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ध्रुव हर्ष की कविताएँ

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  ध्रुव हर्ष  ओरिगामी कागज मोड़ने की जापानी कला है। जापान में सारस पक्षी को सौभाग्य, लंबी उम्र और शांति का प्रतीक माना जाता है।वहाँ एक मशहूर परंपरा भी है, जिसे 'सेंबाज़ुरु' (Senbazuru) कहते हैं। प्राचीन जापानी परम्परा में कहा गया है कि सारस अच्छे भाग्य और दीर्घायु का प्रतीक हैं और यदि कोई एक हज़ार कागज़ के सारस मोड़ता है, तो उसकी इच्छा पूरी हो जाती है।  Sadako Sasaki एक 12 वर्ष की लड़की थी जो हिरोशिमा में, अपने घर के पास बम गिरने के कारण विकिरण प्रेरित ल्यूकेमिया से पीड़ित हो गई और अंत में दस साल बाद, 1955 में मृत्यु को प्राप्त हो गईं । उनकी कहानी ने दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित किया है और उनकी स्मृति ने ओरिगेमी सारस को शांति और आशा के एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक में बदल दिया है। अक्टूबर 1954 में सदाको के लिम्फ नोड्स में सूजन आ गई, जिसके निदान के दौरान उन्हें पता चला कि उसे विकिरण के कारण होने वाला ल्यूकेमिया हो गया है। रोग तेज़ी से बढ़ता गया। एक महीने बाद ही उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। यद्यपि सदाको जानती थीं कि उसकी हालत अच्छी नहीं थी, लेकिन वह मरना नहीं चाहती ...

विद्यासागर नौटियाल की कहानी 'माटी वाली'

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विद्यासागर नौटियाल  एक जमाना था जब घर मिट्टी के बने होते थे। इन मिट्टी के घरों की बाकायदा लिपाई पुताई की जाती थी। यह लिपाई पुताई गोबर और लाल या पीली मिट्टी से की जाती थी। लिपाई करने वाली महिलाएं होती थीं। यही उनकी आजीविका हुआ करती थी और इसी से उनका गुजर बसर हुआ करता था। लेकिन समय बदला। व्यवस्थाएँ बदलीं। यही नहीं विकास की आंधी में कुछ शहर तक अपना वजूद खो बैठे। इसकी मार समाज के निम्नतम तबकों को झेलनी पड़ी। इन्हें तो वह मुआवजा तक नहीं मिला क्योंकि उनके पास कोई आधिकारिक कागजात तक नहीं थे। विद्यासागर नौटियाल ऐसे प्रतिबद्ध रचनाकार थे जिन्होंने जन सामान्य से जुड़े उन विषयों पर कलम चलाई जिन पर सामान्य तौर पर कोई बात नहीं करता। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विद्यासागर नौटियाल की चर्चित कहानी 'माटी वाली'। कहानी 'माटी वाली' विद्यासागर नौटियाल शहर के सेमल का तप्पड़ मोहल्ले की ओर बने आखिरी घर की खोली में पहुँच कर उसने दोनों हाथों की मदद से अपने सिर पर धरा बोझा नीचे उतारा। मिट्टी से भरा एक कंटर। माटी वाली। टिहरी शहर में शायद ऐसा कोई घर होगा जिसे वह न जानती हो या जहाँ उसे न जानते हो...

यादवेन्द्र का आलेख 'अथाह पानी में डूब गई माटी'

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  विद्यासागर नौटियाल विकास अपने आप में एक विवादास्पद शब्द है। आजकल का विकास ऐसा है जो तात्कालिक रूप से तो बेहतर दिखाई पड़ता है लेकिन दूरगामी दृष्टि से इसका प्रभाव नकारात्मक होता है। तकनीक के मामले में निश्चित रूप से हम बहुत विकास कर गए हैं लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि इसने हमारे पर्यावरण को तहस नहस कर दिया है। नेपाल की त्रासदी इसका जीवन्त उदाहरण है। तिब्बत के ऊँचाई वाली जगहों पर बड़े बड़े बांध बना कर जो असंतुलन पैदा किया गया है उसके दूरगामी परिणाम कुछ इसी तरह भयावह होंगे। टिहरी बाँध से हम सब परिचित हैं। लेकिन यह बात कम लोगों को मालूम होगी कि इसके अंदर भागीरथी और भिलंगना नदियों के तट पर बसा टिहरी का पुराना शहर दफ़न है। उस समय इसे बचाने के लिए शहर के लोगों ने धरना, प्रदर्शन, हड़ताल कर अपना प्रतिरोध व्यक्त किया था। लेकिन सरकारों की ज़िद के आगे प्रायः लोगों की ज़िद कहां चल पाती है। विद्यासागर नौटियाल ने टिहरी की इसी पृष्ठभूमि को अपनी कहानी 'माटी वाली' में शिद्दत से दर्ज़ किया है। यादवेन्द्र जी ने इस कहानी के बहाने अपनी उस संस्कृति और परम्परा को याद किया है जिसकी नींव पर आज ह...

प्रेम कुमार मणि का आलेख

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सर्वपल्ली राधाकृष्णन  'मेरी दृष्टि में राधाकृष्णन'   प्रेम कुमार मणि बचपन से 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस का स्वाँग देखता रहा हूँ। जब विद्यार्थी था तब इस अवसर पर शिक्षकों के कल्याण के लिए एक कोश इकट्ठा किया जाता था। यह सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। इस अवसर पर स्कूलों में कुछ आयोजन किया जाता था। वह महान हैं के पाठ सुनते-सुनते हमारी पीढ़ी ऊब गई थी।  जब कॉलेज में पहुंचा तब इनके बारे में कुछ विशेष जाना। कुछ पढ़ा भी इनका लिखा। मेरे गुरु भिक्षु जगदीश काश्यप जी थे। राधाकृष्णन उनके मित्र थे। उनसे एक बार चर्चा की और अनुरोध किया कि राधाकृष्णन जी के बारे में कुछ बतावें। वह हँस कर टाल गये। उनकी किताब 'इण्डियन फिलॉसफी' पढ़ने के लिए कहा। उनकी एक किताब 'उपनिषदों की भूमिका' मैंने हिन्दी में पढ़ी थी। वह आकर्षक लगी थी। 'इण्डियन फिलॉसफी' के बारे में भी बहुत सुना था। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उस में कुछ विशेष नहीं दिखा। संभव है अधिक समझने का सामर्थ्य मुझ में नहीं रहा होगा। हाँ, जब वह किताब छपी थी तो इस विषय पर एक कायदे की किताब रही होगी। राहुल जी ने अपनी किताब 'दर्शन-...

सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'लेखकीय दुनिया की आबोहवा'

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सेवाराम त्रिपाठी साहित्य, संस्कृति हो या राजनीति आजकल जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों और प्रतिमानों की गिरावट सहज ही देखी जा सकती है। राजनीतिक मूल्यों और प्रतिबद्धताओं में गिरावट से सहज ही इस बात को समझा जा सकता है, जो हमेशा नेतृत्वकारी भूमिका में होती है। प्रेमचंद ने साहित्य को आगे चलने वाली उस मशाल के रूप में देखा जो राजनीति तक को दिशा दिखाती है। लेकिन लगता है वह दौर बीत गया। साहित्य में भी पतनशीलता की यह प्रवृत्ति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। जिनके कन्धों पर समाज को दिशा दिखाने की जिम्मेदारी थी वे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भाड़ बनने की होड़ में लग गए हैं।  पद, पुरस्कार और सम्मान पाने के लिए लेखक किस तरह की जोर जुगत लगाते हैं इससे लगभग सभी वाकिफ़ हैं। एक समय था जब प्रकाशक लेखकों को रॉयल्टी प्रदान किया करते थे। आज छपने की होड़ इस कदर है कि लेखक रॉयल्टी शब्द से ही अपरिचित हैं। प्रायः अपना पैसा लगा कर ही तथाकथित लेखक अपनी किताबें छपवा रहे हैं। ऐसे लेखकों का सिरदर्द होता है जगह जगह पर किताबें भेजना जिससे उस किताब की चर्चा हो सके। ये लेखक इस प्रयास में भी लग जाते हैं कि कोई पुरस्कार झटक ...