हुस्न तबस्सुम ‘निहॉ’ की कविताएँ

                      
विधा - कहानी,कविता,लेख
प्रकाशन - कहानी संग्रह-
नीले पंखों वाली लड़कियाँ- (स्वराज प्रकाशन)
नर्गिस फिर नहीं आएगी- (सामयिक प्रकाशन)
गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता-राजकमल प्रकाशन (प्रकाशनाधीन)

कविता संग्रह :
मौसम भर याद- (सुकीर्ति प्रकाशन)
चांद ब चांद- (बोधि प्रकान)

सम्मान- समाज रत्न, सरस्वती साहित्य सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान
स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति सम्मान, और विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ से विद्यावचस्पति की मानद उपाधि

अनुवाद- रचनाओं का पंजाबी,मलयालम,उर्दू भाषाओं में अनुवाद व मंचन


कवि का काम ही है अपने आस पास की दुनिया के शोषित-वंचित जन की पीड़ा को शब्द देना। वही कवि सफल कवि होता है जिसने इस पीड़ा को अपना स्वर दिया हो. हुस्न तबस्सुम निहाँ ऐसी ही युवा कवियित्री हैं जो इस स्वर को अपने शब्द देती हैं. इसी क्रम में वे अपने कवि से पूछती हैं -  'तुम कब लिखोगे/ सुरमई रातों वाली कविता/ कब लिखोगे भींगते/ आकाशों का सुख/ और सिर झुकाए खड़ी /दीन-हीन धर।' आईए पढ़ते हैं तबस्सुम की कुछ कुछ इसी तरह की कविताएँ।


                            
हम प्यार में हैं
                      
प्रायः समय नहीं होता साथ
उस एक समय में
जब तुम होते हो साथ
चॉद की हर तारीख से पहले
धूल जाता है आसमां
और फैल जाता है फिरोजी रंग
उकड़ू बैठ के सितारे
छेड़ देते हैं अन्त्याक्षरी
कि तभी मस्त छैला सा टहलता
हुआ चॉद दिखाई दे जाता है
बर्फ की सिगरेट फूंकता
और हमारे चेहरे पे फूंक देता है
ठण्ठे यख़ छल्ले
फिर हॅसता है हॅसता जाता है
उसे कैसे पता कि
हम प्यार में हैं...! 



अपने अपने खुदा
               
अपने अपने खुदाओं को
कांधे उठा के
चलो कहीं दूर छोड आएं
यही मूल है सारी
नफ्सियात की
इसी के इशारे पे तमंचे
आग उगलते हैं
इसी के इशारे पे
बेवजह
खड़े हो जाते हैं
फसाद


               
आम आदमी
           
आग की कलम से लिखी जा
रही हैं हवाओं की तकदीरें
लिखने वाले हाथ शाखाओं में
उग रहे हैं...
और किस्तों में दफ्न होता जा
रहा है आम आदमी
उसकी भूखी...नंगी चमड़ी पे
लिखा जा रहा है
सवा सवा दिन का हिसाब
और
अंगुल अंगुल नापी जा
रही है
आए दिन उसकी औकात


            

रंग-शाला
                  
रंगशाला में कितने प्रकार के
रंगों में, कितने आकार-प्रकार में
कठपुतलियों की परछाईयां
ट्रे में परोस परोस
बड़े सलीके से
पेश कर रही हैं जीवन
येल्लो...
येल्लो....
पिओ आब-ए-हयात
और
अमर हो जाओ
हमारे साथ
हमारे ही साथ

               
कवि
                
कवि,
तुम कब लिखोगे
सुरमई रातों वाली कविता
कब लिखोगे भींगते
आकाशों का सुख
और सिर झुकाए खड़ी
दीन-हीन धरती
की पीड़ा,
कब लिखोगे सूर्य की
परास्त-विजय
कब रचोगे
कवि,
मेरे अन्तस का
संसार



                                              
एक असमानी दोस्त के नाम...
         
तू जरूर कोई फरिश्ता है
जो भोर से पहले ही फैल ही फैल जाता है
खयालों के फलक़ पे............
तू जरूर कोई फरिश्ता ही होगा
जो मृत्यु को जीवन कर देता है छू कर..
तू जरूर होता होगा पिछले जनम में
मेरा सूर्य............
हो ना हो,तू जरूर नफ़ा है मेरी की गई
नेकियों का..
तू महक है मेरे खोए हुए मौसम की,
कि रफ्ता-रफ्ता उतरा है रग़ ए जां में,
तू जरूर कोई दुआ है छूटी हुई ...
जो अब हुई है बा-असर......
तू मेरा टूटा हुआ सपना हो शायद...
जो लांघ अया है समन्दर....
तू जरूर कोई फरिश्ता ही होगा कि बातें
करता है सब
असमानी.............
और
लारा-लप्पा करता करा लाता है
मुझे
किसी और दुनिया की सैर।।।
  

सम्पर्क-

ई-मेल: nihan073@gmail.com

मोबाईल- 09415778595

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (02-04-2014) को ""स्थायी मूर्ख" चर्चा मंच 1570 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चैत्र नवरात्रों कीशुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Aapki kahaani Hans me padhi hai shaayad. Achchha likhti hain aap. Badhai aur shubhkaamnain!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छी लगी कविताएँ . बधाई .
    -नित्यानंद गायेन

    उत्तर देंहटाएं
  4. उमेश कुमार पटेल ‘श्रीश’1 नवंबर 2014 को 6:21 am

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति कविताएँ अच्छी लगी ....बधाई .

    उत्तर देंहटाएं

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