बसंत त्रिपाठी का आलेख 'नामवर सिंह (पर) एक अधूरा आलेख'
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| नामवर सिंह |
हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह एक ऐसा नाम है जिसके आस पास कोई दिखाई नहीं पड़ता। विद्वता और तर्कशीलता के चलते विरोधी भी नामवर जी का लोहा मानते थे। इस तरह वे अजातशत्रु थे। वे अपने व्याख्यानों की तैयारी जिस तरह करते थे, वह उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। संस्कृत और अंग्रेजी पर अधिकार उनकी विद्वता को और धारदार बनाते थे। शुरुआती लेखन के बाद उन्होंने लिखना छोड़ कर व्याख्यान देना शुरू किया। वाचिक परम्परा के अदभुद और अप्रतिम उदाहरण वे आजीवन बने रहे। आशीष त्रिपाठी ने कई खण्डों में उनके इन व्याख्यानों को संकलित करने का कार्य किया है। नामवर जी पर बहुत कुछ लिखा पढ़ा गया है और आज भी यह प्रक्रिया जारी है। तब भी लगता है कि नामवर जी पर अधूरा ही लिखा गया है। इस अधूरे की शक्ल में ही कवि आलोचक बसन्त त्रिपाठी ने नामवर जी की रचनात्मकता पर एक आलेख लिखा है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बसंत त्रिपाठी का आलेख 'नामवर सिंह (पर) एक अधूरा आलेख'।
'नामवर सिंह (पर) एक अधूरा आलेख'
बसंत त्रिपाठी
आलोचक की सार्थकता इस बात में है कि समकालीन साहित्य को उसने कितना जाँचा परखा है। आलोचना की मुख्य चुनौती समकालीन रचनाएँ ही होती हैं। आलोचना सिद्धांत से नहीं पैदा होती, बल्कि अपने पर्यवेक्षण से, अपने देखने-दिखाने से पैदा होती है और यह सारा देखना-दिखाना साहित्य के अंदर ही होता है। (हिंदी आलोचना की परम्परा, आलोचना और विचारधारा, पृष्ठ-150)
हिंदी आलोचना में नामवर सिंह की अप्रतिम प्रसिद्धि का एक कारण उनके उक्त मत में है। इसमें कोई संशय नहीं कि नामवर सिंह आधुनिक ज्ञान परम्परा और साहित्य के वैविध्यपूर्ण संसार को जानने वाले हिंदी के सर्वाधिक अध्ययनशील, बहसतलब और विवादास्पद आलोचक हैं। वाद, विवाद और संवाद के प्रति समर्पित नामवर जी मृत्यु से लगभग ढाई दशक पहले ही विधिवत रूप से लिखना छोड़ चुके थे। किसी बड़े प्रोजेक्ट को ले कर विस्तार से काम करने की अपेक्षा उन्होंने आलोचना की वाचिक परम्परा से खुद को जोड़ लिया था। इस दौरान देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उन्होंने घूम-घूम कर व्याख्यान और भाषण दिए। आकाशवाणी और दूरदर्शन से उनकी वार्त्ताएँ प्रसारित होती रहीं। ब्लर्ब-लेखन, आशीर्वचन और विमोचन समारोहों में उनकी उपस्थिति स्टार की सी थी। शैक्षणिक संस्थाओं और अकादमियों में उनके होने का अपना महत्त्व था। इस दौरान के बहुत से व्याख्यानों और टिप्पणियों का बड़ा हिस्सा कवि और आलोचक आशीष त्रिपाठी के संपादन में प्रकाशित हो चुका है। इन संपादित संकलनों में उनके कुछ पूर्व के व्याख्यान और कक्षा में दिए गए व्याख्यान भी शामिल हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि नामवर सिंह की हिंदी में उपस्थिति और उनके आलोचकीय कर्म का अधिकांश हिस्सा अब पाठकों और सुधिजनों के सामने है। इससे इतना तो हुआ कि साहित्य पर केन्द्रित पुस्तकों की संख्या और विविधता की दृष्टि से वे हिंदी के प्रमुख आलोचकों में सर्वोपरि हैं।
लेकिन इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंद दुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा आदि के आलोचनात्मक प्रतिमान उनके कर्म में स्पष्टतः दिखते हैं। हम उनसे सहमत हों या असहमत, लेकिन उनके प्रस्थान बिन्दु स्पष्ट हैं। ऐसा नहीं कि वे स्थिर हैं या उनमें सापेक्षिक गतिशीलता नहीं है, लेकिन उनकी स्थापनाओं और आलोचनात्मक उपकरणों के बीच का सम्बन्ध दिखाई पड़ता है। क्या यही बात नामवर सिंह के आलोचनात्मक उपकरणों के संदर्भ में भी कही जा सकती है? बाद के दिनों में उन्हें वाचिक परम्परा का महत्त्वपूर्ण आलोचक कहा जाता रहा। इससे यह ध्वनि निकलती है कि लिखित पाठ के सीमित दायरे से बाहर निकल कर लोकजागरण हेतु अपनी बात वृहत दायरे में ले जाने के लिए उन्होंने जानबूझ कर वाचिक शैली अपनायी। लेकिन यह कोरा भ्रम है। भ्रम इसलिए कि अपनी बात को वृहत्तर समाज तक ले जाने के लिए उन्होंने यह रास्ता नहीं चुना था। यह दरअसल अपनी लोकप्रियता को भुनाने की छुपी हुई आकांक्षा थी। जाहिर है कि यह लोकप्रियता उन्होंने अपने काम और उससे भी ज्यादा साहित्य और उनकी तमाम अकादमियों और शैक्षणिक संस्थाओं पर अपनी पकड़ मज़बूत करके कमायी थी। इसलिए जिसे ‘पब्लिक इंटलैक्चुअल’ कहा जाता है वैसा होने से खुद को बहुत सावधानी से बचाया। आप चाहें तो ‘सावधानी’ को ‘चालाकी’ भी पढ़ सकते हैं। ‘पब्लिक इंटलैक्चुअल’ होने का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आपको सत्ता पर लगातार सवाल उठाने पड़ते हैं। खतरे मोल लेना होता है। पुरस्कार, नियुक्ति, सरकारी खरीद और संस्थानों की सहूलियतों से हाथ धोना पड़ सकता है। ऐसे में यह खतरा उठाना ही क्यों! नामवर सिंह के मुरीदों में आज तक मैंने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखा जो उनके ज्ञान का आदर न करता हो और साथ ही उनकी पॉलीमिक्स की भी चर्चा न करता हो। क्या यह ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ था?
नामवर सिंह के बाद के अधिकांश व्याख्यान उस तरह से सुचिंतित व्याख्यान नहीं है जिस तरह से रवीन्द्र नाथ ठाकुर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, महादेवी आदि के हैं। वे लिखित भाषण कम ही देते थे। वाचिक कला का उत्कृष्ट नमूना पेश करते हुए प्रसंगात स्मृति पर आधारित उनके बाद के व्याख्यान बिखरे-बिखरे हैं। यह तो नहीं कहा जा सकता कि उनमें चिंतन के तत्त्व नहीं है या उन्होंने कोई ढाँचा नहीं बनाया होगा। उलट इसके, उनके समग्र आलोचनात्मक साहित्य में निहित चिंतनशील सूत्र बहुत काम के हैं। जैसे साठोत्तरी दौर की कविता में उल्लिखित मनुष्य को ‘महामानव’ और लघुमानव’ की तर्ज पर ‘नगण्य मानव’ कहना। या ‘किसी भी पुनर्मूल्यांकन के मूल में मूल्यों की एक व्यवस्था एवं प्रणाली होनी चाहिए। हर कवि या कृति के मूल्यांकन के लिए एक नये मूल्य और नये प्रतिमान का प्रयोग पुनर्मूल्यांकन नहीं है.’ (इतिहास और आलोचना, पृष्ठ-171) या ‘अतीत की कृतियों को आज के लिए प्रासंगिक बनाने का सबसे वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ ढंग यह है कि अपने और उनके बीच की दूरी को सुरक्षित रखा जाए और इस प्रकार पाठकों में उस आलोचनात्मक विवेक को जाग्रत रखा जाए जिससे वे अतीत की महान से महान कृति के अपने अंतर्विरोध के प्रति सजग रहें.... पार्थक्य का सतत विवेक’। (वाद विवाद संवाद, पृष्ठ-60) लेकिन लोकप्रियता, प्रभावित करने की आकांक्षा और मंच-आयोजन का दबाव या प्रभाव बहुत महीन स्तर पर उनके व्याख्यानों-वक्तव्यों में दिखाई पड़ता है। हम उनके ऐसे व्याख्यानों के मुरीद तो हो सकते हैं लेकिन क्या सचमुच सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना का कोई प्रतिमान रच सकते हैं?
नामवर सिंह के आलोचना-कर्म की मुख्यतः तीन कोटियाँ बनाई जा सकती हैं। एक, साहित्य का अध्ययन; दूसरा, सैद्धांतिक बहसों से उपजी आलोचना-दृष्टि; और तीसरा, भाषा विषयक कर्म। उन्होंने अधिकतर आधुनिक साहित्य के अध्ययन को आधार बनाया है, यद्यपि भक्ति काव्य, पश्चिमी साहित्य और संस्कृत काव्यधारा की चर्चा भी बहुत की है। सैद्धांतिक बहसों के केन्द्र में पश्चिम और पूरब के साहित्यिक-समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के अलावा हिंदी भाषा और साहित्य की समकालीन बहसें भी हैं। ऐसी बहसें अधिकतर परिमल, प्रगतिशील और आधुनिक-उत्तरआधुनिक विचारकों और लेखकों को संबोधित हैं। उनका भाषा विषयक काम मूलतः अपभ्रंश और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंधों पर केन्द्रित है जो उनके शोध का क्षेत्र रहा है। न मालूम इस काम को उन्होंने आगे क्यों नहीं बढ़ाया। हो सकता है कि वे इसकी कोई समकालीन उपयोगिता (लाभ) न देख रहे हों।
नामवर सिंह का साहित्य सम्बन्धी अध्ययन मुख्यतः बीसवीं शताब्दी के साहित्य पर केन्द्रित है। ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’, ‘कहानी : नयी कहानी’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘आलोचना की दूसरी परम्परा’ के अलावा आलेखों और व्याख्यानों का संकलन ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’, ‘भक्ति काव्य परम्परा और कबीर’, ‘किताबनामा’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। भक्तिकाव्य और समकालीन किताबों की चर्चा से संबंधित व्याख्यान और वक्तव्य-टिप्पणियों में गंभीरता और हल्केपन का कितना पंचमेल हुआ है इस पर ज्यादा न कहना ही ठीक होगा। जहाँ तक खुद ही के द्वारा लिखी या संपादित की गई किताबों की बात है, व्याख्या की सबसे गंभीर किताब है ‘आलोचना की दूसरी परम्परा’ और सबसे चलताऊ किताब है ‘कहानी : नयी कहानी’। ‘कहानी : नयी कहानी’ को तो नामवर जी ने खुद कविता के प्रतिमानों से कहानी की आलोचना कहा है। ‘परिन्दे’ को नई कहानी की पहली कृति कहने पर अब भी बहस है जबकि ‘पल प्रतिपल’ अप्रैल-जून 2002 में प्रकाशित और ‘सम्मुख’ में संकलित राजकुमार राकेश और अजीत राय से बातचीत में अपनी बात पर कायम हैं। ‘दूसरी परंपरा’ के केन्द्र में हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं जिनका उत्स रवीन्द्र नाथ ठाकुर और कबीर हैं। नामवर जी के शब्दों में यह ‘जाति-धर्म-निरपेक्ष मानव की प्रतिष्ठा है।’ (दूसरी परंपरा की खोज, पृष्ठ-15)। इसमें साहित्य और साहित्यकार के अंतर्संबंध की तलाश भी है। हालाँकि इसकी शुरुआत मुक्तिबोध की ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ से हो चुकी थी।
नामवर सिंह की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताबें ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’ हैं। यदि इन किताबों की प्रकृति पर गौर करें तो ये मूलतः छात्रोपयोगी किताबें हैं। खासकर ‘छायावाद’ और ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’। ‘छायावाद’ छायावादी काव्य पर केन्द्रित परिचयात्मक पुस्तक है। यद्यपि छायावाद संबंधी बहुत-सी भ्रांतियों का निराकरण तो यह किताब करती है लेकिन कोई नई अवधारणा प्रस्तुत नहीं करती। 12 अध्यायों में विभक्त यह छोटी-सी किताब जैसे छायावादी कविता संबंधी प्रश्नपत्रों के लिए 12 प्रश्न सुझाती है। मानो नामवर जी हिंदी विभागों के लिए प्रश्नपत्र का नमूना प्रस्तुत कर रहे हों! यही हाल ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ का भी है। छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद पर इसमें चार परिचयात्मक निबन्ध हैं। ‘प्रवृत्तियाँ’ में छायावाद पर लिखा तो सबसे अधिक याद आई द्विवेदीयुगीन कविता की, और प्रयोगवाद पर लिखा तो उसे बार-बार प्रगतिवाद के आलोक में परिभाषित करते रहे। छायावाद पर लिखते हुए उसे श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं। प्रगतिवाद पर लिखा तो वही श्रेष्ठ है। और नई कविता पर लिखा तो उससे बेहतर कुछ नहीं। बेशक आंदोलन विशेष की कविता समझने में इससे मदद तो मिलती है लेकिन क्या इससे नामवर जी की काव्य-रुचियों के बारे में कुछ ठोस पता चलता है?
नामवर सिंह छायावाद की काव्यभाषा पर मुग्ध हैं। द्विवेदीयुगीन सपाट भाषा की तुलना में छायावादी शिल्प उन्हें रुचता है। इसकी आत्मीयता उन्हें आकृष्ट करती है। दूसरे निबंध ‘केवल मैं केवल मैं’ में इसका जिक्र भी किया है। लेकिन ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’ में उन्होंने लिखा है – “प्रत्येक युग में साहित्य-रूढ़ भाषा के समानांतर कोई न कोई देशी (भाषा) अवश्य रही है और यही देशी-भाषा उस साहित्यिक भाषा को नया जीवन प्रदान कर सदैव विकसित करती चलती है। छन्द की भाषा ने तत्कालीन देशी भाषा से शक्ति अर्जित कर के संस्कृत का रूप ग्रहण किया और फिर संस्कृत अपने समय की देशी भाषा के सहयोग से प्राकृत के रूप में ढली। अवसर आने पर प्राकृत को भी अपनी आंतरिक रूढ़ि दूर करने के लिए लोकभाषा की सहायता लेनी पड़ी; फलतः भारतीय आर्यभाषा की अपभ्रंश अवस्था उत्पन्न हुई, जिसने आगे चल कर सिंधी, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी, ब्रज, अवधी आदि आधुनिक देशी भाषाओं को जन्म दिया।” (पृष्ठ-27) बेशक यह आधुनिक भारतीय भाषाओं के उदय के संदर्भ में कही गई है, लेकिन इसमें 20वीं शताब्दी की कविता की ब्रज से तत्समबहुल काव्यभाषा होने की विकास-यात्रा पर लगभग चुप्पी है। अगस्त 1983 में बिहार प्रगतिशील लेखक संघ और सिटीजंस फोरम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में ‘कार्ल मार्क्स और साहित्य’ विषय पर पेरिस पांडुलिपि का हवाला देते हुए कहा – “साहित्य की भाषा में जो ‘सृजनशीलता’ आती है, वह लोक भाषा से आती है। लोकभाषा सृजनशील होती है, सृजनात्मक होती है। उसी से शक्ति ले कर साहित्य अपने रूढ़ घिसे हुए प्रतीकों और रूपकों से मुक्त होता हुआ सृजनशीलता की ओर अग्रसर होता है। सवाल उठता है कि लोकभाषा क्यों सृजनशील होती है? क्योंकि लोकभाषा के निर्माण करने वाले सृजनशील हैं। जो लोक है, जो मेहनत करने वाला है, वही सृजनशील होता है। ‘उत्पादन’ और ‘सृजन’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” (आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धांत, नामवर सिंह, संपादक आशीष त्रिपाठी, पृष्ठ-91) यहाँ सवाल उठता है कि संस्कृत की रूढ़ि यदि देशी भाषाओं की उत्पत्ति का कारण है तो द्विवेदीयुगीन और छायावादी तत्समबहुलता लोकभाषा का दामन छोड़ कर उसी संस्कृतनिष्ठता की ओर क्यों खिसकती चली गई? क्या इसमें उन्नीसवीं शताब्दी के हिन्दी-उर्दू विवाद की कोई भूमिका नहीं थी? इसलिए मैंने कहा कि नामवर जी के प्रतिमानों में कोई क्रमिकता नहीं है। जिस साहित्य-धारा का अध्ययन किया उसे श्रेष्ठ या हीन सिद्ध करने में अपनी सारी अध्ययनशीलता झोंक दी। अपने लेख ‘इतिहास का नया दृष्टिकोण’ में लिखते हैं कि “सूर-तुलसी की भाषा से भारतेन्दु, प्रेमचन्द, प्रसाद की भाषा तत्त्वतः भिन्न नहीं है। हिन्दी दोनों ही है क्योंकि ‘आधारभूत शब्द-समूह’ और ‘व्याकरणिक गठन’ दोनों का लगभग एक है।” (इतिहास और आलोचना, पृष्ठ-150) इसी लेख में नामवर जी ने हिन्दी को भक्ति-भावना की जनवादी प्रेरणा से विकसित बताया, जिसका आगे विकास हुआ। यदि यह सोलह आने सच है तो उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में खड़ी बोली बनाम ब्रजभाषा को ले कर इतनी मारामारी क्यों हुई थी?
‘हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार’ शीर्षक निबंध में नामवर जी इतिहास लेखन में परंपरा पर बहुत जोर दिया है। उनका कहना है कि ‘परम्परा इतिहास के अन्दर केवल सम्बन्ध-भावना नहीं, बल्कि साहित्य का एक निश्चित प्रतिमान है इसलिए इतिहास अंततः समीक्षा का प्रतिमान है।... परम्परा एक व्यावहारिक प्रतिमान है : व्यावहारिक अर्थात स्वयं-प्रयुक्त और प्रयोक्तव्य, विनियुक्त और विनियोज्य, अधिक स्पष्ट शब्दों में, व्यवहार के रूप में सिद्धांत।’ (इतिहास और आलोचना, पृष्ठ-170 इसमें जोर नामवर सिंह का ही है) नामवर जी केवल इतिहास-लेखन के संदर्भ में ही यही बात नहीं कह रहे थे। वे प्रयोगवादी और नई कविता के कवियों-चिंतकों द्वारा काव्य-परम्परा के संदर्भ में पूर्ववर्त्ती काव्य-धारा पर उठाई हुई आपत्तियों से बहस भी कर थे। यदि नामवर सिंह रामचन्द्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी की इतिहास-दृष्टि का मिलान करते हैं तो यह अनायास नहीं था। ‘इतिहास की शव-साधना’ और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ इसका उदाहरण है। लेकिन इतिहास की शव-साधना की दूसरी कड़ी भी लिखी गई। रामविलास शर्मा की मृत्यु की पहली बरसी पर। हजारी प्रसाद द्विवेदी के हाथों में इतिहास शस्त्र है और रामविलास शर्मा के हाथों में आ कर आर्य और हिंदू ग्रंथि बन जाता है! ‘अँधेरे में’ का नायक दो व्यक्तित्वों में खंडित है या नहीं यह तो अलग मुद्दा है, लेकिन नामवर जी में ज़रूर है। नामवर सिंह के संवाद, सहमति और नकार की तर्क-पद्धति जानना हो तो रामविलास शर्मा पर उनका लिखा देखा जा सकता है। वैसे तो यह एक स्वतंत्र निबन्ध का विषय है लेकिन फिलहाल केवल इतना ही कि ‘रामविलास शर्मा की परंपरा-प्रियता’ तो संप्रदाय-निर्माण की दिशा में बढ़ चली थी।’ (इतिहास की शव-साधना’, आलोचना सहस्राब्दी अंक-5, पृष्ठ-246) लेकिन खुद नामवर जी कुछ अलौकिक कारणों से इससे बचे रह पाए!
‘कविता के नए प्रतिमान’ को नामवर जी ने भले बाद में ‘डिस-ओन’ कर दिया। लेकिन आज भी यह आज़ादी के बाद की कविता को समझने के लिए खूब पढ़ी जाती है। भूमिका की आरम्भिक पंक्तियों में ही उन्होंने दावा किया – “कविता के नए प्रतिमान आलोचना के उस ‘सहयोगी प्रयास’ का अंग है, जिसके पीछे नए मूल्यों की खोज और प्रतिष्ठा को ले कर चलने वाले संघर्ष का एक लंबा सिलसिला है और जिसमें हर एक का अपना आत्मसंघर्ष भी शामिल है।”
पुस्तक का प्रकाशन 1968 में हुआ। यानी इसके प्रकाशन के पचपन वर्ष बीत चुके हैं। नामवर सिंह ने इस पुस्तक में मुख्यतः कौन-सी बातें उठाई हैं इस पर ध्यान देना आवश्यक है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ दो भागों में विभक्त है। पहला भाग उन बहसों से संबंधित है जो नई कविता के दायरे में उठाए जाते रहे हैं और दूसरा भाग नए प्रतिमानों और नए काव्य-मूल्यों के आलोक में तत्कालीन कविता का विश्लेषण और मूल्यांकन है।
पहले खंड का दस्तावेजी महत्त्व है। इसमें शामिल निबंधों से गुज़रते हुए नई कविता के दौर में हो रही तमाम बहसों को जाना जा सकता है. नामवर सिंह का मानना है कि प्रयोगशील कविता के भीतर से जिस नई कविता का जन्म हुआ उसका घोषित शत्रु छायावाद है। यानी नई कविता से संबंधित कवियों की मूल चिंता छायावादी संस्कारों से मुक्त होने की थी। यहाँ ठहर कर विचार करनी ज़रूरी हो जाता है कि क्या छायावादी संस्कार एकरूप संस्कार है? फिर निराला को इसके भीतर कैसे समझा जा सकता है? यद्यपि नामवर जी ने कहा कि छायावाद के भीतर निराला की वही स्थिति थी जो नई कविता के भीतर मुक्तिबोध की थी।
छायावादी संस्कारों से मुक्त हुए बिना कविता के नए प्रतिमानों की खोज नहीं हो सकती यह सर्वमान्य राय नए कवियों की थी, ऐसा नामवर सिंह का मानना है। चूँकि इन प्रतिमानों की स्थापना अतीत-वर्तमान-भविष्य की कविताओं के लिए अचूक रामबाण की तरह काम आने वाली थी इसलिए नामवर जी लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक ‘नयी कविता के प्रतिमान’ से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें तो विजय देव नारायण साही ज्यादा महत्वपूर्ण लग रहे थे जो नई कविता के प्रतिमान की जगह कविता के नए प्रतिमान की स्थापना कर रहे थे। उन्हें जगदीश गुप्त भी महत्त्वपूर्ण लग रहे थे जो ‘कविता क्या है’ के साथ-साथ ‘नया क्या है’ जैसे प्रश्नों पर विचार करते हुए दिखाई पड़ते रहे थे। यद्यपि एक बहस में, नामवर सिंह के अनुसार, नागेश्वर लाल ने इसके बारे में स्पष्टतः कहा – “नई कविता के प्रतिमानों के बदले कविता के नए प्रतिमानों पर विचार करना अधिक अर्थपूर्ण है।” और इसका कारण यह है कि “जब-जब कविता बदलती है, उसके प्रतिमान भी बदलते हैं। पर यह नहीं कि नए प्रतिमान अभी-अभी बदली हुई कविता के लिए होते हैं। वस्तुतः वे कविता के समग्र रिक्थ के लिए होते हैं, उनके आधार पर नया युग अपनी कविताओं का मूल्यांकन तो करता ही है, पूर्वजों की कविता का फिर से मूल्यांकन करता है और इस तरह उसे नए संदर्भ में पुनः अंगीकृत करता है।” (कविता के नए प्रतिमान, पृष्ठ-28) जाहिर है कि नए प्रतिमानों की खोज और स्थापना के लिए अपने समय से जुड़ना और जूझना ज़रूरी था। पहले खंड में नामवर जी यही करते हैं। इन बहसों का संबंध नई कविता की सैद्धांतिक चेतना से है। नामवर सिंह का एक प्रमुख अवदान इन निबंधों के मार्फत यह दिखता है कि बिना भारतीय एवं पश्चिमी काव्यशास्त्र का अवगाहन किए कविता के या साहित्य के बारे में कोई भी बात या निष्कर्ष अपूर्ण ही रहेगा।
यद्यपि यह सही है कि इन निबंधों में कोई भी बात नामवर जी ने अपनी ओर से नहीं कही है। वे खंडन के तर्क तेज़ करते हैं और सहमति का शास्त्र और सैद्धांतिकी गढ़ते हैं और जिनसे अक्सर सहमत होते हैं वे प्रयोगशील-नई कविता के रचनाकार और चिंतक ही हैं। जैसे अज्ञेय, रघुवीर सहाय, रामस्वरूप चतुर्वेदी, जगदीश गुप्त, विजय देव नारायण साही, मुक्तिबोध, लक्ष्मीकांत वर्मा, भारत भूषण अग्रवाल आदि-आदि। इस खंड के घोषित खलनायक नगेंद्र हैं क्योंकि उन्होंने प्राचीनता के प्रतिमानों के आधार पर प्रयोगवाद और नई कविता का विरोध किया। गाहे-बगाहे नंददुलारे बाजपेयी को भी विरोध करने के लिए याद कर लिया गया है। ‘छायावाद’ और ‘प्रतिमान’ को एक साथ पढ़ते हुए इसका पता नहीं चलता कि कौन-कौन-सी प्रवृत्तियाँ काव्य के लिए समान रूप से हानिकारक हैं।
ध्यान देने की बात यह कि नामवर सिंह की जिन लोगों से सहमति या रचनात्मक असहमति बनती है वे या तो इलाहाबाद से जुड़े परिमल समूह के लोग हैं या फिर दिल्ली के रचनाकार हैं। मुक्तिबोध एकमात्र अपवाद हैं। कहीं इसके पीछे साहित्य के नए सत्ता-तंत्र की स्थापना का प्रयास तो नहीं था?
यह सवाल इसलिए पैदा होता है क्योंकि ‘इतिहास और आलोचना’ की बहस मुख्यतः प्रयोगवादियों-परिमलवादियों से है। वह छठे दशक का दौर था। नामवर जी अभी साहित्य-तंत्र के शीर्ष पर न पहुँचे थे। ‘आलोचना’ पर परिमल समूह का कब्जा था। लेकिन 1968 तक स्थितियाँ काफी बदल चुकी थी। कह सकते हैं कि नामवर जी के आलोचनात्मक प्रतिमानों में तर्क और विवेक की बजाय ‘टाइमिंग’ हावी रहता है। उनका तो मानना भी है कि ‘अपने सर्जनात्मक रूप में आलोचना-कर्म मूलतः व्यक्तिगत प्रयास है, क्योंकि कृति-संबंधी प्रत्येक सच्ची प्रतिक्रिया वैयक्तिक ही होती है।’ साहित्य का पुनर्मूल्यांकन इसी के कारण संभव हो पाता है। (आलोचना की भाषा, वाद विवाद संवाद, पृष्ठ-22) व्यक्ति-मन की निर्मिति के ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों का यहाँ सिरे से नकार है। इतिहास के नए दृष्टिकोण के लिए जिस द्वंद्वात्मक पद्धति का समर्थन वे 1952 के इसी शीर्षक निबन्ध में कर रहे थे, लगता है, 1968 के बाद उसकी ज़रूरत नहीं रह गई थी। फिर भी ‘इतिहास और आलोचना’ में जो बहसें उन्होंने की है उसका मार्क्सवादी आलोचना के विकास की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्त्व है।
स्वातंत्र्य चिंतन के नाम पर छठे दशक के साहित्य-चिंतन में जो अवसरवाद पनप रहा था, नामवर सिंह ने ‘आस्था का प्रश्न’ शीर्षक निबन्ध में जो खबर ली है, वह आज भी हमारे काम का है। वे भक्ति काव्य या छायावाद को तत्कालीन मनुष्य के संकट से जोड़ कर देखते हैं। उस अनुभूति को वे निजी नहीं मानते बल्कि संपूर्ण समाज की व्यथा मानते हैं। (भ्रम और वास्तविकता, इतिहास और आलोचना, पृष्ठ-63) वे संतों और भक्तों की वाणी को अत्याचार के नग्न-रूप की प्रतिक्रिया कहते हैं। (सामाजिक संकट और साहित्य, उप. पृष्ठ-35) लेकिन ‘भक्ति काव्य-परंपरा और कबीर’ शीर्षक पुस्तक में संकलित एक व्याख्यान ‘भक्ति-आंदोलन और भक्ति काव्य : एक पुनर्विचार’ में भक्ति काव्य को अलौकिक मानते हुए कहते हैं : “तुलसीदास दरिद्र होने के कारण और कबीरदास जुलाहा होने के कारण दुखी होते तो भक्ति काव्य में वह गहराई, वह खनक, वह लोकव्याप्ति न होती.... और किसी शब्द के अभाव में मैं यही कहूँगा कि यह लौकिक से ज्यादा बड़ी कोई अलौकिक या कोई आध्यात्मिक वेदना रही होगी जिस वेदना ने उस उदात्त और ऊँची भूमि पर काव्यों को प्रतिष्ठित करने की कोशिश की।” (पृष्ठ-45) पाठक घूमता रह जाए कि भक्ति काव्य के कवि समाज के वास्तविक संकट से जूझ रहे थे या किसी आध्यात्मिक वेदना से ग्रस्त थे! ऐसे में उन्हें किसी शब्द का अभाव क्योंकर न लगे! कहाँ तो ‘सामाजिक संकट और साहित्य’ में यह बात कि ‘संकट काल में भी श्रेष्ठ साहित्य उत्पन्न होता है लेकिन तब जब समाज में उस संकट के विरुद्ध असंतोष का बीज हो। इस असंतोष को लोकजीवन से जितना ही बल प्राप्त होता है, उसमें उतना ही ओज आता है और साहित्य का स्वर उतना ही ऊँचे उठता है। संत-भक्ति युग में संतों के असंतोष के पीछे लोकजीवन का यही नैतिक बल था’। (इतिहास और आलोचना, पृष्ठ-34) और कहाँ उपरोक्त आध्यात्मिक वेदना। आलोचना के व्यक्तिगत प्रयास की यह परिणति होनी ही थी! ऐसे में 1988 में दिए गए ‘आलोचना और संस्थान’ शीर्षक व्याख्यान की इस बात का क्या औचित्य रह जाता है कि ‘साहित्य को स्वायत्त और इसके साथ ही आलोचना को भी एक अमूर्त बौद्धिक व्यापार मानने वाले लेखक भी अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि आलोचना भी एक संस्थान है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि आलोचना के उदय और विकास या ह्रास का एक ठोस सामाजिक आधार है जिससे किसी हद तक उसका स्वरूप निर्धारित होता है।’ (वाद विवाद संवाद, पृष्ठ-135)
‘दूसरी परंपरा की खोज’ में नामवर जी ने लिखा कि हजारी प्रसाद द्विवेदी अपनी अंतिम पुस्तक तुलसी दास पर लिखना चाहते थे। यह भी लिखा कि “द्विवेदी जी की आलोचना में व्याख्या की भूमिका प्रधान नहीं है, प्रधान भूमिका है उद्धरणों के चयन की। प्रसंग के अनुकूल वे ऐसे उद्धरण चुनकर लाते हैं कि किसी अतिरिक्त युक्ति की आवश्यकता नहीं रह जाती इस कला के क्षेत्र में वे अप्रतिम आचार्य हैं।” (पृष्ठ-132) क्या यही दूसरी परंपरा थी? वैसे नामवर जी ने भी बाद में इस कला को बखूबी साध लिया था। तुलसी दास को नामवर जी जितना उद्धृत करते हैं उतना शायद ही कोई करता हो। परसाई जी भी करते हैं लेकिन वे अक्सर यथास्थितिवाद के समर्थकों के मुख से तुलसी को उद्धृत करवाते हैं. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़ने से पूर्व 1968 में नामवर सिंह ने ‘विश्वविद्यालय में हिन्दी’ (वाद विवाद संवाद) शीर्षक निबन्ध में जो लिखा था वे खुद उसमें कितने गिरफ्त हो गए, इसका निर्णय पाठकों पर छोड़ते हुए उनके इसी निबन्ध के तीन उद्धरणों से इस अधूरे लेख को अधूरा छोड़ना चाहूँगा : सांस्थानिक दृष्टि से हिंदी आलोचना के विकास में विश्वविद्यालयों के स्वातंत्र्योत्त्तर हिंदी-विभागों का कोई योगदान नहीं है क्योंकि सांस्थानिक रूप में वे ऐसा वातावरण दे सकने के योग्य नहीं।”
“गुरु की चिंतन-परंपरा का विकास उत्तरदायित्वपूर्ण असहमति का साहसी शिष्य ही कर सकता है, सतत सहमति का भीरु सेवक नहीं और स्थिति यह है कि अब के आचार्य सेवक चाहते हैं, शिष्य नहीं।”
“प्रकाशन का अधिकांश तो छात्रोपयोगी सामग्री प्रकाशित करने की दिशा में चल ही पड़ा है, लेखन भी इस दबाव को शिद्दत से महसूस कर रहा है। आलोचना तो खैर नब्बे प्रतिशत शिक्षोपयोगी ही हो रही है।”
(अन्विति के हालिया अंक से साभार।)
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| बसन्त त्रिपाठी |
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ई-मेल : basantgtripathi@gmail.com







बसंत त्रिपाठी का नामवर सिंह की आलोचना पर केंद्रित अंक पूरा पढ़ गया। नामवर की आलोचना पर यह एक वस्तुनिष्ठ और बेबाक आलेख है।
जवाब देंहटाएंचंद्रेश्वर, लखनऊ
नामवर सिंह की आलोचना पर कवि-आलोचक बसंत त्रिपाठी का लिखा दिलचस्प लेख पूरा पढ़ गया. भाई बसंत का बेबाक लेखन बहुत पसंद आया.
जवाब देंहटाएंबसंत त्रिपाठी का यह आलेख प्रकाशित कर अन्विति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह पत्रिका केवल सृजन की ही नहीं बल्कि आलोचना की भी प्रमुख पत्रिका होने जा रही है.
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