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रुचि बहुगुणा उनियाल का संस्मरण 'राजा - पीलू'

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रुचि बहुगुणा उनियाल एक समय था जब संयुक्त परिवार की प्रथा थी और घर के सदस्य ही नहीं पशु और पक्षियों को भी सदस्य का ही दर्जा प्राप्त होता था। उनको बेहतर तरीके से रखने की हर संभव कोशिश की जाती और उनके साथ उदारता दयालुता का व्यवहार किया जाता। गाय, भैंस, बैल जैसे जानवर हर घर में होते और  उनकी बेहतरी का ध्यान रखा जाता। समय बदला और संयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त हुई। लोग गांव से शहरों की ओर पलायन करने लगे जहां व्यक्ति के रहने की समस्या थी, जीव जानवर के लिए जगह के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। इन दिनों हम हर महीने के तीसरे रविवार को पहली बार पर रुचि बहुगुणा उनियाल के संस्मरण पढ़ रहे हैं अबकी बार प्रस्तुत है उनके संस्मरण की तीसरी कड़ी राजा पीलू। राजा-पीलू रुचि बहुगुणा उनियाल       प्राप्ति-प्रियम गाड़ी में पीछे बैठे हुए हैं और हम लोगों को नवनीत जी सरप्राइज़ विजिट पर चकराता यात्रा पर ले कर जा रहे हैं।       मैं नवनीत जी के बराबर वाली सीट में बैठी हुई हूँ.... नवनीत जी की नज़र सामने सड़क पर है और पूरा ध्यान ड्राइविंग पर लेकिन मेरी नज़र रास्ते के दोनों ओर की ...

शंभुनाथ का आलेख 'आत्मनिरीक्षण का जोखिम'

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  किसी भी व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है आत्म निरीक्षण। हालांकि आज का समय ही कुछ ऐसा है कि लोग आत्म निरीक्षण से बचना चाहते हैं। व्यक्तित्व के विकास के लिए यह बहुत जरूरी होता है। कबीर अपना आत्म निरीक्षण करते हुए कहते हैं 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना मुझ सा बुरा न कोय।' यह आत्म निरीक्षण कमजोर व्यक्ति कर ही नहीं सकता। इसके लिए साहस की जरूरत होती है। इस आत्म निरीक्षण पर ही  शंभुनाथ जी ने  ’वागर्थ’ मई-2023 की अपनी संपादकीय लिखी है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं  शंभुनाथ का आलेख 'आत्मनिरीक्षण का जोखिम'   'आत्मनिरीक्षण का जोखिम' शंभुनाथ कई बार मनुष्य के पास सिर्फ एक उपाय होता है, ‘जो घटित हो रहा है उसे चुपचाप जियो’। यह अंधेरे का फोटो खींचने से अलग हो सकता है, यदि हमारे सामने यह सवाल हो- ‘फिर भी यह जीवन अपना है, तो इसका क्या अर्थ है?’ इस प्रश्न का संबंध सबसे पहले आत्मनिरीक्षण से है। भारतीय समाज में सामंती मानसिकता की प्रधानता के कारण यह कठिन है, पर जरूरी है। हमें जिन चीजों से परेशानी होती है, सबसे पहले यह दे...

शमशेर बहादुर सिंह से विनोद दास की बातचीत

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शमशेर बहादुर सिंह शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी के अपने ढब के अनूठे कवि हैं। उन से यह बातचीत लगभग  33 साल पहले संभव हुई थी। कवियों के कवि शमशेर बहादुर सिंह से विनोद दास की बातचीत। शमशेर जी से दो-तीन बार मिलने पर यह बातचीत पूरी हुई। वह लखनऊ प्रवास में पत्रकार-कवि अजय सिंह के यहाँ ठहरे हुए थे। बातचीत दो दौर में हुई। पहली बार घर में चारपाई पर बैठे हुए बातचीत हुई। दूसरी बार बातचीत बाहर हुई। काफी अरसे से वह बाहर नहीं निकले थे। अखबार पढ़ने के बाद वह शोभा सिंह के आग्रह पर बाहर निकले। चलते-चलते बातचीत शुरू हुई। कुछ दूर चलने पर वह थक कर बैठ गए। फिर घर लौट कर बातचीत पूरी हुई।  मेरी कोशिश सारे यथार्थ को देखने की है।  देहरादून  यह सुनते ही शमशेर जी मानो जाग गए। उनका समूचा शरीर हरकत में आ गया। ऐसा लगा मानो ठहरी हुईं पत्तियाँ अचानक हवा चलने से धीमे-धीमे हिलने लगीं। थोड़ी देर पहले सो कर उठने से उनमें जो उनींदापन व्याप्त था, वह न जाने कहाँ फ़ना हो गया। वे आहिस्ता-आहिस्ता देहरादून घाटी में उतरते गए। अपने चौड़े काले फ्रेम के चश्मे को उन्होंने सीधा किया और कहने लगे : देहरादून से मेरा रिश्ता गहर...

हरिशंकर परसाई का व्यंग्य लेख 'वैष्णव की फिसलन'

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                                                         हरिशंकर परसाई   व्यंग्य ऐसी विधा है जिसमें किसी मुद्दे पर तार्किक रूप से ऐसे प्रहार किया जाता है जिसमें उपहास का पुट रहे। किसी भी व्यंग्यकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती है। हरिशंकर परसाई हिन्दी व्यंग्य के सरताज हैं। जिस विषय को उठाते हुए उसे बड़ी खूबसूरती से निभाते हैं। परसाई जी का यह जन्मशताब्दी वर्ष है। इसी क्रम में आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं हरिशंकर परसाई का व्यंग्य लेख 'वैष्णव की फिसलन'।   वैष्णव की फिसलन                 हरिशंकर परसाई वैष्णव करोड़पति है। भगवान विष्णु का मंदिर। जायदाद लगी है। भगवान सूदखोरी करते हैं। ब्याज से कर्ज देते हैं। वैष्णव दो घंटे भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, फिर गादी-तकिए व...