना के साथ रची जाती हैं। मेरा अभिमत साफ़ है कि इस तरह की कवितायेँ अकादमिक बनकर रह गयी हैं। कुछ कॅरियर बनाने या रोजग़ार पाने की तमन्ना लिए युवक इनपर शोध करते हैं। ये कविता के लिए ट्रैजिक है। कभी -कभी तो लगता है कि इस क़िस्म की समकालीन युवा कविता एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच गई है, जहाँ से आगे का रास्ता एकदम सँकरा दिखता है। 

मेरी बात में कुछ लोग निराशा ढूँढ सकते हैं; पर सच्चाई इसी के आसपास है। आज बाज़ार जिस तरह हमारे जीवन को नष्ट करने और नकारात्मक दिशा में ले जाने में लगा हुआ है, उसमें ऐसे भी कविता और साहित्य के लिए स्पेस न के बराबर बचा है। उसपर तुर्रा ये कि हमारे कवि गण कविता के प्रति तनिक सजग या सचेत नहीं हो पा रहे हैं। आज कविता का एक और परिदृश्य भी है। अब भी नई पीढ़ी में कुछ सितारे अपनी चमक बनाये हुए हैं। इनमें बेशक प्रभात, आर चेतन क्रांति, शिरीष कुमार मौर्य, व्योमेश शुक्ल, पंकज चतुर्वेदी, अरूणदेव, संतोष चतुर्वेदी, बसंत त्रिपाठी, विवेक निराला, महेश पुनेठा, आत्मरंजन, रविन्द्र स्वप्निल, मनोज कुमार झा, कुमार मुकुल,  हरे प्रकाश और कुमार वीरेंद्र आदि के नाम लिए जा सकते हैं। इनके सरीखे कवियों की कविताओं से ही एक नन्ही उम्मीद बनी रहती है। मैंने उपरोक्त जिन कवियों का उल्लेख किया है, उनकी कविताओं में समय का सच अपनी तहदार परतों के साथ उपस्थित है। 

हरेप्रकाश की एक कविता 'ख़िलाड़ी दोस्त 'का ज़िक्र करना चाहूँगा। वे लिखते हैं -------

'हमारे गहरे अभाव 
टूटन और बर्बादी के दिनों में 
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी 
दोस्त आते हैं खैरियत पूछने 
और हास्य के शिल्प में पूछते है हाल 
हमारे चहरे की हवाइयाँ देखकर 
हताश नहीं होते 
वे मूँछों में लिथडाती मुस्कान बिखेरते हैं '

हरे इस कविता में बदले समय में दोस्ती को जटिल सन्दर्भों में चीन्हने का उपक्रम करते हैं। इसी तरह एक नई पीढ़ी के प्रतिभावान कवि कुमार वीरेंद्र अपनी एक कविता 'विलाप नहीं ' में जड़ों के लिए विलाप नहीं करते हैं, बल्कि विस्थापन के दर्द को अंगीकार करते हुए संघर्ष पथ पर आगे क़दम बढ़ाते हैं। वे पुरानी पीढ़ी या पूर्ववर्ती पीढ़ी की भावुकता से सायास बचने की कोशिश करते हैं। वे लिखते हैं-----

'उन पेड़ों की छाँव को भूलना नहीं है 
लेकिन विलाप भी नहीं करना है 
जो धूप है उसी से सर ढकना है 
बरसात को अपने भीतर भर लेना है 
लेकिन इस झोपड़पट्टी में उस घर के लिए 
विलाप नहीं करना है जो छूट गया है 
---------विलाप नहीं करना है मुझे 
लेकिन कुछ भूलना भी नहीं है /'

इस कविता में भी कुमार वीरेंद्र नए समय में विस्थापन के दर्द को सहते हुए अतीत को लेकर परेशान नहीं होते। वे नए समाज और समय में अपने को समझाते -सुलझाते हुए अपना स्पेस बनाते हैं। 

इसी तरह आत्मरंजन और महेश पुनेठा और प्रभात की कवितायेँ अपनी सादगी और सरलता में अपने आसपास के जीवन और प्रकृति को व्यक्त करने की कला में अद्भुत वितान रच डालती हैं। 'पगडंडियाँ गवाह हैं 'और 'भय अतल में' संकलनों की कवितायेँ इस बात का प्रमाण देती हैं। एक ऐसे समय में जब श्रम में सौंदर्य ढ़ूढ़ना कवियों के पिछड़ जाने का प्रतीक बन चला हो, ये कवि हिंदी कविता में प्रगतिशीलता के तत्वों को आगे बढ़ाने के प्रति संकल्पबद्ध दिखते हैं। ऐसे ही आर चेतनक्रान्ति  की कविता विचार और संवेदना को साथ लेकर आगे बढती है। दरअसल कविता जीवन की ही पुनर्रचना है, आलोचना तो है ही। आज कविता लिखते हुए सामने जब कविता होती है तो बात बिगड़ती है। मेरा मानना है कि समय का निर्मम प्रहार ऐसी कवितायेँ झेल नहीं पाती हैं और अल्पकालिक साबित होती हैं। समकालीन कविता में आज खरी और सच्ची कवितायेँ कम दिखती हैं। अब हमारे बीच कविता रचते हुए कोई निराला नहीं है जो पसीने से लथपथ हो जाये! कोई महावीर प्रसाद द्विवेदी भी नहीं जो कविता वापस कर सके। आज हमारे बीच कवि फैशन के तौर पर कवितायेँ लिख रहे हैं। 

हिंदी कविता में स्त्री विमर्श में सविता सिंह, अनामिका, कात्यायनी और नीलेश रघुवंशी के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें अपने आसपास के समग्र जीवनके बीच स्त्री जीवन के अंतर्विरोधों को उभारने की अद्भुत दृष्टि और कला है। इनमें सविता सिंह की कविता में एक स्त्री प्रतिरोध का स्वर ज्यादा तीखेपन और तार्किकता के साथ व्यक्त हुआ है। वे एक कविता में कहती हैं कि 'मैं किसी की औरत नहीं हूँ।' ये सभी कवयित्रियाँ अपनी अलग-अलग पहचान रखती हैं। इसी तरह दलित कवियों का सन्दर्भ लिया जा सकता है। सचमुच इन विमर्शों ने हिंदी कविता को जड़ता और ठहराव से बाहर निकाल कर उसे एक नई पृथ्वी और नया आकाश प्रदान किया है। अब इन्होंने तथाकथित मुख्यधारा को बेमानी बना दिया है। कविता इनसे आगे बढ़ती दिख रही है। दरअसल, आज हिंदी कविता की मुख्यधारा में कवियों की बेवज़ह की भीड़ बढ़ी है, पर उस हिसाब से कविता संपन्न नहीं हुई है। आज कविता में सुखी और अघाया वर्ग भी दिख रहा है। ये वर्ग जीवन से शिद्दत से नहीं जुड़ा है। मैनेजर पाण्डेय सही लिखते हैं कि 'कविता अघाये आदमी की डकार नहीं है।'

सम्पर्क-

मोबाईल- 09236183787

टिप्पणियाँ

  1. जड़ भी जड़ के लिए विलाप नहीं करता। जड़ का एक अर्थ मूर्ख मान लिया गया है। यह मान्यता भीतर उतरे बिना बनी है। इसलिए हवाई और झूठ है। जड़ कभी स्थिर नहीं होती। हमेशा गतिशील होती है। वह अपनी गतिशीलता में विकसित हुई शीर्ष पर पहुँचती है, जो स्थूल रूप में इनसान से भी ऊँची होती है। वही जड़ विकसित होकर फूल और फल का रूप धारण करती है। मुझे लगता है (प्रस्तुत कवितांश के आधार पर) कि कविता में विलाप से अधिक भूलना नहीं है, अधिक प्रासंगिक है। वर्तमान दौर भूलने का है, जबकि कवि न भूलने की ज़िद कर रहा है। इस प्रकार कविता में विलाप का दुहराव भले हुआ हो, परंतु ज़िद तो न भूलने की है। और यही अधिक ज़रूरी और अर्थगर्भित है।

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  2. समकालीन हिन्दी कविता में हरीश चन्द्र पांडे का नाम सम्मलित किये बगैर----यह लेख पूरा नहीं होता

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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